बीती ताहि बिसार दे

बीती ताहि बिसार दे

सुपरिचित लेखक। दैनिक समाचार-पत्र, मासिक पत्रिकाओं कल्याण, जाह्नवी, रचना, अंतसमणि में लेखन। अखिल भारतीय भाषा सहित भोपाल द्वारा राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित।

 

महान् कूटनीतिज्ञ एवं राजनीतिज्ञ आचार्य चाणक्य ने बीती बातों का शोक-पछतावा एवं भविष्य की चिंता न करने के विषय में कहा है—

गतं शोको न कर्तव्यं भविष्यं नैव चिन्तयेत्।

वर्तमानेन कालेन प्रवर्तंत विचक्षणाः॥

भावार्थ—बीती हुई बात का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य में क्या होगा इसकी भी चिंता नहीं करना चाहिए। बुद्धिमान लोग वर्तमान काल के अनुसार ही चलते हैं (चाणक्य नीति 13/2)

नीति सम्राट् चाणक्य ने उक्त श्लोक द्वारा अमूल्य शिक्षा (सीख) दी कि हमें बीती हुई बातों को अपने मन में गाँठ बनाकर नहीं रखना चाहिए। अप्रिय, दुःख, कटु एवं ठेस पहुँचाने वाली बातों को भूल जाना ही हितकर होता है। यदि हम बीती बातों को अपने दैनिक जीवन में बार-बार याद करते रहेंगे तो हमारी मानसिक शांति नष्ट होगी और मानसिक रूप से अशांति का प्रभाव हमारे वर्तमान जीवन पर भी बुरा पड़ सकता है। यदि हमारा वर्तमान बिगड़ता है तो उसका प्रभाव भावी जीवन पर भी पड़ सकता है। यदि हम हमेशा भविष्य की चिंता करने में ही अपना समय बरबाद करेंगे तो यह भी गलत होगा। भविष्य तो अभी आया नहीं। भविष्य में क्या होगा? कोई नहीं जान सका है और न ही जान सकता है, इसलिए भविष्य की चिंता करने में कोई लाभ नहीं होगा। भविष्य कि चिंता में अपने वर्तमान की शांति नष्ट मत करो। संसार में जो भी व्यक्ति महान् बने हैं, उन्होंने वर्तमान में ही जीना सीखा था। वर्तमान व्यक्ति की मुट्ठी में है, वह चाहे तो उसका सदुपयोग कर जीवन की ऊँचाई को छू ले या अपनी बरबादी का मूकदर्शक बना रहे। वर्तमान को स्वीकार कर ही हम श्रेष्ठता को प्राप्त कर सकता है।

अतः आवश्यकता है वर्तमान जीवन के हरेक पल को, प्रत्येक क्षण को सहेजने, सँवारने और गढ़ने की।

प्रत्येक व्यक्ति सुख और शांति का जीवन जीने की कामना करता है और यह कामना इच्छा स्वाभाविक भी है। परंतु सुखी और शांति का जीवन जीना क्या चिंता और मानसिक घुटन के साथ रहने से संभव है? सर्वथा नहीं। मानसिक रूप से चिंतित रहने और बीती बातों पर सोचते रहने से तो जीवन में सुख और शांति का अनुभव करना संभव नहीं। लगातार घुटन का जीवन जीते रहने से व्यक्ति कई रोगों जैसे तनाव, रक्तचाप, मधुमेह आदि का शिकार हो जाएगा। इतना ही नहीं वह पारिवारिक जीवन का सुख और आनंद से भी वंचित रहेगा। स्वास्थ्य भी गिर जाएगा। परिजनों, मित्रों और संबंधियों से भी संबंध खराब हो सकते हैं। तो क्या करें? चिंता और मन-ही-मन में घुटते रहने के स्वभाव को बदलिए। अपने दृष्टिकोण सोच में परिवर्तन करिए। सकारात्मक सोच को अपनाना चाहिए। कहा भी गया है कि ‘चिंता चिता से बढ़कर है’ चिंता तो मुर्दा को जलाती है, परंतु चिंता तो जीवित को जलाती रहती है।

कहा गया है कि ‘गतं न शोचन्ति पण्डिता’, अर्थात् विद्वान् बीती बातों पर शोक-चिंता नहीं करते।

मदर टेरेसा ने कहा है—कल तो चला गया, आने वाला कल अभी आया नहीं, हमारे पास केवल आज है, आइए शुरुआत करें।

अतएव वर्तमान को सँवारो, सुधार करो, आशावादी बनो, जो बीत गया उससे शिक्षा (सीख) लो और भविष्य की योजना बनाने में अपने समय का बेहतर उपयोग करो। अतीत को भूल जाओ, जो बीत गया उस पर चिंता मत करो, दुःखी मत रहो, वर्तमान का महत्त्व समझो, यदि इस पर ध्यान दिया जाए तो आपका भविष्य अपने आप ही सुखद बनेगा। स्वस्थ और सुखी जीवन जीने के लिए वर्तमान को सुधारना ही अच्छा होगा।

मनोवैज्ञानिक मैथ्यू सेक्सटान का कहना है कि हम अपने संबंधों की खटास एवं पीड़ा को अपने जेहन में जिंदा रखना चाहते हैं। इन्हें समाप्त नहीं करते, बल्कि इनको जिंदा रखने के लिए उनका पोषण करते हैं। इस संदर्भ में मनोवैज्ञानिक डेबिडसन कहते हैं कि यदि व्यक्ति किसी घटना को लगातार और लंबे समय तक याद करता रहे तो वह दीर्घकालीन स्मृति में परिवर्तित हो जाती है, अर्थात् वह अचेतन में चली जाती है और जैसे ही हम इस संदर्भ में सोचने लगते हैं तो हमारे मन-मस्तिष्क में अतीत की वह घटना उसी रूप में चलचित्र के समान चलने लगती है और हम उन भीषण घटनाओं के साथ जीने के लिए विवश हो जाते हैं।

रिचर्ड मेकनली के अनुसार कहें तो डरानेवाली, भय एवं आतंकित करने वाली बुरी यादें मस्तिष्क के एमाइगेडला नामक संवेदनशील स्थान पर संगृहीत हो जाती हैं। मनोविज्ञानी केथरीन का कहना है कि अतीत की सारी बातें अपने आप में परेशानी खड़ी करने वाली नहीं होती हैं। परेशानी ले तब होती है, समस्या तो तब बनती है, जब ये बोझ बनकर हमारे मनोमस्तिष्क को झकझोरने लगे, हमारे व्यक्तित्व को प्रभावित करने लगें।

मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि इनसान अपने अतीत की सुनहली एवं सुखद घटनाओं के स्थान पर दुःखद एवं पीड़ित करने वाले क्षणों को अधिक याद करते हैं। नकारात्मक चिंतन एवं स्मृतियों से तनाव बढ़ता है और तनाव बढ़ने से शरीर में कार्टीसोल नामक हार्मोन का स्राव बढ़ जाता है। इससे हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली क्षमता घट जाती है।

अतीत की कड़वाहट से बचने के लिए हमें वर्तमान में जीने का अभ्यास डालना चाहिए। जो वर्तमान को सँभाल लेता है, वह अतीत की भूलों का सुधार करके भविष्य को सुनहला एवं उज्ज्वल बना लेता है। (युग निर्माण योजना से उद्धृत साभार)

इस विषय में किसी महापुरुष ने बहुत अच्छा कहा है—‘Never think hard about past it brings tears. Don’t think more about future it brings fear.’

(बीते गए समय के लिए कभी न सोचें, वह आँसू लाता है। भविष्य के बारे में न सोचें, उससे भय लगता है। आज के क्षण को भरपूर जिएँ, वह खुशी लाता है।)

राष्ट्रसंत श्री अमरमुनिजी महाराज ने कहा है—

बीत गया गत बीत गया वह

अब उसकी चर्चा छोड़ाे।

आज कर्म करो निष्ठा से,

कल के मधु सपने जोड़ो॥

अर्थात् जो बीत गया उसको भूलना ही आपके लिए हितकारी है। जो बीत गया, उसे बदला नहीं जा सकता फिर उसे याद करते रहना, घुटन अनुभव करते रहना बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। मनुष्य पहला सुख ‘नीरोगी काया’ कहा गया है और नीरोग रहने के लिए यह आवश्यक है कि आप चिंता, तनाव, घुटन एवं असंतोष का जीवन छोड़कर वर्तमान को सुखी बनाने का प्रयास करें। अपने मन से उदासीनता, निराशा, क्रोध को छोड़कर वर्तमान में प्रसन्न रहने का उपाय करें और प्रसन्नता के लिए भी आवश्यक है कि पहले आप अपने आप में कुछ परिवर्तन करें, सोच को बदलें, नकारात्मक विचारों को छोड़ें, अप्रिय कटु बातों पर कोई ध्यान न दें। थोड़ा सहनशील भी बनें। हाँ, एक और सबसे महत्त्वपूर्ण बात है वह ‘क्षमाशील बनें’। क्षमाशीलता एक सर्वोत्तम गुण माना गया है। क्षमा प्रदान करने से दोनों को लाभ मिलता है। जो क्षमा करना है उसे आनंद खुशी और शांति मिलती है और जिसे क्षमा किया जाता है, उसे भी प्रसन्नता होती है और वह क्षमा करने वाले के प्रति हमेशा कृतज्ञ और श्रद्धाशील रहता है।

नीतिसम्राट् चाणक्य की तरह बीती बातों को भूलने के विषय में यह भी कहा गया है—

बीती ताहि बिसार दे आगे की सुधि लेय।

जो बन आवे सहज में, ताहि में चित देय॥

अर्थात् बीती बातों को भूलना ही अच्छा माना गया है। घाव को बार-बार खोलकर देखना-कुरेदने से घाव अच्छा नहीं होता, इसी प्रकार बीती हुई बातों को सोचते रहने से मानसिक सुख और शांति भी नष्ट होती है। गलतियाँ तो प्रत्येक मनुष्य से होती हैं। कहा भी गया है कि ‘Man is made of errors’ मनुष्य भूलों से बना है। और भूलों को क्षमा करना भी एक अच्छी नीति है।

कहा गया है—‘Forget and forgive is the best policy’ यह कथन सुखी जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण शिक्षा है। अपनी भूल के लिए क्षमा माँगना और दूसरों की भूलों को क्षमा करना भी आवश्यक होता है। कहा गया है—“जीवन को सुखी और सफल बनाने के लिए एक ही उपाय है कि आप एक क्षण को भी खिन्नता के वशीभूत न हों। अप्रिय परिस्थिति उत्पन्न होने पर भी प्रसन्नचित्त रहिए।”

“विरोध को विरोध के रूप में न लेकर उसे प्रेरणा के रूप में स्वीकार कीजिए। कटुता का उत्तर मधुरता से दीजिए। खिन्नता हर तरह के शोक-संतापों की जड़ है। इसको आश्रय देते ही संपूर्ण जीवन दुःखों का भंडार बन जाएगा।” (ऋषि चिंतन के सान्निध्य में से उद्धृत)

बीती हुई बातों को भूलने में ही आपकी भलाई है। हमेशा याद रखें, जो हो गया अच्छा हुआ, जो हो रहा है वह भी अच्छा है और जो होगा वह भी अच्छा ही होगा। ईश्वर जो कुछ करता है अच्छा ही करता है—‘God does everything for good’, इसलिए बीती हुई बातों पर अपनी मानसिक शांति नष्ट मत करो। भूलना सीखना भी आवश्यक है। इस विषय में अमेरिका के प्रमुख डॉक्टर ‘मेडिकल टॉक’ (Medical Talk) नामक पत्र में लिखते हैं कि वर्षों के अनुभव के बाद मैं इस निर्णय पर पहुँचा हूँ कि दुःख दूर करने के लिए ‘भूल जाओ’ से बढ़कर कोई दवा है ही नहीं। अपने लेख में वे लिखते हैं—यदि तुम शरीर से, मन से और आचरण से स्वस्थ होना चाहते हो तो अस्वस्थता की सारी बातें भूल जाओ। उन्हें भुला दो।

रोज-रोज जिंदगी में छोटी-मोटी चिंताओं को लेकर झींकते मत रहो, उन्हें भूल जाओ। उन्हें पोसो मत, अपने दिल के अंदर उन्हें मत रखो, उन्हें अंदर से निकाल फेंको और भूल जाओ।

माना कि किसी ‘अपने’ ने तुम्हें चोट पहुँचाई है, तुम्हारा दिल दुखाया है। संभव है जान-बूझकर उसने ऐसा नहीं किया है और मान लो कि जानबूझकर ही उसने ऐसा कर डाला है तो क्या तुम उसे लेकर सूत कातते रहोगे? इससे तुम्हारे दिल का दर्द कुछ हलका होगा क्या? अरे भाई, भुला दो, भूल जाओ से लेकर चिंताओं का जाल मत बुनने लगो। भूल जाओ, उधर से चित्त हटा लो, आँखें फेर लो, मन मोड़ लो।

भूलना सीखो। यदि शरीर का स्वास्थ्य और मन की शांति अभीष्ट है तो भूलना सीखो, भूलना सीखो। (कल्याण, दिसंबर 2004, पृष्ठ 1003 से उद्धृत)

विश्वप्रसिद्ध महापुरुष, नीतिज्ञ, कवि, संत एवं लेखकों के मतानुसार यह स्पष्ट है कि बीती बातों को भूलना ही बुद्धिमत्ता है। यदि आप बीती बातों को भूलते नहीं हैं और उन अप्रिय कटु एवं ठेस पहुँचाने वाली बातों को अपने दिल और दिमाग में बनाए रखते हैं तो आप अपने शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य को बिगाड़ लेंगे। अपनी मानसिक शांति को भी नष्ट कर देंगे। इस विषय में यदि आप स्वयं परेशानी अनुभव करते हैं तो बेहतर है कि आप अपने बुजुर्ग परिजनों (माता-पिता आदि) शुभचिंतक मित्र से भी परामर्श लें। हमेशा सकारात्मक सोच रखें। प्रत्येक परिस्थिति में संतुलित रहने की आदत डालें। अनुभवी व्यक्तियों से मार्गदर्शन एवं सलाह लेने में संकोच न करें। ऐसा करने पर आप हमेशा मानसिक रूप से शांति अनुभव करेंगे। खुश रहेंगे। स्वस्थ रहेंगे।


रमेश चंद्र बादल 
ई-2/141, अरेरा कॉलोनी,
भोपाल-462016 (म.प्र.)
दूरभाष : 9910068399

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