संत-सिपाही दशम गुरु का ३५०वाँ प्रकाशोत्सव

दशम गुरु गोविंद सिंह का ३५०वाँ प्रकाशोत्सव पूरे देश में बडे़ हर्षोल्लास से मनाया गया। उनके जन्मस्थान पटना साहब में भव्य आयोजन हुए। इसी प्रकार आनंदपुर साहब, दशम गुरु की प्रेरणा से जहाँ खालसा का जन्म हुआ, वहाँ भी बड़े-बड़े जश्न मनाए गए। दिल्ली के भाई वीरसिंह सदन में आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय गोष्ठी का उद्घाटन मान. उपराष्ट्रपति श्री हामिद अंसारी ने किया। गुरु गोविंद सिंह की एक जीवनी का भी विमोचन हुआ। आशा है, इस गोष्ठी में प्रस्तुत किए गए आलेख पुस्तकाकार प्रकाशित होंगे। गुरु गोविंद सिंह केवल सिख समुदाय के ही आदरणीय नहीं हैं। वे उन मानव-मूल्यों के प्रतीक हैं, जिनकी आज देश और विश्व को बड़ी आवश्यकता है। उनका जीवन बलिदान और त्याग, निस्पृहता और निडरता की जीती-जागती कहानी ही नहीं, मशाल है, प्रकाश-स्तंभ है। बचपन में सभी की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए पिता गुरु तेग बहादुर का आत्मोत्सर्ग और अपने चारों पुत्रों का बलिदान धर्म और सिद्धांतों के लिए बलिदान की गाथा अनुपमेय है। वे एक कुशल योद्धा तो थे ही, पर साथ-ही-साथ साहित्य-प्रेमी, कवि, दार्शनिक और रचनाकार भी थे। वे विद्वानों व कवियों के संरक्षक रहे और उन्हें सदैव प्रोत्साहन देते रहे। गुरुजी के संघर्षमय जीवन में भी साहित्यिक गतिविधियाँ चलती रहती थीं। वे स्वयं हिंदी, ब्रज, पंजाबी, संस्कृत, उर्दू, फारसी आदि भाषाओं के ज्ञाता थे। उनकी प्रशासनिक दृष्टि ऐसी थी कि उन्होंने मसनदों की परंपरा को समाप्त कर दिया, क्योंकि वे जनता का शोषण कर रहे थे। गुरुजी न्याय और सत्य के पक्षधर थे। सही माने में उनको संत-सिपाही की संज्ञा दी गई। सब कष्टों के बावजूद करुणा और मानवता के गुण उनके व्यक्तित्व एवं व्यवहार में सदैव प्रदर्शित होते रहे। इसलाम धर्म से उनका विरोध नहीं था। वे तो मुगलों और उनके सूबेदारों के अत्याचारों के विरोध में लड़ते रहे। गुरु गोविंद सिंह के करीब ग्यारह काव्य ग्रंथ हैं। उनमें गुरु की दार्शनिकता, रहस्यवादी प्रवृत्ति और जीवन के लक्ष्य का पता चलता है। ‘वचित्तर’ नाटक में गुरुजी की अपनी कहानी है।

उनका ‘जफरनामा’ अत्यंत प्रभावी है। जफरनामा फारसी में काव्यात्मक एक पत्र है। औरंगजेब को गुरु गोविंद सिंह ने लिखा कि सब कोशिशों के बाद भी न्याय न दिखे तो तलवार उठाना उचित है। दशम ग्रंथ में उनकी सब रचनाएँ संकलित हैं। गुरु गोविंद सिंह ने गुरु ग्रंथ को अंतिम रूप दिया, उसमें अपने पिता गुरु तेगबहादुर की कुछ रचनाएँ शामिल कीं, पर अपनी नहीं। गुरु गोविंद सिंह की जादुई वाणी और करिश्माई व्यक्तित्व ने बंदा वैरागी (माधव दास) को बंदा बहादुर सिंह के रूप में निखार दिया और बंदा का नाम भी आत्माहुति और बहादुरी के लिए इतिहास में अंकित हो गया। नांदेड़ पड़ाव में जब वे दक्षिण जा रहे थे, दो अफगान सेवकों ने उनको छुरा भोंक दिया, जिससे कुछ दिनों के बाद उनका देहांत हो गया। अपनी मृत्यु के पहले गुरु गोविंद सिंह ने एक बड़ा दूरदर्शिता का कार्य किया। गुरु सत्ता किसी व्यक्ति को न देकर श्रीगुरुग्रंथ साहब को ही भविष्य के लिए अनंत गुरु घोषित कर दिया। अपनों के लिए भी भविष्य में उत्तराधिकार के विषय में किसी विवाद की संभावना ही नहीं रही। ऐसे महामानव के प्रति पूरा देश श्रद्धापूर्वक नतमस्तक है।

कलेंडर में फोटो का विवाद

सरकार व्यर्थ में कभी-कभी ऐसे विवादों में फँस जाती है, जो बेमानी हैं, किंतु विरोधी दलों को सरकार की आलोचना करने का एक अवसर मिल जाता है, वे भ्रांति फैलाते हैं। इसी प्रकार का प्रकरण है—खादी ग्रामोद्योग कमीशन के २०१७ के कलेंडर में गांधीजी की तसवीर की जगह प्रधानमंत्री मोदी की चरखा चलाते हुए फोटो को रखना। शायद खादी कमीशन की २०१६ की डायरी में भी यही हुआ था। राजग सरकार द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अधिक-से-अधिक प्रचारित करने में कोई बुराई नहीं है। यह उचित ही है, पर इसमें कुछ कल्पनाशीलता, सोच और समझदारी दिखाना आवश्यक होता है। अन्य सरकारें भी अपने प्रधानमंत्री को प्रचारित करती रही हैं। कलेंडर के प्रकरण में खादी कमीशन के कुछ कर्मचारियों ने विरोध प्रदर्शन कर लिया, पर वह शांत हो गया। इस समय पर ऐसा राजनैतिक माहौल है कि कांग्रेस, तृणमूल, सी.पी.एम. एवं कुछ अन्य विरोधी दल इस फिराक में ही रहते हैं कि कहीं कुछ मिले तो उसे तिल का ताड़ बना दिया जाए। एन.सी.पी. के नेता प्रफुल्ल पटेल ने कहा है कि कलेंडर और डायरी विवाद निरर्थक है। खादी कमीशन का यह भी कहना है कि न ऐसी कोई परंपरा है और न ही कोई नियम अथवा कानून है कि केवल गांधीजी का ही फोटो कलेंडर अथवा डायरियों में रखा जाए। पहले कई सालों के कलेंडर में गांधीजी की फोटो नहीं रही थी, किंतु न कांग्रेस, न अन्य किसी विरोधी दल ने कोई एतराज किया। इसीलिए हमने कहा कि खादी कमीशन के अधिकारी कुछ कल्पनाशीलता और दूरदर्शिता दिखाते तो यह व्यर्थ का बवंडर होने से बच जाता। यह भी सही है कि नरेंद्र मोदी ने खादी के प्रचार की ओर विशेष ध्यान दिया। बदलते परिवेश में उसमें आधुनिक रुचियों का ध्यान रखना चाहिए, इस बात पर जोर दिया गया है। प्रधानमंत्री द्वारा उत्साहित करने के कारण खादी प्रचार को बल मिला और खादी की बिक्री में २० प्रतिशत की वृद्धि हुई।

अतएव गांधीजी की फोटो रहते हुए भी प्रधानमंत्री के चरखा चलाते हुए फोटो को रखा जा सकता था। गांधीजी की फोटो कुछ बड़ी और उनके साथ मोदी की फोटो कुछ छोटी, जैसा कि अकसर हम विज्ञापनों में देखते हैं, जहाँ प्रधानमंत्री की बड़ी फोटो के साथ किसी अन्य मंत्री की छोटी फोटो होती है। तब किसी को यह कहने का मौका नहीं मिलता कि प्रधानमंत्री गांधीजी का स्थान ले रहे हैं। कहा जा सकता कि मोदी गांधीजी की विरासत को और समृद्ध कर रहे हैं। हालाँकि विरोधियों का गांधी विचारधारा से कोई संबंध नहीं है। गांधीजी ने देश में चरखे के प्रचलन के लिए अथक परिश्रम किया, अतएव खादी के साथ उनका नाम जुड़ गया। ऐतिहासिक और भावात्मक दृष्टि से हमें उसका आदर करना चाहिए। गांधी राष्ट्रपिता हैं, खादी उनकी विशेष देन है। उन पर अथवा खादी पर एक विशेष पार्टी का ही एकाधिकार नहीं है।

प्रधानमंत्री को कोसनेवाले यह भूल जाते हैं कि राजनैतिक वंशवाद का प्रारंभ नेहरू-गांधी परिवार के रूप में हुआ। यही नहीं, कितनी संस्थाओं योजनाओं, हवाई अड्डे, पार्क, सड़कें, अस्पतालों आदि के नाम इस बात के परिचायक हैं कि व्यक्तिवाद के जन्मदाता कौन हैं। जहाँ तक हमारा प्रश्न है, कोई भी राजनैतिक दल हो, लोकतंत्र में व्यक्तिपूजा का स्थान नहीं होना चाहिए। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान बनने के उपरांत देश को इस दिशा में आगाह भी किया था। एक बात, जो बहुत अखरती है—वह है राजनैतिक दलों में बढ़ती बड़बोलों की संख्या। भाजपा में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है। सरकार भाजपा की है, अतएव वह भी इनकी टिप्पणियों की चपेट में आ जाती है। हरियाणा के एक वरिष्ठ मंत्री विज कलेंडर के विवाद में कूद पड़े और मोदी को खादी के लिए बेहतर ब्रांड बताया। यह भी कह डाला कि गांधी का नाम नोट के ऊपर चिपक गया, जिससे नोट का अवमूल्यन हो गया। बाद में अपना कथन वापस लिया। थूककर चाटना कोई अच्छी बात नहीं। स्पष्टीकरण की जरूरत होती तो मोदी हर प्रकार से सक्षम हैं। इस तरह की बातों में चाटुकारिता की गंध आती है। अत्यधिक उत्साह में बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के राजस्थान के एक मंत्री कह गए कि गाय केवल ऑक्सीजन की साँस लेती है और ऑक्सीजन ही निकालती है। ऐसे बयान हास्य के कारण बन जाते हैं।

२०१७ का विश्व पुस्तक मेला

२०१७ के दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में स्वास्थ्य की बाध्यताओं के कारण हमारा स्वयं जाना नहीं हो सका, यद्यपि काफी पुस्तकें सूचीपत्रों और व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर मँगा सका। किंतु क्रय करने के पहले पुस्तक के पन्ने खोलने, इधर-उधर थोड़ा पढ़ने आदि से जो सुख मिलता है, उससे वंचित रहा। समाचार-पत्रों में पढ़कर कि इस बार प्रतिदिन अच्छी भीड़ रही और रविवार होने से अंतिम दिन और भी ज्यादा भीड़ मेले में देखने को मिली। लड़के-लड़कियाँ, महिलाएँ, वृद्ध, सभी ने मेले में रुचि दिखाई। केवल भीड़ ही नहीं जुटी, समाचार-पत्रों के अनुसार पिछले वर्ष के मुकाबले में पुस्तकों की खरीदारी करीब २० प्रतिशत अधिक रही। पुस्तक विक्रेताओं और प्रकाशकों के लिए यह बहुत संतोषजनक बात है। नोटबंदी के कारण डर था कि कहीं पुस्तकों की माँग पर बुरा असर न पडे़, अतः डिजिटल माध्यम से भी पेमेंट करने की व्यवस्था की गई थी। पर यह डर पाठकों के उत्साह के कारण गलत साबित हुआ। महिलाओं की रचनाधर्मिता विषय को इस वर्ष केंद्र में रखा गया था। पूरे देश में पिछले दो सौ सालों से महिलाएँ अपने अनुभव पर आधारित बहुत कुछ लिख रही हैं, पर उन्हें प्रकाशन के अवसर नहीं मिल पाते थे। अब धीरे-धीरे यह अभाव दूर हो रहा है। बाल-साहित्य के विषय में भी रचनाकारों को यह आकलन करने का अवसर मिला होगा कि बालिकाएँ और बालक आज के तकनीकी और वैश्विक वातावरण में किस प्रकार की रचनाओं की अपेक्षा करते हैं, क्योंकि वे मानसिक रूप से पहले की पीढि़यों के मुकाबले अधिक चैतन्य हैं। खैर, जो भी हो, इस बात से प्रसन्नता है कि आनेवाली पीढि़याँ केवल इंटरनेट पर ही निर्भर नहीं रहेंगी, वे हाथ में लेकर पुस्तक पढ़ना चाहेंगी। ये अच्छे लक्षण हैं। प्रकाशक खुश हैं कि अच्छी बिक्री रही और साहित्यकार भी कि पाठक उनकी रचनाओं का आदर करते हैं। कुछ प्रकाशकों ने आखिरी दिन पुस्तकों पर दस की जगह बीस प्रतिशत का डिस्काउंट दिया। हिंदी और अंग्रेजी पुस्तकों की खरीदारी संतोषजनक रही। कुछ बडे़ प्रकाशक, खासकर अंग्रेजी के उसमें शामिल नहीं हुए, ऐसा क्यों हुआ? यही नहीं, हमारी पुरानी शिकायत कि राज्य सरकारों के प्रकाशन संस्थान एवं विभागीय प्रकाशनों का अभाव इस बार भी रहा। नेशनल बुक ट्रस्ट को दूसरे राज्यों के प्रकाशकों से अधिक संपर्क साधना चाहिए। राज्य सरकारों से भी इस विषय पर बातचीत करनी चाहिए। अगर मेला देश के प्रकाशकों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं करेगा तो वह कुछ विदेशी स्टॉलों के आधार पर, जो केवल प्रचार के लिए होते हैं, सही माने में ‘विश्व पुस्तक मेला’ नहीं कहा जा सकता। वैसे आज भारत का प्रकाशन विश्व स्तर का होता जा रहा है और भारतीय प्रकाशन का स्वयं में विविधता की दृष्टि से अपना एक संसार है।

सरकार को निर्यात के लिए भारतीय प्रकाशकों को विशेष सुविधाएँ देने पर विचार करना चाहिए। हम समझते हैं कि कुछ छोटे प्रकाशक देश के, दिल्ली के आसपास के भी एवं ऐसी संस्थाओं के प्रकाशन, जो पाठकों की सुविधा के लिए अपना लाभांश कम रखते हैं, वे भी मेले में भाग नहीं ले पा रहे हैं। संबंधित सरकारी मंत्रालयों और विभागों को किराए के बारे में पुनर्विचार करना चाहिए। मेले में आने की फीस नाममात्र की होनी चाहिए। पुस्तकों को आज पावर या मृदु शक्ति कहा जाता है, जबकि उनकी क्षमता का इतिहास साक्षी है। राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक अथवा आर्थिक परिवर्तन की दृष्टि से पुस्तकों का प्रभाव कम नहीं है। वैसे भी अच्छी पुस्तकों की आवश्यकता है, अच्छे नागरिक तब ही बन सकेंगे। मानव संसाधन मंत्रालय और संस्कृत मंत्रालय को भान होना ही चाहिए कि पुस्तक प्रकाशन एवं पढ़ने की आदत में वृद्धि के लिए कुछ भी दिया जाना, जनता के धन का जनता के हित में और देश के विकास के लिए सदुपयोग ही है। नेशनल बुक ट्रस्ट को हीरक जयंती के लिए बधाई, साधुवाद। साठ वर्षों से प्रशंसनीय कार्य किया है, भविष्य में उसे और कैसे आगे बढ़ाया जाए, इसके लिए जनसंवाद करना चाहिए। विश्व पुस्तक मेले को कैसे और अधिक सार्थक बनाया जा सकता है, उसके बारे में विज्ञों और स्टॉक होल्डरों से विस्तृत विचार-विमर्श करना चाहिए। आपसी संवाद खुलकर होंगे, तभी विश्व पुस्तक मेला अधिक आकर्षक और अर्थपूर्ण होगा।

मालवीयजी और बी.एच.यू. के सौ वर्ष

इस स्तंभ में एक बात की ओर, जिसके विषय में कई बार चर्चा कर चुके, किंतु उस दिशा में प्रगति होती दिख नहीं रही है, ध्यान दिलाना चाहते हैं। मालवीयजी की १५०वीं वर्षगाँठ कब की बीत चुकी। घोषणा की गई थी विश्वविद्यालय के विशेष कन्वोकेशन, जिसमें नेपाल के तत्कालीन राष्ट्रपति को ‘डॉक्टरेट’ की मानद डिग्री प्रदान की गई थी। स्वयं हमने तथा बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति डॉ. करन सिंह ने भी कहा कि सरकार से आर्थिक सहायता मिलने के बावजूद कुछ काम नहीं हो रहा है, विशेषतया, मालवीयजी के भाषणों और लेखों, साक्षात्कार आदि के संकलन का। युवा मालवीय कांग्रेस के दूसरे वार्षिक अधिवेशन (कलकत्ता) में शामिल हुए और तीन बार कांग्रेस के प्रेसीडेंट चुने गए। दीर्घकालीन सामाजिक और राजनीतिक सक्रिय जीवन में वे अनेक संस्थाओं से जुडे़। प्रांतीय और सेंट्रल एसेंबली, दोनों के सदस्य रहे। उनके भाषण हिंदी और अंग्रेजी में जगह-जगह बिखरे पडे़ हैं। उनकी पत्रावली भी होगी। सबको खोजना है। १९४० के उपरांत उनकी सार्वजनिक गतिविधियाँ वृद्धावस्था के कारण कम होने लगी थीं, किंतु मृत्युपर्यंत देश में क्या हो रहा है, वे सजग रहे। डॉ. करन सिंह और संस्कृति मंत्रालय को जब यह सुझाव दिया था कि उनके भाषण, लेखों आदि के संकलन का दायित्व नेहरू मेमोरियल और लाइब्रेरी को दिया जाए, शीघ्रता से और सामग्री का पता लगाकर वहाँ के अनुभवी और विज्ञ शोधकर्ता संकलन का संपादन कर सकते हैं। वैज्ञानिक ढंग से यह काम होगा। तत्कालीन नेहरू लाइब्रेरी के डायरेक्टर डॉ. रंगरंजन और संस्कृति मंत्रालय के ज्वॉइंट सेक्रेटरी ने बताया कि हमारा सुझाव स्वीकार हो गया है। बी.एच.यू. में इस बृहत् कार्य के लिए न उचित वातावरण है और न सक्षम शोधकर्ता हैं। बहुत से कलक्टेड और सलेक्टेड वर्क्स नेहरू लाइब्रेरी के तत्त्वावधान में प्रकाशित हो चुके हैं। मोतीलाल नेहरू के चयनित वर्णन उनमें हैं। राजाजी के सेलेक्टेड वर्क्स (चुनिंदा संकलन) पर काम हो रहा है। दो या तीन भाग निकल भी चुके हैं। बनारस विश्वविद्यालय का प्रकाशन विभाग कभी बहुत अच्छा था, वह अब दयनीय अवस्था में है।

मालवीयजी की १५०वीं जयंती पर वहाँ कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं हुआ। केवल खाना-पूरी हुई। कुछ पुराने प्रकाशन पुनः प्रकाशित कर दिए गए—बिना किसी परिमार्जन अथवा परिवर्तन के। हम इस ओर इस वजह से विशेष ध्यान दिलाना चाहते हैं कि २०१६ बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी का शती वर्ष है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो वाराणसी के सांसद भी हैं, प्रारंभिक आयोजन में गए भी थे। विश्वविद्यालय के प्रारंभिक दिनों के विषय में एक अच्छा शोधग्रंथ एक विदेशी महिला द्वारा लिखा गया, प्रकाशित भी हुआ था। यूनिवर्सिटी ने भी ३०-४० साल पहले ‘हिस्टरी ऑफ बी.एच.यू.’ नामक ग्रंथ निकाला था। दो साल पहले जब वाराणसी गया तो देखा, उसको जैसे का तैसा फिर छाप दिया गया है। कोई पूरक या सप्लीमेंट जोड़ने की भी कोशिश नहीं की गई। हम चाहते हैं कि कम-से-कम इस वर्ष तो मालवीयजी की कृतियों के संकलन पर किसी प्रकार का वैज्ञानिक रूप से कार्य प्रारंभ हो। नेहरू लाइब्रेरी को इसका दायित्व तुरंत देना चाहिए। रचनावलियों या संगृहीत भाषणों का केवल सामग्री एकत्र करने के काम तक सीमित नहीं है। उन पर टिप्पणियों की आवश्यकता होती है, ताकि जो कहा गया, उसकी पृष्ठभूमि और संदर्भ स्पष्ट हो सकें। यूनिवर्सिटी कम-से-कम अपने विकास के इतिहास को २०१५ तक लाने की कोशिश करे, कम-से-कम नया न लिखवा सके तो पुराने ग्रंथ का एक समुचित पूरक ही तैयार करवाकर प्रकाशित करे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का सौ वर्ष का गौरवशाली इतिहास है। वह ऐसे व्यक्ति की देन है, जिसे न कभी किसी प्रकार का मद रहा, न किसी तरह का मोह और जिसने अपनी सेवाओं व उपलब्धियों से देशवासियों का मन मोह लिया। अतएव विश्वविद्यालय की विकास-यात्रा का परिचय जन-साधारण को होना॒चाहिए।

राष्ट्रगान या कुछ और

गत माह के अंक में सर्वोच्च न्यायालय ने सिनेमाघरों में फिल्म दिखाने, उसके साथ राष्ट्रध्वज फहराने के विषय में जो निर्णय दिया, उसमें जो प्रोटोकॉल या आचार-संहिता निश्चित हुई, उसके विषय में जो प्रतिक्रियाएँ आईं, उसके विषय में कुछ लिखा गया था। अब इस संबंध में जो समाचार आ रहे हैं, उनसे पता चलता है कि जनता ने इस कदम को सराहा और स्वीकार किया है। तथाकथित व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं विभिन्न विचार व्यवहार के झंडावरदारों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को बडे़ विकृत रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की गई, इसे जनता पर दक्षिणपंथी विचारधारा और देशभक्ति तथा राष्ट्रीयता की अवधारणा से जोड़ने का प्रयास किया, पर कोई खास सफलता नहीं मिली। वैसे जब विचार हो रहा था कि कौन सा राष्ट्रगान हो—टैगोर का ‘जन-गण-मन’ अथवा बंकिम का ‘वंदेमातरम्’, तो देश में दो प्रकार की राय थी और उसके अलग-अलग तर्क थे। जनता का बहुमत तो ‘वंदेमातरम्’ के पक्ष में था, किंतु अन्य कारणों से प्रधानमंत्री नेहरू ने ‘जन-गण-मन अधिनायक’ को राष्ट्रगान घोषित करवा दिया। आज हम सब उसे स्वीकार करते हैं। उस समय क्या तर्क थे और क्या सोच थी, एक राष्ट्रगान के क्या लक्षण हैं आदि, उसका एक अनुमान हमें लगा, जब एक पारसी प्रो. के.डी. सेठना, जिनको ‘अमल किरन’ का नाम श्रीअरविंद ने दिया था, उन्होंने ‘मदर इंडिया’ में, जो उस समय बंबई से प्रकाशित होता था, इस विषय में अपने विचार संपादकीय के रूप में प्रकाशित किए, पत्रिका का संपादन प्रो. के.डी. सेठना करते थे। यह संपादकीय इस कारण महत्त्वपूर्ण है कि प्रो. सेठना प्रत्येक संपादकीय पहले श्रीअरविंद के अवलोकन और संस्तुति के लिए भेजते थे। श्रीअरविंद ‘वंदेमातरम्’ के पक्ष में थे, क्योंकि उस समय के राष्ट्रीय संघर्ष में यह ‘बेटल क्राई’ यानी ‘युद्धघोष’ की तरह प्रेरक था। यह संपादकीय ‘The Indian Spirit and the World Scene’ नामक चयनिका में १९५३ में छपा और चयनिका पुनः २००४ में मुद्रित हुई। यह श्री सेठना (स्व.) के अन्य बडे़ संकलन ‘India and the World Scene’ में भी है, जो १९९७ में छपा। दोनों श्रीअरविंद सोसाइटी, पांडिचेरी के प्रकाशन हैं। बहुत से पाठक शायद उसे पढ़ना चाहें।

इस समय बहुत सी समस्याएँ हैं, जो एक अनिश्चितता और परेशानी का कारण बन सकती हैं। चीन और पाकिस्तान की बढ़ती हुई दोस्ती, चीन की परोक्ष में धमकियाँ, इंडियन महासमुद्र में अपनी न्यूक्लियर पनडुब्बियाँ भेजने जैसे कदम हमारी परेशानियाँ बढ़ा सकते हैं। भारत के अमेरिका से बेहतर रिश्तों के कारण पाकिस्तान रूस को भी रिझाने की तरह-तरह से कोशिश कर रहा है। रूस पिछले कुछ दशकों से भारत का न केवल हथियार प्राप्त करने का सबसे बड़ा स्रोत रहा है, वरन् संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में जम्मू-कश्मीर विवाद में हमारा साथ देता रहा है। उसके सैन्य संबंध पाकिस्तान से बन रहे हैं। अब कुछ मामलों में बेरुखी दिखाई देती है। हमारी सुरक्षा और विदेश नीति को इन सब प्रवृत्तियों के निराकरण के लिए एक संतुलित और गतिशील रणनीति बनानी होगी। यह भारत के लिए बड़ी चुनौती है।

विमुद्रीकरण के कारण जो विवाद पैदा हुआ, वह अभी चलता रहेगा। आनेवाले बजट सत्र में भी यह विवाद भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट हो सकता है। जी.एस.टी. पहली अप्रैल से लागू होना था, वह जुलाई तक टल गया है। यह आर्थिक सुधारों की दृष्टि से एक धक्का है। राष्ट्रपति महोदय ने अपने एक भाषण में कहा था कि जिन वर्गों के ऊपर नोटबंदी का विपरीत असर पड़ा है, उनकी तकलीफें दूर करने की तुरंत कोशिश होनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने अपने ३१ दिसंबर के उद्बोधन में कुछ कदमों की चर्चा की, जो सरकार राहत के लिए उठा रही है। बजट में शायद कुछ और सुविधाएँ घोषित हों, किंतु यह ध्यान में रखना होगा कि प्रधानमंत्री ने जो घोषित किया था कि वे शोषित, वंचित और पीड़ित वर्गों को कुछ मनलुभावन खिलौने या लॉलीपॉप एवं राजनैतिक लाभ उठा लेने-देने में विश्वास नहीं करते हैं, बल्कि उनको सशक्त करना चाहते हैं, ताकि वे अंततोगत्वा अपने पैरों पर स्वयं आत्मसम्मान के साथ खडे़ हो सकें और सरकारों का मुँह जोहने की आवश्यकता न रहे। सबके आर्थिक सशक्तीकरण का मुद्दा आर्थिक सुधारों का एक बहुत बड़ा अंग है, दोनों आवश्यकताओं में सामंजस्य बिठाना होगा। गरीबी तभी दूर होगी, जब देश की उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी। विशेषतया आज एक राजनीतिक वैमनस्य और कड़वाहट का वातावरण पैदा किया जा रहा है, अतः बहुत समझदारी से इस ओर कदम उठाने होंगे।

२० जनवरी को प्रेसीडेंट ओबामा का कार्यकाल समाप्त हो गया और डोनाल्ड ट्रंप ने २० तारीख को अमेरिकी राष्ट्रपति का कार्यभार सँभाला। ट्रंप ने अपनी पिछली प्रेस कॉन्फ्रेंस में मीडिया को बहुत भला-बुरा कहा तो मीडिया ने भी उसी प्रकार का उत्तर दिया। भारत की ओर ट्रंप का कुछ रुझान दिखाई पड़ता है, पर आगे क्या होगा, कहना कठिन है। ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका किस प्रकार की आर्थिक नीति, किस प्रकार की विदेश नीति और कैसे अमेरिका अंतरराष्ट्रीय समझौतों एवं दायित्वों का निर्वाह करना चाहेगा, इस पर विश्व में अटकलबाजियाँ चल रही हैं। ट्रंप किस प्रकार का नेतृत्व देते हैं और किस प्रकार की नीतियाँ अपनाते हैं, उससे अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य बहुत कुछ प्रभावित होगा। अभी तो संशयात्मक स्थिति है।

सेना और अर्धसैनिक बलों की कुछ समस्याएँ

२६ जनवरी को देश ने गणतंत्र दिवस मनाया, हमारी सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा में जवान अपनी जान हथेली पर लेकर लगे हुए हैं, उन जवानों के प्रति देश कृतज्ञता प्रकट करता है, उनको आश्वस्त करता है कि देश उनके साथ है और उनके परिवारों का ध्यान रखेगा। यह आवश्यक है, पर इस संकल्प के कार्यान्वयन में बहुत सी कमियाँ रहती हैं। पिछले दिनों देखा गया कि सैनिक एवं अर्धसैनिक बल के जवान कुछ बेचैन हैं। उनकी कुछ शिकायतें हैं, एक है भोजन की गुणवत्ता के बारे में। भोजन पोषक होना चाहिए। समय-समय पर कुछ विविधता भी उसमें दिखनी चाहिए। दूसरी है कि समय पर उनको घर जाने की छुट्टी नहीं मिलती है। हताशा में वे आत्महत्या कर बैठते हैं या दूसरों पर बंदूक चला देते हैं। छुट्टी का मामला एक जवान के लिए बहुत भावनात्मक होता है, यह हम नहीं भूल सकते। इस विषय में संवेदनाशीलता की आवश्यकता होती है। तीसरी बड़ी शिकायत है कि उनसे घरेलू तथा निम्न स्तर के काम लिये जाते हैं, जो उनके व्यक्तिगत सम्मान के विरुद्ध हैं। संसद् की एक समिति ने कुछ साल पहले अपनी रिपोर्ट दी थी, पर उस पर काररवाई नहीं हुई। एक और शिकायत अकसर यह होती है कि शहीदों के परिवारों को समय से और नियमानुसार जो मुआवजा या सहायता मिलनी चाहिए, वह नहीं मिलती है। समाचार-पत्रों में यदा-कदा इस प्रकार के समाचार आते रहते हैं। जिससे जवान आशंकित होते हैं। यह एक ऐसा मामला है, जिस पर सरकार की उचित निगरानी रहनी चाहिए। जो नियम है या जो वादा किया जाए, वह शीघ्रता से पूरा होना चाहिए। अतएव आवश्यकता इस बात की है कि इन शिकायतों को गंभीरता और निरंतरता से लिया जाए, ताकि हमारे सैनिक, अर्धसैनिक जवान संतुष्ट रहकर अपने कर्तव्यों का पालन समुचित रूप में अनुशासित रहकर कर सकें।

पाँच राज्यों में चुनाव

पाँच राज्यों में विधान सभाओं के चुनाव का बिगुल बज गया है। ये राज्य हैं—उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर। सबसे ज्यादा आँखें उत्तर प्रदेश की ओर लगी हैं। महीनों से देश ने समाजवादी पार्टी का नाटक देखा। बहुत उलट-पलट और कलाबाजियों के बाद अब वह प्रहसन में परिवर्तित हो गया, जब मुलायम सिंह अखिलेश से अड़तीस सीटों के लिए सिफारिश करते हैं, जिसमें शिवपाल सिंह भी शामिल हैं। अखिलेश शिवपाल और मुलायम की अन्य चुनावी टिकट की सिफारिशों का क्या करते हैं, देखना है। कांग्रेस का अस्तित्व उत्तर प्रदेश में आजकल न के बराबर है, राहुल गांधी की सब कोशिशों के बावजूद। अखिलेश की साइकिल पर बैठना निश्चय किया, ताकि कांग्रेस का वजूद कुछ तो रहे। बसपा, कांग्रेस-समाजवादी गठबंधन और भाजपा के बीच मुकाबला है। आप के केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री का दायित्व सिसोदिया को देकर पंजाब और गोवा के चुनाव में लगे हैं। पंजाब में अकाली दल और कांग्रेस तथा आप के बीच अच्छी टक्कर रहेगी। देखें, ऊँट किस करवट बैठता है।

(त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी)

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