राम झरोखे बैठ के

राम झरोखे बैठ के

हमने इधर अनुभव किया है कि मौसम का मिजाज कुछ तेज हो गया है, जैसे कोई शांत प्रवृत्ति का व्यक्ति बात-बात पर गुस्सा करने लगे। गरमी है तो ऐसा लगता है, जैसे कोई सुलगती भट्ठी से अदृश्‍य आग निकल रही हो। तेज रफ्तार की धधकती लू किसी को भी बीमार करने में समर्थ है। जाहिर है कि कई ने गरमियों में प्राण गँवाए हों। खेत या बाजार से अच्छे-खासे लौटे। सूखते गले को पानी पीकर तर किया और कुछ देर बाद बैठे-ठाले ढेर हो गए। बारिश भी होती है तो ऐसी कि बाढ़ आकर रहे। बस्ती, गाँव, शहर, मोहल्ले सब डूबें। यदि इंद्रदेव रूठें तो ऐसे कि लोग एक बूँद पानी के लिए आकाश ताकें। बादल आएँ पर मुँह चिढ़ाते निकल जाएँ, जैसे रूस यूक्रेन से रूठा है। बारिश तो हो नहीं, पर सूखे के बम बरसें। कुछ प्यास से मरें, कुछ आस-पास की बरबादी के अवसाद से। धरती बूँद-बूँद पानी को तरसे। बुद्धिजीवी अतीत को तलाशें और निष्कर्ष निकालें कि ऐसा ऐतिहासिक सूखा कभी पड़ा ही नहीं। कुछ ग्लोबल वाॅर्मिंग का हवाला दें, कुछ हरियाली के हनन का रोना रोएँ। “और छेड़छाड़ करो प्रकृति से। और वनों का विनाश कर शहर के जंगल बसाओ। यही सब तो होना है, होकर रहेगा।”

इसे क्या कहें, कुदरत की नाराजी या इनसान से उसका बदला? जाड़ा पड़े तो ऐसा कि शीत-लहर आए। कुछ फैशन में नंगे हों, कुछ अभाव में। काँपे दोनों, एक पुरस्कार की प्रतीक्षा में एक ठंड के मारे। सबसे ज्यादा दिक्कत गरीबों की हो। मोदीजी के दिए आयुष्‍मान कार्ड से अस्पताल में भरती तो हों, पर अधिकतर के लिए सरकारी अस्पताल निदान केंद्र न होकर सिर्फ मरघट के सफर का सराय-स्थल हैं। वह आयुष्‍मान कार्ड दिखाते ही दिखाते चल बसते हैं। जब तक डॉक्टर उनकी बीमारी की पहचान के लिए, दर्जनों टेस्ट लिखकर अपने ज्ञान की नुमाइश करे, ऊपरवाले का बुलावा आ जाता है। ऐसे लोग, दंगई मानसिकता के मुकाबले और उसकी तुलना में सच्चे देश-सेवक हैं। उन्होंने आयुष्‍मान कॉर्ड का प्रयोग तो किया, पर उसके खर्चे में बचत भी की। ऐसे वाकई वित्तमंत्री से सेवा या बचत मैडल के हकदार हैं। उन्होंने भले ही डॉक्टरों का कमीशन काटा, पर वित्तीय हित-साधन भी किया नहीं तो कॉर्ड की राशि में से कुछ ही शेष रहती इलाज के लिए।

इधर मौसम की मार हर ऋतु का समान तत्त्व है। इसके लिए कहना कठिन है कि इसमें सरकारी अस्पतालों की भूमिका अह‍म है कि पर्यावरण के हत्यारों की। यों यह तो निर्विवाद रूप से कहा ही जा सकता है कि भूमिका दोनों की है। कम या ज्यादा का निर्णय विषय के विद्वानों पर छोड़ना उचित है। कौन कहे, यह करते-करते कुछ ऊपरवाले को प्यारे हो जाएँ? क्या पता, उनका निष्कर्ष आते-आते कई डॉक्टर, पर्यावरण विशेषज्ञ भी स्वर्ग या नर्क सिधारें? विद्वानों की यही विशेषता है। जबतक वह अंतहीन बहसों के नतीजों पर पहुँचते हैं, कई सूरज डूब चुके होते हैं। ये कईयों का अनुभव है कि मौसम का प्रहार झेलने में ज्यादातर गरीब असमर्थ हैं। यों अब तक अपने सुनने में नहीं आया कि फलाना समृद्ध बाढ़ में डूब गया या ढिकाना लू की चपेट में आ गया, अथवा कोई सर्दी खाकर, चल बसा। गरीबी हटाने का निश्‍चय तो इंदिराजी ने किया था। लगता है कि उसके पहले से प्रकृति, गरीबों को हटाकर, इस शुभ कार्य में लगी है। जब गरीब ही नहीं रहेंगे तो गरीबी को हटना ही हटना? राजनेता, कई वादे अनजाने ही कर जाते हैं, जहाँ उन्हें निभाने में कुदरत भी उनकी मददगार है। उनके उत्तराधिकारी यह श्रेय तो ले ही सकते हैं कि उनके शासन-काल में गरीबी हटी न हटी हो, पर कम तो जरूर हुई है। जाने उनके वंशज इस बारे में चुप क्यों हैं?

यों बाजार, सड़क, चौराहे, रेल के स्टेशन या एयरपोर्ट पर भीड़ में कोई कमी नहीं आई है। रेलवे स्टेशन की भीड़ तो पल्ले पड़ती है कि निर्धन रोजगार की तलाश में जा-आ रहे हैं। पर हवाई अड्डों की में अभी भी, हवाई चप्पलवालों का चलन नहीं है। वहाँ भीड़ क्यों लगी है? क्या यह भारत का नया उभरता मध्य वर्ग है या फिर सरकारी कर्मचारी अथवा नव-धनाढ्‍‍‍य, कहना कठिन है? यों हमे बताया गया है कि असली रईस अपने खुद के जहाजों से सफर करते हैं। कौन इन सामान्य इनसानों के संपर्क में आकर प्रदूषण का खतरा उठाए? क्या पता, यह कौन-कौन से रोगों के मौन वाहक हैं? कुछ नहीं तो उन्हें सामान्य होने की बीमारी ही लगा दें?

ऐसे कोरोना की विविधता का भी कोई मुकाबला नहीं है। नाम और रूप, बदल बदलकर लोगों को ठग रहा है। जो बच गए, वे भी जीवन-पर्यंत उसकी कोई निशानी से पीड़ित हैं। जो चले गए, वे रोते-बिलखते परिवार को पीछे छोड़ खुद तो अब हर सांसारिक झंझट से मुक्त हैं। कुछ कहते हैं कि वह दुनियावी मोह में पीपल के पेड़ पर टँगे हैं, कुछ धर्मशास्त्रियों का विचार है कि वह झींगुर या मेढक का रूप धरकर पास की किसी पोखर के शृंगार हैं। जितने ज्ञानी, उतने विचार। कौन जाने, इसीलिए सच की खोज एक कठिन कर्म है। कुछ उसे स्वीकारने पर इतराते हैं, कुछ उसे नकारकर इठलाते हैं। देखने में आया है कि कोई उनके स्वयं के प्रामाणिक ग्रंथ की घटना का जिक्र भी कर दे तो यह धर्म का अपमान है। कुछ इसका सियासी फायदा उठाते हैं, दंगे ही नहीं भड़काते, अराजकता भी फैलाते हैं। यही वह अवसर है जब कट्टर धर्मगुरुओं की चाँदी है। वह दाढ़ी लहराते उपदेश देते हैं। अपना महत्त्व प्रदर्शित करते, अशिक्षित समर्थकों के भ्रम से भावना की चिनगारी सुलगाते हैं। “हम तो अमन-चैन की राह के मुसाफिर हैं, यह भड़काऊ नफरत की आग तो किसी घोर सांप्रदायिक दल ने लगाई है।” हमें तो कभी-कभी ताज्जुब होता है कि कैसे-कैसे घोर कट्टरपंथी भी आज ‘सैक्युलर’ कहलाते हैं। जातिवादी हो या धर्मवादी सबके सब अपनी सेक्युलर ठौर में सुरक्षित हैं। इतना ही नहीं, फल-फूल भी रहे हैं।

मिजाज सिर्फ मौसम का ही नहीं, इनसानों का भी बिगड़ा है। नहीं तो यह कैसे संभव है कि बजाय हिंदुस्तानी बनने के आजादी के आठवें दशक के कगार पर आकर ये पढ़े-लिखे जनगणना भी जातिगत आधार पर करवाएँ? क्या इनका इरादा उन पश्चिमी विचारकों को सत्य सिद्ध करना है, जो भारत को एक देश न कहकर, जातियों का झुंड निरूपित करते रहे हैं? हमें कभी-कभी शक होता है कि हमारे नेता वर्तमान आरक्षण से संतुष्‍ट नहीं हैं। उनका लक्ष्य और इरादा सौ फीसदी आरक्षण का है। यह न गरीबों का सोचते हैं, न निर्धनता उन्मूलन का। न एक समृद्ध और प्रतिष्‍ठित प्रजातंत्र का। इनके चिंतन और दृष्‍टिकोण की सुई सिर्फ भारत को जातियों का जनतंत्र बनाने पर अटक गई है। वह भी निजी हित-साधन और स्वार्थ के वशीभूत होकर। वह खुद पिछ़डे हैं तो पिछड़ों के एक छत्र नेता बने रहें, चुनाव हो तो उनकी जीत में कोई संशय न रहे। उनका अपना भविष्य सुधरे, देश के भविष्य से उन्हें क्या लेना-देना? जैसे गांधी, पटेल, नेहरू ने देश को आजादी दिलवाई, वैसे ही कोई-न-कोई अवतारी पुरुष मुल्क को स्वस्थ लोकतंत्र भी बनाएगा। उनका इकलौता ध्येय अपनी कुरसी सुरक्षित रखना है और वह इस सीमित लक्ष्य को पाने को जी-जान से हर मुमकिन जुगाड़ में लगे हैं।

जहाँ भीड़ देखकर नेता को अपनी जीत और कुरसी के स्थायित्व का ध्यान आता है, वहीं कुछ को उन्नीसवीं सदी के अंग्रेज अर्थशास्त्री माल्थस का। उनका जनसंख्या का सिद्धांत था कि आबादी की तादाद अनाप-शनाप दर से बढ़ती है, वहीं खाद्यान्न की सीमित संख्या में। जाहिर है कि इससे भुखमरी, बीमारी भी अनियंत्रित रूप में फैले। हमें कभी-कभी संदेह होता है कि कही यह माल्थस की अवधारणा, वर्तमान भारत पर तो लागू नहीं है? बेरोजगारी, मुद्रास्फीति और महँगाई आकाशीय रुख अपनाए हुए हैं और लाइलाज होते जा रहे हैं। गनीमत है कि कहीं से भुखमरी के समाचार नहीं आ रहे हैं, पर यह भी कब तक? गरीबों का, पेट फ्री सरकारी राशन से फिलहाल भर रहा है। पर इसका ‘प्रभु अनंत, हरि कथा, अनंता’ होना तो मुमकिन नहीं है? मुफ्तखोरी को किसी दिन रुकना ही रुकना। न अर्थशास्त्र इसके पक्ष में है, न देश के सीमित संसाधन!

जनसंख्या-नियंत्रण का अब किसी को खयाल तक नहीं आता है जब से संजय गांधी के ‘हम दो हमारे दो’ का नारा चुनावी अलोकप्रियता में तब्दील हो चुका है। एकाध दशक से तो उसका भूला-भटका जिक्र तक नहीं है। कोई सोचे तो सच ही है। चुनाव जीतना सियासी दलों के अस्तित्व का प्रश्‍न है। वह क्यों ऐसे अलोकप्रिय मुद्दे उठाकर अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारें? इससे तो बेहतर है कि इतने ही प्रयास से वह खुद की जाति का आरक्षण बढ़वा लें? राष्‍ट्रीयहित और जन-कल्याण ऐसे शब्द सिर्फ सार्वजनिक मंच के भाषण के लिए सुरक्षित हैं। यह केवल गजदंती आदर्श हैं। कौन सा नेता ऐसा कालिदास है, जो इन पर अमल कर, अपनी सत्ता की संभावनाओं का अंत करे? नतीजतन, परिणाम सामने है। सब अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हैं। अपने अलावा आज कोई समाज तक का नहीं सोचता है, देश और देश-हित का तो सवाल ही नहीं है। आबादी है, जो चक्रवर्ती ब्याज की दर से बढ़ रही है, तो बढ़ती रहे। माल्थस जाएँ भाड़ में। अधिकतर ने तो उनका नाम तक नहीं सुना है। उनके ऐसे विलायती सिद्धांतों का हमसे क्या लेना-देना? जब कभी जनसंख्या विस्फोट होगा तो होगा, वर्तमान में देश के सामने कोई कम संकट है, जो हम इस काल्पनिक खतरे से जूझें? यों भी तब जाने किस दल की सत्ता हो? जिसकी भी हो, वही निबटे। हमारे शासनकाल में इस मुद्दे पर समय नष्ट करने में क्या धरा है? कई राज्यों में चुनाव हैं। उन्हें जीतना है। फिर राष्‍ट्रीय चुनाव हैं। उसमें विपक्षी बड़बोलों को पराजित करना है। माल्थस के मुकाबले ये अधिक महत्त्वपूर्ण मुद्दे हैं। इनका इलाज जरूरी है, बजाय जनसंख्या नियंत्रण जैसे भविष्य के प्रश्‍नों के। कौन जाने, तब तक ऊपरवाला कोई कोरोना जैसी महामारी न भेज दे? यह एक ऐसी  विनाशक उपलब्धि है, जो सिर्फ चीन की वुहान प्रयोगशाला या वहाँ के किसी चमगादड़ के लिए ही संभव है। यदि ऐसा हुआ तो न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।

एक जमाना था कि हमें और हमारे ऐसे कइयों को विश्‍वास था कि हर दल के अपने-अपने सिद्धांत और उसूल हैं। वह उन्हीं के अनुसार चुनाव लड़ते और शासन में आए, तो सरकार चलाते हैं। अब हमें कोई भ्रम नहीं है। अतीत का मोह-भंग हो चुका है। सियासी दलों का एकमात्र लक्ष्य सत्ता में आना है। दीगर है कि उसके बाद वह जनसेवा के स्वघोषित मिशन में लगें। पर कई बार का सामूहिक अनुभव है कि जनकल्याण केवल दिखाने के हाथी-दाँत हैं, न वह चबाने के हैं, न खाने के। हर दल का सीमित ध्येय अपनी और समर्थकों की जेबें भरना है। संघर्ष के दिनों में इन्हीं ने तो साथ और सहारा दिया है। सच है कि नेता कतई स्वार्थ-प्रेरित हैं, पर इतने अहसान-फरामोश भी नहीं कि सब भूलें। फिर भविष्य में भी तो इनकी जरूरत पड़ेगी। उसका भी ख्याल रखना है। यों भी कौन उनकी निजी जेब लुट रही है। जो जा रहा है, वह जनता से एकत्र टैक्स का ही पैसा है। इससे मित्रों और समर्थकों का ही कल्याण नहीं हो रहा है, नेता तथा उनके परिवार के कोष में भी नाम से, नहीं तो बेनामी दौलत, जुड़ रही है। यह पारस्परिक कल्याण भी दूसरों के साथ, अपनी खुद की कमाई का एक बड़ा कारण भी है।

इस पारस्परिक हित-साधन के अलावा जनहित के कुछ काम भी वोटरों की संतुष्टि के लिए करने ही पड़ते हैं। नहीं तो भविष्य में उन्हें कौन वोट देगा? दीगर है कि वह इस क्षेत्र में तिल का ताड़ बनाएँ। करें रत्तीभर और मनभर का प्रदर्शन करें। जो यह न करे, वह नेता कैसा? अतिश‍योक्ति अलंकार खुद की उपलब्धियों और जन-सेवा का, उनकी स्वाभाविक का सामान्य आदत है। यह ऐसा नियम है, जो हर नेता पर बिना किसी अपवाद के लागू है। वह जानते हैं कि सबसे अधिक वोट पिछड़ों और गरीबों के हैं। इनको लुभाने और पटाने को आकर्षक योजनाएँ बनती हैं। भारत एक कृष‌ि-प्रधान देश है। यही कारण है कि किसानों की भलाई सबका एजेंडा है। कोई भी दल ऐसा नहीं है जो अपने किसान-लगाव का सार्वजनिक प्रदर्शन न करे। वह भी जिनका गाँव से कोई भी ताल्लुक नहीं रहा है और वह भी जो गाँवों से जुड़े हैं। देखने में आया है कि पूरी तरह से शहरों से संबंध रखनेवाले, गाँवों की सबसे अधिक बात करते हैं। ग्राम-कल्याण की हवाई योजनाएँ बनाने में उनकी सानी नहीं है, ठीक वैसे ही जैसे गरीबी हटाओ की हुंकार भी वही भरते हैं जिनका निर्धनता से दूर-दूर तक का वास्ता नहीं है। उन्होंने बचपन से शाही जीवन बिताया है। अब तो सबकी राजगद्दी छिन गई है वर्ना राजा-महाराजाओं के युवराज भी उनका क्या मुकाबला करते? उनके मुँह से गरीब और अभाव-ग्रस्त की व्यथा-कथा सुनकर हँसी आना स्वाभाविक है। पर इधर मौसम के असर से कोई अछूता नहीं है। अब जैसे हँसना मना है।

गरमी ने जुल्म ढाया है तो जाड़ा क्यों बाज आए? जाड़ा ऐसा जोरदार है कि अपने वजन के बराबर पुलोवर-कोट लादे लोग भी घर से निकलकर कँपकँपा रहे हैं। फिर उनका क्या कहना, जो दहेज के ऐसे पुराने कोट-पैंट में सजे हैं, जिनमें समय के साथ छेद हो गए हैं। इनके अलावा कुछ ऐसे भी हैं, जिन्हें कोट-पुलोवर की विलासिता ही उपलब्ध नहीं है। उनमें से कई ऐसे भी हैं, जो बीनकर लाई लकड़ी का अलाव जलाकर भी ठंडे पड़े जा रहे हैं। ऐसों पर शीत-लहर का दुष्‍प्रभाव सबसे अधिक है। ऐसा नहीं है कि सरकार ने इनके लिए कुछ किया ही नहीं है। प्रधानमंत्री आवास योजना ने बहुतों का भला किया है। पर इस श्रेणी में यह अत्यधिक गरीब नहीं आते हैं। गाँव छोड़कर आने के बाद यह दिन में रिक्‍शा चलाते या मेहनत-मजदूरी करते हैं और रात को पार्क की बेंच पर सो जाते हैं। अब तो ऐसा जाड़ा है कि इसकी कल्पना से ही बदन ठंडा पड़े।

इनके लिए सरकार की रैनबसेरे की व्यवस्था है। चद्दरें, गद्दे, तकिया, कंबल आदि का उसमें प्रावधान है। मंत्रीजी ने जब इसका उद्घाटन किया था, तब के फोटू हमने देखे हैं। अच्छा खासा ठंड से बचने का सामान उसमें देखकर रश्क हो कि रैन बसेरा घर से भी बेहतर है। सुंदर, आकर्षक और सुविधाजनक। इसका क्या करें कि यह व्यवस्था केवल उद्घाटन समारोह तक ही है। अन्यथा, यह अल्पजीवी है। अधिकारी-कर्मचारियों को भी इसका लाभ उठाना है। यह सामान आया ही इसीलिए था कि उनके घरों के शयनकक्ष को सुशोभित करे। जो फोटो लिये गए हैं, वह प्रचार सामग्री है। यदि रैन-बसेरे ऐसे ही सजे होते तो उन्हें छोड़ता कौन? शहर में प्रतियोगिता हो जाती—उनमें रात बिताने की। कुछ सिफारिश करवाते, मंत्रियों से, तब जाकर प्रवेश मिलता। वह तो अफसरों का शुक्र है कि रैन-बसेरे केवल काम चलाऊ हैं। रात बिताकर कोई भी वहाँ से भागना चाहे। फिर भी सर्दी से बचने का उपयोगी साधन तो है ही। कइयों के जीवन का सहारा है रैन-बसेरा, वरना इस ठिठुरते मौसम में बेघर गरीब की प्राणरक्षा कौन करता? सरकार अपने कल्याण-कार्यों का ढिंढोरा पीटती है। अखबार, टी.वी. उनके गुण गाते हैं, पर सच्चाई यह है कि यदि उनमें से दस-बीस फीसदी भी जमीन पर उतरे तो गरीबों के लिए यही बड़ी राहत है।

हिंदी की लोकप्रियता का प्रमाण उसके शोधार्थियों और उनके गाइड की संख्या है। एक गाइड तो दो सौ से अधिक लोगों को पी-एच.डी. दिलाकर उनका कल्याण कर चुके हैं। उनके शोधार्थी उन्हें विवश करते हैं कि घर के काम-काज के लिए कोई मददगार वगैरह न रखें, वरना शोधार्थियों का अपमान होगा। उनके रहते और किसी की क्या दरकार है? गाइड ने इधर मौसम पर कृपा की है। उनका हालिया विषय ‘तेज-तर्रार मौसम और मृतकों की संख्या’ है। कोई जिज्ञासा जताए कि इसका साहित्य से क्या लेना-देना है तो उनका उत्तर है कि “सकल जीवन का प्रतिनिधित्व साहित्य करता है। दिवंगत लोगों में कई उदीयमान कवि, लेखक, कहानीकार व उपन्यासकार शरीक थे। उनकी प्रतिभा का पाठकों को पता लग पाता, इसके पहले ही वह मौसम की मार के शिकार हो गए। इस शोध के माध्यम से हम इन सबको श्रद्धांजलि दे रहे हैं।”

हमें भी उनकी शोध का उत्सुकता से इंतजार है। कम-से-कम यह तो ज्ञात हो कि गरमी, बरसात, जाड़े के कारण कितने निर्धन नागरिक शहीद होते हैं?

९/५, राणा प्रताप मार्ग, लखनऊ-२२६००१

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