पर्थ-प्रवास के कुछ संस्मरण

पर्थ-प्रवास के कुछ संस्मरण

चिकित्सा विषय पर हिंदी में लिखनेवाले प्रतिनिधि लेखक। चिकित्सा क्षेत्र में अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप से सम्मानित। ढाई सौ से अधिक शोध-पत्र विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित। ‘हृदय सूक्तियाँ’, ‘तंबाकू चित्रावली’, ‘मैं बनारस हूँ’, ‘स्कूल स्वास्थ्य’ कृतियाँ प्रकाशित। संप्रति नई दिल्ली स्थित नेशनल हार्ट इंस्टीट्यूट में वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ।

 

किशोर पौत्र-पौत्री के निरंतर आग्रह-अनुरोध पर हम दोनों पति-पत्नी इस बार नव संवत्सर के शुभारंभ एक अप्रैल के दिन सिंगापुर विमान सेवा से ऑस्ट्रेलिया के महानगर पर्थ पहुँच गए। वहाँ करीब पंद्रह दिन बिताने के बीच हमें कुछ अविस्मरणीय अनुभव हुए, जिन्हें मैं लिपिबद्ध करने का प्रयास कर रहा हूँ। उनमें से कुछ प्रमुख हैं—

स्वान पयस्विनी का मौन संकेत

पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया की राजधानी पर्थ विश्व के खूबसूरत शहरों में से एक है। यह महानगर ‘स्वान’ नदी के किनारे पर बसा हुआ है। इस नदी की कुल लंबाई ७२ किलोमीटर है और इसके बेसिन का क्षेत्रफल १,२१,००० वर्ग किमी. है। स्वान अंततः हिंद महासागर में विलीन हो जाती है। इसका नाम स्वान क्यों पड़ा, इस विषय में कोई विशेष कारण नहीं पता चलता है। पर्थ नगर की खोज का प्रयास सर्वप्रथम डच नाविकों ने किया, पर वे पूर्णतः विफल रहे। उनके बाद फ्रांसीसी नाविकों ने दो बार कोशिश की। वे भी नदी के किनारे रेत-बालू के ढूहों से जूझते रहे और कई साथियों के प्राण गँवाकर भी सफल नहीं हो सके। अंततोगत्वा अंग्रेजों ने नदी पार कर इस शहर को ढूढ़ने में सफलता प्राप्त की। संभवतः नदी के आसपास काले हंसों को देखकर उन्होंने इस नदी को ‘स्वान’ के नाम से संबोधित करना शुरू कर दिया। ज्ञात रहे, अंग्रेजी में स्वान को हंस कहते हैं। कृष्ण हंस को पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में २५ जुलाई, १९७३ से राज्य पक्षी का सम्मान प्राप्त है।

पूरे पर्थ को अपने अंक में समेटे पयस्विनी स्वान इस महानगरी की जीवन-रेखा है। पर्थ निवासियों ने इसे बहुत सँजोकर, सजा-सँवारकर रखा है। मजाल है कोई इसे दूषित कर सके। मुझे कोई इसमें स्नान-प्रक्षालन करते, थूकते, खखारते, किसी प्रकार के उच्छिष्ठ का निस्तारण करने का दुस्साहस करते नहीं दिखा। स्रोतस्विनी स्वान के किनारे-किनारे अनेक भव्य होटल, बहुखंडीय इमारतें, अट्टालिकाएँ, व्यापारिक केंद्र, मॉल, उपरिसेतु निर्मित किए गए हैं। सबकी वास्तु रचना ऐसी कि नदी का कूल भी दिखता रहे और उसका सलिल प्रवाह पर दुकूलों को कोई क्षति न पहुँचे। सरिता के प्राणाधार विशाल वृक्षों को कोई हानि न पहुँचे। पर्थ सिटी सेंटर के निकट एक विशाल वृक्ष की एक भुजा भूमिशायी बुद्ध की मुद्रा में स्वान दुकूल की तरफ आने वाले अभ्यागतों का मानो स्वागत कर रही थी, पर किसी ने उसे क्षतिग्रस्त करने या उस पर आरूढ़ होकर उसे कंपित या विकृति करने की सोची भी न होगी। यह सब करना वहाँ अपराध और जघन्य समझा जाता है।

मैं जब स्वान पयस्विनी की स्वच्छता और रख-रखाव की तुलना राजधानी दिल्ली की यमुना से करता हूँ तो मन मसोसकर रह जाता हूँ कि कभी लालकिले से सटकर बहने वाली यमुना अब लाल किले से कितनी दूर मलिन, फेनिल, पंकमयी और शिथिल बह रही है। उसमें आस-पास का सारा मल, उच्छिष्ट बह रहा है। अब वह अंतिम साँसें गिन रही है। कमोबेश यही हाल लखनऊ की गोमती तीरा की है। काशी में अविरल प्रवाहिनी, मुक्तिदायिनी माँ गंगा का हाल भी बहुत अच्छा नहीं है। क्या हम भारतवासी पर्थ पयस्विनी स्वान तथा लंदन टेम्स के किनारे बसे उनके निवासियों द्वारा अपनी जीवन-रेखा रूपी इन सरिताओं को निर्मल रखने और उनके अजस्र प्रवाह को अक्षुण्ण रखने के सद्प्रयास से यह शिक्षा नहीं ले सकते कि हम भी अपनी नदियों को कैसे विमल और सनातन रखे? कहने को तो हम गंगा, यमुना, गौमती, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी, कृष्णा जैसी बड़ी नदियों के साथ अपने आसपास छोटे-छोटे पोखरों-जलाशयों को भी देवी-देवताओं का सम्मान देते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं, परंतु जाने-अनजाने अपने व्यवहार से उन्हें निरंतर मलिन, शिथिल और संकुचित करते रहे हैं। इस विरोधाभास से अब हमें मुक्ति लेनी चाहिए। स्वान पयस्विनी मुझे यही मौन संकेत दे रही थी।

पर्थ में रामनवमी : उठ रहे कुछ विचार

आज १० अप्रैल है—चैत्र शुक्ल नवमी का शुभ दिन। त्रेतायुग में अयोध्या की पावन नगरी में महाराज दशरथ के राजनिवास में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का जन्म कौशल्या माता की कोख से मध्याह्न‍ के सुहावने क्षणों में हुआ था। स्वदेश में प्रायः हर नगर-महानगर मर्यादा पुरुषोत्तम राम की आराधना-पूजा में निमग्न होगा। हम पर्थ में थे, इसलिए वहाँ के सुप्रसिद्ध बालामुर्गन (कार्त्तिकेय) मंदिर में दर्शन-पूजन के लिए सपरिवार गए। यह मंदिर पर्थ नगर से करीब अट्ठाईस मील दूर शांत-एकांत क्षेत्र में दक्षिण भारतीय श्रद्धालुओं द्वारा बनाया गया है। वहाँ पर अधिकतर दक्षिण भारतीय और श्रीलंका मूल के लोग पारंपरिक वेश-भूषा में आते हैं। मंदिर के त्रिपुंड मंडित पंडित-पुरोहित अपनी विशिष्ट शिखा, धोती और उत्तरीय में जब दक्षिण भारतीय आरोह-अवरोह के साथ देवभाषा संस्कृत में वेदोच्चार करते हैं तो सुनते ही बनता है। हम लोगों ने भी श्री कार्त्तिकेय के दर्शन के साथ-साथ राम दरबार, मारुतिनंदन, भगवान् शिव और शक्ति स्वरूपा देवी भगवती के दर्शन किए। परिक्रमा की। कुछ क्षण बिताए और वहाँ स्थित शुभ्र एवं बहुरंगी मयूर को देखकर वापस घर लौट आए।

रामजन्म की पवित्र गाथा को अपने अविस्मरणीय महाकाव्य रामचरितमानस के माध्यम से अक्षरशः उतारने वाले गोस्वामी तुलसीदास ने रामनवमी का ही मांगलिक दिन चुना था। यद्यपि तुलसी द्वारा रामचरितमानस लिखे जाने के पूर्व महर्षि वाल्मीकि की देवभाषा संस्कृत में रचित रामायण अनादि काल से लिखी जा चुकी थी, परंतु दीर्घ काल से चली आ रही पराधीनता ने भारतीय संस्कृति और संस्कृत पर इतना प्रबल और सांघातिक प्रहार किया कि अधिकांश भारतीय अपनी देवभाषा और संस्कृति को शनैः-शनैः विस्मृत करते जा रहे थे और विदेशी भाषा को अपनाने, उसकी संस्कृति को अंगीकार करने में गर्व और अस्तित्व के संकट को टालने का एकमात्र उपाय समझने लगे थे। इन्हीं विपरीति परिस्थितियों में शिशु तुलसीदास का जन्म सन् १४९७ में, संवत् १५५४ श्रावण शुक्ल सप्तमी को हुआ था। कहना न होगा कि उनका बचपन और कैशोर्य अत्यंत निर्धनता में बीता। वैवाहिक जीवन में बढ़ने के उपरांत युवक तुलसी पत्नी रत्नावली से उपालंभ के पश्चात् विरक्त हो गए। इस तिरस्कार के पश्चात् उनके जीवन में एक ऐसा क्रांतिकारी मोड़ आया कि वे पूर्णतः रामभक्त और राम-समर्पित हो गए।

रामोपासना की इसी उत्कट आराधना में वह अयोध्या, चित्रकूट, काशी, संपूर्ण मध्यभारत, किष्किंधा (वर्तमान कर्नाटक), रामेश्वर तथा राम से संबंधित प्रायः सभी स्थानों पर पैदल भ्रमण करते रहे। अंततः काशी को उन्होंने अपना कार्यक्षेत्र बनाया। रामायण के प्रणयन का सुनिश्चय उन्होंने अयोध्या में ७७ वर्ष की अवस्था में विक्रम संवत् १६३१ में भगवान् राम के आविर्भाव, अर्थात् राम नवमी के दिन आरंभ किया, परंतु उसके विभिन्न कांडों की रचना चित्रकूट और काशी में संपन्न की। मानस की भाषा उन्होंने बहुत सोच-समझकर लोकभाषा हिंदी रखी, जिससे उसकी लोक में पैठ हो सके और लोग राम के चरित्र को हृदयंगम कर सकें। उन्होंने तत्कालीन अवधी और ब्रज भाषा के शब्दों का सहारा लिया और संस्कृत के दुरूह शब्दों को भी सरलतम बनाकर उन्हें अपने शब्द भंडार में बड़ी सुगमता और सहजता से प्रयोग किया। इस विषय में महाकवि तुलसी का कोई सानी नहीं। उनकी शब्द योजना और शिल्प दोनों अप्रतिम हैं। कोई मुकाबला ही नहीं। यह उनकी भाषा और ग्रामीण संस्कृति से समरसता का ही प्रतिफल है कि रामायण घर-घर में राम भक्ति के प्रचार-प्रसार का सुलभ साधन बन गई। कालांतर में जब अंग्रेजों ने सनातन संस्कृति की जड़ पर प्रहार करना शुरू किया तो यह रामायण ही थी, जिसने उत्तर भारत, बिहार, मध्यभारत और राजस्थान में रामकथा को जीवित रखा।

सच कहिए तो अप्रतिम रामभक्त, ‘संकटमोचन’ के अनन्य उपासक, हिंदी के महानतम कवि, सनातन संस्कृति के प्रबल उन्नायक, जीवन के अंतिम क्षण तक अखंड आस्तिक, एक सौ छब्बीस वर्ष तक स्वस्थ-सुदीर्घ जीवन के धनी ऐसे रामचरितमानसकार को हम कैसे सहज में विस्मृत कर सकते हैं। उन्होंने जब आततायी मुगलों के काल में हमारी आस्तिकता और संस्कृति की लौ जलाए रखी। तुलसी रचित मानस ने अंग्रेजी शासन काल की पराधीनता के विकट दिनों में जब गिरमिटिया भारतीय प्रवासी समुद्री जहाजों में ठूस-ठूसकर सुदूर अफ्रीका, मॉरीशस, फिजी, सूरीनाम, कीनिया आदि देशों में मजदूर के रूप में भेजे गए, तब उनके पास तुलसीकृत रामायण ही एक ऐसा साधन था, जिसने उनको धर्मच्युत होने से बचा लिया और वे सनातन धर्म से जुड़े रहे। आज उन देशों में फल-फूल रही भारतीय संस्कृति तुलसी की इस अमर कृति का ज्वलंत प्रमाण है। लोकमंगल के ऐसे महाकवि तुलसीदास को उनके ‘मंगल भवन अमंगल हारी’, ‘दीन दयाल बिरद संभारी, हरहु नाथ मम संकट भारी’, ‘मम पन शरनागत भय हारी’, ‘सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुणगान’ तथा ‘मामभिरक्षय रघुकुल नायक’ परमाराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम राम के साथ-साथ कोटिशः प्रणाम।

जब सागर तट ने तुलसी के अद्भुत शब्द-शिल्प का स्मरण कराया

पर्थ आए हुए हम लोगों को दस दिन से ऊपर हो गए। प्रायः प्रतिदिन ही हमारे किशोर पौत्र-पौत्री, दोनों दादा-दादी को कहीं-न-कहीं नगर के किसी रमणीक स्थान पर ले जाने का आग्रह करते हैं। पत्नी के घुटनों में अपार कष्ट के बावजूद हम किशोर बच्चों के स्नेहिल अनुरोध को ‘ना’ नहीं कर पाते हैं। आज वे हम लोगों को नगर के हिंद महासागर समुद्र तट पर ले जाना चाहते हैं। अतएव हम दोनों सहर्ष तैयार हो गए। चिरंजीव की जीपनुमा गाड़ी से हम सब समुद्र तट की तरफ चल दिए। करीब आधा घंटे बाद नगर के शांत-प्रशांत सड़कों से होते हुए, अगल-बगल के नैसर्गिक सौंदर्य का आनंद लेते हुए, संकेत पट्टिकाओं को ध्यान में रखते हुए तट के निकट पहुँच गए। राजमार्गों पर लगी ये पट्टिकाएँ कैंब्रिज सिटी समुद्र तट की ओर इशारा कर रही थीं। एकबारगी मन में यह ऊहापोह हुआ। पर्थ में कैंब्रिज का क्या आशय? तुरंत ध्यान आया। ऑस्ट्रेलिया पूर्व में ब्रिटिश उपनिवेश था। उसे १ जनवरी, १९०१ में अंग्रेजों से मुक्ति मिली। अंग्रेज जहाँ-जहाँ भी गए, चाहे वह ऑस्ट्रेलिया हो या अमेरिका, कनाडा या न्यूजीलैंड, वे अपने देश के कैंब्रिज, लंदन, यार्क या वेलिंग्टन को भूल नहीं पाए और उन्होंने उन स्थानों पर भी कैंब्रिज, यॉर्क, लंदन, वेलिंगटन स्थापित कर दिए। इस सोच-विचार में हम सब समुद्र तट के निकट पहुँच गए।

समुद्र तट के निकट सड़क के दोनों ओर कुछ रेस्‍त्राँनुमा दुकानें थीं। कुछ आवासीय भवन भी थे। सब रोशनी से नहाए हुए। पर बाहर कोई भी नहीं था। शायद लोग अंदर ही आमोद-प्रमोद, नाश्ता-भोजन, नृत्य-विलास में लिप्त होंगे। गाड़ी जब समुद्र तट तक पहुँच गई तो वहाँ गाड़ियों की कतारें लगी हुई थीं। बड़ी मुश्किल से गाड़ी के लिए पार्किंग का स्थान मिला। अपने यहाँ की तरह नहीं कि जहाँ चाहा, वहीं गाड़ी अटका दी, चाहे आने-जाने वालों को कितनी भी असुविधा का सामना क्यों न करना पड़े? अक्षम और अतिवृद्ध लोगों के लिए समुद्र तट तक ढलान के माफिक अलग गलियारा है। जहाँ से तटीय रेत का प्रारंभ होता है, वहाँ से खुरदुरे प्रकार की मजबूत चटाई बिछी थी, जिससे होकर हम लोग तट तक पहुँच गए। रात हो चुकी थी। समुद्र का दृश्य अत्यंत अद्भुत था। सामने प्रशस्त हिंद महासागर अंधकार के आवरण में डूबा हुआ था, पर उसके दोनों तटों पर प्रकाश-पुंज का आलोक विस्मयकारी अनुभव था।

जिस स्थान पर हम लोग खड़े थे, वहाँ पर कुछ अन्य लोग भी इस नयनाभिराम दृश्य का आनंद उठा रहे थे। एक प्रौढ़ अपने नन्हे शिशु के साथ मछली पकड़ने में व्यस्त था। हम लोग कुछ दूर एक सुदृढ़ प्रस्तर खंड पर खड़े होकर ऊपर से समुद्र की उत्ताल लहरों का आनंद लेने लगे। हिंद महासागर की उत्ताल तरंगें रह-रहकर किनारे से टकरा रही थीं। उनका उफान देखते ही बनता था। उनसे उत्पन्न ध्वनि मन में रोमांच उत्पन्न करती थी। बालुका कणों से उनकी क्षण-भंगुर स्पर्श मिलन जीव और आत्मा के मिलन की क्षणभंगुरता का स्मरण कराता था। मेरे किशोर पौत्र-पौत्री मुझे बार-बार इन लहरों के बीच ले चलने के लिए प्रेरित कर रहे थे, पर मैं कुछ भय, कुछ सागर की विशालता से मुग्ध होने के कारण दूर से ही इस नैसर्गिक दृश्य का अवलोकन कर रहा था।

वहाँ पर खड़े होकर मैं कल्पना कर रहा था, यह वही अथाह हिंद महासागर का अंश है, जो भारत-श्रीलंका (त्रेतायुग की लंका) के बीच प्रवाहित होता है और त्रेतायुग में सीता की खोज में निकले मारुतिनंदन के समक्ष चुनौती बनकर खड़ा था। परंतु वह तो ठहरे ‘अतुलित बलधाम’। उन्होंने अपने अपार साहस और पराक्रम के बल पर उसे लाँघा ही नहीं वरन् सीता मय्या से अशोक वन में मुलाकात की, लंका दहन किया और प्रभु राम के पास वापस सकुशल लौट आए। अब बारी थी संपूर्ण वानर सेना को समुद्र पार जाने की। इसलिए मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने पहले सागर से पार जाने की याचना की। जब उसने उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की तो उन्होंने धनुष-बाण सँभाला। श्रीराम के धनुष पर बाण चढ़ाते ही पयोनिधि काँप उठा—

‘विनय न मानत जलधि जड़, गए तीन दिन बीत।’

बोले राम सकोप तब, भ्‍ाय बिन होय न प्रीत॥

संधानेउ प्रभु विशिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥

मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने॥

कनक थार भरि मणि गन नाना। विप्र रूप आयउ तजि माना॥'

यह प्रसंग याद आते ही मुझे गोस्वामी तुलसीदास के अप्रतिम शब्द-शिल्प का ध्यान हो आया, जिन्होंने महासागर के लिए रामचरितमानस के सुंदरकांड में नौ पर्यायवाची शब्दों का यथोचित प्रयोग किया है। ये शब्द हैं—सिंधु, सागर, पयोधि, पयोनिधि, पाथोधि, जलधि, उदधि, जलनिधि, वारिधि। इस मंथन-विचार-विमर्श के बीच मेरी समुद्र तट यात्रा पूर्ण हो गई।

श्रीधर द्विवेदी

बी-१०७, सागर अपार्टमेंट, सेक्टर-६२,
नोएडा-२०१३०४ (उ.प्र.)

दूरभाष : ९८१८९२९६५९

shridhar.dwivedi@gmail.com

जुलाई 2022

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