निर्णय

निर्णय

सुपरिचित लेखक। व्यंग्य, कविता, ग़ज़ल, कहानी, लघुकथा, साक्षात्कार एवं लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्‍थान द्वारा ‘लल्ली प्रसाद पांडेय बाल-पत्रकारिता’ सम्मान।

 

समय से उठना, स्कूल जाना, पढ़ाई करना, होमवर्क करना, खेलना, ऐसे सारे काम परफेक्ट तरीके से करने के कारण न केवल मम्मी-पापा का बल्कि स्कूल में और कॉलोनी में भी सबका लाड़ला था अतुल।

अतुल स्कूल से आने के बाद शाम को हलका सा नाश्ता करता और खेलने चला जाता। होमवर्क और पढ़ाई का समय होने से पहले घर आ जाता। यों तो वह पार्क में केवल एक घंटे ही खेलता था, लेकिन उसके बाद लगभग एक घंटे वह किसी-न-किसी के घर में होता। कॉलोनी में सबका लाड़ला जो था।

अतुल जब घर लौटता था तो उसकी माँ, रंजना खाना लगाती तो अकसर वह कह देता था कि भूख नहीं है, और अगर खाना खाता भी तो कम ही खाता। हाँ, शाम को अगर मम्मी कुछ बढ़िया या अलग सा खाने को कुछ बनातीं और उसके कमरे में रख देतीं, तो वह सारा का सारा जरूर खा लेता था। अतुल की रात को खाना न खाने या कम खाने की आदत से उसकी माँ रंजना परेशान थीं। उन्होंने अतुल से कई बार पूछा भी कि बेटा, क्या बात है? तुम रात को ठीक से खाना नहीं खाते। इस पर अतुल मुसकराकर कह देता कि आज राखी दीदी ने ढोकला खिला दिया था या ललिता ताई ने कचौड़ी खिला दी थी या फिर ऊषा दादी ने लड्डू खिला दिए थे। ऐसे ही कोई-न-कोई जवाब उसका होता था। माँ कहती, “वह तो ठीक है बेटा, लेकिन फिर भी अपने खाने का ध्यान तुम्हें रखना चाहिए।” अतुल कहता, “ठीक है माँ, अब से ध्यान रखूँगा।” लेकिन फिर से उसका वही हाल हो जाता था।

एक शाम माँ ने अतुल के कम खाने की बात, साथ ही कॉलोनी में, औरों के यहाँ कुछ-न-कुछ खा आने की बात उसके पापा संजीव को बताई। वे भी कई बार रात को देख चुके थे कि अतुल रात में ठीक से खाता नहीं था। उन्होंने अतुल को समझाया, “बेटा, आपके सारे काम अच्छे हैं। बस, यह रात को खाने का जो मामला है, इसे भी ठीक कर लो। आप किसी के यहाँ कुछ भी खाओ, लेकिन शरीर-दिमाग के लिए तो भोजन ही उत्तम होता है।”

अतुल ने पापा की बात पर अपनी सहमति जताई और भरोसा दिलाया कि वह इसका खयाल रखेगा। लगभग सात-आठ दिन तो ठीक रहा, पर अतुल का फिर से वही ढर्रा हो गया। इस बार पापा ने उसे सख्त आदेश दिया, “कल से खेलने के बाद तुम सीधे घर आओगे और कॉलोनी में किसी के यहाँ नहीं जाओगे।”

यह सुनकर अतुल एकदम सन्नाटे में आ गया। लेकिन पापा के आदेश को तो वह टाल नहीं सकता था। उसका कॉलोनी के घरों में आना-जाना बंद हो गया। इससे उसके रात के खाने की स्थिति थोड़ी ठीक जरूर हो गई, लेकिन केवल थोड़ी सी।

एक-दो दिन बीते। अब अतुल कुछ उदास, कुछ चिंता में रहने लगा। लेकिन वह कर भी क्या सकता था! चार दिन बीत चुके थे। आज रविवार था, सो अतुल के पापा भी घर पर ही थे। तभी दरवाजे की घंटी बजी, पापा ने गेट खोला तो देखा, ललिता ताई मुसकराती हुई खड़ी थीं। उन्हीं के साथ राखी दीदी एक हाथ से अपनी बैसाखी पकड़े और एक हाथ में टिफिन लिये खड़ी थीं। अतुल के पापा ने उन्हें अंदर बुलाकर बिठाया। वे गेट बंद ही करने वाले ही थे कि उन्होंने देखा कि ऊषा दादी हाथ में मोबाइल लिए हाँफती हुई चली आ रही थीं। अतुल के पापा ने उन्हें प्रणाम किया, हाथ का सहारा देते हुए अंदर ले आए और सोफे पर बिठाया।

अब तक अतुल की माँ भी डाइंग रूम में आ गई थीं। अतुल की माँ ने जब तीनों को देखा तो तीनों को प्रणाम किया। ललिता ताई ने पूछा, “अतुल का क्या हाल है, ठीक तो है न वह?”

अतुल की माँ बोली, “हाँ-हाँ ताई, वह बिल्कुल ठीक है। अपने कमरे में पढ़ रहा है।”

“बहुत होशियार बच्चा है, चार दिन से नहीं आया तो मुझे लगा, कहीं बीमार तो नहीं हो गया, इसीलिए जैसे-तैसे, हाँफते-हूँफते उससे मिलने चलने आई।” ऊषा दादी बोलीं।

राखी दीदी ने अतुल की माँ की तरफ टिफिन बढ़ाते हुए कहा, “लो भाभी, अतुल के लिए ढोकला लाई हूँ, उसे बहुत पसंद है। अब कई दिनों से आया नहीं तो मुझे उसकी चिंता हुई। वह रोज शाम को जब आता है तो पूछ लेता है, ‘दीदी, कुछ लाना तो नहीं है।’ अब मैं तो बैसाखी लेकर दुकान या बाजार तक मुश्किल से जा पाती हूँ। सो प्यारा अतुल, रोज ही जो सामान मुझे मँगाना होता है, लाकर दे देता है। सचमुच बहुत होनहार बच्चा है। वरना तो आजकल के बच्चे अपने घर के लिए ही कुछ लेने नहीं जाते। ऐसे में हम जैसों के लिए कौन जाएगा।”

अतुल की माँ टिफिन हाथ में पकड़े राखी दीदी की बात सुन रही थीं।

“सही कह रही हो राखी,” तभी ऊषा दादी बोलीं, “अब मेरा बेटा जो बंगलुरु में रहता है। मेरे लिए यह महँगा स्मार्ट फोन तो दिला गया, लेकिन मैं बुढ़िया कहाँ इस फोन को चलाना जानूँ! वह तो अतुल ही है, जो रोज शाम को मेरे बेटे-बहू से वीडियो कॉल पर बात करवा देता है। यों तो घर पर कामवाली आती है, पर वह भी यह फोन चलाना नहीं जानती। अब चार दिन से अतुल नहीं आया तो मेरी तो बहू और बेटे से वीडियो कॉल पर बात ही नहीं हो पाई। मैं अपने नाती को देख नहीं पाई। हालाँकि कल जब बेटे का फोन आया तो मैंने आवाजें तो सबकी सुन लीं, लेकिन वीडियो कॉल वाली बात सादा कॉल में कहाँ?” ऊषा दादी फोन को उदासी से देखने लगीं।

ललिता ताई थैले से टिफिन निकाले और बोलीं, “लो रंजना, तुम्हारे टिफिन।”

“हमारे टिफिन, आपके यहाँ! इन्हें तो मैं कल-परसों ढूँढ़ रही थी।” अतुल की माँ आश्चर्यचकित हुईं।

ललिता ताई हँसी और बोलीं, “अरे, तुमने जो पकौड़ियाँ बनाई थीं, वह अतुल मेरे लिए लाया था। उसे पता है कि मुझे पकौड़ी बहुत पसंद हैं। सो जब भी तुम पकौड़ी या मेरी पसंद की कोई चीज बनाती हो तो वह मेरे लिए जरूर ले आता है।”

रंजना मुसकराकर रह गईं। आज उनके समझ में आया था कि आखिर वे चीजें जो वह अतुल के कमरे में रख देती थीं, कैसे खत्म कर लेता था!

ललिता ताई फिर से बोली, “रंजना, तुम्हारा अतुल बहुत खास बच्चा है। पूरी कॉलोनी में ऐसा कोई और है ही नहीं। हमसे रोज मिलने आता है। अपनी चीजें खिलाता है, और हमारे बहुत कहने के बाद कुछ खाता है। अकसर कहता है ‘नहीं ताई, आज कुछ नहीं खाऊँगा, माँ डाँटेंगीं, और कहेंगी तू रात का खाना ठीक से नहीं खाता है’ फिर हमारे बहुत कहने पर कहता है, ‘अच्छा तो आपका मन रखने के लिए खा लेता हूँ।’ उसके आने से मेरा अकेलापन कुछ कम हो जाता है। दिन भर तो मैं टीवी देखती हूँ या अपने काम करती हूँ। लेकिन शाम का इंतजार करती हूँ कि अतुल आएगा तो उससे कुछ बातें करूँगी। वह मुझ अनपढ़ को अखबार भी पढ़कर सुना देता है, वरना तो हमें क्या पता शहर में क्या हो रहा है?”

“लेकिन, वह है कहाँ, अब तक आया क्यों नहीं, ठीक तो है हमारा अतुल?” अतुल से मिलने को व्याकुल ऊषा दादी बोलीं।

“हाँ दादी, वह तो ठीक है, बस हम ही ठीक नहीं थे।” अतुल के पापा रंजना को देखते हुए बोले।

अचानक अतुल डाइंग रूम में आ गया और सभी को देख, चहककर बोला, “अरे ललिता ताई, राखी दीदी, ऊषा दादी आप!” अतुल को देख के उन तीनों के मुरझाए चेहरे खिल उठे। उन्होंने उसे अपने पास बिठा लिया और उससे बात करने लगीं। ऊषा दादी उसके सिर पर हाथ फिरा रही थीं तो ललिता ताई उससे पूछ रही थीं, “कहाँ रहा रे, इतने दिन? हमें तो चिंता हो गई तेरी!”

राखी दीदी ने मेज पर रखा टिफिन उठाया और उसमें से ढोकला निकालकर उसे खिलाते हुए बोलीं, “पता है, मुझे कितनी परेशानी हुई, जब मैं बाजार से सामान लेने गई? तूने तो मेरी बाजार जाने की आदत ही खत्म कर दी है, मेरे लाल!”

रंजना, संजीव उन चारों को देखते हुए मुसकरा रहे थे, और अपने ‘निर्णय’ को आज काफी हलका और छोटा महसूस कर रहे थे।

 


निश्चल
‘शारदायतन’, पंचनगरी, सासनीगेट,
अलीगढ़-202001 (उ.प्र.)
दूरभाष : 9719007153

मई 2022

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