नए साल में नया क्या है?

नए साल में नया क्या है?

“यकुम जनवरी है, नया साल है, दिसंबर में पूछेंगे, क्या हाल है।” हर नए वर्ष की पहली भोर अपने स्वर्गीय मित्र अमीर कजलबाश का यह शेर मन खुद-बखुद ही गुनगुना उठता है। पहली जनवरी को लाने के लिए ३१ दिसंबर से ही तैयारी शुरू हो जाती है। ३१ की रात को तो बड़े होटल ही नहीं, ढाबे तक सजते हैं। पूरा शहर जगमगा उठता है। कभी-कभी संदेह होता है कि इस रात की सुबह होगी कि नहीं? ऐसी चहल-पहल कि रात बीतने का अंदेशा तक न हो। अंग्रेजों की बनाई और स्थापित परंपरा का ऐसा प्रभाव है कि किसी को खयाल तक नहीं आता है कि एक भारतीय नववर्ष भी है। उसके उत्सव को मनाने में क्या हमारी नाक कटती है? दुर्भाग्य है कि यह अंग्रेजों की मानसिक दासता का प्रभाव ऐसा विषाक्त, व्यापक और देसी दारू सा ऐसा लोकप्रिय है कि देश की युवा पीढ़ी को भारतीय नववर्ष का क्या पता ज्ञान भी है कि नहीं?

देश में किस्म-किस्म के लोग हैं। कुछ समृद्ध हैं। उन्हें पैसा लुटाने में आनंद आता है, बशर्ते वह उनके किसी हित साधन से जुड़ा हो। कुछ निर्धन हैं। वह ढाबे के भठूरे-छोले से संतोष कर लेते हैं। कुछ अपने परिवार का सोचकर ढाबे की यह नायाब निधि लेकर झुग्गी के दर तक जाते हैं, पत्नी-बच्चों के साथ नए वर्ष को मनाने। उनका स्वार्थ केवल पारिवारिक साथ है। उनका आकाश भी इसी झुग्गी और अपनी रोज की ठेके की कमाई तक सीमित है। कहीं यह बिल्डिंग बन गई तो उसके बाद क्या होगा? उनके मन में यह विचार भी कभी-कभी क्या, अकसर कौंध जाता है। फिर या तो किसी और इमारत के निर्माण में काम मिलेगा, नहीं तो फिर राजस्थान, बिहार या यू.पी. के अपने गाँव की ओर प्रस्थान करेंगे? कौन कहे, भाई वहाँ घर में घुसने भी दे या नहीं? संबंधों पर समय की सेंध सिर्फ शहरों तक ही नहीं, गाँवों तक आ पहुँची है। फिलहाल वहाँ प्रारंभ है। कहना कठिन है कि इस अशुभ शुरुआत का अंत कहाँ होगा? फिलहाल गाँवों में अब न आदर्श व्यवहार है, न जीवन। ये भी धीरे-धीरे शहरी सोच की विकृतियों की अनुकृति बनते जा रहे हैं।

शहरों की दुर्दशा यह है कि सेठ धीरूमल अपने धंधे से संपर्क में आए मंत्रालय के सचिव नया वर्ष लाने को उसकी पसंद के फाइव-सिक्स स्टार होटल में पास या टिकट की सुविधा प्रदान करने को अपने प्रभु प्रदत्त कर्त्तव्य के समान निभाते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे दर के मंदिर में पूजा-अर्चना को। दोनों उसकी खातिर अनिवार्य हैं। एक पैसा कमाने को, दूसरा इस पाप की कमाई के प्रायश्चित्त को। ऐसा नहीं है कि इन धंधे वालों में प्रतियोगिता नहीं है।

कितने ही अपने धंधे से संबद्ध विभाग या मंत्रालय को पैसे और संपर्क के प्रभाव से अपनी जेब में डाले घूमते हैं। पर सतत कंपटीशन के उसके प्रतियोगी, स्पर्धा और प्रशंसा मिश्रित भाव में, कहने से नहीं चूकते, “माल कितना भी घटिया हो, टेंडर के बाद हर आॅर्डर उसी को मिलना है।”

“कुछ का मत है कि जाने क्या जादुई प्रक्रिया है कि उसका टेंडर सबसे सस्ता हो जाता है। लगन ऐसी है कि उसकी पहुँच बाबू से लेकर चपरासी-अफसर तक है। साहब या बाबू के घर में कोई बीमार है तो वह डॉक्टर लेकर पहुँच जाता है। डॉक्टर-दवा सब फ्री। ऊपर से सरकारी चिकित्सा केंद्र तक जाने की जहमत भी नहीं। ऐसे कल्याण के कामों के लिए उसका संपर्क अधिकारी मौजूद है। ऐसे सेवा के कर्म जैसे दीवाली पर ‘मेवा-मिठाई’ से लेकर नर्व-वर्ष होली तक भेंट-गिफ्ट वगैरह इसी का नेक दायित्व है। नव-वर्ष समारोह में मंत्रालय सचिव जैसे आला अफसरों को निमंत्रित करने स्वयं लालाजी पधारते हैं।

यों विभाग-मंत्रालय के आका होटल के पंद्रह-बीस हजार का टिकट या पास, एक-एक डील में लाखों की कमाई करने वाले कैसे इनकार करें? बूँद-बूँद करके ही घट भरता है। यों उसके मुँह में भ्रष्टाचार का खून लग चुका है। स्वयं को निराकार सरकार का साकार पर्याय समझने वाले अधिकारी की यह भी मान्यता है कि वह पूरी तरह से फ्री-फंडिया है। ऐसे ईमानदार दिखने को दर में वह निजी सेवक भी रखते हैं। दीगर है कि उनका वेतन तक इस ईमानदार अफसर की जेब से नहीं जाता है। इसके लिए दूसरे एजेंट हैं। इनके पास प्रमोशन, बहाली, तबादले जैसे कामों का ठेका है। अफसर के दर रसद-पानी, सब्जी, फल, आटा-दाल वगैरह के प्रबंध के यही माध्यम है। ऐसे हर पावन कर्मों के कारण मंत्रालय में इनकी तूती बोलती है। ऐसों का दावा है कि मंत्रालय में पत्ता भी तभी डोलता है, जब यह अनुमति दें। यों अनुमति भी बिना ‘कैश’ की भेंट के संभव नहीं है।

इस प्रकार हर मंत्रालय की अनौपचारिक रोजगार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ‘भ्रष्टाचार हटाओ’ के नारे में सबका विश्वास है। हर सरकारी एजेंसी, साल में एक दिन सदाचार के पुण्य-लाभ का दिवस मनाती है। सब कर्मचारी ईमानदारी का व्रत लेते हैं। कतई उन प्रेमियों के समान, जो साथ-साथ जीने और बिछुड़े, तो मरने की कसमें खाकर आज अलग-अलग होकर सुखमय वैवाहिक जीवन बिता रहे हैं। उल्टे करप्शन का यह आलम है कि वह आज सरकारी जाँच एजेंसियों तक जा पहुँचा है। हमें तो शक है। जो जितना चीख-चीखकर और निष्ठा से ईमानदारी के ढोल पीटता है, वह उतना ही भ्रष्ट है। किसी भी दल की सरकार का हर मंत्री नेकनीयती और जन-कल्याण की सौगंध लेता है। कैसे कहें? पर मन ही मन सोचता है। कोरोड़ों के चुनावी खर्चे की वसूली भी तो करनी है और अगले इलेक्शन के खर्चे का प्रबंध भी। लिहाजा ईमानदारी ‘कथनी’ के भाषण तक शेष है और भ्रष्ट ‘करनी’ की कोई सीमा नहीं है। जब ऐसे किसी भ्रष्टाचार में फँसे भी तो वह सामान्य नियम का एक असाधारण अपवाद है। शरद जोशी इस विषय में जैसे एक युग-सत्य का बखान कर गए हैं, “हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे।”

भ्रष्टाचार की इस प्रचलित व्यवस्था में कुछ मूर्ख भी हैं। इनकी त्रासदी है कि ये स्वयं को सिर्फ सदाचारी कहते ही नहीं, हैं भी। कोई क्या करे? मूर्ख जो ठहरे। ऐसे शासकीय संस्थाओं के कलंक हैं। इनके सरकारी जीवन का अंत बहुधा ‘डिसमिसल’ से होता है। पता लगा कि वह भ्रष्टाचार के आरोप की जाँच में अपराधी पाए गए और नौकरी से हाथ धो बैठे। ऐसे दूसरों के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण हैं। यदि व्यवस्था से निभाना है तो भ्रष्ट बनना ही बनना, वरना रामप्यारे की तरह राम को प्यारे हो जाओगे। एक हैं बाबूराम, जो रामप्यारे के उलट हैं। हर भ्रष्ट उन्हें अपना आदर्श मानता है। उनकी देशव्यापी छवि ही भ्रष्टाचारी की है। दूसरे तो दूसरे, उन्होंने तो अपनों तक को ‘कमीशन’ से नहीं बख्शा है। जो बहुत खास थे तो उन्हें थोड़ी-बहुत एकाध परसेंट की रियायत भले ही दे दी हो, पर यह भी रो-झींककर। अपनी जानी-मानी छवि के बावजूद वह खूब फले-फूले हैं। उनका दो मंजिला शानदार महल है। धन-धान्य और सम्मान की कोई कमी नहीं है। कभी किसी दफ्तर में गए तो जिस भी अधिकारी को कृतार्थ किया, लोग उसे सलाम ठोकते हैं। करप्शन के प्रतीक और पर्याय ने इस मौन भक्त को अपने सिद्ध और दिव्य दर्शन तो दिए।

ऐसे कहने को कोई भी नाम दे दें, हर दफ्तर आज भ्रष्टाचार का पूजास्थल जैसे मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारा, गिरजाघर है। यहीं भ्रष्टाचार का जन्म हुआ। शुरू से ही न हर क्षेत्र में याने व्यापार से लेकर कृषि-संसाधनों तक पर न सरकार का ऐसा नियंत्रण होता, न उसकी स्वीकृति की इतनी दरकार रहती। यदि दफ्तर में कोई ‘धाकड़’ के विशेषण से विख्यात है तो उसका भ्रष्ट होना अनिवार्य है। वही तो वर्तमान की शासकीय व्यवस्था का नुमाइंदा है, वरना वह कायर, बेवकूफ या कागज का बोझा ढोने वाले खच्चर की उपाधि से अलंकृत होता।

दिसंबर के अंत में ऐसा क्या खास है कि हम उसका उत्सव मनाएँ? हमने जीवन में कई जनवरी देखी हैं। हमें तो किसी में कोई अंतर नहीं लगता है। कीमतें स्पेस शिप सी आकाश की ओर अग्रसर हैं। पेट्रोल-डीजल की राहत सरकार का उदारतापूर्वक दिया एक रूमाल भर है। आज जरूरत तौलिया की है, रूमाल से क्या होगा? हम फिर भी कृतज्ञ हैं। हमारे पैसे का कुछ सदुपयोग तो हुआ। हमें रह-रहकर गोरखपुर के ‘तुरंता भोजनालय’ का सत्तू याद आता है। मीठा भी और नमकीन भी। मीठा, गुड़ या चीनी के साथ और नमकीन प्याज या हरी मिर्च चबाकर। वह उन दिनों पेट भरने का सबसे सस्ता साधन था। वर्तमान में वह भी कइयों की जेब की सीमा के बाहर है। पेट को स्वीकार पर जेब को अस्वीकार्य। कई तो दर की थाली में आलू-प्याज देखने को तरस गए हैं। जिंदा रहने को रोटी-नमक पर्याप्त है। सब्जी-दाल तो विलासिता है। कुछ फाके कर जिजीविषा से जीवित हैं। हर वर्ष यही क्रम दोहरा रहा है और हम विवश तमाशबीन बने इस वास्तविकता से रूबरू हैं। नेताओं के दिलासा देने वाले भाषणों से कोई फर्क पड़ता है क्या? सब सत्ता हथियाने के बहाने हैं। हमने इनका शासन भी देखा है। कुछ भ्रष्टाचार में अग्रणी रहे हैं, कुछ निष्क्रियता में तो कुछ जातिवाद में। कुछ का विश्वास है कि अपनी जाति के साथ अल्पसंख्यक वोट भी पटा लो तो जीत अपनी है। वह भूल जाते हैं कि जनता की याददाश्त कमजोर भले हो, पर ऐसी भी नहीं है कि गुंडई, भुखमरी या अराजकता की घटनाएँ भूल जाएँ? ‘बीती ताहि बिसारना’ और केवल ‘आगे की सुधि लेना’ इतना आसान नहीं है। यदि होता, तो भी तो विरोधी दल इन दुर्दिनों को याद दिलाने में पर्यावरण को प्रदूषित करने की लगन से लगे हैं। जनता भूले तो कैसे भूले?

उत्सव मनाने की कोई वजह अपने पल्ले नहीं पड़ती है। क्या बदलता है? मूल्यवृद्धि वैसी की वैसी है। नेताओं के असत्य आश्वासन भी। गरीबी घटी है तो इनसान के व्यक्तिगत प्रयास से। इसमें सरकार का क्या योगदान है? कहीं सूखा, कहीं बाढ़, नियमित रूप से चालू है।

हमारे मित्र बुद्धिजीवी हैं याने व्यर्थ की बहस के धुरंधर। वह हमें ज्ञान देते हैं कि “कीमतें बढ़ी हैं तो वेतन भी, महँगाई भत्ता भी। आप आदतन सरकार को कोस रहे हैं।” हम उन्हें कैसे समझाते कि सरकारी सेवक हमेशा से याचक रहा है। जैसे घिघियाकर वसूली की भीख माँगता है, वह वैसे ही आटे, दाल-सब्जी की भी भीख माँग लेता। लोकलाज तो कब की तज चुका है यह अजूबा। बस फर्क इतना है कि आज भीख भी वह अधिकार से माँगता और पाता है। नहीं तो फाइल नामक जरूरी कागजों का पुलिंदा एक मेज से दूसरी तक पहुँचने में खुद-बखुद कैसे समर्थ हो? दिखाने को वह व्यवहार में बेहद विनम्र और विनीत भले हो, पर अपने हिस्से की श्रम-साद्र कमाई से क्यों चूके? उसने संबद्ध कागजों को एकत्र कर फाइल बना दी, उसे इधर-उधर ठेलने का मेहनताना भी आवश्यक है। वह इसे हक की वैधानिक कमाई मानता है। कुछ अज्ञानी इसे भ्रष्टाचार कहते हैं तो कहते रहें। इस विशुद्ध बकवास से क्या होना जाना है? दफ्तरों और सचिवालयों का यही चलन है। यह दफ्तरों की कार्यकुशलता का नमूना है, करप्शन का नहीं। दफ्तरों की चुस्ती-फुरती को भ्रष्टाचार का नाम देकर बदनाम करना पूरी तरह से अनुचित है, वैसे ही जैसे दिन में रोशनी ऊर्जा देने वाले सूरज को सिर्फ आग का गोला बताना। फिर भी कुछ मनोरोगी हैं। यह वास्तविकता से परे है। इनका क्या इलाज है? यह अपने काल्पनिक भ्रष्टाचार के संसार में विचरण करते हैं। यदि इन्हें इससे चैन-आराम और सुख है तो उनका आनंद भोगते रहें। किसी का क्या बिगाड़ लेंगे?

हर वर्ष की तरह जनवरी में आज भी जाड़ा है। गनीमत है कि ‘ग्लोबल वार्मिंग’ का फिलहाल इतना दुष्प्रभाव नहीं है कि सर्दी के स्थान पर गरमी हो जाए। दफ्तर में हीटर है, नहीं तो वातानुकूलन। घर में ये सुविधाएँ अनुपलब्ध हैं। दफ्तर में फ्री हैं। हमारी मुफ्तिया मानसिकता ऐसी प्रबल है कि कोई फ्री में देने के पहले जूते भी मारे तो हम इसे सम्मान के साथ स्वीकार करने को मनोयोग के साथ सहर्ष प्रस्तुत हैं। लिहाजा, हमारे ऐसे कर्तव्यनिष्ठ सरकारी सेवक कभी-कभार तो समय के पहले ही दफ्तर पहुँच जाते हैं। भले ही यह प्रोत्साहन राशि की सौदेबाजी के लिए हो! इतने वर्षों से न हमारी आदतें बदली हैं, न दफ्तर। मूल्यवृद्धि की तरह कमीशन का रेट भी प्रगति पथ पर है। उसके भुगतान से कार्य कुशलता में भी सुधार हुआ है। फिलहाल, दफ्तरों में मुख्यालय द्वारा निर्धारित कार्य-कुशलता की एक शील्ड है। हमारे कार्यालय को इस वर्ष यह शील्ड भी प्राप्त हुई है, यानी हमारे दफ्तर ने काम को मानकों के आधार पर सर्वश्रेष्ठ माना गया है। हम इसका श्रेय कार्यालय में व्याप्त ‘प्रोत्साहन राशि’ को देते हैं। दीगर है कि कुछ मूर्ख इसे करप्शन का नाम दें।

ऐसे यह कोई गौरवशाली उपलब्धि नहीं है। दो-तीन साल के अंतराल में ऐसी शील्ड हर दफ्तर को मिल ही जाती है। क्या यह समय के साथ पधारा कोई बदलाव है? हमारे एक मित्र सुझाते हैं कि जनवरी में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव नया कलेंडर है। कोई सोचे। इससे जीवन में क्या परिवर्तन परिलक्षित होता है? क्या मूल्यवद्धि कम हुई? क्या रुपए की क्रय-शक्ति बढ़ी? क्या सरकारी अस्पताल की नर्सों का रुख-रवैया बदला? वह बहुधा उन पर निर्भर रोगियों को ऐसे हड़काती हैं, जैसे वह उसकी जान की दुश्मन हों। कंबख्त को टें बोलने से परहेज है। वह पूरी लगन से अपने मरीज को मरघट भेजने के प्रयास में लगी हैं। फिर भी असफल हैं। उनकी निराशा स्वाभाविक है।

यही दुर्दशा वेतन भोगियों की है। सेवा अवधि का एक वर्ष कम हो गया। आवास की सुविधा भी, तीन-चार बार जनवरी आने के बाद तजनी ही पड़ेगी। एक दर तो बनवा लिया है। एक-दो और बनवाने पड़ेंगे। नहीं तो वर्तमान जीवन शैली को निभाना कठिन होगा। कैसी स्वार्थी दुनिया है? न कोई पार्टी में बुलाएगा, न हर त्योहार को दस्तूरी भेंट-गिफ्ट मिलेगी, न बैठे-ठाले की शुभकामनाएँ। क्लब भी जाओ तो पुराने भले साथ निभाएँ, नए अधिकारी तो कन्नी ही कटाएँगे। कलेंडर सिर्फ बढ़ते समय का दुखद संकेत है, किसी शुभ परिवर्तन का नहीं। गनीमत यही है कि न कोई दुर्घटना घटी, न शरीर के पिंजड़े से साँस का पखेरू फुर्र हुआ।

हम गंभीरता से चिंतन में लगे हैं कि जीवन की त्रासद रूटीन में क्या ऐसा बदलाव आए कि नया वर्ष सार्थक लगे? हम कोई ज्ञानी-विचारक नहीं हैं, जो सदियों का कल्याण कर सकें। हमें निजी अनुभव के आगे जाना कठिन है। हमने देखा है कि हर पाँच-छह तारा होटल के पास एक झुग्गी बस्ती है। कई बिना छत वाले हैं, जो सरकारी रैन बसेरे में रात बिताते हैं, फटे-छेददार कंबलों के सहारे। डायबिटिक होने के कारण सुबह की कष्टप्रद सैर अपनी अनिवार्यता है। इस दौरान पाँच तारा होटलों के बाहर रात्रि भोज की जूठन पर श्वान-इनसान का संघर्ष भी हमने वर्ष दर वर्ष देखा है। दोनों प्रतिद्वंद्वी हैं इस जूठन के भोजन के लिए। यह जूठन भी तभी तक है, जब तक इसे ले जाने कूड़े की नियत गाड़ी नहीं आती है। सीमित समय का तकाजा है कि पेट भर लें। यह दुखद युद्ध हर भोर का पीड़ादायी सच है। इनसान कुत्ते भगाने को कभी शू-शू का मंत्र उच्चारित करता है, कभी पत्थर फेंकता है। कुत्ता भी अनवरत भौंककर दाँत दिखाता, उसे काटने पर आमादा है। यह भोर की यातना पूरे दिन आंतरिक पीर का संचार करने को काफी है। ऐसी अनुभूति किसी भी उत्सव के बाद की सुबह और बढ़ जाती है, श्वान-इनसान संघर्ष की संख्या भी।

हमें इंतजार है, उस शुभ भोर का, जब इस रोजमर्रा के संघर्ष का अंत हो। कुत्ते भले स्वभाववश जूठन चाटें, इनसान को विवशता की यह कवायद न करनी पड़े। वह दो पायों का जानवर न बने, इनसान के समान गौरव व गरिमा का जीवन बिताए। कौन कहे, हमारे प्रतीक्षारत नव वर्ष का यह स्वप्न कभी सच हो। फिर चाहे वह हमारा नववर्ष हो या अंग्रेजों का, फर्क क्या पड़ता है? यही प्रतीक्षित वर्ष की यथास्थिति का सबसे सुखद बदलाव होगा। क्या अपने जीते-जी किसी नए वर्ष का यह क्रांतिकारी कायाकल्प मुमकिन है? हमारे ऐसे कई इसी इंतजार में हैं। 

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