खेल

खेल

मौन-मुग्ध संध्या स्मित प्रकाश से हँस रही थी। उस समय गंगा के निर्जन बालुका-स्थल पर एक बालक और एक बालिका अपने को और सारे विश्व को भूल, गंगा तट के बालू और पानी को अपना एकमात्र आत्मीय बना, उनसे खिलवाड़ कर रहे थे।

प्रकृति इन निर्दोष परमात्मा-खंडों को निस्स्तब्ध और निर्निमेष निहार रही थी। बालक कहीं से एक लकड़ी लाकर तट के जल को छटा-छट उछाल रहा था। पानी मानो चोट खाकर भी बालक से मित्रता जोड़ने के लिए विह्व‍ल हो उछल रहा था। बालिका अपने एक पैर पर रेत जमाकर और थोप-थोपकर एक भाड़ बना रही थी।

बनाते-बनाते भाड़ से बालिका बोली, “देख, ठीक नहीं बना तो मैं तुझे फोड़ दूँगी।” फिर बड़े प्यार से थपका-थपकाकर उसे ठीक करने लगी। सोचती जाती थी—इसके ऊपर मैं एक कुटी बनाऊँगी। वह मेरी कुटी होगी। और मनोहर?...नहीं, वह कुटी में नहीं रहेगा, बाहर खड़ा-खड़ा भाड़ में पत्ते झोंकेगा। जब वह हार जाएगा, बहुत कहेगा, तब मैं उसे अपनी कुटी के भीतर ले लूँगी।

मनोहर उधर अपने पानी से हिल-मिलकर खेल रहा था। उसे क्या मालूम कि यहाँ अकारण ही उस पर रोष और अनुग्रह किया जा रहा है।

बालिका सोच रही थी—मनोहर कैसा अच्छा है, पर वह दंगई बड़ा। हमें छेड़ता ही रहता है। अबके दंगा करेगा तो हम उसे कुटी में साझी नहीं करेंगे। साझी होने को कहेगा तो उससे शर्त करवा लेंगे, तब साझी करेंगे। बालिका सुरबाला सातवें वर्ष में थी। मनोहर कोई दो साल उससे बड़ा था।

बालिका को अचानक ध्यान आया—भाड़ की छत तो गरम होगी। उस पर मनोहर रहेगा कैसे? मैं तो रह जाऊँगी। पर मनोहर तो जलेगा। फिर सोचा—उससे मैं कह दूँगी भई, छत बहुत तप रही है, तुम जलोगे, तुम मत आओ। अगर नहीं माना? मेरे पास वह बैठने को आया ही—तो मैं कहूँगी—भाई, ठहरो, मैं ही बाहर आती हूँ। पर वह मेरे पास आने की जिद करेगा क्या? जरूर करेगा, वह बड़ा हठी है। पर मैं उसे आने नहीं दूँगी। बेचारा तपेगा। भला कुछ ठीक है! ज्यादा कहेगा, मैं धक्का दे दूँगी और कहूँगी—अरे, जल जाएगा मूरख? यह सोचने पर उसे बड़ा मजा सा आया, पर उसका मुँह सूख गया। उसे मानो सचमुच ही धक्का खाकर मनोहर के गिरने का हास्योत्पादक और करुण दृश्य सत्य की भाँति प्रत्यक्ष हो गया।

बालिका ने दो-एक पक्के हाथ भाड़ पर लगाकर देखा—भाड़ अब बिल्कुल बन गया है। माँ जिस सतर्क-सावधानी के साथ अपने नवजात शिशु को बिछौने पर लेटाने को छोड़ती है, वैसे ही सुरबाला ने अपना पैर धीरे-धीरे भाड़ के नीचे से खींच लिया। इस क्रिया में वह सचमुच भाड़ को पुचकारती सी जाती थी। उसके पैर ही पर तो भाड़ टिका है, पैर का आश्रय हट जाने पर बेचारा कहीं टूट न पड़े! पैर साफ निकालने पर भाड़ जब ज्यों-का-त्यों टिका रहा, तब बालिका एक बार आह्ल‍ाद से नाच उठी।

बालिका एकबारगी ही बेवकूफ मनोहर को इस अलौकिक चातुर्य से परिपूर्ण भाड़ के दर्शन के लिए दौड़कर खींच लाने को उद्यत हो गई! मूर्ख लड़का पानी से उलझ रहा है, यहाँ कैसी जबरदस्त कारगुजारी हुई है—सो नहीं देखता! ऐसा पक्का भाड़ उसने कहीं देखा भी है!

पर सोचा—अभी नहीं; पहले कुटी तो बना लूँ। यह सोचकर बालिका ने रेत की एक चुटकी ली और बड़े धीरे से भाड़ के सिर पर छोड़ दी। फिर दूसरी, फिर तीसरी, फिर चौथी। इस प्रकार चार चुटकी रेत धीरे-धीरे छोड़कर सुरबाला ने भाड़ के सिर पर अपनी कुटी तैयार कर ली।

भाड़ तैयार हो गया। पर पड़ोस का भाड़ जब बालिका ने पूरा-पूरा याद किया तो पता चला एक कमी रह गई। धुआँ कहाँ से निकलेगा? तनिक सोचकर उसने एक सींक टेढ़ी करके उसमें गाड़ दी। बस, ब्रह्म‍ांड का सबसे संपूर्ण भाड़ और विश्व की सबसे सुंदर वस्तु तैयार हो गई।

वह उस उजड्ड मनोहर को इस अपूर्व कारीगरी का दर्शन कराएगी, पर अभी जरा थोड़ा देख तो और ले। सुरबाला मुँह बनाए आँखें स्थिर करके इस भाड़-श्रेष्ठ को देख-देखकर विस्मित और पुलकित होने लगी। परमात्मा कहाँ बिराजते हैं, कोई इस बाला से पूछे तो वह बताए—इस भाड़ के जादू में।

मनोहर अपनी ‘सुरी-सुरो-सुर्री’ की याद कर पानी से नाता तोड़, हाथ की लकड़ी को भरपूर जोर से गंगा की धारा में फेंककर जब मुड़ा, तब श्रीसुरबाला देवी एकटक अपनी परमात्मा लीला के जादू को बूझने और सुलझाने में लगी हुई थीं।

मनोहर ने बाला की दृष्टि का अनुसरण कर देखा—श्रीमतीजी बिल्कुल अपने भाड़ में अटकी हुई हैं। उसने जोर से कहकहा लगाकर एक लात में का काम तमाम कर दिया।

न जाने क्या किला फतह किया हो, ऐसे गर्व से भरकर निर्दयी पर चिल्लाया, “सुर्रो रानी!”

सुर्रो रानी मूक खड़ी थी। उनके मुँह पर जहाँ अभी एक विशद्ध रस वहाँ अब एक शून्य फैल गया। रानी के सामने एक स्वर्ग आ खड़ा हुआ था। वह उन्हीं के हाथ का बनाया हुआ था और वह एक व्यक्ति को अपने साथ लेकर उस स्वर्ग की एक-एक मनोरमता और स्वर्गीयता को दिखलाना चाहती थीं। हा हंत! वही व्यक्ति आया और उसने अपनी लात से उसे तोड़-फोड़ डाला! रानी हमारी बड़ी व्यथा से भर गई।

हमारे विद्वान् पाठकों में से कोई होता तो उन मूर्खों को समझाता—“यह संसार क्षण-भंगुर है। इसमें दुःख क्या और सुख क्या! जो जिससे बनता है, वह उसी में लय हो जाता है—इसमें शोक और उद्वेग की क्या बात है? यह संसार जल का बुदबुदा है, फूटकर किसी रोज जल में ही मिल जाएगा। फूट जाने में ही बुदबुदे की सार्थकता है। जो यह नहीं समझते, वे दया के पात्र हैं। री, मूर्खा लड़की, तू समझ। सब ब्रह्म‍ांड ब्रह्म‍ का है और उसी में लीन हो जाएगा। इससे तू किसलिए व्यर्थ व्यथा सह रही है? रेत का तेरा भाड़ क्षणिक था, क्षण में लुप्त हो गया, रेत में मिल गया। इस पर खेद मत कर, इससे शिक्षा ले। जिसने लात मारकर उसे तोड़ा है, वह तो परमात्मा का केवल साधन-मात्र है। परमात्मा तुझे नवीन शिक्षा देना चाहते हैं। लड़की, तू मूर्ख क्यों बनती है? परमात्मा की इस शिक्षा को समझ और परमात्मा तक पहुँचने का प्रयास कर। आदि-आदि।”

पर बेचारी बालिका का दुर्भाग्य, कोई विज्ञ धीमान् पंडित तत्त्वोपदेश के लिए उस गंगातट नहीं पहुँच सका। हमें तो यह भी संदेह है कि सुर्री एकदम इतनी जड़-मूर्खा है कि यदि कोई परोपकाररत पंडित परमात्मा-निर्देश से वहाँ पहुँचकर उपदेश देने भी लगते तो वह उनकी बात को न सुनती और समझती। पर अब तो वहाँ निर्बुद्धि शठ मनोहर के सिवा कोई नहीं है और मनोहर विश्वतत्त्व की एक भी बात नहीं जानता। उसका मन न जाने कैसा हो रहा है। कोई जैसे उसे भीतर-ही-भीतर मसोस डाल रहा है। लेकिन उसने बनकर कहा, “सुर्रो, दुत् पगली! रूठती है?”

सुरबाला वैसी ही खड़ी रही।

“सुरी, रूठती क्यों है?” बाला तनिक न हिली।

“सुरी! सुरी!...ओ, सुरो!”

अब बनना न हो सका। मनोहर की आवाज हठात् कँपी सी निकली।

सुरबाला अब और मुँह फेरकर खड़ी हो गई। स्वर के इस कंपन का सामना शायद उससे न हो सका।

“सुरी...ओ सुरिया! मैं मनोहर हूँ...मनोहर! मुझे मारती नहीं।”

यह मनोहर ने उसके पीठ पीछे से कहा और ऐसे कहा, जैसे वह यह प्रकट करना चाहता है कि वह रो नहीं रहा है।

“हम नहीं बोलते।” बालिका से बिना बोले न रहा गया। उसका भाड़ शायद स्वर्गविलीन हो गया। उसका स्थान और बाला की सारी दुनिया का स्थान काँपती हुई मनोहर की आवाज ने ले लिया।

मनोहर ने बड़ा बल लगाकर कहा, “सुरी, मनोहर तेरे पीछे खड़ा है। वह बड़ा दुष्ट है। बोल मत, पर उस पर रेत क्यों नहीं फेंक देती, मार क्यों नहीं देती! उसे एक थप्पड़ लगा—वह अब कभी कसूर नहीं करेगा।”

बाला ने कड़ककर कहा, “चुप रहो जी!”

“चुप रहता हूँ, पर मुझे देखोगी भी नहीं?”

“नहीं देखते।”

“अच्छा मत देखो। मत ही देखो। मैं अब कभी सामने न आऊँगा, मैं इसी लायक हूँ।”

“कह दिया तुमसे, तुम चुप रहो। हम नहीं बोलते।”

बालिका में व्यथा और क्रोध कभी का खत्म हो चुका था। वह तो पिघलकर बह चुका था। यह कुछ और ही भाव था। यह एक उल्लास था, जो व्याज-कोप का रूप धर रहा था। दूसरे शब्दों में यह स्त्रीत्व था।

मनोहर बोला, “लो सुरी, मैं नहीं बोलता। मैं बैठ जाता हूँ। यहीं बैठा रहूँगा। तुम जब तक न कहोगी, न उठूँगा, न बोलूँगा।”

मनोहर चुप बैठ गया। कुछ क्षण बाद हारकर सुरबाला बोली, “हमारा भाड़ क्यों तोड़ा जी? हमारा भाड़ बनाकर दो!”

“लो, अभी लो।”

“हम वैसा ही लेंगे।”

“वैसा ही लो, उससे भी अच्छा!”

“उसपै हमारी कुटी थी, उसपै धुएँ का रास्ता था।”

“लो, सब लो। तुम बताती जाओ, मैं बनाता जाऊँ।”

“हम नहीं बताएँगे। तुमने क्यों तोड़ा? तुमने तोड़ा, तुम्हीं बनाओ।”

“अच्छा, पर तुम इधर देखो तो।”

“हम नहीं देखते, पहले भाड़ बनाकर दो।”

मनोहर ने एक भाड़ बनाकर तैयार किया। कहा, “लो, भाड़ बन गया।”

“बन गया?”

“हाँ।”

“धुएँ का रास्ता बनाया। कुटी बनाई?”

“सो कैसे बनाऊँ—बताओ तो?”

“पहले बनाओ, तब बताऊँगी।”

भाड़ के सिर पर एक सींक लगाकर और एक-एक पत्ते की ओट लगाकर कहा, “बना दिया।”

तुरंत मुड़कर सुरबाला ने कहा, “अच्छा, दिखाओ।”

‘सींक ठीक नहीं लगी जी’, ‘पत्ता ऐसा लगेगा’ आदि-आदि संशोधन कर चुकने पर मनोहर को हुक्म हुआ—

“थोड़ा पानी लाओ, भाड़ के सिर का डालेंगे।”

मनोहर पानी लाया।

गंगाजल से कर-पात्रों द्वारा यह भाड़ का अभिषेक करना ही चाहता था कि सुर्रो रानी ने एक लात से भाड़ के सिर को चकनाचूर कर दिया।

सुरबाला रानी हँसी से नाच उठी। मनोहर उत्फुल्लता से कहकहा लगाने लगा। उस निर्जन प्रांत में वह निर्मल शिशु-हास्यारव लहरें लेता हुआ व्याप्त हो गया। सूरज महाराज बालकों जैसे लाल-लाल मुँह से गुलाबी-गुलाबी हँसी हँस रहे थे। गंगा मानो जानबूझकर किलकारियाँ मार रही थी और...और वे लंबे ऊँचे-ऊँचे दिग्गज पेड़ दार्शनिक पंडितों की भाँति, सब हास्य की सार-शून्यता पर मानो मन-ही-मन गंभीर तत्त्वालोचन कर, हँसी में भूले हुए मूर्खों पर थोड़ी दया बख्शना चाह रहे थे।

 

जुलाई 2022

   IS ANK MEN

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