गद्दी जनजाति के लोकनाट्य

गद्दी जनजाति के लोकनाट्य

सुपरिचित लेखक एवं शोधकर्ता। ‘गद्दियाली लोकगीतों का साहित्यिक विश्लेषण एवं मूल्यांकन’ विषय पर शोधकार्य। ‘गद्दी जनजाति के लोकगीत’ पुस्तक का प्रकाशन। राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं में लोक-संस्कृति विषयक लगभग १८ शोध-आलेख प्रकाशित। संप्रति शोधार्थी हिंदी विभाग, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला।

हिमाचल प्रदेश पश्चिमी हिमालय में अवस्थित नैसर्गिक, प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण पर्वतीय भू-भाग है। जितना सुंदर इसका प्राकृतिक परिवेश है, उतना ही सुंदर यहाँ का लोकसाहित्य है। वास्तव में लोकसाहित्य आम जनमानस का साहित्य है, जो श्रुत अथवा कंठस्थ रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित होता है। लोकसाहित्य की समस्त विधाओं में ‘लोकनाट्य’ प्रमख विधा है। इसके माध्यम से जनसामान्य अपनी दिनभर की परिश्रमजन्य क्लांति, चिंताओं और अवसाद का परिहार लोकनाट्यों के मनोरंजनात्मक कार्यक्रमों में पाता है। हिमाचल प्रदेश में मुख्यतः पाँच जनजातीय समुदाय निवासरत हैं—गद्दी, गुज्जर, पंगवाल, लाहौले और किन्नौरे। विवेच्य जनजातीय समुदाय का अपना एक वशिष्ट लोकसाहित्य है, जिसके अंतर्गत इनके लोकगीत, लोककथाएँ, लोकगाथाएँ, लोकनाट्य तथा लोक-सुभाषित आदि आते हैं। यदि बात गद्दी जनजाति की करें तो यह समुदाय हिमाचल प्रदेश के जिला चंबा, काँगड़ा, मंडी एवं प्रदेश के अन्य भू-भाग में निवास करती है। इस जनजाति का मूल निवास स्थान ‘ब्रह्म‍पुर’ अर्थात् ‘भरमौर’ रहा है। रजतधवल पर्वत-शृंखलाओं से घिरे जनजातीय क्षेत्र भरमौर अत्यंत दुर्गम एवं आधुनिक सुख-सुविधाओं के अभावग्रस्त होने के परिणामतः यहाँ का लोकमानस अपने मनोरंजन हेतु गीत, संगीत और नृत्य के संयुक्त तत्त्वावधान द्वारा ‘लोकनाट्यों’ से अपना मनोरंजन करता है। इन पारंपरिक लोकनाट्यों के प्रदर्शन-मंचन के फलस्वरूप ऐतिहासिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक ज्ञानदर्शन के साथ-साथ विविध प्रकार की उपदेशात्मक शिक्षाओं से समाज अनुगृहीत होता है। गद्दी जनजाति में परंपरित लोकनाट्यों का विवरण इस प्रकार से है—

हरणातर

गद्दी जनजाति मूलतः जिला चंबा के भरमौर जनपद से संबंधित है। यहाँ पर सर्दियों में भीषण हिमपात होता है, अतः कुछ गद्दी पुहाल अपने मवेशियों सहित कुछ दिनों के लिए ‘जांधर’ (समतलीय भू-भाग) की ओर प्रवास करते हैं। जबकि अधिकांश लोग स्थायी रूप से भरमौर में ही निवास करते हैं। अतः भरमौर जनपद में होली उत्सव के सुअवसर पर यहाँ के जनसमुदाय में ‘हरणातर’ लोकनाट्य परंपरित है। हरणातर के दिन सुबह से ही ढोल बजने लगता है। हरणातर के लिए कोई खुला स्थान, आँगन निश्चित करके साफ किए गए स्थान के मध्य में लकड़ियों का बड़ा ढेर लगाया जाता है, जिसे लोग ‘घ्याणा’ कहते हैं। इसे घ्याणा इसलिए कहते हैं कि यह ढेर आग जलाने के लिए लगाया जाता है। इस अवसर पर स्थानीय जनसमुदाय द्वारा ‘हरण’ खेला जाता है। हरण अथवा ‘हरणातर’ में गीत, संगीत, नृत्य और अभिनय चारों का सम्मिश्रण होता है। इस लोकनाट्य में कोई शास्त्रीय बंधन नहीं होता। लोक अपनी प्रकृति और स्वरूप के अनुसार सरल, सहज और स्वाभाविक रूप से ‘हरणातर’ आयोजित करते हैं, जिसमें अपनी-अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार स्वाँग बनते हैं, जिसमें ‘खप्पर’ (मुखौटाधारी), चंद्रौली (स्त्रीभेस में पुरुष), गद्दी, गद्दण, हरण तथा साहब प्रमुख हैं। हरण स्वाँग करते हुए किसी पशु का चर्म बाँधे हुए होता है। सिर पर सींग लगाए होते हैं। सारे शरीर को डोर से बाँधा हुआ होता है। इस पर बच्चे अथवा व्यक्ति सवारी करते हैं तथा सामर्थ्य के अनुसार पैसे भी देते हैं। हरण या हिरण जानवर के जैसे चलने का अभिनय करता है। वस्तुतः यह लोकनाट्य हास्य-विनोद संवादों से ओत-प्रोत होता है, इस स्वाँग के वस्त्राभूषण ही उत्सुकता और मनोरंजन के साधन हैं।

स्वाँग

गद्दी जनजाति का दूसरा प्रमुख लोकनाट्य ‘स्वाँग’ है, जो मुख्य रूप से छतराड़ी क्षेत्र में परंपरित है। छतराड़ी क्षेत्र में शिवशक्ति का भव्य मंदिर है, जिसकी मान्यता हर स्थान पर है। जिस दिन मणिमहेश जात्रा भाद्रपद राधाष्टमी को समाप्त होती है, उसी दिन शिवशक्ति छतराड़ी में मेला (जात्रा) प्रारंभ होता है। अतः जातर प्रारंभ होने से पूर्व यहाँ स्वाँग निकालने की प्रथा है। ‘स्वाँग’ शिवशक्ति छतराड़ी से निकाले जाते हैं। स्वाँगों में तीन मुखौटेधारी पुरुष पात्र होते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग ‘खप्पर बड्डे’ कहते हैं। चौथा मुखौटाधारी स्त्रीपात्र होता है। पुरुषपात्र राक्षस के द्योतक हैं तथा स्त्रीपात्र देवी का स्वाँग माना जाता है। जब स्वाँग निकलता है तो वहाँ पर उपस्थित दर्शक तुमुल ध्वनि करते हैं। राक्षस पात्रों को ऐंहण (बिच्छु बूटी) से पीटने का अभिनय किया जाता है। जब राक्षस पात्रों को पीटा जाता है तो वे विभिन्न भाव-भंगिमाओं के माध्यम से अभिनय कर अपनी पीड़ा को प्रकट करते हैं, यह लोकनाट्य दर्शकों के लिए अत्यंत मनोरंजन और उत्सुकता का विषय बन जाता है।

उक्त समस्त मुखौटाधारी राक्षस अपने हाथों में खड्ग धारण किए होते हैं। लोकनाट्य का मंचन करते हुए राक्षस पात्र देवी पर आक्रमण करते हैं। देवी का स्वाँग बड़ी वीरता और पराक्रम से लड़ते हुए राक्षसों को पराजित करता है। इसी दिवस स्वाँग सहित बटुक महादेव की यात्रा भी दिखाई जाती है। यह स्वाँग समस्त लोकमानस के लिए धार्मिक भावना का प्रेरक और मनोरंजन का उत्तम साधन है।

बांढ़ा लोकनाट्य

 बांठड़ा शब्द का संबंध भांड शब्द से जुड़ा है। भांड शब्द स्वयं संस्कृत भाण से उत्पन्न हुआ है। संस्कृत साहित्य के अनुसार भाण दृश्य-काव्य का एक रूपक है, जिसमें हास्य की प्रधानता रहती है और प्रायः एक अंक का होता है। इस दृष्टि में भाण, सादृश्य और प्रहसन को लोक-शैली के नाट्य रूपक कहा जाता है। हिमाचल के अन्य क्षेत्रों, यथा—मंडी, बिलासपुर और काँगड़ा में यह लोकनाट्य दशहरे और दीपावली उत्सव के दौरान मनाया जाता है, जबकि भरमौर जनपद में बांढ़ा उत्सव असूज मास की आरंभिक तिथियों में मनाया जाता है। भरमौर के बाढ़े और काँगड़ा, मंडी और बिलासपुर के बांठड़े में सांगोपांग समानता पाई जाती है। लेकिन क्षेत्र भिन्नता के फलतः इसमें कतिपय असमानता स्वाभाविक है। भरमौर जनपद में बांढ़ा नाट्य उत्सव प्रमुख रूप में दियोल, चंहौता, क्वारसी और शुटकर में मनाया जाता है।

बांढ़ा लोकनाट्य का आयोजन प्रायः मंदिरों में किया जाता है। भरमौर जनपद के चंहौता गाँव में लक्ष्मीनारायण, शिव और नाग मंदिर हैं, अतः बांढ़े का आयोजन मंदिर के खुले प्रांगण में ही किया जाता है। स्थानीय लोकमान्यताओं के अनुसार बांढ़ा लोकोत्सव का आयोजन नौ दिन होता था, अतः प्रकाश की व्यवस्था हेतु गाँव का प्रत्येक सदस्य एक ‘जंगणी’ (विरोजायुक्त लकड़ी) का गट्ठा लाता है, जिसका प्रयोग ‘घियाणा’ (आग जलाने के लिए लकड़ी का ढेर) लगाने के काम आता है। इस ‘घियाणे’ के चारों ओर बैठकर समस्त जनसमुदाय इस लोकनाट्य का आनंद लेता है।

बांढ़ा लोकनाट्य का मुख्य आकर्षण ‘स्वाँग’ आयोजन है। इस लोकनाट्य में भी हरणातर की भाँति विभिन्न स्वाँगों का आयोजन होता है। संप्रतिकाल में बांढ़ा लोकनाट्य के पुनरुत्थान हेतु दियोल गाँव के स्थायी निवासी, वर्तमान में कृषि विज्ञान केंद्र चंबा में बतौर कृषि वैज्ञानिक पद पर कार्यरत डॉ. केहर सिंह ठाकुर इस लोकपरंपरा के संरक्षण, संवर्द्धन में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं।

बांढ़ा उत्सव में प्रत्येक स्वाँग अपनी-अपनी वाक्पटुता दिखाने का प्रयत्न करते हैं। यद्यपि इस लोकनाट्य में किसी कथा विशेष का अभिनय अपरिहार्य नहीं है, किंतु फिर भी रात्रि में सामूहिक रूप से पारंपरिक वाद्य-यंत्रों सहित गाने, बजाने, नाचने और हँसी-मजाक से दर्शकों का मनोरंजन किया जाता है। बांढ़ा लोकनाट्य के संवाद भी निश्चित नहीं हैं। अपनी वाक्पटुता और हाजिरजवाबी से समूचे वातावरण को कुतूहलपूर्ण बनाया जाता है।

गद्दी जनजातीय समुदाय में मनाए जाने वाले प्रमुख ‘लोकनाट्यों’ का सम्यक् अवलोकन करने के उपरांत अंततोगत्वा कहा जा सकता है कि अनंतकाल से गद्दी जनजाति के यायावरी जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आया, किंतु संस्कृतियों के आपसी संक्रमण एवं भूमंडलीकरण और बाजारवाद के प्रभावमय इनकी सांस्कृतिक विरासत में कतिपय परिवर्तन अवश्य आया है, लेकिन बावजूद इसके इस समुदाय ने अपने लोकसाहित्य और लोकसंस्कृति के मौलिक स्वरूप को संप्रतिकाल तक अक्षुण्ण बनाए रखने में सफल रहा है। यदि इनके लोकनाट्य ‘हरणातर’, स्वाँग एवं बांढ़ा की बात करें तो इसकी लोक-परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित हो रही है। किंतु संस्कृतियों के आपसी संक्रमण, बाजारवाद और भूमंडलीकरण के दौर में विवेच्य लोकनाट्यों के मंचन और प्रस्तुति में कतिपय भेद आया है, बावजूद इसके गद्दी जनजाति ने इन लोकनाट्यों को वर्तमान में भी अक्षुण्ण बनाए रखा है। प्रकृति के सान्निध्य और कठोर पारिश्रमिक जीवनयापन करने के परिणामस्वरूप विवेच्य समुदाय के लोकसाहित्य में प्रकृति की सुकोमलता, भव्यता, श्रम-साधना और ऋतु-त्योहार एवं पारिवारिक संबंधों का ताना-बाना इसके लोकसाहित्य का वर्ण्य विषय है।

गाँव-भौंट, डाकघर गरनोटा, तहसील भ‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍‍ियात,

जिला चंबा-१७६२०७ (हि.प्र.),

दूरभाष : ८२१९७७५९०६

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