मदनलाल धींगरा

मदनलाल धींगरा

वीर, निडर और निर्भीक देशभक्त मदनलाल धींगरा का परिवार अमृतसर में रहनेवाला एक संपन्न और अंग्रेज-भक्त परिवार था। उनके पिता डॉ. दत्तामल अमृतसर के जाने-माने चिकित्सक थे। लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। अंग्रेजी राज में उनकी तूती बोलती थी। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें ‘राय साहब’ के खिताब से सम्मानित किया था।

मदनलाल धींगरा डॉ. दत्तमल के छठे पुत्र थे। उनका जन्म सन् 1887 में हुआ था। बचपन से ही वह अपने परिवार के अन्य लोगों से भिन्न स्वभाव के थे। वह मितभाषी थे।

मदनलाल धींगरा की प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर के मिशन हाई स्कूल में हुई। वहीं से उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा फर्स्ट ग्रेड में उत्तीर्ण की। गणित में उनकी विशेष रुचि थी। तकनीकी विषयों से भी उन्हें विशेष लगाव था। वह सभी प्रकार के यंत्रों और मशीनों को बड़ी पैनी नजर से देखते थे।

मैट्रिक के बाद एफ.एस.सी. की पढ़ाई के लिए उन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज (लाहौर) में प्रवेश लिया। वहीं से उन्होंने बी.ए. किया। उच्च शिक्षा के लिए वह विदेश जाना चाहते थे, किंतु उनके पिता उन्हें विदेश नहीं भेजना चाहते थे बल्कि अपनी देख-रेख में ही पढ़ाना चाहते थे।

घर छोड़कर मदनलाल सीधे जम्मू-कश्मीर रियासत में पहँुचे। वहीं उन्होंने सेटलमेंट विभाग में एक साधारण सी नौकरी कर ली। लेकिन कुछ ही दिनों में वह नौकरी से ऊब गए और नौकरी छोड़कर कालका चले गए। कालका में उन्हें ताँगा चलाने की धुन सवार हुई और वहाँ ताँगा चलाने लगे; लेकिन जल्दी ही वह इस कार्य से भी ऊब गए।

इसके बाद मदनलाल ने वहीं एक कारखाने में नौकरी कर ली। कारखाने का मालिक अंग्रेजों का भक्त था। वह मजदूरों पर अत्याचार करने में जरा भी नहीं हिचकता था। वहाँ उन्होंने गरीब मजदूरों की दयनीय दशा देखी।

मजदूरों को उनके अधिकार दिलाने के लिए मदनलाल धींगरा ने कमर कस ली। इसके लिए उन्होंने ट्रेड यूनियन बनाई। मजदूरों के अधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने अपनी नौकरी की भी परवाह नहीं की। वह मजदूरों के सच्चे हितैषी बन गए।

बंबई में उन्होंने पानी के एक जहाज पर नाविक की नौकरी कर ली। वहाँ उन्होंने अपना वास्तविक नाम नहीं बताया और न ही अपने घर-परिवार का कोई पता दिया।

मदनलाल ने लंदन में खूब सैर की, वहाँ का वैभव देखा। कुछ दिन लंदन में घूम-फिरकर वह एक बार फिर अपने घर लौट आए। इससे माता-पिता को बड़ी शांति मिली। उन्होंने अब चैन की साँस ली।

सन् 1906 में मदनलाल लंदन के लिए चल पड़े। वहाँ उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज में इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए दाखिला ले लिया। बढ़िया कपड़े पहनकर, मेकअप करके वहाँ की सड़कों पर घूमना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। आईने के सामने खड़े होकर वह देर तक अपने केश सँवारते रहते थे।

एक दिन मदनलाल को इंडिया हाउस, जिसकी स्थापना प्रसिद्ध क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा ने की थी, के बारे में पता लगा। जब मदनलाल इंडिया हाउस पहुँचे तब वीर सावरकर भारतीय युवकों के एक समूह को संबोधित कर रहे थे। वह युवकों को भारत की दयनीय दशा के बारे में बता रहे थे। मदनलाल ने वह सब सुना तो उनका खून खौल उठा। उनके मन में अंग्रेजों के प्रति घृणा पैदा हो गई। चँूकि उनका परिवार अंग्रेजभक्त था, इसलिए उन्हें देशवासियों की दयनीय दशा और उनपर होनेवाले अंग्रेजों के अत्याचारों का आभास नहीं था।

उस दिन से सावरकर धींगरा के हृदय-सम्राट् बन गए। उनके भाषण सुनने के लिए वह रोज इंडिया हाउस जाने लगे।

सन् 1908 में वीर सावरकर ने लंदन में एक अभियान छेड़ा। देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) की इक्यावनवीं वर्षगाँठ के रूप में। इसके माध्यम से भारतीय युवकों में देशप्रेम की भावना भरने का उन्हें अच्छा अवसर मिला।

उस अभियान के एक समारोह में लंदन में प्राय: सभी अप्रवासी भारतीय छात्र सम्मिलित हुए। वे ‘1857 स्मारक’ के बिल्ले लगाकर अपनी कक्षाओं में गए। यह देखकर अंग्रेज अध्यापक बहुत नाराज हुए।

इन्हीं युवा छात्रों में मदनलाल धींगरा भी थे। वह बढ़िया सूट पहनकर, बिल्ला लगाकर बड़ी शान से महाविद्यालय की इमारत में घूम रहे थे। एक अंग्रेज ने उनके कोट पर लगा बिल्ला खींचने का प्रयास किया। तभी धींगरा ने उसके मुँह पर एक तमाचा जड़ दिया और उसे जमीन पर पटककर उसकी छाती पर चढ़ बैठे तथा अपनी जेब से चाकू निकाल लिया। बेचारा अंग्रेज दया की भीख माँगने लगा। उन्होंने उसे माफ कर दिया।

लंदन में एक संस्था थी—‘नेशनल इंडियन एसोसिएशन’, जिसका काम था इंग्लैंड गए भारतीय युवकों को अंग्रेजों का प्रशंसक बनाना। मार्च 1909 में धींगरा इस संस्था के कार्यालय में गए और संस्था की सचिव कुमारी एमा से मिले। उन्होंने पहले उससे दोस्ती गाँठी और फिर संस्था के सदस्य बन गए।

इस संस्था के तीन महत्त्वपूर्ण सदस्यों में सर विलियम कर्जन वायली भी था। वह बहुत धूर्त और चालाक था। भारतीय युवकों का ब्रेन-वॉश करने में माहिर वह अंग्रेज ऐसे युवकों को अंग्रेजभक्त और देशद्रोही बनाने का प्रयास करता था। इसीलिए भारतीय विद्यार्थी उससे प्राय: घृणा करते थे।

कर्जन वायली धींगरा के पिता और बड़े भाई का अच्छा मित्र भी था, इसलिए वह धींगरा का कुछ ज्यादा ही खयाल रखता था। वायली धींगरा को इस बात के लिए धीरे-धीरे मनाने लगा कि वह इंडिया हाउस की गुप्त खबरें उसे बताया करे।

1 जुलाई, 1909 को ‘नेशनल इंडियन एसोसिएशन’ की वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में एक समारोह होने वाला था। धींगरा कुमारी एमा से मिले और समारोह की पूरी जानकारी हासिल कर ली। उन्हें यह जानकर खुशी हुई कि इस समारोह में कर्जन वायली भी सम्मिलित होगा।

उस दिन वार्षिक समारोह के लिए इंपीरियल का जहाँगीर हॉल रंग-बिरंगे फुग्गों और कागज की झंडियों से सजाया गया था। धींगरा रात आठ बजे वहाँ पहुँचे। हॉल में एक तरफ बने-ठने छैल-छबीले पुरुष थे, दूसरी तरफ सजी-सँवरी लड़कियाँ।

रात ग्यारह बजे समारोह समाप्त हुआ। कर्जन वायली मंच से उतर आया। अब धींगरा कर्जन वायली की ओर बढ़े और उससे गर्मजोशी से मिले। धींगरा उससे सटकर ऐसे खड़े हो गए मानो कोई खास बात बताना चाहते हों।

बात सुनने के लिए कर्जन वायली ने जैसे ही अपनी गरदन धींगरा की ओर झुकाई वैसे ही धींगरा ने अपनी पिस्तौल से गोली चलाई। गोली की आवाज सुनकर आमोद-प्रमोद थम गया। लोग सहम गए। सभी की नजरें धींगरा की ओर उठ गईं। धींगरा तब तक अपना काम कर चुके थे। कर्जन वायली एक चीख मारकर धराशायी हो गया। धींगरा ने उस पर दो गोलियाँ और चलाईं।

तभी कावसजी लाल काका नामक एक व्यक्ति कर्जन वायली की सहायता के लिए दौड़ा। धींगरा ने उसे भी गोलियों से धराशायी कर दिया।

एक अन्य व्यक्ति धींगरा को पकड़ने के लिए आगे बढ़ा तो धींगरा ने उसकी गरदन पर जबरदस्त चोट की, जिससे उसकी गरदन टूट गई। वह जमीन पर गिर पड़ा। उसके मुँह से खून बहने लगा।

इस पूरी घटना के बीच धींगरा शांत खड़े रहे। उनके चेहरे पर कोई डर, घबराहट या बेचैनी नहीं थी। पुलिस आई और उन्हें गिरफ्तार करके ले गई। धींगरा ने जहाँगीर हॉल जाने से पूर्व अपनी जेब में एक वक्तव्य लिखकर रख लिया था, जिसे पुलिस ने निकालकर छिपा लिया।

लंदन के सभी समाचार-पत्रों ने इस घटना को सुर्खियों में छापा।

मदनलाल धींगरा को ब्रिक्स्टन जेल में रखा गया था। वीर सावरकर उनसे मिलने के लिए गए। उन्हें धींगरा के कार्य पर गर्व था। अदालत में उनपर 25 जुलाई तक मुकदमा चला। अदालत ने मदनलाल धींगरा को मृत्युदंड दे दिया।

17 अगस्त, 1909 को मदनलाल धींगरा को फाँसी दे दी गई। उस समय उनके हाथ में ‘गीता’ थी और होंठों पर राम तथा कृष्ण का नाम।

लगभग पैंसठ वर्षों के बाद (13 दिसंबर, 1976 को) पंजाब सरकार मदनलाल धींगरा की अस्थियाँ भारत लाने में सफल हो पाई। इस कार्य में भारत सरकार ने भी प्रभावशाली भूमिका निभाई।

25 दिसंबर, 1976 को प्रात: दस बजे अस्थि-कलश राजपुरा से अंबाला, जगाधरी, सहारनपुर होता हुआ हरिद्वार पहुँचा और उसी दिन गंगा में उसका विसर्जन कर दिया गया।

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