बच्चा

हवेली की किसी मंजिल से गिरकर बच्चा सीधे दालान के बीचोंबीच आ गिरा था। जब तक लोग देखें, तब तक उसके मुँह से निकले खून की धारियाँ इधर-उधर बहने लग गई थीं। असहाय और गिरने के आघात से बेहोश बच्चे का सिर एक तरफ लुढ़क गया था। कोई दौड़कर आया था और उसने सिर्फ बच्चे का मुँह कपड़े से ढँक दिया था।

धमाके को सुनकर लोग अंदाजा ही नहीं लगा पाए; क्या हुआ? लेकिन बहते खून और बच्चे को उलटा पड़ा देख जल्दी ही भीड़ जमा हो गई।

जिसने भी सुना, वह उसी ओर भागा आया। हवेली की हर मंजिल के हर दरवाजे से दौड़कर आती औरतों का हजूम पल-भर में ही जैसे बच्चे के चारों ओर जमा हो गया था। सिसकती, चीखती औरतों की आवाजों के बीच कुछ भी सुनाई नहीं पड़ रहा था।

औरतों को देखकर घर, पड़ोस के जो थोड़े मर्द वहाँ इकट्ठे हो गए थे, वे जल्दी ही वहाँ से हट गए थे। हट ही नहीं गए थे, बल्कि जैसे कहीं गुम हो गए थे और रात के पहले पहर तक अपनी ही दुनिया में अकेली रहनेवाली उन औरतों को हवेली के हर घर का रहस्य मालूम था। यही काम था, जिसे वे दिनभर करती थीं। घर के मर्द लोग व्यापार या दुकानों की नौकरियों के लिए सुबह निकल जाते तो रात को सिर्फ सोने के लिए ही घर लौटते।

आज की घटना में जो दो-एक मर्द वहाँ पहले दिखाई दे रहे थे, वे बीमार या बेकार लोग थे और औरतों के सामने से हट जाने का शिष्टाचार निभाना उनके लिए बहुत जरूरी था।

थोड़ी ही देर में दालान भर गया था। औरतें बैठ गई थीं और विलाप करने लग गई थीं। वह एक सामूहिक संकीर्तन जैसी स्थिति थी। कुछेक औरतें अपनी गोद में छोटे बच्चे भी लिटाए हुई थीं।

कितनी देर वे लोग सामूहिक विलाप में डूबी रही होंगी, इसका तो कोई विवरण इस कहानी में जुटाना मुश्किल है, परंतु इतना जरूर था कि वह दुर्घटना दोपहर के करीब हुई थी, जब सब औरतें अपना चौका-बरतन समेटकर अपनी निंदा-गोष्ठी में बैठ जाती थीं। अब यह जैसे उठने का समय था। उठने के समय का कोई यंत्रचालित एहसास था कि तब लयबद्ध उस विलाप में अचानक विराम पड़ा।

“किसको छोरो?” किसी औरत ने सवाल किया।

“पता नहीं किसका बच्चा है?” दूसरी ने उत्तर दिया।

“नेकर तो नानकचंद जैसी लगती है।”

“ना री, मेरा बच्चा तो यह रहा,” लंबी सी एक औरत ने अपने बच्चे का सिर सहलाते हुए कहा, जो उसके पास ही बैठा था।

इतनी देर बाद उन औरतों को खयाल आया कि बच्चा किसका है। घंटों विलाप करने के बाद और एकलय वहाँ बैठे रहने के बाद अचानक उनमें खलबली मच गई। हर कोई अपने बच्चे की तलाश में निकल पड़ी। कुछ जिनके बच्चे बड़े-बड़े थे और शहर में नहीं थे या बाँझ औरतें अभी वहाँ बैठी हुई थीं। बच्चे के बिल्कुल पास बैठी औरतें हालाँकि अभी भी सिसक रही थीं, लेकिन झुंड-की-झुंड औरतों को उठते-बैठते देखकर वे सिसकियों के बीच कुनमुनाकर पड़ोसिन से कुछ पूछ भी लेती थीं।

दनादन अपने बच्चों को लेकर हवेली की औरतें फिर दालान में लौट आईं और एक-दूसरे को अपना बच्चा दिखाकर तसल्ली से फिर बैठ गईं और रोने का उपक्रम करने लगीं।

“अब तो यह मर गया होगा?” एक खड़ी औरत ने जैसे सबको संबोधित करते हुए कहा।

और मरने की यह बात सुनते ही बैठी हुई भीड़ में जैसे हलचल हुई और रोने का काम फिर शुरू हो गया।

“मामचंद के पिता आज जल्दी आएँगे। मैं घर चलूँ और रात का खाना तैयार करूँ।” अपनी पड़ोसिन को सुनाती हुई ठिगने कद की एक औरत उठी और हवेली में अपने घर की ओर चल दी। देखादेखी दो-तीन औरतें दूसरों को सुना कुछ कहती हुई उठने लगीं कि तभी हवेली के दरवाजे से गठे हुए जिस्म की एक अधेड़ औरत अंदर आई और जोरों से दहाड़ मारकर रोने लगी।

“अरी, मैं जरा बाजार क्या गई थी कि मेरा नाथमल गिर पड़ा।”

और वह बैठी औरतों को धकियाती हुई बीच में उस जगह पहुँचने की कोशिश करने लगी, जहाँ मरा हुआ बच्चा पड़ा था।

“तेरा नाथमल तो भई पंद्रह साल का है,” एक औरत खड़ी होकर बोली। बोलते हुए उसने घूँघट उठा लिया तो देखा कि वह साठ साल की झुर्रियों-भरे चेहरे वाली औरत थी। “यो बच्चा तो छह-सात साल का लगे है।”

नाथमल की माँ बीच में ही रुक पड़ी। उसका घूँघट सिर की तरफ खिसक आया था। उसके चेहरे से लगता था जैसे उसे कोई आकस्मिक सी चीज मिली है। और धम्म से जमीन पर बैठ गई।

“आपने तो मेरी जान बचा ली सासूजी, वरना मैं तो मर ही गई थी।” उसने बूढ़ी औरत को संबोधित किया, जो अपना घूँघट पूरी तरह चेहरे के नीचे तक झुलाने की कोशिश कर रही थी।

अब रुदन रुका हुआ था और हर दूसरे कान में कोई कुछ-न-कुछ फुसफुसा रहा था।

“धनमल की औरत तो न आई होगी यहाँ?” एक चपल सी आवाज ने पूछा। “उसका तो भाई बच्चा नहीं है न।”

“तो क्या हुआ, मातम मनाने न आ सकती थी क्या?”

“ना पता चला होगा।”

“बस-री-बस। अरी चली गई होगी अपने ‘यार’ के साथ।” ‘यार’ शब्द इस फुसफुसाहट में कहा गया था कि वह चारों ओर फैल गया था। लगा जैसे घूँघटों के भीतर के चेहरे हँसी में दमक आए हों। फिर रोना रुका रहा। कामकाजी औरतें किसी-न-किसी बहाने से खिसकती रहीं। जिन औरतों को खबर बाद में मिली थी वे रोती हुई भीड़ की उस बैठक में घुसतीं और फिर तसल्ली की साँस लेकर वहाँ की बातचीत में शामिल हो जातीं।

अब वहाँ सिर्फ यही समस्या थी कि बच्चा किसका है?

“च-च-च, बड़ा बुरा हुआ।” अनेक औरतों ने यह वाक्य दुहराया, पर किसी ने जानने की कोशिश में लड़के के मुँह का कपड़ा नहीं हटाया कि उसकी शक्ल क्या है और वह किसका बच्चा है। डॉक्टर को बुलाने या उसे उठाकर कहीं छाया में रखने की सूझ जैसे हवेली की उन असंख्य औरतों में आई ही नहीं।

“मुझे तो भाई उन्होंने तीन तोले का बाजूबंद बनवा दिया है।”

“सोना तो बड़ा महँगा है न?”

औरतों में फिर वे ही बातें चल पड़ीं, जो उनकी दिन-दोपहर की गप्प-गोष्ठियों में होती थीं।

“लो आ गई मास्टर परेश की बीवी,” तो लोगों की आँखें एकदम मुख्य दरवाजे की ओर जा लगीं। हाथ का पर्स हिलाती घूँघटविहीन एक औरत दरवाजे से दाखिल हो रही थी। सारी हवेली में वही एक महिला थी, जो घूँघट नहीं निकालती थी और उसके बारे में ज्यादातर औरतें आपस में जो बातचीत करती थीं, उसका सार इतना ही था कि “न रूप, न रंग, खुले मुँह भी चले तो क्या।”

“क्या हुआ?” मास्टर परेश की श्रीमती ने मुँह से कुछ नहीं कहा, लेकिन सिर्फ अपनी मुद्रा से जाहिर किया।

“ऊपर से गिरकर किसी का बच्चा मर गया।”

“किसका बच्चा?” श्रीमती परेश ने पूछा।

“यही तो घंटों से पता नहीं चल रहा!”

“मर गया बेचारा!” और मरने का जिक्र आते ही जैसे औरतों के आँसू पिघल आए। मंद गति से मातम चालू हो गया था।

श्रीमती परेश धड़धड़ाती हुई ठीक बीच में पहुँची और लेटे बच्चे को देख बोली, “मेरा अंदाज है कि यह सबरी धोबिन का लड़का है।”

धोबिन का लड़ाक...भीड़ में सन्नाटा छा गया। औरतें हड़बड़ाहट में उठने लग गईं।

“बेचारा मर गया,” श्रीमती परेश के कहने पर भी कोई औरत रोने और मातम के लिए नहीं रुकी।

कुलीन और श्रीमंत किस्म की औरतें जैसे घूँघट के बीच ही नाक-भौंह सिकोड़ रही थीं। धोबिन के बच्चे के लिए वे नहीं रुक सकती थीं। उसे छूने का तो सवाल ही नहीं उठता था।

धीरे-धीरे दालान खाली हो गया। खून की धारियाँ सूख गई थीं और वहाँ मक्खियाँ मँडरा रही थीं।

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