मृत्यु से साक्षात्कार

मृत्यु से साक्षात्कार

पत्रकारिता के छात्रों को सबसे पहले खबर या न्यूज की परिभाषा सिखाई जाती है। न्यूज एजेंसी ‘हिंदुस्थान समाचार’ के दिनों में मैंने भी इस परिभाषा को आत्मसात् कर लिया था। लेकिन अब मुझे लगता है, ऐसी सभी परिभाषाएँ ठीक नहीं हैं। अब मेरा एक नई परिभाषा से सामना हुआ है। जिसका अपने से संबंध नहीं है, वह खबर है और जिसका सीधा-सीधा अपने से ही संबंध है, वह खबर नहीं बल्कि कटु यथार्थ है। बस इसमें एक सफाई और देना जरूरी है। जो मेरा कटु यथार्थ है, वह दूसरों के लिए खबर ही है और जो दूसरे का कटु यथार्थ है, वह मेरे लिए खबर ही है। जिन दिनों देश में कोरोना का प्रकोप शुरू हुआ, उन दिनों अखबारों में व चैनलों पर भी कोरोना से बीमार होने वालों और बचने वालों व कोरोना की चपेट में आकर शरीर छोड़ देने वालों के आँकड़े छपते थे। (आज भी छप रहे हैं) तब मेरे लिए ये सब खबरें थीं। जैसा कि मैंने पहले ही कहा है, जब तक आदमी का किसी घटना से प्रत्यक्ष संबंध न हो, तब तक वह घटना खबर ही रहती है। कोरोना से मरने वालों की संख्या स्वाभाविक ही कम रहेगी, इसलिए उन आँकड़ों के आधार पर विश्लेषण होते रहते हैं। अपने देश की जनसंख्या १३० करोड़ को लाँघ रही है। इसलिए कुछ हजार या लाख लोगों की मौत हो जाना क्या मायने रखता है, जब हमारे पास यूरोप के उन देशों के आँकड़े हों, जिनकी जनसंख्या भारत की जनसंख्या के मुकाबले आटे में नमक समान हो, लेकिन कोरोना से मरने वालों की संख्या कहीं ज्यादा हो। अमेरिका व रूस जैसे शक्तिशाली देशों में जब कोरोना से बेतहाशा मौतें होने लगीं तो कहीं-कहीं भाव यह भी पनप रहा था, देखो इन देशों की हालत, इम्यून सिस्टम तो बचा ही नहीं। बचेगा भी कैसे! मिट्टी से बचो, धूल से बचो, पानी भी छान कर पियो, जरा सा नजला जुकाम हुआ नहीं तो दर्जनों गोलियाँ खाते हैं। भाई, पहले बीमारी से लड़ने का मौका अपने शरीर को दो। शरीर हारने लगे तो उसकी सहायता के लिए दवाई खाएँ। लेकिन कहाँ? हलकी सी हरारत भी हुई तो ढेरों गोलियाँ गटक लेते हैं। मन के भीतर यह भाव आते तो बाहर चेहरे पर उसकी झलक। इधर देखो, अपने देश के लोगों की प्रतिरोधक क्षमता बहुत ज्यादा है, इसलिए कोरोना को पराजित किया जा सकता है। यह सोचते-समझते अपने देश पर अभिमान हो जाता था। अमेरिका-रूस क्या खाकर हमारे देश की प्रतिरोधक क्षमता का मुकाबला करेंगे? इस तरह रोज ही कोरोना को लेकर विश्लेषण होता और निष्कर्ष निकाले जाते। इन विश्लेषणों में कोरोना से मरने वाले व्यक्ति, व्यक्ति न रह कर महज आँकड़े बन जाते। यदि कोई मुझसे बहस करता कि भारत में कोरोना से मरने वालों की संख्या बहुत ज्यादा है तो मैं पिल जाता। निरंतर बहसबाजी करता रहता। करोड़ों की जनसंख्या में ये मौतें क्या मायने रखती हैं? नैगलिजिबल।

लेकिन इस प्रकार के विश्लेषण करता हुआ भी मैं चौकन्ना ही था। रसोई में व घर में काम करने वालों को छुट्टी दे दी। (नौकरी से नहीं, वे विश्वविद्यालय के कर्मचारी थे, इसलिए उन्हें किसी न किसी विभाग में भेज दिया। लेकिन इसका अर्थ यह न लिया जाए कि मैं विश्वविद्यालय के कर्मचारियों से घर का काम करवाता था। ये कर्मचारी नियमानुसार कुलपति आवास के रख-रखाव के लिए ही थे।) कुलपति आवास का जिम्मा मैंने और श्रीमती ने स्वयं ही सँभाला। रहा प्रश्न सुरक्षा कर्मचारियों का, फिलहाल तो सुरक्षा की जरूरत कोरोना से ही थी। मैं जानता था, वर्दी पहने ये कर्मचारी कम-से-कम कोरोना से सुरक्षा नहीं दे पाएँगे। अलबत्ता रोज बाहर से आने के कारण मेरे लिए खतरा जरूर हो सकते हैं। इसलिए मुख्य द्वार पर खड़े सुरक्षा कर्मचारी भी विश्वविद्यालय में ही भेज दिए। अखबार वाला अखबार तो बाकायदा फेंकता था, लेकिन मैं उसको पूरा दिन चिमटी से भी नहीं छूता था। अाज का अखबार कल पढ़ा जाता। यदि अखबार की किसी खबर पर कोरोना का वायरस चिपककर बैठा भी होगा तो एक दिन में तो नष्ट हो ही जाएगा। सब्जी को बाकायदा पोटैशियम परमैंगनेट, यानी लाल दवाई से धोया जाता। दिन में नहाने के मौके प्रयास करके बढ़ाए गए। ऑक्सीमीटर चारपाई पर चौबीस घंटे सजा रहता। ‌िगलोय काफी मात्रा में जमा कर ली। बाबा रामदेव के कोरोनिल की शीशियाँ सज गईं। जुशांदा, काढ़ा सबने रसोई में जरूरत से ज्यादा स्पेस ले लिया। बाकी वाष्प मुँह के रास्ते लेना, गरमियों में भी गरम पानी पीना, मुँह पर कपड़ा बाँधे रखना तो नित्य कर्म बन गए थे। तभी हल्ला पड़ गया कि कोरोना की वैक्सीन भी भारत ने बना ली है। मेरा सीना चौड़ा हो गया। भारत अब पीछे नहीं रह सकता। जैसे ही सरकार ने घोषणा की कि वरिष्ठ नागरिक अस्पताल में जाकर टीका लगना सकते हैं तो मैं आगे की कतार में खड़ा था। यकीन मानिए, जिस तरह परीक्षित ने तक्षक नाग के प्रहार से बचने के लिए पानी के भीतर शीशे का महल बना लिया था, उसी तरह मैंने कोरोना से बचने के लिए अपने आवास को एक किले में तब्दील कर लिया था।

लेकिन इतनी चौकसी के बावजूद एक गलती हो गई। 27 मार्च 2021 को मैं हिमाचल का अपना सुरक्षित शीशमहल छोड़कर दिल्ली आ गया। पहाड़गंज के संगत भवन में अपना ठिकाना बनाया। अविनाश जायसवालजी, निर्मला पंथ वरिष्ठ संन्यासी स्वामी रामेश्वरानंद गिरिजी, संगत संसार के प्रबंध संपादक अमरपालजी, सब वहीं थे। खाना-पीना, गप्प-गोष्ठी सब चलता ही था। ८ अप्रैल को अविनाशजी ने किसी लैब से खून के सैंपल लेने वाले कार्यकर्ता को बुलाया हुआ था। अविनाशजी ने अपना खून तो दिया ही, कहने लगे, आप भी टेस्ट करवा लो। मुफ्त में टेस्ट हो रहा हो तो भला कोई क्यों पीछे रहेगा? मैंने भी अपना बेशकीमती खून टेस्ट के लिए दे दिया और शाम होते-होते वह कार्यकर्ता रिपोर्ट लेकर आ गया। उसमें एंटीबॉडी टेस्ट की भी रिपोर्ट थी। मैंने सरसरी नजर से देखी। एंटीबॉडी की संख्या पाँच सौ अस्सी थी और इस रिपोर्ट को लैब ने पाॅजिटव लिखा हुआ था। मैंने इसकी व्याख्या सकारात्मक तरीके से की। मैंने वैक्सीन का पहला टीका लगवाया हुआ था। उसी के आधार पर मैंने सोचा कि टीके ने ठीक असर दिखाया और अपना काम शुरू कर दिया है। उसने मेरे शरीर में कोरोना से लड़ने के लिए एंटीबॉडी बनाना शुरू कर दिया है और बड़ी संख्या में बना भी लिए हैं। अब यदि कोरोना का वायरस शरीर के अंदर घुस भी जाता है तो ये एंटीबॉडी भला उस दुष्ट के पैर कहाँ लगने देंगे? वैसे भी मुझे अपने शरीर की प्रतिरोधक क्षमता पर पता नहीं क्यों बहुत भरोसा था। मुझे अपना गाँव छोड़े हुए पचास साल हो गए, लेकिन न जाने क्यों अभी भी मैं मानसिक रूप से गाँव में ही हूँ। केवल गाँव से जुड़ा हुआ हूँ, इतना नहीं, गाँव में ही हूँ। जब कोरोना ने दस्तक दी और उसके फैलने और उसकी चपेट में आने वालों की मरने की खबरें आने लगीं तो न जाने क्यों मन में कहीं-न-कहीं यह भाव बना रहा, यह सब हल्ला-गुल्ला शहरों में है। शहर के लोगों का इम्यून सिस्टम कोरोना का क्या मुकाबला करेगा? हम तो गाँव के लोग हैं। कोरोना इधर का रुख करेगा तो मुँह की खाएगा। इसलिए मेरी ओर से कोरोना का अध्याय समाप्त हो गया था। अलबत्ता जो मिलने जुलने वाले आते थे, उनको जरूर कोरोना से बचने की हिदायत करता था और कैसे बचना है, उसके एक-दो तरीके भी बताता ही था। कई बार मुँह पर मास्क नहीं लगाया होता था तो सुनने वाला मुझे भी संकेत दे देता था कि आपने मास्क लगाया हुआ नहीं है, दिल्ली में दूसरी बेव का बहुत ज्यादा प्रकोप है, इसलिए थोड़ा अलर्ट रहिए। मास्क तो मैं जरूर लगा लेता, लेकिन मन के भीतर कहीं यह भाव भी होता कि भाई, हम तो गाँव के रहने वाले हैं, हमारा तो कोरोना कुछ बिगाड़ नहीं सकेगा, बाकी शहरों के लोग जरूर चौकन्ना हो जाओ, क्योंकि आपका शरीर यह मुकाबला नहीं कर पाएगा।

लेकिन तब मुझे इस बात का इल्म नहीं था कि मैं गाँव का आदमी भी कोरोना के शिकंजे में फँस चुका था। पता तो तभी चलता, यदि या तो शरीर संकेत देना शुरू करे या फिर बाकायदा टेस्ट करवा लिया जाए। एंटीबॉडी का टेस्ट मेरे पास था, लेकिन उसको मैं डीकोड नहीं कर पाया। उधर शरीर ने संकेत दिया नहीं था और बिना संकेत के मैं मुँह और नाक वाला टेस्ट क्यों करवाता? शरीर ने संकेत दिया १५ अप्रैल को, जब में दिल्ली से धर्मशाला पहुँचा। लेकिन यह संकेत भी इतना स्पष्ट नहीं था। गोलमोल ही था। थोड़ी थकावट महसूस हो रही थी। यह थकावट तो कार से दिल्ली से धर्मशाला आने के कारण भी हो सकती थी। वैसे भी किसान आंदोलन के कारण शामली होता हुआ आया था। समय भी ज्यादा लगा था। थकावट तो होगी ही। लेकिन इतना संकेत मिलते ही मैंने पी.जी.आई. में डॉ. वीरेंद्र गर्गजी को फोन किया। एंटीबॉडी की संख्या बताई तो उन्होंने अपनी डॉक्टरी भाषा में बता दिया कि मैं कोरोना की गिरफ्त में आ चुका हूँ। संकेत का पीछ करते हुए सोलह को जोनल अस्पताल में मैंने और श्रीमतीजी ने टेस्ट करवाया। कहा गया था कि दो दिन बाद परिणाम का पता चलेगा, लेकिन सत्रह को ही फोन करके मुझे डॉक्टर ने बता दिया कि मैं कोरोना की पकड़ में आ चुका हूँ। शुक्र था कि श्रीमतीजी का परिणाम निगेटिव था। पहले तो सोचा कि सभी का आजमाया हुआ, इलाज शुरू कर दूँ। चौदह दिन तक क्वारंटीन, पैरासीटामोल का सेवन और नियमित काढ़ा व भाप। लेकिन डॉक्टर ने स्पष्ट कर दिया कि इसका वक्त गुजर चुका है। मामला टेढ़ा हो चुका है। अस्पताल की एंबुलेंस तपोवन में ठीक घर के सामने आकर खड़ी हो गई थी। कुछ दिन पहले मैंने टी.वी. पर एक दृश्य देखा था। 13-14 साल का किशोर कोरोना से पीड़ित था। घर के दरवाजे पर वह एंबुलेंस में बैठ रहा है। अकेला। उसने एक थैला पकड़ा हुआ है। स्कूल का थैला ही लगता था। अब शायद उसमें कपड़े रखे हुए होंगे। दरवाजे पर सब घर वाले खड़े हैं। वह विवश अपने घर वालों की ओर कातर नजरों से देख रहा है। अब वह जहाँ जा रहा है, वहाँ उसके आसपास कोई अपना नहीं होगा। कोविड डैडिकेटेड अस्पताल। मैं बच्चे और उसके माता पिता दोनों की आँखों में एक कातर विवशता देख पा रहा था। यह कातरता किस कारण थी? असाध्य बीमारी। न जाने मुझे क्यों लगा कि कहीं बच्चे की यह अंतिम यात्रा तो नहीं? यह दृश्य मेरी आँखें में न जाने कितने दिन घूमता रहा। अब एंबुलेंस में मैं भी अकेला बैठा था। बीमारी अब भी असाध्य थी और डॉक्टर ने तो कह ही दिया था कि मामला बिगड़ चुका है। दरवाजे पर रजनी गंगाहर खड़ी थी। न जाने क्यों, मेरी आँखों के सामने एंबुलेंस में बैठे उस लड़के का दृश्य उभर आया था।

अठारह को मैं धर्मशाला के क्षेत्रीय अस्पताल में भरती हो गया। लेकिन आश्चर्य जिस थकावट को आधार मानकर मैंने कोरोना का टेस्ट करवाया था, अब वह थकावट बिल्कुल गायब हो चुकी थी। कोरोना का एकमात्र संकेत भी गायब हो चुका था। लेकिन इन संकेतों की जरूरत नहीं रह गई थी, क्योंकि अब टेस्ट की रिपोर्ट ही आ चुकी थी। उसके बाद किसी और प्रमाण या संकेत की जरूरत नहीं रह जाती। कोरोना से मरने वालों के आँकड़े उस दिन भी छपे थे। लेकिन अब मैं उन आँकड़ों के आधार पर कोरोना का या गाँव वालों की प्रतिरोधक क्षमता का विश्लेषण नहीं कर सकता था। अब मुझे में सारा संसार समा गया था। अब मैं स्वयं में ही पूरा संसार हो गया था। मैं बचता हूँ तो इसका अर्थ है कि संसार ने कोरोना को पराजित कर दिया है और मैं नहीं बचता तो इसका अर्थ है कि कोरोना ने सारे संसार को पराजित कर दिया है। जब मृत्यु आसपास घूमना शुरू कर देती है तो उसका साक्षात्कार कर रहे व्यक्ति के भीतर सारा संसार सिमट आता है। संसार अपने लघुतम रूप में प्रकट होता है। परंतु दूसरे दिन ही डॉक्टर ने सलाह दी कि आप चंडीगढ़ शिफ्ट हो जाओ। मैं हैरान था। मुझे किसी भी प्रकार की कोई शारीरिक या मानसिक चिंता नहीं थी। न साँस लेने में तकलीफ, न अब बुखार। अलबत्ता खाँसी जरूर थी, लेकिन यह मेरा पुराना साथी है, तब से, जब कोरोना का चीन में भी नामलेवा कोई नहीं था। भारत की बात तो बहुत दूर की है। मैं जितना चिंता मुक्त था, डॉक्टर उतना ही चिंताग्रस्त होता जा रहा था। पंचकूला के पारस अस्पताल में जगह उपलब्ध थी। बीस को अलसुबह ही एंबुलेंस में चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गया। एक बार घर जाने की भी अनुमति नहीं दी गई। इससे पंचकूला पहुँचने में देर हो सकती थी। डॉक्टर को चिंता थी कि जितनी जल्दी हो सके पंचकूला पहुँच जाना ठीक रहेगा। मैं श्रीमतीजी को टेलीफोन पर ही सूचना दे सका। लेकिन मैं अंदाजा लगा सकता था कि उसकी चिंता कितनी बढ़ गई होगी।

बीस अप्रैल को लगभग दोपहर को मैं धर्मशाला से पंचकूला अस्पताल में पहुँच गया। रास्ते भर एंबुलेंस में ऑक्सीजन  की जरूरत नहीं पड़ी। कहीं भी मैं असहज नहीं हुआ। बिल्कुल सामान्य। अपना सामान खुद उठाकर अस्पताल में दाखिल हुआ। अरुण कुमार शर्मा पहले ही अस्पताल पहुँचे हुए थे। वे मुझे और सामान उतारने में सहायता करना चाहते थे, लेकिन मुझे शायद इसकी जरूरत नहीं थी। मुझे तो कहीं से भी महसूस नहीं हो रहा था कि मैं घातक बीमारी की पकड़ में आ चुका हूँ। लेकिन इस चमड़े के नीचे क्या-क्या हो रहा है, इसे कौन जान सकता है? अंदर का शत्रु यदि शोर मचाता है तो शरीर सूचना देने लगता है, लेकिन यदि शत्रु यदि चुपचाप काम करता रहता है तो शरीर भला क्यों शोर मचाएगा? मुझे लगता है यह दूसरे प्रकार का शत्रु था। आज तक जितने सांसारिक शत्रुओं से वास्ता पड़ा था, वे शोर मचाकर हमला करते थे। इसलिए उनका सामना करना भी आसान होता था, लेकिन इस बार का शत्रु मौन रहकर अपना काम कर रहा था। लेकिन फिर भी इतना सुकून तो था ही कि डॉक्टरों ने शत्रु के अंदर होने की पुख्ता सूचना मुझे दे दी थी। इस शत्रु को पराजित करने की रणनीति तो डॉक्टर को ही बनानी थी, लेकिन शायद उसमें मेरी भी कुछ-न-कुछ भूमिका हो सकती थी। इसी भूमिका को चिकित्सा शास्त्र के विद्वान् मरीज का आत्मबल कहते हैं या सीधी भाषा में मरीज की जिंदा रहने की जिद्द कह सकते हैं। डॉ. आशीष अरोड़ा, जिनकी निगरानी में मुझे जाँचा-परखा गया, दवा-दारू चालू हुई, वे तो शायद कभी मेरी हालत से निराश हुए होंगे, लेकिन मैं निराशा की गिरफ्त में आया हूँगा, ऐसा मुझे स्मरण नहीं है।

लेकिन इसे आश्चर्य ही कहा जाएगा कि मुझे एक क्षण के लिए भी नहीं लगा कि कोरोना मुझे निगल सकता है, जबकि मेरे चारों ओर कोरोना की पकड़ में आ चुके लोग ही पड़े थे। एक-दो तो देखते-ही-देखते इस संसार को अलविदा भी कह गए। दरअसल कोरोना मेरी प्राथमिकता में आ ही नहीं पाया। अस्पताल में मरीज को कोई काम तो होता नहीं। कोरोना का मरीज होने के कारण घर का कोई व्यक्ति एटैंडेंट भी नहीं आ सकता। इसलिए लैंड पर लेटे-लेटे मरीज बीमारी के बारे में ही सोचता रहता है। बीमारी के बारे में सोचता है तो जाहिर है कि उसके परिणाम के बारे में भी सोचता है। कोरोना तो ऐसी बीमारी है कि उसके परिणाम के बारे में सोचने के लिए बहुत स्पेस होती ही नहीं। उसके बारे में मरीज को भी पता है कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है। इलाज की तो छोड़ो, मरने के बाद शरीर का क्या होगा, संस्कार कैसे होगा, इसकी ज्यादा चिंता होने लगती है। टी.वी. पर ऐसी अनेक घटनाएँ प्रसारित हो ही चुकी थीं। यह भी सब जानते हैं कि ज्यादातर लोग तो चौदह दिन के क्वारंटीन व काढ़े से ही ठीक हो जाते हैं। अस्पताल में आने और भरती होने का अर्थ ही यही है कि मामला हाथ से निकल चुका है। ऐसे हालात में बेड पर लेटा मरीज जिंदा रहने की जिद्द कितनी दूर तक खींच सकता है? लेकिन जितना कुछ मैंने ऊपर लिखा है न जाने क्यों बेड पर लेटे मेरे दिमाग में ये कभी आई ही नहीं। आती तो तब यदि मैं बेड पर कभी खाली होता। मेरे पास तो इतने काम थे कि वे खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

बेड पर लेटा-लेटा मैं उन कामों की सूची बनाता रहता था, जो मुझे ठीक होकर निपटाने थे। कश्मीर पर लिखी जा रही अधूरी किताब को पूरा करना है। बाबा साहिब आंबेडकर पर लिखी पुस्तक का दूसरा संशोधित संस्करण तैयार करना है। गुरु तेग बहादुरजी पर पुस्तक लिखनी है। पूर्वोत्तर भारत की जनजातियों पर कितना काम करने के लिए पड़ा है। मणिपुर के स्वतंत्रता संग्रामी जादोनांग पर किताब लिखनी थी। मणिपुर में प्रेमानंद शर्मा से कितनी बार चर्चा हो चुकी है मोरेह से म्यांमार, थाईलैंड होते हुए कंबोडिया में विश्व के सबसे विशाल विष्णु मंदिर अंगकोर की सड़क मार्ग से यात्रा करनी है, ताकि उसके बाद भारत से कंबोडिया तक का यह तीर्थ मार्ग प्रचलित हो सके। कंबख्त काम खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

मुझे कहीं से भी आभास ही नहीं हुआ कि मेरा शरीर, खासकर फेफड़े, कोरोना के आगे हथियार डाल रहे थे। शायद मेरा मन तो पूरी तरह आत्मविश्वास से लबरेज था, लेकिन शरीर धीरे-धीरे कोरोना के वायरस को स्थान दे रहा था या दे ही चुका था। कहा जाता है कि कोरोना का वायरस फेफड़ों में ही आसन जमाता है और उनको निशक्त करता है। अब मुझे लगता है कि उसने जरूर मेरे फेफड़ों को जकड़ लिया होगा।। यदि कार्ल मार्क्स की शब्दावली का प्रयोग किया जाए तो अब यह चेतन और पदार्थ का संघर्ष बन चुका था। कार्ल मार्क्स मानते रहे कि पदार्थ ही सर्वोपरि है, चेतन उस पर आश्रित है। लेकिन मैं चेतन के सहारे शरीर से लड़ रहा था। लेकिन डॉक्टर को तो शरीर का इलाज करना था। उन्होंने बाईस अप्रैल को मुझसे कहा कि आपके घर से कौन आया हुआ है? जब मैंने कहा कि यहाँ तो कोई नहीं है तो उन्होंने संकेत दिया कि किसी को तुरंत बुला लो। मैं थोड़ा हैरान तो हुआ। अचानक मेरे दिमाग में कौंधा कि शायद मृत्यु के बाद शरीर किसके सुपुर्द किया जाएगा, इसके लिए किसी को घर से बुला लेने के लिए कहा जा रहा है। मैंने अपने छोटे भाई डॉ. विजय कुमार को फोन किया, जो उस समय दिल्ली एयरपोर्ट पर था। उसकी न्यूयाॅर्क के लिए फ्लाइट थी। वह अपनी फ्लाइट कैंसिल करवाकर तुरंत पंचकूला पहुँच गया। उसने अस्पताल के पास के एक होटल में ठिकाना जमा लिया। अंदर आने की अनुमति नहीं थी। मेरी हालत सचमुच ही गंभीर रही होगी। श्रीमतीजी पहले ही धर्मशाला से कुलपति आवास को खाली करके मोहाली आ गई थीं। मुझे बाद में पता चला कि उनको और उनके दस दशक पार कर चुकीं माताजी को भी कोरोना ने छू लिया था। छू लिया इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि वे काढ़े और पैरासीटामोल से ठीक हो गई थीं। परंतु मेरा उससे संपर्क नहीं था। अस्पताल में मैं बाहरी संसार से कट गया था। थोड़ा बहुत टेलीफोन के माध्यम से जुड़ने की सफल असफल कोशिश करता था, लेकिन टेलीफोन का प्रयोग न किया जाए, इसको लेकर अस्पताल के कर्मचारी जरूरत से ज्यादा चौकन्ना थे। तेईस और चौबीस को शायद डॉक्टर ने कयामत के दिन घोषित कर दिया था। यह मुझे तो नहीं बताया, लेकिन पल-प्रति-पल मेरे स्वास्थ्य का ध्यान रख रहे मित्रों को अवश्य बता दिया। हरजीत सिंह ग्रेवाल ने किसी तरह डॉक्टर को मना लिया कि एक बार अंदर जाकर देख तो लेने दो। ग्रेवालजी आए। मैं बोल तो नहीं सकता था, क्योंकि चेहरे पर बहुत सख्त ऑक्सीजन  मास्क लगा हुआ था। इतना सख्त कि कंबख्त ने मेरा नाक ही पिचका दी। अब ताउम्र इस पिचकी नाक को लेकर ही घूमना पड़ेगा। फिर भी भगवान् का शुक्रगुजार हूँ। लोगों की तो नाक ही कट जाती है। मेरा तो केवल पिचका ही था। डॉ. किस्मत कुमारजी ने तो सभी मित्रों को रामचरितमानस के सुंदुर कांड का पाठ करने का आदेश जारी कर दिया।

लेकिन मुझे शारीरिक तौर पर उसका अहसास नहीं था। मानसिक रूप से तो प्रश्न ही नहीं था। मेरा शरीर कोरोना से कितना लड़ रहा था, यह तो डॉक्टर जानते होंगे, लेकिन मेरा मन निश्चय ही कोरोना पर भारी पड़ रहा था। परंतु एक नया अनुभव भी हुआ। समय और स्थान का भाव और अहसास तिरोहित होने लगा था। दिन और रात का अंतर भी समाप्त होने लगा था। जैसे ही मैं आँखें बंद करता, चाहे दिन हो या रात, वे सभी सगे-संबंधी, जो संसार छोड़कर जा चुके हैं, आने लगते। मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता था कि वे इस संसार से जा चुके हैं। हम पाँच भाई और दो बहनें हैं। भाइयों में मैं सबसे बड़ा हूँ। मुझ से छोटा भाई बृजमोहन तीन साल पहले पूरा हो गया था। किसी के स्वर्गवास होने पर कहा जाता है कि वह पूरा हो गया है। जब तक आदमी जिंदा है तो वह अधूरा है। मृत्यु पर ही वह पूरा होता है। दर्शन की बहुत बड़ी बात इन दो साधारण शब्दों में छिपी है। बृजमोहन आकर मेरे पास बैठ जाता है। पूछता है, क्या हुआ, अस्पताल में क्यों आए हो? मैं कोरोना के बारे में बताता हूँ। वह मुझे कहता है, कुछ नहीं होगा, चिंता मत करो। मैं खुद सँभाल लूँगा। बाऊजी (पिताजी) आते हैं। यहाँ तक कि नानी जानकी देवी, जिनकी मृत्यु तब हुई थी, जब मैं पाँचवीं-छठी में पढ़ता था, आकर सिर पर हाथ फेरती हैं। मेरे ससुर भी आ गए। आश्चर्य से मुझे देखते हैं। न जाने कितने संबंधी देवलोक से इस मृत्यु लोक में मुझे देखने आए। मृत्यु लोक में रहने वाले कोरोना के मरीजों से नहीं मिल सकते, देवलोक से आने वालों पर कोई पाबंदी नहीं है। मैं आँखें बंद करता हूँ। सामने दिल्ली का चाँदनी चौक दिखाई देने लगता है। भाई मतिदास, भाई सतिदास, भाई दिआलाजी खड़े हैं। लोहे के पिंजरे में श्री गुरु तेग बहादुरजी हैं। किसी को आरे से चीरा जा रहा है, किसी को खौलते पानी में उबाला जा रहा है, किसी को रुई में लपेटकर जलाया जा रहा है। जल्लाद तलवार लेकर गुरुजी की ओर झपटता है। मेरी आँख खुल जाती है। वैसे तो बंद ही कब हुई थी। लगता है, खुली आँख और बंद आँख का भेद भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगा है। सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया है। नित्य कर्म अनित्य हो गए हैं। चौबीसों घंटे लेटा रहता हूँ। दाएँ-बाएँ करवट लेकर लेट नहीं सकता। लगातार चारपाई पर सीधे लेटे रहना कितना कष्टकारी हो सकता है, यह पहली बार पता चला। और ऊपर से भैंसे पर सवार यमराज की गंध अनुभव की जा सकती हो।

लगा मेरा व्यक्तित्व भी विभाजित हो गया हो। जैसे मैं दो हिस्सों में बँट गया हूँ। एक कुलदीप वह, जिस पर कोरोना ने कब्जा कर लिया था और दूसरा कुलदीप वह, जो कोरोना वाले कुलदीप को ललकार रहा हो। एक मानसिक कुलदीप, दूसरा शारीरिक कुलदीप। मैं जैसे ही आँख बंद करता, यह मल्ल युद्ध मुझे स्पष्ट दिखाई देने लगता। जब कोई दवाई लेता तो मानों मेरा मुँह भी दो हिस्सों में बँट जाता। दवाई का एक हिस्सा पहले कुलदीप के पास चला जाता और दूसरा हिस्सा दूसरे कुलदीप के पास। लेकिन न जाने क्यों मुझे इस बात का पक्का यकीन हो गया था कि कोरोना से लड़ रहा कुलदीप कोरोना के पक्षधर कुलदीप को हर हालत में पराजित करेगा। डॉक्टर आकर पूछता है, कैसा अनुभव कर रहे हो? बिल्कुल नाॅर्मल हूँ। ऑक्सीजन  तो लगी हुई थी। इसलिए साँस की तकलीफ भला कैसे हो सकती थी? बाद में पता चला, डॉ. बी.के. कुठयालाजी भी इसी अस्पताल में भरती थे। वे कुछ दिनों में ही ठीक होकर चले गए थे। मुझे देखने भी आए थे, लेकिन उनका कहना है कि मैं सो रहा था। उधर बंगाल विधानसभा के नतीजे आने शुरू हो गए। अस्पताल में टेलीविजन तो हो नहीं सकता था। मैं बार-बार संजय सिंह को मैसेज कर रहा था, लेटेस्ट परिणाम भेजो। कुछ लोग, बचेंगे या नहीं बचेंगे, इस महत्त्व पूर्ण प्रश्न को हल करने में लगा हो रहे थे, मैं बंगाल के चुनाव परिणामों का विश्लेषण करने में मशगूल था। शुभेंदु अधिकारी ने ममता को हरा दिया है। असम में भाजपा की सरकार फिर से बन गई है। मैंने शुरू में ही स्पष्ट कर दिया था कि मेरी प्राथमिकता कोरोना नहीं थी। यही कारण था कि ग्यारह मई को कोरोना की निगेटिव रिपोर्ट आई। कोरोना भी शायद समझ गया था कि जब यह आदमी मुझे भाव नहीं देता तो मैं इसको ज्यादा भाव क्यों दूँ? मुझे लगा, मैंने लड़ाई जीत ली है। लेकिन इस जीत ने मेरे शरीर को खोखला कर दिया था। इसीलिए जब मैंने अपनी इस जीत की प्रसन्नता डॉक्टर से जाहिर की तो उसने कहा, शरीर के सभी अवयवों को पटरी पर लाने के लिए कुछ और समय लगेगा। कोरोना से मुक्ति के बाद आॅफ्टर कोरोना कंपलीकेशंज और भी खतरनाक होती हैं। इसका अहसास मुझे तभी हो गया था, जब मेरे लिए अपने बलबूते चार कदम चल पाना भी मुश्किल हो गया। परंतु अपने यहाँ तो कहा ही गया है, शनैर्पन्था। धीरे-धीरे ही चलना चाहिए। परंतु मृत्यु से हुए इस साक्षात्कार ने जीवन के अनेक पक्षों को एक साथ समझने-बूझने का अवसर अवश्य प्रदान कर दिया।

कुलपति
हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय
धर्मशाला-१७६२१५ (हि.प्र.)
दूरभाष : ९४१८१७७७७

मई 2022

   IS ANK MEN

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April 2022