मुन्नी के पाँव

मुन्नी के पाँव

सच पूछिए तो मैं स्वयं ही नहीं जानता कि मैंने उनकी बात क्यों मान ली! और आज मैं वह सब याद करके भी काँप उठता हूँ। वहाँ मुझे एक बड़ी संस्था ने आमंत्रित किया था और उन्हें मेरा आरक्षित टिकिट रद्द करा कर इस गाड़ी से भेजने की व्यवस्था में कोई कठिनाई नहीं हुई। उनके अपनत्व भरे व्यवहार को देखते हुए मुझे उनका आग्रह स्वीकार करना पड़ा। कोई विषेश आयोजन नहीं था...बस एक शाम अनौपचारिक सम्मेलन और दूसरे दिन बाहर एक भोजनालय में साथ बैठकर खाना। फिर रात को तीन-चार मित्र मुझे स्टेशन तक पहुँचाने भी आए।

जिस कैबिन में मुझे जगह मिली, वह पूरी तरह भरा था। वहाँ एक छोटा सा परिवार और भी था। एक सुदर्शन युवा, उसकी पत्नी और दो बच्चे। लड़का लगभग दस वर्ष का होगा और लड़की अधिक-से-अधिक चार वर्ष की। बड़ी प्यारी सी बच्ची।

सहसा किसी ने मुझसे कोई बात नहीं की...शायद इसलिए कि मुझे पहुंचाने आए हुए मेरे कुछ साथी बाहर प्लेटफॉर्म पर खड़े थे। जब तक वे वहाँ थे, मैंने भी उनसे कोई बात नहीं छेड़ी। उनके जाते ही मेरे सहयात्री ने अंग्रेजी में मुझसे पूछा, “आप भी गुवाहाटी जा रहे हैं?”

“जी हाँ...और आप?” उत्तर में मैंने भी प्रश्न किया।

“हम भी...” उसने मुसकराते हुए कहा, “वैसे तो हमें शिवसागर जाना है, पर एक रात हम गुवाहाटी में रुकेंगे।”

“यह तो अच्छी बात है...गुवाहाटी तक हम लोग साथ रहेंगे। आप शिवसागर में ही काम करते हैं?”

“हाँ, वहाँ तेल के कारखाने में।”

“अच्छा, कितना समय हो गया वहाँ काम करते?”

“छह वर्ष होने वाले हैं, इसका...” उन्होंने बच्ची की ओर संकेत करते हुए कहा, “इसका जन्म वहीं हुआ था।”

इसके बाद हमें आपस में घुल-मिल जाने में देर नहीं लगी। उस बच्ची ने देखते-ही-देखते हम लोगों के बीच की दूरियाँ और भी मिटा दीं।

वह युवक मूल रूप से पंजाबी था और लगभग दस वर्ष पहले दिल्ली में जा बसा था। उसके पिता ने दिल्ली में कुछ जायदाद खरीदी थी और वे अब दिल्ली में ही रह रहे थे। वह परिवार सहित किसी काम से दिल्ली गया था और छुट्टी बिताकर शिवसागर लौट रहा था। सुनकर मुझे याद आया कि मैंने स्टेशन पर एक वरिष्ठ दंपती को देखा था। यह भी याद आया कि उन्होंने गाड़ी चलते समय इस परिवार को देखकर हाथ हिलाया था। उस समय मैंने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया था, क्योंकि तब मैं अपने मित्रों के साथ बातें करने में व्यस्त था। उनके सिर पर पगड़ी नहीं थी...चेहरे पर दाढ़ी भी नहीं थी। स्पष्ट है, वे सिख नहीं थे। हमारी तरफ कुछ लोग समझते हैं कि पंजाब में सभी सिख होते हैं, पर ऐसा नहीं है।

उनका एक बड़ा प्यारा सा, छोटा सा परिवार था, यह समझते मुझे देर नहीं लगी। और वह प्यारी, दुलारी सी बच्ची, उसे प्रारंभिक झिझक भुलाकर पूरी तरह खुलने में भी बहुत देर नहीं लगी। चपल और चंचल ऐसी कि बरबस ही उसने अपनेपन का नाता जोड़ लिया। उसकी बोली बड़ी स्पष्ट थी और उसने जो थोड़ा बहुत मेरी भाषा में बोला, वह सुनकर तो मैं चमत्कृत रह गया। उसके परिवार में अन्य सभी इतनी असमिया नहीं सीख पाए थे। मुझे सहज ही लगा कि मुन्नी के साथ उस लंबी यात्रा का समय बड़े मजे में कट जाएगा।

‘‘गुवाहाटी में आपके कोई परिचित या संबंधी हैं?’’ मैं बातों ही बातों में पूछ बैठा।

‘‘नहीं...’’ उन्होंने कहा। वे रात को किसी होटल में ठहरकर अगले दिन बस द्वारा शिवसागर जाने वाले थे।

मैंने सोचा, हमारे मीतू और मणी तो इस गुड़िया से मिलकर फूले नहीं समाएँगे। दोनों ही बच्चों के दीवाने हैं। मीतू कॉलेज जाती है और मणी इस वर्ष दसवीं की परीक्षा देगा। मन-ही-मन मैंने गुवाहाटी मैं इस परिवार को अपने घर ले जाने की योजना बनाई। लेकिन उस समय मैंने कुछ नहीं कहा। मुझे पता था, गुवाहाटी उतरने वाले यात्री, गाड़ी बोंगनी गाँव पहुँचते ही उतरने की तैयारी करने लगते हैं। मैंने सोचा, तब मैं उनसे कहूँगा...सहसा एक सुखद निमंत्रण देते हुए। मुझे पता था, यदि मीतू गाड़ी लेकर मुझे लेने के लिए स्टेशन आती है तो वह भी उनसे मिलकर बहुत प्रसन्न होगी। यह योजना बनाकर मैं मन-ही-मन प्रसन्न हो रहा था।

और उनका बेटा सुमन, जिसने हाल ही में स्कूल जाना प्रारंभ ही किया था, उसका आत्म-विश्वास देखकर तो मैं चकित ही रह गया। वह बड़ा होकर आई.ए.एस. पास करके बड़ा अफसर बनेगा, उसने कहा था। छोटी सी आयु में ही यह सपना उसके दादाजी ने दिया था।

और मुन्नी? वह कभी बड़ी नहीं होगी, उसने यह निर्णय ले लिया था। सहसा मुझे नवकांत बरुआ का लिखा, बीरेंद्रनाथ दत्त का गीत याद हो आया—‘‘प्यारी बच्ची तुम सदा ऐसी ही बनी रहना...न दीदी, न माँ, न दादी कभी बनना। ऐसी ही प्यारी बच्ची बनी रहना...’’

मुझे लगा, ऐसी प्यारी बच्ची को क्या आवश्यकता है, दीदी, चाची या माँ बनने की! वह हमेशा घर भर में चहकती-फुदकती रहेगी, बिना किसी चिंता के कि कहीं उसकी बुँदकियों वाली फ्रॉक के बटन कहीं खुल तो नहीं गए। ऐसी प्यारी गुड़िया ही किसी को गीतकार बना सकती है।

भोजन का समय हो गया था। गाड़ी में परोसा गया, खाना सभी को रुचिकर लगा। एक स्टेशन पर मैंने कुछ केले खरीद लिए और वह गुच्छा मुन्नी को दे दिया। उसने लेकर कैबिन में बैठे हर व्यक्ति को एक-एक केला दिया। फिर एक केला छीलते हुए अपने मुँह में रखा। तभी मैंने कहा, ‘‘अरे यही केला तो मैं खाना चाहता था।’’

‘‘तो यह लो...!’’ उसने यह कहते हुए अपना अधखाया केला मेरी ओर बढ़ाया। तभी उसकी माँ ने हाथ बढ़ाकर उसे बीच ही में रोक दिया। मुन्नी असमंजस में चुपचाप इधर-उधर देखती रह गई।

उसकी किलकारियाँ और चहकता स्वर सुनकर आस-पास के कैबिन में बैठे कुछ लोग भी आ पहुँचे। किसी ने उसे अपने कैबिन में ले जाने की बात की तो किसी ने उसे चॉकलेट दी। उसकी चहक गूंजती ही रही और अनजाने ही समय बीतता चला गया।

रेल समय से चल रही थी। आशा थी कि ठीक समय पर ही गुवाहाटी पहुँच जाएगी। लगता था, जैसे पूर्वोत्तर संबंधी यह घटना एक अपवाद बन जाएगी। और फिर नई व्यवस्था में यह योजना बनाई गई थी कि रेल पश्चिमी असम का क्षेत्र दिन रहते ही पार कर ले।

मुन्नी अपने स्वभाव के अनुरूप लगातार चहकती-फुदकती फिर रही थी। उसके पिता कभी उसे रोकते भी थे तो वह और भी चपल हो जाती थी। उसके दोनों पैरों में पायल थे, जिनमें छोटे-छोटे घुँघरू बँधे थे। यद्यपि उनमें से कोई स्वर तो नहीं निकल रहा था, फिर भी उसके थिरकते-घूमते पाँव रेल की यांत्रिक खड़खड़ से मुक्ति दिला रहे थे। वह शायद थक गई थी, इस कारण रात को भोजन करने के बाद सो गई।

अगले दिन सुबह वह जल्दी ही जाग गई और उसने अपनी माँ को भी झकझोरकर जगा ही दिया। उसे लघुशंका के लिए जाना था। जाते-जाते उसने मेरा गाल छूते हुए, जैसे यह जानने का प्रयास किया कि मैं जाग चुका था या नहीं...और बोली, ‘‘नमस्ते मामू। मैंने मुसकराकर उसका अभिवादन स्वीकार दिया। लौटते ही वह फिर से वही पुरानी मुन्नी बन गई। ‘‘नमस्ते मुन्नी बेटी...’’ पास के कैबिन से किसी ने पुकारा। ‘‘नमस्ते जी!’’ मुन्नी ने तुरंत ही उत्तर दिया, यह जाने बिना कि उसे नमस्ते कहने वाला वह कौन था।

अपनी धुन में वह खिड़की के बाहर भी देख रही थी, रेल की पटरी के पास लगे पीछे की ओर भागते-से तार के खंभे, मकान, पेड़ आदि। ‘‘ये कहाँ भागते जाते हैं?’’ वैसे ही, जैसे इस आयु के सभी बच्चे हमेशा से पूछते आ रहे हैं। मुझे कौतूहल हुआ और मैं पूछ बैठा, ‘‘क्या तुम कभी आइंसटीन से मिली हो?’’

‘‘कौन आइंसटीन?’’ उसने छूटते ही पूछा।

‘‘वह एक बूढ़ा आदमी था। वह शायद तुम्हें अच्छी तरह समझा सकता था कि पेड़ और मकान इस तरह क्यों भागे जा रहे हैं, पर पता तो मुझे भी है कि ये सब कहाँ जा रहे हैं।’’

‘‘कहाँ, मामाजी’’

‘‘ये दिल्ली जा रहे हैं, तुम्हारे दादू से मिलने।’’

‘‘अरे, झूठी बात...’’

‘‘अरे हाँ...’’ मैंने जोर देकर कहा, “वह तुम्हारे दादू से कहेंगे कि उन्होंने असम जाते हुए मुन्नी को देखा। और यह भी बताएँगे कि मुन्नी गुवाहाटी की ओर गाड़ी में बैठी उड़ी जा रही है।’’

सात बज चुके थे और हम लोग लगभग एक घंटा पहले ही असम की सीमा में प्रवेश कर रहे थे। कौन जाने हम मन-ही-मन खुश हो रहो हों कि हम लगभग एक घंटा पहले गुवाहाटी पहुँच जाएँगे।

मुझे ठीक से याद नहीं कि मैंने अपना वाक्य पूरा किया भी था या...! अब जो याद है, वह बस यह कि उसी क्षण जैसे जोरदार झटके के साथ हमारा डिब्बा हवा में उड़ गया। बस कान फोड़ देने वाला एक धमाका सुनाई दिया था। डिब्बे में बैठे यात्री उछलकर न जाने किधर-किधर जा गिरे। ऊपर की बर्थ पर औंधे मुँह पड़ा सोता हुआ सुमन नीचे अपनी माँ पर आ गिरा। मेरी आँखों के आगे पूरी तरह अँधेरा छा गया।

तनिक चेत होते ही मैंने आँखें खोलने का भरपूर प्रयास किया। मैं पीड़ा से छटपटा उठा था, जैसे लकवा मार गया हो। कोई मेरे कान के पास मुँह लगाकर, ऊँचे स्वर में, मेरा नाम और पता पूछ रहा था। मैं पूरी तरह समझ नहीं पाया, वह क्या कह रहा है...और न यह कि वास्तव में क्या हुआ है। उसके प्रश्न मेरी उलझन ही बढ़ा रहे थे। मैंने टूटे से स्वर में, जैसे हकलाते हुए पूछा, ‘‘मैं कहाँ हूँ?’’

उस व्यक्ति ने मुझे कोई उत्तर नहीं दिया...और पास खड़े किसी और व्यक्ति से कहा, ‘‘इसे होश आ गया है। इससे सब कुछ पूछिए, मैं उधर दूसरे लोगों को देखने जा रहा हूँ।’’ यह सब क्या है? मैंने समझने का प्रयास किया और उठने की कोशिश की। सबकुछ असंभव लगा। मैंने हाथ हिलाकर संकेत में ही अपने बारे में बताना चाहा, पर मैं कुछ नहीं कर पाया। मेरा दाहिना पैर निर्जीव हो गया था और बायाँ हाथ भी। उन पर दो खपच्चियाँ बाँध दी गई थीं।

लगभग चार घंटे पहले कोई भयंकर दुर्घटना हुई थी। ट्रेन के अनेक डिब्बे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे, सौ से अधिक लोग मर चुके थे और उससे भी दुुगने बुरी तरह घायल पाए गए थे, जिनमें कुछ की हालत गंभीर थी।

रेल की पटरी के किनारे कुछ घास वाली जमीन पर हम लोगों को लिटाया गया था। वे सब उन सबसे उनका नाम-पता पूछने का प्रयास कर रहे थे, जो कुछ बोलने की स्थिति में थे।

यह सब विवरण किसी ने मुझे कोई आधिकारिक आँकड़े पढ़कर नहीं सुनाए, बस टुकड़ों-टुकड़ों में, वह सब मैंने अस्पताल के कर्मचारियों की आपसी बातों से जाना था। वहाँ बीसियों स्वयंसेवी भी थे, जो घायलों की सहायता के लिए दौड़ते फिर रहे थे। किसी आतंकी संगठन ने शायद किसी रिमोट-कंट्रोल से ट्रेन को उड़ाने का काम किया था। यह सब सुनकर मुझे लगा जैसे मैं फिर बेहोश होता जा रहा हूँ। सहायता की सारी व्यवस्था की जा रही थी—डॉक्टर, दवाएँ, एंबुलेंस, आवश्यक सामग्री आदि लेकर आ रहे थे। दिल्ली और दिसपुर को संदेश भेजे जा चुके थे और हम लोगों को समझाया जा रहा था कि अब चिंता की कोई बात नहीं है।

मेरा गला सूखकर खरखरा हो रहा था। कुछ समय तक मैं एक शब्द भी नहीं बोल पाया। जैसे-तैसे साँस भरते हुए मैंने इशारे से एक स्वयंसेवी को बुलाया और अपना फोन नंबर देकर अनुरोध किया कि मेरे घरवालों को सूचना दी जाए कि मैं जीवित हूँ।

‘‘चोपड़ा का परिवार? मुन्नी? कैसे हैं वो लोग?’’ मैंने उसी व्यक्ति से जैसे-तैसे पूछा और थककर आँखें बंद कर लीं।

‘‘उधर...इन्हें उधर ले जाओ...” किसी ने जैसे आदेश देते हुए कहा...। यह स्पष्ट नहीं हुआ कि कौन, किसे ले जा जाएगा। मेरी स्थिति गंभीर रही होगी, ऐसा मुझे उन लोगों के मेरे प्रति ध्यान देने से लग रहा था।

अचानक मुझे एक चीख सुनाई दी—‘‘भाई साहब!’’ मुझे वह स्वर पहचाना सा लगा। वह नीति थी...नीति चोपड़ा, जो दिल दहलाने वाले स्वर में चीख रही थी। मैंने आँखें खोलीं, वह घोरतम दृश्य देखने के लिए, जो मैंने जीवन में कभी नहीं देखा था।

‘‘मुन्नी के पैर...भाई साब...’’ वह लगभग मुझपर गिरते चीख पड़ी। किसी ने मेरी मुन्नी के पैर चुरा लिये’’ कोई मुन्नी के पाँव काटकर ले गया, ऐसा उसे लग रहा था।

मैंने लगभग वैसे ही स्वर में चीखते हुए पूरी श्‍ाक्ति लगाकर उठने का प्रयास किया, यद्यपि मेंरे गले से कोई शब्द नहीं निकल पाया। मुझे याद है, दो लोग लगभग खींचते हुए उस महिला को उधर ले गए, जहाँ अनेक घायल लोग पड़े थे।

मैं अपनी सिसकियाँ नहीं रोक पाया और फिर अचेत होकर गिर पड़ा। तभी किसी डॉक्टर ने मुझे बेहोशी का इंजेक्‍शन दे दिया। बाद में मुझे बताया गया कि उस हालत में भी मैं कई बार मुन्नी...मुन्नी कहकर कराहता रहा था।

वह हृदय-विदारक दृश्य मुझे रह-रहकर याद आता रहा, ऐसे जैसे किसी ने जलती हुई लाल सलाख मेरे सीने में घुसा दी हो। मैं जीवन भर वह घटना नहीं भूल सकता, वह मेरी स्मृति में कभी धुँधली नहीं हो सकती। मुन्नी के दोनों पाँव घुटने के नीचे से कट गए थे। यह पता लगाना कठिन था कि उसकी माँ को कितनी चोट आई। पर उसके कपड़े खून से लगभग तर थे। वह शेष निर्जीव श्‍ारीर को सीने से चिपकाए हुए अपनी मुन्नी के पैर को ढूँढ़ती इधर-उधर दौड़ती फिर रही थी। पगलाई सी वह, कई घंटों से उस हाल में भटक रही थी। उस विक्षिप्त स्थिति में जाने कैसे उसने मुझे पहचानकर अपनी व्यथा सुनाई। वह इतनी पगला गई थी, उसे यह जानने की भी सुध नहीं थी कि उसका पति कहाँ है, बेटा कहाँ है!

होश आने पर मुझे सहसा कुछ सुखद अुनभव हुआ। मेरी बेटी मीतू, मेरा हाथ चूमते हुए पुकार रही थी—‘‘बाबा!’’ फिर वह लगभग चिल्लाते हुए बोली, ‘‘डॉक्टर...इन्हें होश आ गया।’’ मणि दरवाजे पर ही खड़ा था, वह दौड़ते हुए मेरे पलंग के पास आकर ‘‘बाबा...’’ कहते हुए मुझसे लिपट गया।

लगा, जैसे मेरी सारी पीड़ा दूर हो गई। चैन की साँस लेते हुए पहला शब्द जो मेरे मुँह से निकला वह था, ‘‘मुन्नी की माँ,’’ सुनकर मीतू और मणि अवाक् रह गए। वे सोच में पड़ गए—‘क्या सचमुच इन्हें होश आ गया है या ये बेहोशी में ही बड़बड़ा रहे हैं!’ उन्हें क्या पता ये मुन्नी कौन है और उसकी माँ! जब मैं कुछ बोलने-बताने की स्थिति में आ जाऊँगा, तब बताऊँगा कि वे कौन थे...और उनके विषय में पता लगाने के लिए कहूँगा।

पर मैं कहाँ हूँ?

बोंगनी गाँव के एक अस्पताल में। उस घटना को आज चौथा दिन है। अब तक मैं लगभग बेहोश ही था। नहीं, उनको कोई टेलीफोन द्वारा संदेश नहीं मिला। वे तो बस दुर्घटना का समाचार पाकर दौड़े-दौड़े घटना स्थल पर पहुँचकर, रेल-विभाग द्वारा संचालित कंट्रोल रूम होते हुए, मुझ तक पहुँच पाए थे।

इस घटना से उन सब पर क्या बीती होगी, मैं बस थोड़ा-बहुत अनुमान ही लगा सकता हूँ।

मेरे दाएँ पैर और बाएँ हाथ पर प्लास्टर बँधा है। इधर-उधर कुछ और जगहों पर भी चोट आई है...छोटी-मोटी। कुछ ठीक हो जाने पर मुझे एंबुलेंस द्वारा गुवाहाटी पहुँचा दिया जाएगा।

‘‘ये मुन्नी कौन है, बाबा?’’ कुछ दिन बाद मुझे कुछ ठीक पाते ही मीतू पूछ बैठी।

मैंने धीरे-धीरे उन्हें बताया, रुक-रुककर। यह भी बताया कि कैसे मैं एक बार उन्हें यहाँ लाने की सोच रहा था, तुम दोनों से मिलाने। बताते-बताते जब मैं उस वीभत्स दृश्य तक पहुँचा, तो वे भी जैसे छटपटा उठे और मेरे सीने पर गिरकर सिसकने लगे। पास के रोगी और कुछ उनके मिलने वाले विस्मित रह गए और हमारी ओर देखने लगे।

मेरी पत्नी मीलू ने भी दुर्घटना का वह विवरण सुना। वह मीतू के पीछे ही खड़ी मेरी बातें सुन रही थी। वह मीतू-मणि की तरह बिलख तो नहीं पाई...हाँ, मोटे आँसुओं की धार गालों और गले को भिगोते हुए उसके ब्लाउज तक जा पहुँची। उसे यह भी सुध नहीं थी कि साड़ी को उठाकर उन आँसुओं को पोंछे।

जब वह कुछ कहने की स्थिति में आई, तब उसने बताया, “कुछ आतंकवादियों ने उस घटना की जिम्मेदारी ली है और वे बड़े गर्व का अनुभव कर रहे हैं।” अगर मैं कभी उनसे मिल पाता तो उनसे यह अवश्य पूछता कि उस प्यारी सी बच्ची के पैर लेकर उन्होंने किसका भला किया?

मैं अपना खुला हुआ हाथ मीतू और मणि के सिर पर फेर रहा था, उसे उठाते हुए मैंने अपना हाथ मीलू तक फैलाने का प्रयास किया कि उसे भी अपने पास खींच सकूँ, पर हाथ उस तक पहुँच नहीं पाया।

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