केशर-कश्मीरा

केशर-कश्मीरा

मुरलीधर वैष्णव

अब तक कहानी-संग्रह ‘पीड़ा के स्वर’, लघुकथा-संग्रह ‘अक्षय तूणीर’, ‘कितना कारावास’, काव्य-संग्रह ‘हैलो बसंत’, बालकथा-संग्रह, ‘पर्यावरण चेतना की बाल कथाएँ’, ‘चरित्र विकास की बाल-कहानियाँ’, ‘जल और कमल’, ‘अबु टॉवर’, बालगीत-संग्रह ‘चींटी का उपकार’। राजस्थान साहित्य अकादमी का विशिष्ट साहित्यकार सम्मान, सुमित्रानंदन पंत बाल साहित्य सम्मान, ‘हिंदी भाषा भूषण सम्मान’ सहित करीब एक दर्जन सम्मान।

 

अब तक कहानी-संग्रह ‘पीड़ा के स्वर’, लघुकथा-संग्रह ‘अक्षय तूणीर’, ‘कितना कारावास’, काव्य-संग्रह ‘हैलो बसंत’, बालकथा-संग्रह, ‘पर्यावरण चेतना की बाल कथाएँ’, ‘चरित्र विकास की बाल-कहानियाँ’, ‘जल और कमल’, ‘अबु टॉवर’, बालगीत-संग्रह ‘चींटी का उपकार’। राजस्थान साहित्य अकादमी का विशिष्ट साहित्यकार सम्मान, सुमित्रानंदन पंत बाल साहित्य सम्मान, ‘हिंदी भाषा भूषण सम्मान’ सहित करीब एक दर्जन सम्मान।

सरदार कश्मीरा सिंह की टैक्सी-कार भरतपुर की ओर दौड़ रही थी। कार में दो सवारी थीं। अधेड़ उम्र के पति-पत्नी। भरतपुर के केवला देवी पक्षी अभियारण्य को देखते हुए उन्हें जयपुर जाना था, वरन् वे सीधे ही हाई वे संख्या ८ से जयपुर शीघ्र पहुँच सकते थे।

“देखा केशू, कितनी तरह की बतखें और चिड़ियाँ हैं। वाह! क्या सीन है!” यह कहते हुए पन्नेसिंह अपने कैमरे से फोटो लेने लगा। वह अपनी पत्नी केशर को केशू ही कहता था और केशू पन्नेसिंह को प्यार से पन्नू।

“जस्ट इनक्रेडिबल! वह तालाब के किनारे टें...टें...करती बतखें और झाड़ियों में बैठी चिड़ियों का कलरव सुन रहे हो, पन्नू! ये आपस में बातचीत कर रही हैं। शायद आपस में यह तय कर रही है कि चलो, तालाब किनारे नहाने चलते हैं।”

“तुम तो कविता करने लगीं!”

“कविता नहीं, कल्पना जरूर कर रही हूँ। मुझे याद है पन्नू, मेरी माँ कहा करती थी कि पक्षी-लोक का रहस्य अद्भुत है। पक्षियों को दिया गया दाना-पानी, पता नहीं, आपको कब कैसी मुसीबतों से बचा लेता है। मुझे तो लगता है कि पक्षी इनसान के दिल की निर्मलता, उसमें बसी करुणा व प्रेम को इनसानों से बेहतर समझ लेते हैं। भरोसा करने लगते हैं उन पर। केशु पानी में अठखेलियाँ करती चिड़िया व बतखों के पास गई। उसे यह देखकर खुशी हुई कि उसके पास आने से वे उड़ी नहीं, बल्कि दो-तीन तो अपने गीले पंखों से उस पर फुहार करने लगीं। बतखें भी उसके पास आकर पानी में गोते लगाती रहीं। लेकिन जब पन्नू केशु को बुलाने उसके पास आया, सारे पक्षी तितर-बितर हो गए।

“सुना है कि पक्षियों का झूठा पानी पीने से तुतलाहट बंद हो जाती है और तो और, वह यह भी जान सकता है कि पक्षी आपस में क्या बात कर रहे हैं। हमारे मारवाड़ के लोकदेव हड़बूजी साँखला तो इससे भी एक कदम आगे थे। वे पक्षियों से बातचीत तक कर लेते थे।” केशु ने कार की ओर लौटते हुए पन्नू से कहा।

“यह सब बकवास है। पता नहीं किस पोंगा पंडित से सुन लिया तुमने!” पन्नू ने अजीब सा मुँह बनाते हुए कहा, “फिलहाल तो कार में बैठो। समय पर जयपुर पहुँचना जरूरी है।” केशु को पन्नू की बात अच्छी नहीं लगी। लेकिन वह अपना मूड खराब नहीं करना चाहती थी। वे कार में बैठ गए।

“पक्षियों के झूठे पानी में कुछ तो है मेम साहब।’’ मेरी मौसी भी यही कहती थी। कश्मीरा सिंह ने केशु का समर्थन किया।

“फिर वही बात! अरे यह सब बकवास है। और कुछ हो न हो उनका झूठा पानी पीने से इंफेक्सन होने का खतरा तो होता ही है। हाँ, दाना-पानी तो उन्हें डालना ही चाहिए।’’ पन्नूसिंह ने चालक को कार स्टार्ट करने का इशारा किया।

“अच्छा, यह तुम्हारी एक टाँग में मैंने कुछ लड़खड़ाहट देखी है, क्या हुआ था मिस्टर...क्या नाम है तुम्हारा?।” पन्नू ने पूछा।

“सर, कश्मीरा सिंह।”

“हाँ-हाँ कश्मीरा सिंह, क्या हो गया था?’’

“सर, पहले मैं फौज में था। कश्मीर सीमा पर मेरी काफी लंबी पोस्टिंग रही। एक बार आतंकवादियों से हुई मुठभेड़ में मैंने व मेरे एक साथी ने घुसपैठ कर रहे पाँच आतंकवादियों को मार दिया था। लेकिन दो गोलियाँ मेरे बाएँ पैर पर घुटने के नीचे लगी, जिससे एक लंबे अरसे तक मैं सैनिक अस्पताल में भरती रहा। बाद में मुझे मेडिकल ग्राउंड पर सेना से डिस्चार्ज लेना पड़ा।

“ओह! बहुत बहादुर हो तुम।” केशु बोली।

“थैंक्स मेम साहब!” कहते हुए कश्मीरा सिंह ने कार जयपुर की ओर दौड़ा दी।

“मैं मीटिंग में जा रहा हूँ। ग्यारह बजे तो वह शुरू हो जाएगी। मुझे दो-तीन घंटे लग जाएँगे। तब तक तुम जयपुर घूम लो। मेरे तो यहाँ सब देखा हुआ है।’’ पन्नू को जयपुर में ऑल इंडिया होजरी उद्योग संघ की मीटिंग में जाना था।

“ठीक है, लेकिन लंच साथ ही करेंगे। तीन बजे तक तो आ ही जाना।”

“ओ, स्योर।”

“वैसे तो जयपुर मेरे भी देखा हुआ है। लेकिन दस-बारह साल हो गए। तुम तो कहीं ऐसी जगह ले चलो, जहाँ शांति और सुकून हो। हाँ, याद आया, आज बुधवार है। गढ़-गणेश चलते हैं कश्मीरा सिंहजी।’’ धार्मिक स्वभाव की प्रकृति व एकांत पसंद केशु बोली।

“आप मेरे नाम के आगे जी नहीं लगाएँ, मेम साहब। बस ‘कश्मीरा’ ही काफी है।”

“नहीं, नहीं, आप मुझ से उम्र में बड़े हो। चलो, थोड़ा छोटा कर देती हूँ। ‘कश्मीराजी’ चलेगा न!”

जवाब में कश्मीरा सिंह केवल मुसकरा दिया।

गाड़ी नीचे पार्किंग में रखकर दोनों गढ़-गणेश पहुँचे। वहाँ मंगल-मूर्ति के दर्शन कर केशु एक चट्टान पर बैठकर वहाँ से नाहर गढ़ पर्वत व जयपुर शहर के नजारे का आनंद लेने लगी।

“आप भी बैठ जाओ, कश्मीराजी।” केशु कश्मीरा को प्रसाद का लड्डू देते हुए बोली।

“परिवार में तुम्हारे कौन-कौन है?” केशु ने कश्मीरा से पूछा।

कश्मीरा इस सवाल के लिए तैयार नहीं था। वह एकदम उदास हो गया, मानो उसके घाव खुरचने लगे हो।

“क्या करना है मेम साहब, छोड़िए न।”

“कोई खास दिक्कत न हो तो आप हमें अपना समझकर ही बता दीजिए।”

“थे कभी मेम साहब। सभी थे। पत्नी, इकलौता बेटा, बहू और एक प्यारी सी पोती। लेकिन आज तो मैं बिल्कुल अकेला हूँ। आगे-पीछे कोई नहीं।”

“हुआ क्या था कश्मीराजी?”

“यह उन दिनों की बात है मेम साहब, जब पंजाब में खलिस्तानियों व भिंडरावाला का बोलबाला था। एक दिन मेरी बीबी सुखवंत कौर, मेरा इकलौता बेटा मनदीप सिंह, उसकी बहू पम्मी व एक प्यारी सी पोती सिमरन पटियाला के हमारे घर में ही थे।” यह कहते-कहते कश्मीरा की आँखें भर आईं।

“कश्मीराजी, आप तो बहादुर हो। हिम्मत रखो।” केशु ने उसे सांत्वना दी। कुछ देर बाद उसकी उत्सुकता कश्मीरा के प्रति संवेदना पर भारी पड़ने लगी।

“फिर क्या हुआ कश्मीराजी।” केशु ने न चाहते हुए भी उससे पूछ ही लिया।

“होना क्या था मेम साहब। उग्रवादियों ने घर में घुसकर सभी को गोलियों से भून दिया। उन्हें शक था कि मेरा बेटा पुलिस का मुखबिर था, जबकि ऐसा कतई नहीं था। उधर श्रीनगर के सैनिक अस्पताल में पैर में लगी गोलियों के कारण मैं बेहोश पड़ा था। दो दिन बाद जब मुझे कुछ होश आया तो मेरे पूरे परिवार के सफाए की मुझे खबर मिली। और तो और मैं उनके अंतिम दर्शन तक नहीं कर सका मेम साहब। रब दी मर्जी...!’’ यह कहते हुए कश्मीरा ने आकाश की ओर अपने हाथ उठाए। उसके चेहरे पर दुःख और गहरा गया था। कश्मीरा की दास्तान सुनकर केशु अत्यंत क्षोभ से भर गई।

“टैक्सी से ठीक-ठाक कमाई हो जाती होगी?” केशु ने कुछ सोचकर विषय परिवर्तन किया।

“जी मेम साहब। कुछ टैक्सी से तो कुछ आर्मी की पेंशन से मिल जाता है। मेरा ज्यादा कोई खर्चा नहीं है। जो पैसा बचता है उसे दिल्ली के ‘गुरु गोविंद सिंह खालसा लंगर’ में दे देता हूँ। अपनी टैक्सी भी मैंने उन्हीं के नाम कर रखी है। वैसे भी मेरे आगे-पीछे कोई नहीं है। पता है मेम साहब, रोजाना एक हजार से भी ज्यादा गरीब वहाँ मुफ्त खाना खाते हैं।’’ कुछ संयत होने के बाद वह यह कह सका। केशु को यह सुनकर अच्छा लगा।

केशु के जीवन में भी कम त्रासदी नहीं हुई थी। उसके पिता का दिल्ली में होजरी का थोक का अच्छा व्यापार था। केशु अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। एक दिन दिल्ली में एक ट्रक ने उनकी कार के टक्कर मार दी, जिसमें उसके माता-पिता चल बसे। पिता ने अपनी संपत्ति की वसीयत पहले से ही केशु के नाम कर दी थी। वह तब से ही उदास और एकांत पसंद रहने लगी थी। थायराइड और अस्थमा जैसे रोग अलग लग गए थे उसे।

समय बीतता गया और एक दिन युवा केशु ने अपने थोक व्यापार प्रतिष्ठान के मैनेजर पन्नेसिंह के प्रति आकर्षित होकर उससे शादी कर ली। केशु को जब भी अस्थमा का अटैक होता था, तब उसे लगता था कि वह अब गई कि अब गई। आठ साल हो गए उसका पेट भी नहीं मढ़ा। डॉक्टरों ने इसकी संभावना से भी इनकार कर दिया था। इसी कारण से उसने अपनी जायदाद की वसीयत पन्नेसिंह के नाम कर रखी थी। लेकिन उसके भीतर कहीं गहराई में एक अजीब सा भय दबा हुआ था, जिसका कारण स्वयं उसे भी मालूम नहीं था।

“अच्छा तुम्हारा नाम कश्मीरा सिंह कैसे पड़ा?’’ केशु कश्मीरा की बहादुरी और निर्मल छवि भाने लगी थी।

“जी मेम साहब, बात यह है कि मेरे पिता भी फौज में थे और मेरा जन्म जब हुआ तब मेरे पिता की तैनाती भी कश्मीर बाॅर्डर पर ही थी। बस बेटा होने का समाचार मिलते ही वे उछल पड़े। खुशी के मारे उन्होंने शराब के दो पेग और चढ़ा लिए। फिर बोले कि बेटे का नाम कश्मीरा सिंह रखूँगा।’’ कश्मीरा सिंह के जवाब के लहजे से केशु को लगा कि वह अपने दुःख को भूलकर सामान्य होने लगा है।

“तुम तो पंजाबी हो फिर भी हिंदी ठीक-ठाक बोल लेते हो।’’

“जी, कश्मीर में मेरी कंपनी में यूपी व बिहार के भी जवान थे। बस उनसे बतियाते हुए।’’

दिन के २ बज चुके थे। शीघ्र ही जंतर-मंतर देखकर वे अपने होटल पर पहुँचे। पन्नू अभी तक आया नहीं था।

“तुम भी चाय पी लो।’’ केशु ने दो चाय का आर्डर देते हुए कश्मीरा से कहा।

“अरे हाँ, तुमने यह तो बताया ही नहीं कि वे हत्यारे उग्रवादी पकड़े गए या नहीं?’’ केशु ने न चाहते हुए भी कश्मीरा से पूछ ही लिया।

“मुझे मालूम तो पड़ गया कि हत्यारे उग्रवादी कौन थे? मैंने उनसे बदला लेने की ठान भी ली थी। मेरे पास कई सालों से लाइसेंस शुदा पिस्तौल है, जो मैं हर समय अपने साथ रखता हूँ। लेकिन इससे पहले कि मैं कुछ कर पाता, पुलिस ने उन उग्रवादी हत्यारों का एनकाउंटर कर दिया था।’’ कश्मीरा ने काफी देर बाद संतोष की साँस ली।

कश्मीरा सिंह हरदम अपने पास पिस्तौल रखता है, यह जानकर केशु कुछ घबरा सी गई। लेकिन इसी के साथ उसे पूरा विश्वास होने लगा था कि यह आदमी भला लगता है।

“सॉरी आईएम लिटल लेट, कैसी रही तुम्हारी साईट सींग!” पन्नू ने होटल के वेटिंग हॉल में प्रवेश करते हुए वहाँ बैठी केशु से पूछा।

“अच्छी रही।’’ केशु ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया। उसका मूड ठीक नहीं था। खाना खाने के बाद उन्होंने शाम पाँच बजे होटल से चैक आउट किया।

“चलो अब दिल्ली चलते हैं। मैं थक गई हूँ।’’ केशु ने पन्नू से कहा।

“लेकिन तुम तो आज करौली मदनमोहनजी मंदिर की महाआरती के दर्शन करना चाहती थी। चाहो तो चलो। थोड़ा चक्कर तो लगेगा। लेट हो गए तो भरतपुर नाइट-हाॅल्ट कर लेंगे।’’ पन्नू ने केशु को याद दिलाया।

“ओह, अच्छा किया, आपने याद दिला दिया। मैं तो भूल ही गई थी। थैंक्स।’’ केशु धार्मिक विचारों की पढ़ी-लिखी महिला थी। कृष्ण का ईष्ट था उसे।

वे लोग शाम करीब साढ़े सात बजे तक करौली पहुँच गए। वहाँ केशु ने महाआरती का आनंद लिया। पन्नू को इसमें रुचि नहीं थी सो वह मंदिर के बाहर ही रुक गया। खाना प्रसाद लेते-लेते रात के करीब दस बज गए थे। सभी ने भरतपुर में ही रात्रि विश्राम करना तय किया। पन्नू सिंह एक तरफ दूर जाकर मोबाइल पर बातें कर रहा था। केशु ने सोचा कि वह भरतपुर में होटल रूम बुकिंग के लिए फोन कर रहा है।

करौली से रवाना होते ही केशु को थकानवश आराम करने का जी कर रहा था, लेकिन पता नहीं आज क्यों, उसके भीतर एक अजीब सी हलचल थी। सड़क पर पोल लाइट्स भी नहीं थी। घुप्प अँधेरे में कार बयाना से कुछ आगे पहुँची ही थी कि कश्मीरा ने सड़क पर पत्थर व काँटे बिछे देखे। लगता था किसी ने जानबूझकर रास्ते में रुकावट पैदा की है। कार हलके से झटके के साथ रुकी ही थी कि पास ही झाड़ियों में छुपे चार-पाँच बदमाश, काले कपड़े से अपने मुँह को आधा ढके हुए सामने आए। उनके सरगना ने देशी कट्टे को कार की ओर तानते हुए तीनों को कार के बाहर आने का इशारा किया। उन बदमाशों में दो के हाथ में देशी कट्टे व शेष के हाथों में चाकू-सरिए थे।

केशु और कश्मीरा भारी दुःख और आश्चर्य से अवाक् रह गए, जब उन्होंने कार की लाइट में देखा कि पन्नू दौड़कर उन युवकों के सरगना के पास गया। उसने एक लिफाफेनुमा पैकेट उसे पकड़ाया और वहाँ से गायब हो गया।

कश्मीरा को यह देखकर विश्वास नहीं हुआ कि स्वयं पन्नेसिंह ने किराए के बदमाशों को सुपारी देकर यह जाल बिछाया था। लेकिन केशु की आँखों को तो कतई विश्वास नहीं हुआ कि उसे हमेशा प्यार जताने व उसकी देखभाल करने वाला पन्नू उसके साथ ऐसी घातक दगाबाजी कर सकता है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इतने सालों में वह उसका असली चेहरा क्यों नहीं पहचान सकी? एक बात तो उसके सामने साफ थी कि उसने वसीयत में अपनी समस्त जायदाद पन्नू के नाम लिख रखी थी। वह उसे शीघ्रताशीघ्र पाना चाहता था। उसके लिए उसे रास्ते से हटाना जरूरी था। इसी वास्ते उसने ऐसी घिनौनी हरकत की।

“तुम दोनों बाहर आओ।’’ सरगना दहाड़ा। उसने कश्मीरा से कार की चाबी छीनी और अपने एक गुर्गे से कार व उन दोनों को पास ही साइड के कच्चे रास्ते पर ले गया।

“देखो यारो, जो कुछ रुपया-पैसा लेना हो वह हमसे ले लो और हमें जाने दो।’’ कश्मीरा ने सरगना और उनके सभी बदमाशों से गुहार की। वह किसी तरह केशु की जान बचाने की कोशिश कर रहा था।

“पैसे तो हमारे पास पहले से ही काफी हैं।’’ यह कहते हुए सरगना ने अपने कट्टे से दो गोलियाँ केशु को मारी जो उसके पेट में लगी। केशु, खून से लथपथ होकर जमीन पर गिर पड़ी।

कश्मीरा ने फौज में ऐसे कई एम्बुशों का सामना कर रखा था। उसका खून खौल उठा। उसने तुरंत अपनी कमर में दबाई पिस्तौल से उस सरगना के सिर में दो गोलियाँ मारी, जिससे वह वहीं ढेर हो गया। तभी एक बदमाश ने मौका पाकर अपने कट्टे से कश्मीरा पर दो गोलियाँ दाग दीं। कश्मीरा भी खून से लथपथ हो गया। लेकिन उस हालत में भी उसने उन दो बदमाशों को गोलियों से भूनकर ढेर कर दिया। शेष बदमाश वहाँ से भाग गए।

अब वह तुरंत केशु के पास पहुँचा। उसने अपनी पगड़ी उतारकर उसे फाड़ा और केशु के पेट से लपेटकर बह रहे उसके खून को रोका। केशु बेहोश थी। उसने पेट से बह रहे खून को भी पगड़ी की पट्टी बनाकर रोका। किसी तरह उसने केशु को कार की पिछली सीट पर लेटाया और खुद कार चलाने लगा। उसके भी पेट से खून बह जाने के कारण उसे लग रहा था कि वह ज्यादा देर होश में नहीं रह सकेगा। उसने एकाध किलोमीटर ही कार चलाई थी कि इतने में उसे सामने से एक पुलिस वेन आती दिखाई दी। शायद गश्ती दल की गाड़ी थी। उसने अपने हाथ व कार लाइट से उन्हें रुकने का इशारा किया। वेन के रुकते ही उसमें एक पुलिस निरीक्षक व तीन-चार सिपाही नीचे उतरे। कश्मीरा ने उन्हें क्षीण हो रही अपनी आवाज से सारी दास्तान बतलाई और उन्हें तुरंत भरतपुर अस्पताल ले जाने की प्रार्थना की। राम सिंह ने दो सिपाहियों को घटनास्थल को सुरक्षित रखने के लिए वेन से रवाना कर स्वयं ने कार का स्टियरिंग सँभाल लिया। शीघ्र ही वे भरतपुर सरकारी अस्पताल पहुँच गए। सिपाहियों ने पुलिस कंट्रोल रूम को सारी सूचना दे दी थी, सो अस्पताल में डॉक्टर आदि पहुँच गए थे। वे ऑपरेशन की तैयारी में पहले से ही जुट गए थे।

इस बीच कश्मीरा भी बेहोश हो चुका था। उसके एक गोली पेट में लेकिन दूसरी गोली दिल के ठीक नीचे लगी थी। उधर केशु भी अभी तक बेहोश थी। लेकिन कश्मीरा की हालत एकदम गंभीर हो गई। उसे ऑपरेशन टेबल तक ले जाया जाता, उसके पहले ही उसके प्राण पखेरू उड़ चुके थे।

डॉक्टर्स ने केशु का ऑपरेशन कर उसके पेट में धँसी दोनों गोलियाँ निकाल दीं। गोलियों से फटी उसकी आँतों का भी ऑपरेशन किया गया। करीब दो घंटे बाद केशु को होश आ गया। कोई पंद्रह-बीस मिनट उसे कुछ सामान्य होने में लग गए।

कुछ क्षणों में उसके सामने अपने जीवन की रील रिविंड होने लगी। उसका बचपन, माता पिता का प्यार, काॅलेज समय की मस्ती, एक आदर्श पति मिलने का सपना और फिर पन्नू के छद्म प्यार में छुपा लोभ व दगाबाजी के जहर के दृश्य साफ नजर आने लगे। सबसे सुखद याद तो कश्मीरा के शौर्य और चरित्र की थी जो उसे सुकून दे रही थी।

केशु के पूछने पर एक नर्स ने उसे बता दिया कि कश्मीराजी की हालत बहुत गंभीर थी। डॉक्टर उन्हें नहीं बचा पाए। यह सुनकर केशु को भारी सदमा हुआ। वह अर्ध बेहोशी की हालत में चली गई।

डॉक्टर के अनुसार केशु अभी खतरे से बाहर नहीं थी। पुलिस केशु का बयान लेने अस्पताल आ चुकी थी। पुलिस को लगा कि शायद केशु भी न बचे इसलिए मृत्यु-पूर्व बयान दर्ज करने के लिए वे मजिस्ट्रेट को भी साथ लेकर आए थे। करीब आधे घंटे के इंतजार के बाद केशु को ठीक से होश आया।

मजिस्ट्रेट ने अपना परिचय देकर उससे कुछ सवालात पूछे। केशु ने अटकते-अटकते बताया कि बयाना के पास सड़क पर हत्यारों ने उनका रास्ता रोका। उन्हें वह नहीं जानती। उनके सरगना ने उसके पेट में गोलियाँ मारीं। यह सब उसके पति पन्नेसिंह के षड्यंत्र से हुआ। कुछ और बातों के अलावा उसने यह भी बताया कि उसने अपनी जायदाद की वसीयत पन्नेसिंह के नाम कर रखी है।

“आप...मुझे...पेन-कागज दीजिए।’’ केशु ने मजिस्ट्रेट से निवेदन किया।

“मैं पन्नेसिंह के पक्ष में लिखी अपनी पहली वसीयत कैंसिल करती हूँ। आज मैं अपनी समस्त चल-अचल जायदाद पुरानी दिल्ली के गुरु गोविंद साहब खालसा लंगर खाने के नाम करती हूँ। और हाँ, कश्मीराजी ने अपनी टैक्सी-कार आदि भी उक्त लंगर के नाम कर रखी है।’’ उसने बमुश्किल धीरे-धीरे लिखकर अपने दस्तखत किए। मजिस्ट्रेट ने समस्त कानूनी औपचारिकताएँ पूरी कीं।

मेरी एक आखिरी इच्छा और है मजिस्ट्रेट साहब। मैं जानती हूँ कि मेरे पास समय कम है। मेरा इस संसार में आगे-पीछे कोई नहीं है। मुझे मालूम है कि कश्मीरा सिंहजी के भी आगे-पीछे कोई नहीं है। फिर यह कोरोना काल है। अगर संभव हो तो हम दोनों का एक ही चिता पर दाह-संस्कार कर देना।

आधी रात में केशु की साँसें तेज होने लगीं। शायद उसमें अब जीने की इच्छा-शक्ति भी बिल्कुल नहीं रही थी। भोर होते-होते आखिर वह नहीं रही। वहाँ मौजूद सभी अधिकारी गण के लिए केशु उर्फ केशर व कश्मीरा सिंह बिल्कुल अनजान व्यक्ति थे, लेकिन उनका एक ही चिता पर दाह-संस्कार करते हुए सभी की आँखें नम थीं।

मुरलीधर वैष्णव
ए-77, रामेश्वर नगर,
बासनी प्रथम, जोधपुर-342005
दूरभाष : 9460776100

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