द्रौपदी की ऊहापोह : 'व्यथा कहे पांचाली' से...

द्रौपदी की ऊहापोह : 'व्यथा कहे पांचाली' से...

द्रौपदी का ऊहापोह :  ‘कुंती’

काश वचन स्वीकार न करती।

मैं भी रेखा पार न करती।।

*

पाँच पिया स्वीकारे क्यूँ थे।

खुद ही भाग बिगाड़े क्यूँ थे।।

*

काश विरोधी हो जाती मैं।

थोड़ा क्रोधी हो जाती मैं।।

*

काश नहीं जो भिक्षा होती।

कभी न खुद को ऐसे खोती।।

*

काश न मेरे हिस्से होते।

शुरू नहीं ये िक़स्से होते।।

*

काश मुझे वरदान न मिलता।

तो फिर ये शमसान न मिलता॥

*

काश जरा मैं जिद पर अड़ती।

व्यथा ना मुझको कहनी पड़ती॥

*

खुला शिव का नेत्र न होता।

तो शायद कुरुक्षेत्र न होता॥

* * *

द्रौपदी का ऊहापोह :  कर्ण

काश कर्ण को वर लेती मैं।

वाणी वश में कर लेती मैं॥

*

काश कर्ण न छोड़ा होता।

कष्ट न साथ निगोड़ा होता॥

*

काश जाति को बीच न लाती।

दुख इतना मैं फिर क्यूँ पाती॥

*

कर्ण पे यों तो रीझ गई थी।

जाति सुनी तो खीज गई थी॥

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काश कर्ण जो हितकर होता।

क्यों परिणाम भयंकर होता॥

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काश कर्ण समझाया होता।

राज-पाट फिर साझा होता॥

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काश नहीं ठुकराया होता।

कर्ण कभी न पराया होता॥

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कर्ण अगर ना रोता शायद।

फिर संग्राम न होता शायद॥

* * *

द्रौपदी का ऊहापोह :  अर्जुन

क्यों अर्जुन ने घुटने टेके।

क्यों परिणाम न उसने देखे॥

*

चुप था जो मुझको वर लाया।

माँ के सम्मुख क्यों घबराया॥

*

अपनी बात न कटने देता।

काश न मुझको बँटने देता॥

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काश धर्नुधर साथ निभाता।

अपनी माता को समझाता॥

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कितना सुंदर साथ मिला था।

अर्जुन का जो हाथ मिला था॥

*

यों ना काश विभाजन होता।

अर्जुन ही बस साजन होता॥

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काश न मुझको वर के लाता।

अर्जुन सारे दुख का दाता॥

*

सत्य यही जो समर न होता।

कुरुक्षेत्र फिर अमर न होता॥

* * *

द्रौपदी का ऊहापोह :   दुर्योधन

दुर्योधन से ज़बाँ लड़ायी।

सचमुच कृष्णा अब पछताई॥

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काश नहीं मैं उसपर हँसती।

जान मुसीबत में क्यों फँसती॥

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काश न कसती उसपर ताना।

सभा न पड़ता मुझको जाना॥

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काश न उसको अंधा कहती।

क्यों फिर इतनी पीड़ा सहती॥

*

मैंने तो परिहास किया था।

वो समझा उपहास किया था॥

*

शब्दों के ना बाण चलाती।

फिर क्यों इतना दुख मैं पाती॥

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अगर नहीं जो आपा खोती।

मारा-मारी फिर क्यों होती॥

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जो दुर्योधन क्रुद्ध न होता।

तो शायद ये युद्ध न होता॥

* * *

द्रौपदी का ऊहापोहः दुः: शासन

दुःशासन को माफ़ जो करती।

लाल न होती फिर ये धरती॥

*

काश बाँध मैं वेणी लेती।

मुझ पर ध्यान सभा ना देती॥

*

काश द्रौपदी क़सम न लेती।

लहराती फिर घर की खेती॥

*

दुष्ट यदि नहीं भाई होता।

किस्सा क्या दुखदायी होता?

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काश दुःशासन मेरी सुनता।

ऐसी फिर वो मौत न मरता॥

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उसको था कितना समझाया।

दुष्ट मगर कुछ समझ न पाया॥

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काश अगर ये प्रण ना लेती।

कष्टों के ये क्षण ना लेती॥

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दुःशासन मतिमंद न होता।

रिश्तों में फिर, द्वंद्व न होता॥

* * *

द्रौपदी का ऊहापोह :   ध्रतराष्ट्र

काश न होते राजा लोभी।

हुआ न होता, हुआ है जो भी॥

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काश न पांडु से वो जलते।

पांडव उनको कभी न खलते॥

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भीष्म, विदुर की सुनते बातें।

कभी न मिलती फिर आघातें॥

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काश न होने देते क्रीड़ा।

नहीं झेलते दारुण पीड़ा॥

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नहीं मोह में अंधे होते।

फिर हालात न ऐसे होते।।

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नहीं अगर जो विग्रह होता।

इंद्रप्रस्थ क्यों दुखड़ा ढोता॥

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राजा यदि अंजान न होते।

इतने फिर नुकसान न होते॥

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जो यह वाद-विवाद न होता।

इतना कभी फ़साद न होता॥

* * *

द्रौपदी का ऊहापोह :  गांधारी

काश न पट्टी बाँधी होती।

नहीं युद्ध की आँधी होती॥

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पतिव्रता थी यों तो रानी।

अँधियारे को वर कर मानी॥

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राजा की आँखें बन जाती।

दुनिया उसको यों दिखलाती॥

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सिर्फ पतिव्रत धर्म निभाया।

घर-गृहस्थी का कर्म भुलाया॥

*

बच्चों को थोड़ा समझाती।

संस्कार-शिक्षा दे पाती॥

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झगड़ों को सुलझाती माता।

रहती बनकर साथी माता॥

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लड़े भिड़े सब भाई माता।

मिली तुझे रुसवाई माता॥

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यदि जो हठ के संग न होती।

शायद फिर ये जंग न होती॥

* * *

द्रौपदी का ऊहापोह :  भीष्म

भीष्म प्रतीज्ञा काश न लेते।

जीवन से अवकाश न लेते॥

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पितृभक्ति में डूबे थे वो।

लक्ष्य इसे ही समझे थे वो॥

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पाप! द्यूत क्रीड़ा को कहते।

फिर क्यों वो पीड़ा को सहते॥

*

काश! सत्य का साथ निभाते।

और भीष्म भी कुछ कह पाते॥

*

सच के साथ खड़े जो होते।

क्यों फिर शरशैय्या पर सोते॥

*

चारों ओर न होती जड़ता।

क्यों फिर युद्ध देखना पड़ता॥

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भीष्म सभा में बोले होते।

क्यों जलते फिर शोले होते॥

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भीषण ये परिणाम न होता।

रिश्तों में संग्राम न होता॥

* * *

द्रौपदी का ऊहापोह :   जयद्रथ

जयद्रथ को यदि दंडित करते।

दर्प दुष्ट का खंडित करते॥

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काश उसे न छोड़ा होता।

दंभ दुष्ट का तोड़ा होता॥

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पति दुःशाला का नहीं होता।

अपने प्राणों को वो खोता॥

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जी सबका यहीं पसीजा था।

वो कौरव दल का जीजा था॥

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काश न उसका सिर मुँडवाती।

और मृत्यु की नींद सुलाती॥

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पार्थ नंदन को मारा था।

जयद्रथ ही तो हत्यारा था॥

*

काश उसे मरवाया होता।

‘रावण’ तभी जलाया होता॥

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उसमें दंभ-प्रकर्ष न होता।

तो शायद संघर्ष न होता॥

* * *

द्रौपदी का ऊहापोह :     प्रतिशोध

काश न जाना होता वन में।

कभी न जलती ज्वाला तन में॥

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अगर न होती आँखें गीली।

नहीं आत्मा जाती छीली॥

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खुले केश मैं नहीं दिखाती।

काश की आँसू नहीं बहाती॥

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आग नहीं मैं अगर उगलती।

रण की ज्वाला कभी न जलती॥

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काश नहीं मैं उनसे लड़ती।

बातें ऐसे नहीं बिगड़ती॥

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काश न पतियों को उकसाती।

बात न इतनी फिर बढ़ पाती॥

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मैं खुद को मर जाने देती।

काश न उनको ताने देती॥

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लिया अगर वो प्रण ना होता।

तो शायद फिर रण ना होता॥

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द्रौपदी का ऊहापोह :  ‘काश’

कैसे कह दूँ द्वेष नहीं है।

सुत मेरा इक शेष नहीं है॥

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पाँच सुतों को माता थी मैं।

उनकी जीवन दाता थी मैं॥

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काश न रब को प्यारे होते।

जीवित राज दुलारे होते॥

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काश अगर समझौता होता।

ऐसा फिर बिल्कुल ना होता॥

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वक्त बना क्यूँ हाय क़साई।

जीवित बचा ना मेरा भाई॥

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सर पर हाथ बड़ों के होते।

सारे पेड़ जड़ों के होते॥

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काश न खेला चौसर जाता।

कभी नहीं यह अवसर आता॥

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जो ये नहीं लड़ायी होती।

फिर भी तो पछतायी होती॥

* * *

द्रौपदी का ऊहापोह :  द्यूत-क्रिया

खुले अगर ये बाल न होते।

श्वेत पृष्ठ फिर लाल न होते॥

*

यदि मेरा अपमान न होता।

गिद्धों का जलपान न होता॥

*

मौन अगर गुरुदेव न होते।

रण आँगन में प्राण न खोते॥

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काश! सत्य का साथ निभाते।

और बड़े भी कुछ कह पाते॥

*

द्रोण अगर दुर्भाव न होते।

अपनों में अलगाव न होते॥

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द्यूत-क्रिया का काम न होता।

चीर-हरण अंजाम न होता॥

*

भरी सभा में कितना रोयी।

काश व्यथा को सुनता कोई॥

*

नारी का अपमान न होता।

कुरुक्षेत्र शमशान न होता॥

उर्वशी अग्रवाल ‘उर्वी’

४/१९ आसफ अली रोड

नई ‌िदल्‍ली-११०००२

दूरभाष : ९९५८३८२९९९

जुलाई 2022

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