जीवन रक्षा के लिए...

जून के महीने में एक दिवस ऐसा मनाया जाता है, जो पूरे विश्व के लगभग ८०० करोड़ मनुष्यों के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है—‘विश्व पर्यावरण दिवस’। यदि यह कहा जाए कि पूरे विश्व में लगभग हर दिन कोई-न-कोई दिवस मनाया जाता है, उनमें इस दिवस को किसी भी धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक पर्व से अधिक महत्त्व मिलना चाहिए, क्योंकि इस दिवस पर पूरी मनुष्य जाति का अस्तित्व टिका हुआ है, तो अनुचित न होगा।

क्या इतना पर्याप्त है कि संयुक्त राष्ट्र इस दिवस के लिए एक ‘थीम’ दे दे, उस थीम के आधार पर कुछ विमर्श तथा अन्य आयोजन कर लिये जाएँ! क्या यह दिवस मात्र सरकारों अथवा सरकारी संस्थाओं तक ही सीमित रहना चाहिए! यदि इस दिवस पर धरती के समस्त मनुष्यों ने ध्यान नहीं दिया तो यह निश्चय ही अनर्थकारी होगा।

आज पर्यावरण के बिगड़ते संतुलन को महसूस करना एक आम इनसान के लिए भी कितना आसान हो गया है। दशहरा महोत्सव मनाने के लिए जब रामलीलाएँ शुरू होती थीं तो प्रायः लोग एक चादर, शॉल अथवा कंबल लेकर जाया करते थे, क्योंकि दशहरा सर्दी की आहट लेकर आता था। अब दशहरा क्या, दीवाली निकल जाती है, सर्दी का दूर-दूर तक पता नहीं होता। उधर मार्च-अप्रैल में ऐसी गरमी पड़ने लगती है कि मई-जून फीके पड़ जाएँ। ऐसा क्यों हो रहा है?

बड़ा सीधा सा उत्तर है ‘जलवायु परिवर्तन’। जलवायु परिवर्तन, जिसने पूरे विश्व में हाहाकार मचा रखा है। विश्व का तापमान बढ़ता जा रहा है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं। भू-जल का स्तर निरंतर घटता जा रहा है। जिन क्षेत्रों में पहले ३० फीट खोदने पर पानी मिल जाता था, वहाँ अब १२० से १४० फीट नीचे पानी मिलता है। फसलों पर जलवायु परिवर्तन का भयानक असर पड़ना शुरू हो गया है। गेहूँ-चावल या अन्य फसलों का उत्पादन पहले के मुकाबले कम होता जा रहा है। कई देशों के कई क्षेत्र जल-समाधि लेने के कगार पर हैं। भारतीय शास्‍त्रों में वर्णित ‘प्रलय’ शायद इसी जलवायु परिवर्तन की अग्रिम चेतावनी है। हाल ही की असम की भयावह बाढ़ की कड़वी समृतियाँ दशकों तक आहत करेंगी। १५०० गाँवों का जलमग्न हो जाना, फसलों का नष्ट हो जाना, लाखों लोगों का घर छोड़कर शरणार्थी बन जाना, करोड़ों की संपदा का नष्ट हो जाना अत्यंत दुखद त्रासदी है। ऐसी आक्रामक वर्षा हुई कि पूरी-की-पूरी रेलगाड़ी उलट गई। भयावह जलवृष्टि, बाढ़ एवं सूखा दोनों ही जलवायु परिवर्तन के कारण निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। वर्षा के दिनों में वर्षा न होना, और अनपेक्षित वर्षा का होना भी जलवायु परिवर्तन का ही रूप है। अब एक कुचक्र को समझने का प्रयास करते हैं।

दिल्ली महानगर का ही उदाहरण लें तो कई दशक पहले लाखों लोग छतों पर सोते थे। बच्चों को कहानियाँ सुनने को मिलती थीं, आसमान के तारे देखने, पहचानने का सुख मिलता था। अब कानून व्यवस्था के बिगड़े हालात तथा भौतिक सुविधाओं के वर्चस्व के कारण छतों पर सोने और प्राकृतिक हवा का आनंद लेने का रिवाज समाप्त हो गया। अब एक-एक घर में दो-दो, तीन-तीन एयर कंडीशनर चलना आम बात हो गई। जहाँ ए.सी. नहीं, वहाँ कूलर या पंखे...। सोचिए कि बिजली की खपत कितनी बढ़ गई। बिजली का उत्पादन अभी भी सबसे अधिक कोयले से हो रहा है। तो सारी कहानी समझना कितना आसान है। ए.सी. एक कमरे को भले ही ठंडा कर दे, लेकिन आसपास कितनी गरमी फेंकता है। हम सब जानते हैं कि यह पर्यावरण को बुरी तरह क्षतिग्रस्त करता है। यह भी विचारणीय है कि दुनिया के सर्वाधिक तापमान वाले १५ नगरों में १२ नगर भारत के हैं। जी हाँ, २०० देशों में सर्वाधिक तापमान वाले सर्वाधिक नगर भारत में हैं! नगरों की संख्या भी बढ़ती जा रही है, नगरों की ओर पलायन भी बढ़ रहा है। नगरों की आबादी असंतुलित ढंग से बढ़कर नई-नई चुनौतियों को जन्म दे रही है।

पूरे विश्व के देशों ने मिल-बैठकर कार्बन उत्सर्जन कम करने की प्रतिज्ञा की है। विडंबना यह है कि जब यह प्रतिज्ञा की गई, उसके दस साल बाद के कार्बन उत्सर्जन में १० से ११ प्रतिशत की बढ़ोतरी पाई गई। कारण सीधा-सादा है कि सरकारें भी खानापूरी करती रहती हैं और आम लोग सबकुछ सरकारों के भरोसे छोड़कर निश्चिंत हो जाते हैं। पॉलीथीन पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदायक है किंतु बहुत सारी जद्दोजहद के बावजूद पॉलीथीन ही पॉलीथीन दैनिक जीवन पर हावी है। भारत सरकार ने कुछ बरस पहले ‘पर्यावरण मंत्रालय’ के नाम में बदलाव कर ‘पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन’ मंत्रालय कर दिया, ताकि जलवायु परिवर्तन पर विशेष ध्यान दिया जा सके। सी.एन.जी. बसों का चलना, ई-रिक्‍शा का चलन, विद्युत् कारों की संख्या बढ़ाने का प्रयास जैसे अनेक उपाय भी उल्लेखनीय रहे हैं। ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ पर रोक लगाने का प्रयास आदि अनेक कदम उठाए जा रहे हैं, किंतु अभी रास्ता बहुत लंबा है और मंजिल दूर है। जलवायु परिवर्तन का सबसे दुःखद पहलू है इसके कारण होनेवाले रोग तथा उससे होनेवाली मौतें। पिछले दिनों एक वैश्विक संस्था के सर्वेक्षण के परिणाम हमें डराते हैं। २०२१ में पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन से होनेवाले रोगों से लगभग ७० लाख लोगों ने दम तोड़ा और इनमें भी भारत में होनेवाली मौतें सर्वाधिक हैं।

अब यह समझना कठिन नहीं कि जलवायु परिवर्तन की समस्या कितनी भयानक, कितनी गंभीर है। मात्र सरकारों के भरोसे इसका समाधान छोड़ देना उचित नहीं होगा। सामाजिक संस्थाओं को, मीडिया को, बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों तथा आम नागरिकों को अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ निभानी होंगी। भारत में लगभग ८०० टी.वी. चैनल हैं, लेकिन जलवायु परिवर्तन पर कोई चर्चा आपको याद पड़ती है! अपवादों को छोड़कर शायद ही किसी चैनल ने इस पर सोचा भी हो—जबकि यह करोड़ों के जीने-मरने से जुड़ा विषय है। इसी प्रकार पर्यावरण की चिंता पर कितनी कहानियाँ, कितने उपन्यास आपको याद आते हैं। हाँ, कविताओं में ‌अवश्य उल्लेख एवं संकेत मिलते रहते हैं। लेकिन चैनलों पर कविताओं के जो कार्यक्रम होते हैं, वहाँ ऐसे विषय नदारद मिलेंगे। हम सभी को स्वच्छ हवा, पानी चाहिए। वायु प्रदूषण नगरों के लिए चिंता का विषय बन गया है। हम सभी को यदि धरती को बचाना है, जीवन को बचाना है तो जलवायु परिवर्तन के खतरों को गंभीरता से समझना होगा।

 

अमृत महोत्सव की पुकार

बात कुछ वर्ष पुरानी है। अमरीका के एक नगर में तेजी से बढ़ रही कार को अचानक रोकना पड़ा था। सारा का सारा ट्रैफिक रुक गया था। मैंने उत्सुकतावश पूछा था, क्या यहाँ भी ‘वी.आई.पी. रूट’ लगता है, जैसे भारत में किसी अति महत्त्वपूर्ण व्यक्ति के लिए ट्रैफिक रोक दिया जाता है। पता चला कि ऐसा कुछ नहीं है। एक स्कूल बस रुकी थी। बच्चे के साथ एक अध्यापिका भी उतरी थी और बच्चे को सड़क पार कर उसके घर के दरवाजे तक सुरक्षित पहुँचाया था। स्कूल बस के चलते ही ट्रैफिक वापस चल पड़ा था। यह थी सरकार एवं संस्था के स्तर पर गहरी मानवीय संवेदना की एक झलक। इसी प्रकार वहाँ कोई भी ऐसी पार्किंग नहीं दिखी, जहाँ दिव्यांगों (विकलांगों) के लिए आरक्षित स्‍थान न हो। किसी भी मॉल अथवा अन्य दर्शनीय इमारतों में बच्चों के लिए विशेष कक्ष, विशेष सुविधाएँ निःशुल्क उपलब्ध रहती हैं। इसी प्रकार कई देशों में महिलाओं के शौचालयों में निःशुल्क सैनिटरी पैड रखे मिल जाएँगे, ताकि उनकी विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके। कुछ देशों में एक कैबिनेट मंत्री ‘हैप्पीनेस मिनिस्ट्री’ (प्रसन्नता मंत्रालय) सँभालता है ताकि वह जनता के लिए आवश्यक उन सुविधाओं पर ध्यान दे सके, जो जनता की परेशानियाँ दूर कर खुशियाँ दें। कुछ देशों में आम लोगों को स्वस्‍थ बनाने के लिए आवश्यक उपकरण सार्वजनिक स्‍थलों पर निःशुल्क उपलब्‍ध कराए जाते हैं। कुल मिलाकर सरकारें जनकल्याण के लिए प्रयास करती हैं तथा ‘संवेदना’ को संस्थागत स्वरूप देती हैं।

भारत में दो माह बाद स्वतंत्रता के ७५ वर्ष पूरे हो रहे हैं। अमृत महोत्सव की एक पुकार यह भी है कि अंग्रेजों द्वारा भारत के दमन के लिए बनाई गई ‘व्यवस्था’ और ‘नौकरशाही के चरित्र’ में आमूलचूल बदलाव किया जाए। यह कोई चुटकला नहीं है कि बीमारी के कारण जुलाई में जीवित होने का प्रमाण-पत्र न दे पानेवाले बुजुर्ग से अगस्त में भी जुलाई का प्रमाण-पत्र जमा करने की माँग की गई। आज भी कोई छोटा-बड़ा नौकरशाह अच्छे-भले काम में कोई कमी निकालकर, रोड़ा अटकाकर ही अपनी ताकत, अपना रुतबा प्रदर्शित करता है तथा अपने लिए भ्रष्‍टाचार का द्वार खोलता है। आज भी एक सीधा-सादा आम नागरिक पुलिस थाने में जाने से डरता है। पुलिस की क्रूरता, दुर्व्यवहार की कहानियाँ आए दिन देखने-सुनने को मिलती हैं। अमृत महोत्सव में अनेकानेक सांस्कृतिक आयोजनों का अपना महत्त्व है, किंतु यह भी महत्त्वपूर्ण है कि हर भारतवासी को ‘सम्मान’ एवं ‘गरिमा’ तथा किसी भी प्रकार के शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति मिले एवं पूरा तंत्र मानवीय संवेदना से परिपूर्ण हो। ‘संवेदना’ को संस्थागत रूप दिया जाए। बच्चों, महिलाओं, दिव्यांगों, बुजुर्गों पर विशेष ध्यान दिया जाए। केंद्र सरकार अथवा प्रांतीय सरकारों ने समय-समय पर कुछ प्रयास किए भी हैं, किंतु इसे गहरे सोच-विचार के साथ संगठित रूप दिया जाए। आखिर हम एक महान् संस्कृति के वाहक हैं।

 

(लक्ष्मी शंकर वाजपेयी)

जुलाई 2022

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