घोंसला

घोंसला

सुपरिचित बाल-साहित्यकार। ‘किनारे की चट्टान’ (कविता-संग्रह), ‘भोलू भालू सुधर गया’ (बाल-कहानी-संग्रह), ‘हिमाचल का बाल साहित्य’ (शोध संदर्भ), ‘जड़ों से जुड़ाव’ (धरोहर संरक्षण की पहल), ‘वह बिल्कुल चुप थी’ (कहानी-संग्रह) प्रकाशित। ‘२१ श्रेष्ठ बालमन की कहानियाँ हिमाचल’ (संपादन), स्कूल और कॉलेज पाठ्यक्रमों में रचनाएँ शामिल। कविता ‘फेगड़े का पेड़’ को वर्ष २०१७ का प्रतिलिपि संपादकीय चयन में प्रथम पुरस्कार तथा बाल-साहित्य में कई सम्मान।

 

बसंत का मौसम अपने अंतिम पड़ाव पर है। पतझड़ में खाली हुई टहनियाँ अब फल, फूलों और ढेर सारे पत्तों से लद चुकी हैं। यह पक्षियों के प्रजनन का समय है। घोंसला बनाने के लिए सभी पक्षी अपना-अपना ठिकाना आबाद कर रहे हैं। कुछ इसे जल्दी तैयार कर अंडे भी सेने लग गए हैं, जबकि कुछ अभी थोड़ी देर लगाएँगे।

पिंटू, रमन और दीपू इस मौसम का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हैं। इस बार से नहीं बल्कि पिछले कुछ वर्षों से। तीनों की उम्र भी एक और कक्षा भी एक ही—आठवीं। गाँव की यह तिकड़ी सबसे शरारती भी है। अभी-अभी इनका वार्षिक परीक्षा परिणाम आया है। तीनों ही पास। नई कक्षा का यह शुरुआती महीना है। आजकल तीनों ही स्कूल के बाद निकल पड़ते हैं खेतों की ओर। उन छोटे-बड़े पेड़ों की ओर, घोंसलों की तलाश में। हर पेड़, मेंड़, गाँव के तालाब के आसपास, मिट्टी की कच्ची दीवार के सुराखों पर, हर जगह घोंसले पर इनकी नजर है। जैसे ही किसी पक्षी ने अंडे दिए नहीं कि ये अपने मनोरंजन के लिए उन्हें अपने हाथों में बार-बार उछालते हैं। एक-दूसरे को दिखा-दिखाकर मजे लेते हैं। इनकी इस हरकत से बहुत से अंडे खराब हो जाते हैं। इनकी इस खुशी में पक्षियों का नया परिवार बनने से रह जाता है। कई बार तो इनसे ये अंडे टूट भी गए हैं।

जब अंडों से चूजे निकलते हैं तो इनका उत्साह और भी बढ़ जाता। एक-एक घोंसले से उन नन्हे, नंगे और बिना पंख के चूजों को हाथ में उठाते हैं। एक-दूसरे को सौंपते, उछालते हैं। यदि थोड़े पंख निकल आए हों तो ऊपर से ही फेंककर उनके उड़ने की इच्छा पालते हैं। इनकी इस हरकत से कई चूजे तो भी मर जाते हैं। और जो बचते भी हैं तो उनकी टाँगें या फिर पंख टूट गए होते हैं। चूजों के माता-पिता पक्षी उन्हें बार-बार शोर मचाकर या फिर ठोंग मारकर हटाने की कोशिश करते हैं, लेकिन सब बेकार रहता है। वे पत्थर या डंडों से उन्हें वापस परे उड़ा देते हैं। ज्यादा ही परेशान हुए तो उनका घोंसला ही गिरा देते थे। कई पक्षी तो असहाय से चुपचाप दूसरे पेड़ों पर बैठकर अपने घोंसले की दुर्गति देखते रहते हैं।

उनकी ये हरकतें पक्षियों के लिए बहुत दर्द देने वाली होती हैं। इस इलाके के सभी पक्षी उन्हें पहचान गए हैं। तीनों के आते ही वे शोर मचाना शुरू कर देते हैं, ताकि दूसरे पक्षी भी सतर्क हो जाएँ। कई तो उन्हें ठोंगे मार-मारकर वापस भेजने का असफल प्रयास करते हैं। घोंसला बनाने, अंडे देने और बच्चों के बड़ा होने तक का समय इस गाँव और आसपास के पक्षियों के लिए बहुत ही डरावना और परेशान करने वाला होता है।

इसका परिणाम यह रहा कि अबकी बरस यहाँ पक्षियों ने बहुत कम घोंसले बनाए। लेकिन इस बार उनके लिए एक नया आकर्षण था बाज का घोंसला। यह पहली बार था, जब किसी बाज ने इस गाँव में अपना घोंसला बनाया था। यह खेत के ऊँचे पेड़ पर था। अध्यापक ने उन्हें कक्षा में बताया भी था कि प्रदूषण और कई खतरनाक विकिरणों के चलते बहुत से पक्षी धीरे-धीरे अपना ठिकाना बदल रहे हैं या फिर खत्म हो रहे हैं। शायद इसकी भी यही वजह थी। कुछ ही समय में बाज की जोड़ी ने अपना घोंसला भी बना लिया था। शायद अब तक अंडे भी दे दिए थे या उनसे बच्चे भी निकल आए होंगे। यह पत्तों के बीच से देख पाना मुश्किल था। इसका पता लगाने हेतु पिंटू का नाम तय हुआ। पिंटू भी तैयार था। वह मुश्किल से जब घोंसले के पास पहुँचा तो उसने देखा, वहाँ एक चूजा है। वह बहुत खुश हुआ। जैसे ही उसने नीचे खड़े रमन और दीपू को दिखाने के लिए उसे उठाना चाहा तो न जाने कहाँ से बाज आकर उस पर टूट पड़ा। बड़ी मुश्किल से बचता-बचाता वह आधे पेड़ तक उतर आया। बाज का हमला बराबर जारी था। अब पिंटू भी थकने लगा था। नीचे खड़े रमन और दीपू इस दशा में न पत्थर और न ही कोई डंडा बाज को मार सकते थे। चोट पिंटू को भी लग सकती थी। तभी अचानक पिंटू के हाथ छूटे और वह पेड़ से सीधा नीचे कनक के खेत पर आ गिरा। अस्पताल जाकर पता चला कि उसकी दाईं टाँग और बाजू टूट चुके हैं। फिलहाल उसकी टाँग और बाजू में कुछ दिनों के लिए प्लास्टर चढ़ गया। उसे डॉक्टर ने पूरी तरह से आराम करने की सलाह दी।

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पिंटू अब घर के भीतर बैठा या तो टी.वी. देखता रहता या फिर अपने आँगन में लुकाठ की छाँव में एक मंजे पर लेटा रहता। एक दिन उसने देखा, लुकाठ के पेड़ पर फुदकी का जोड़ा अपना घोंसला तैयार कर रहा है। दोनों ही अपनी चोंच में नरम घास तथा बाल लाते तथा चुनी हुई छोटी टहनी पर बिछाते। उन्होंने इस प्रक्रिया को कई बार दोहराया। वे घोंसले का आधार तैयार कर रहे थे। शाम हो रही थी। लेकिन यह क्या? तभी एक तेज हवा के झोंके ने इस घोंसले को पल भर में ही उड़ा दिया। फुदकी का जोड़ा बेबस सा उसे उड़ते हुए देखता रहा। बड़ी देर तक उसी टहनी पर मायूस से वे बैठे रहे।

पिंटू ने देखा, अगले दिन वे दोनों फिर से अपने काम में लग गए। इस बार वे इस घास व अन्य सामग्री को टहनी व पत्तों के साथ बाँधने की कोशिश करते हैं। बड़ी कोशिशों के बाद फिर से घोंसले का आधार तैयार होने लगता है। वे दोनों खुशी से फुदकने लगते हैं। लेकिन यह क्या? उसी वक्त पेड़ पर बैठी मैना लुकाठ खाने को जैसे ही चोंच मारती है तो एक पका हुआ लुकाठ सीधा ही उस घोंसले पर गिरकर उसे तोड़ देता है। यह उनके लिए बहुत ही परेशान करने वाली बात थी। वे दोनों थोड़ी देर चुपचाप वहीं बैठे रहे। लेकिन फिर एक उड़ान भरी और दोबारा उसी जोश के साथ अपने काम पर लग गए। पिंटू बड़े ध्यान से सब देखता रहा। यह सारी प्रक्रिया देखकर उसका समय भी बढ़िया बीत रहा था। अबकी बार न हवा चली और न ही कोई लुकाठ गिरा। कुछ ही दिनों में उनका घोंसला बनकर तैयार हो गया। फुदकी ने वहाँ अंडे भी दिए।

उस दिन पिंटू पेड़ के नीचे ही अपने पलंग पर आराम कर रहा था। तभी एक कौआ फुदकी के अंडों को खाने के लिए झपटा। इसके चलते एक अंडा नीचे गिरकर टूट गया। यह फुदकी के लिए बड़ा आघात था। वह जैसे पागल सी हो गई थी। आज पहली बार वह खूब जोर-जोर से चिल्ला रही थी। वह कभी पेड़ पर इधर-उधर उड़ती तो कभी बड़ी देर तक उस टूटे अंडे के पास जा-जाकर उसे देखती। अपने पंजों से अंडे की जैली को समेटने और उसे जोड़ने की नाकाम कोशिश करती। वह सामने बैठे पिंटू से भी नहीं डर रही थी। यह दृश्य पिंटू के लिए बड़ा ही दुखदायी था। घायल पिंटू भी एकदम से कुछ न कर पाया था।

पिंटू इतने दिनों से उनकी घोंसला बनाने की मेहनत से लेकर घोंसले में अंडे सजाने तक को देखता आया था। उसने देखा कि जिन घोंसलों को तोड़ने में हम एक पल भी नहीं लगाते। ये पक्षी उन्हें कितनी मेहनत से बनाते हैं। उसे पूरी रात नींद ही नहीं आई। उसे बार-बार सपने में वे सभी पेड़, घोंसले, अंडे और चूजे ही दिखते रहे, जिनका उन्होंने नुकसान किया था। उसने देखा, सारे पक्षी उनके गाँव से चले गए हैं। पूरे गाँव में सन्नाटा पसरा है। किसी भी पक्षी की आवाज सुनाई नहीं दे रही है। यह सपना उसे कचोटता रहा। वह समझ गया कि उनके कारण ही इस बार गाँव में कम घोंसले बने हैं। कई पक्षियों ने अपनी पुरानी जगहों पर घोंसले भी नहीं बनाए हैं और कुछ पक्षी उन्हें इस बार दिखे ही नहीं। उसने सारी बात रमन और दीपू को बताई। सब सुनकर वे भी उदास हो गए।

तीनों ने एक-दूसरे से वादा किया कि अब वे पक्षियों को तंग नहीं करेंगे। साथ ही पक्षियों के नुकसान की भरपाई के लिए स्वयं कृत्रिम घोंसले तैयार करेंगे और जगह-जगह सुरक्षित स्थानों पर उन्हें लटकाकर पक्षियों को वापस आने का न्योता देंगे।

आज पिंटू को अच्छे से नींद आई। उसने अब यह कार्य अपने अंदाज में शुरू भी कर दिया था। सुबह ही उसने अपना पलंग पेड़ के नीचे लगवा दिया था। अबकी बार उसके पास एक लंबा डंडा था। घोंसला बनाने की सामग्री थी। अब जब भी कोई कौआ या बिल्ली फुदकी के घोंसले को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते तो वह इस डंडे या मुँह से अलग प्रकार की तीखी आवाज निकालकर उन्हें भगा देता था। जब तक चूजे उड़ने नहीं लगे, उसने अपनी ड्यूटी पूरी तरह से निभाई। वहीं दूसरी तरफ, रमन और दीपू भी बड़ी रुचि के साथ घोंसले बना रहे थे। उन्होंने अब तक कई घोंसले जगह-जगह पेड़ों पर टाँग भी दिए थे।

पवन चौहान

गाँव व डाक-महादेव, तहसील-सुंदरनगर,

जिला-मंडी-175018 (हि.प्र.)

दूरभाष : 9418582242

जुलाई 2022

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