रामप्रसाद बिस्मिल

रामप्रसाद बिस्मिल

अपनी प्राणाहुति देकर भारत माता को आजाद करानेवाले देशभक्तों में पं. रामप्रसाद बिस्मिल का नाम विशेष श्रद्धा के साथ लिया जाता है। उनका जन्म सन् 1897 में शाहजहाँपुर (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री मुरलीधर था। वे ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं थे। उनके पूर्वज तत्कालीन ग्वालियर राज्य के तोमरघार क्षेत्र से संबद्ध थे। वे शाहजहाँपुर नगरपालिका में कार्यरत थे।

पं. मुरलीधरजी को पहले एक बेटा हुआ था; परंतु थोड़े दिनों के बाद ही वह चल बसा। उसके कुछ वर्ष बाद रामप्रसाद का जन्म हुआ। उनके जन्मोत्सव पर परिवार में खुशियाँ तो खूब मनाई गईं; लेकिन इसके साथ ही परिवारवालों को उनकी सही-सलामती की चिंता भी बनी रहती थी। परिवार में उनके लालन-पालन का विशेष ध्यान रखा गया। धीरे-धीरे वे बड़े होते गए।

बचपन में रामप्रसाद बहुत शरारती थे। उनके दादा नारायण लालजी, जो व्यायाम के बहुत शौकीन थे, अपने साथ बालक रामप्रसाद से भी व्यायाम करवाते थे। रामप्रसाद अपने दादाजी के साथ मंदिर भी जाते थे और वहाँ सबके साथ बैठकर भजन-कीर्तन करते थे। इन्हीं सब संस्कारों के फलस्वरूप वे आगे चलकर बलिष्ठ, सुंदर, साहसी तथा चरित्रवान् व्यक्ति बने।

सात वर्ष की आयु में रामप्रसाद को पहले घर पर ही हिंदी सिखाई गई। हिंदी सीखने के बाद उर्दू पढ़ने के लिए उन्हें एक मौलवी के पास भेजा गया। उसके बाद पढ़ने के लिए वे पाठशाला जाने लगे। उनके पिता मुरलीधरजी उनकी पढ़ाई पर बहुत ध्यान देते थे और उन्हें अनुशासन में रहना सिखाते थे; परंतु अपने शरारती स्वभाव के कारण वे पढ़ने में मन नहीं लगा पाते थे।

एक बार रामप्रसाद मंदिर में पूजा कर रहे थे, तभी वहाँ मुंशी इंद्रजीत नामक एक सज्जन आए, जो आर्यसमाज के सिद्धांतों को माननेवाले थे। रामप्रसाद को पूजा करते देखकर वे बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने रामप्रसाद को ‘संध्या-वंदन’ सिखाई और साथ ही आर्यसमाज के सिद्धांतों के बारे में भी बताया।

रामप्रसाद के पिताजी सनातनपंथी थे और रामप्रसाद पक्के आर्यसमाजी बन गए। इस कारण पिता-पुत्र में अकसर कहा-सुनी भी होने लगी। एक दिन नाराज होकर उन्होंने रामप्रसाद को बहुत डाँटा-फटकारा और आर्यसमाज छोड़ देने की हिदायत दी; परंतु रामप्रसाद अपने इरादे पर अटल रहे।

रामप्रसाद घर छोड़कर निकल गए और एक-दो दिन आस-पास के जंगलों में घूमते हुए शाहजहाँपुर लौट आए। वहाँ उन्होंने आर्यसमाज के सदस्यों द्वारा आयोजित एक सभा मेें भाग लिया। उसी दौरान आर्यसमाज के स्वामी सोमदेव, जो महान् देशभक्त और विद्वान् थे, शाहजहाँपुर आए। उनसे मिलकर रामप्रसाद बहुत प्रभावित हुए। अब वे जी-जान से स्वामीजी की सेवा में लग गए।

लखनऊ में ही रामप्रसाद का संपर्क कुछ क्रांतिकारियों से हुआ, जो एक गुप्त समिति के माध्यम से क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देते थे। रामप्रसाद के मन में क्रांति की चिनगारी तो सुलग ही रही थी। जल्दी ही वे उस गुप्त समिति के सदस्य बन गए।

हथियार आदि खरीदने के लिए समिति के पास धन नहीं था। रामप्रसाद ने इन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पुस्तकों का प्रकाशन करने की एक योजना बनाई। इसके लिए उन्होंने अपनी माँ से कुछ पैसे उधार के रूप में लिये और ‘अमेरिका ने स्वतंत्रता कैसे प्राप्त की’ नामक एक पुस्तक प्रकाशित की। इससे लोगों में क्रांतिकारी विचारों का प्रचार तो हुआ, धन की समस्या भी कुछ हद तक कम हुई। उन्होंने अपनी माँ से लिये हुए पैसे भी वापस कर दिए।

उसी दौरान मैनपुरी षड्यंत्र केस के नेता गेंदालाल दीक्षित ग्वालियर में गिरफ्तार कर लिये गए। तब रामप्रसाद ने अपने साथियों के सहयोग से ‘देशवासियों के नाम संदेश’ शीर्षक परचे छपवाए और उन्हें कई जिलों में बँटवाया। इससे उनकी चर्चा दूर-दूर तक होने लगी; परंतु दुर्भाग्यवश सूचना मिल जाने के कारण अंग्रेजी सरकार ने परचे और पुस्तक दोनों को जब्त कर लिया। इस प्रकार रामप्रसाद पुलिस की नजर में आ गए और पुलिस उनकी तलाश करने लगी।

रामप्रसाद बिस्मिल की एक छोटी बहन थीं, जिनका नाम शास्त्री देवी था। उनका विवाह आगरा के पिनाहट नामक गाँव में हुआ था। रामप्रसाद अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों के बारे में भी अपनी बहन को बताते रहते थे। कई बार हथियार आदि छिपाकर रखने में भी वह रामप्रसाद की मदद करती थीं।

रामप्रसाद पुलिस की नजरों से बचकर अपने मामा के यहाँ चले गए। वहाँ वे खेती-बाड़ी का काम करते और साथ-साथ किताबें भी लिखते थे। उधर उनके पिताजी के नाम सरकारी नोटिस जारी हुआ कि उनकी गिरफ्तारी के वारंट की भरपाई के लिए उनके हिस्से की जमीन-जायदाद नीलाम की जाएगी। उस समय रामप्रसाद और उनके परिवारवालों की हालत बहुत खराब थी। तब रामप्रसाद ने कोई व्यवसाय आरंभ करना चाहा। अपने मित्र की सहायता से उन्होंने बँगला भाषा का अध्ययन किया और बंगाली पुस्तक ‘निहिलिस्ट रहस्य’ का अनुवाद करना शुरू कर दिया। इस दौरान कुछ दिनों तक वे एक साधु की कुटिया में रहे। वहाँ उनका ज्यादा समय अनुवाद करने में बीतता था। अनुवाद समाप्त करने के बाद उन्होंने ‘सुशीलमाला’ के नाम से एक ग्रंथमाला निकाली।

पैसों के अभाव और परिवार की दयनीय दशा के कारण रामप्रसाद को एक कारखाने में नौकरी करनी पड़ी। वहाँ वे कपड़ा बुनने का काम करते थे। धीरे-धीरे वे इस काम में कुशल हो गए और उन्हें एक कारखाने में मैनेजर की नौकरी मिल गई। अपनी कमाई के पैसे वे अपने पिताजी को दिया करते थे, जिससे घर की हालत धीरे-धीरे सुधरने लगी।

उसी समय उत्तर प्रदेश में क्रांतिकारी दल का पुनर्गठन होने लगा। कुछ समय के बाद रामप्रसाद बिस्मिल भी उसमें शामिल हो गए। उस दल में चंद्रशेखर आजाद, सरदार भगत सिंह आदि प्रमुख क्रांतिकारी शामिल थे। रामप्रसाद बिस्मिल को दल के संचालन का कार्यभार सौंपा गया। अब उन्हें हथियारों की आवश्यकता पड़ी। इसके लिए सभी क्रांतिकारियों ने आपस में विचार-विमर्श करके काकोरी स्टेशन पर सरकारी खजाना लूटने की योजना बनाई।

सहारनपुर से आनेवाली कलकत्ता मेल को उन लोगों ने अपनी निश्चित योजना के अनुसार काकोरी स्टेशन से कुछ पहले ही रोक लिया। रामप्रसाद बिस्मिल और उनके साथियों ने गाड़ी में रखा सारा खजाना लूट लिया। उस समय गाड़ी में चौदह अंग्रेज फौजी मौजूद थे। सभी हथियारों से लैस थे, परंतु क्रांतिकारियों के साहस के सामने उन्हें बोलने की हिम्मत नहीं हुई।

काकोरी कांड की छानबीन के लिए सरकार ने गुप्तचर विशेषज्ञ मिस्टर हॉस्टन को नियुक्त किया था। अपनी छानबीन के दौरान उसने संदिग्ध व्यक्तियों की एक सूची तैयार की, जिसमें रामप्रसाद बिस्मिल का नाम प्रमुख था। अब पुलिस की गतिविधियाँ और तेज हो गईं। वह हर हाल में बिस्मिल को पकड़ना चाहती थी। पुलिस की नजरों से बचते हुए बिस्मिल इधर-उधर रहकर समय व्यतीत कर रहे थे; लेकिन दुर्भाग्य से पुलिस ने उन्हें तब गिरफ्तार कर लिया, जब वे अपने एक मित्र के यहाँ से लौटकर घर आए थे। उन्हें लखनऊ जेल में रखा गया।

19 दिसंबर, 1927 को बिस्मिल को फाँसी दी जानी थी। उस दिन उनके माता-पिता उनसे मिलने आए। बिस्मिल ने उन दोनों के चरण स्पर्श किए। अपने को संयत रखने की लाख कोशिशों के बावजूद बिस्मिल के पिता फूट-फूटकर रो पड़े। फिर रामप्रसाद बिस्मिल माँ के गले से लिपट गए। जिन आँखों से कभी आँसू की एक बूँद नहीं बही थी, उन आँखों से आज अविरल अश्रुधारा बह रही थी। बेटे के आँसू देखकर माँ ने ऊँचे स्वर में कहा, “मैं तो समझती थी कि मेरा बेटा बहुत बहादुर है। उसके नाम से अंग्रेजी हुकूमत काँपती है। आज वही रो रहा है। यदि मरने से इतना डर लगता है तो इस रास्ते पर चले ही क्यों थे?”

बिस्मिल ने बड़े शांत भाव से कहा, “माँ, ये आँसू मौत के डर के कारण नहीं आए हैं। ये तो तेरी ममता के आँसू हैं।” और उनके चेहरे पर फिर से मुसकराहट खिल गई।

निर्धारितसमय पर बिस्मिल को फाँसी के तख्ते के पास ले जाया गया। वे मुसकराते हुए आगे बढ़े और ‘वंदे मातरम्’ बोलते हुए फाँसी के तख्ते पर चढ़ गए। उन्होंने अपने हृदय के उद्गार व्यक्त किए—

‘मालिक तेरी रजा रहे,

बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे।

जब तक कि तन में जान रगों में लहू रहे,

तेरा ही जिक्र या तेरी ही जुस्तजू रहे॥’

इसके बाद उन्होंने जोर से कहा, ‘‘मैं ब्रिटिश सरकार का विनाश चाहता हूँ।’’ इतना कहकर उन्होंने अंतिम बार भारत माता को प्रणाम किया और फाँसी के फंदे पर झूल गए।

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