बशीरा

वह गाँव का अंतिम छोर। खाली चौड़ी जगह। जिसके बीचो-बीच विशाल बरगद का छायादार पेड़। विशाल भुजाओं को सँवारे। उसके मोटे तने को घेरे, जमीन से उठा था एक छोटा सा चबूतरा। इसी चबूतरे पर मोहल्ले भर के लोगों का जमघट लगा रहता। यहीं देश दुनिया और गाँव भर की बातों का सिलसिला चलता। वहीं बगल में गाँव की बड़ी पोखर। जिसमें धोबी पाड़ा के धोबी कपड़े धोते। पशु पानी पीते। उस बरगद के आश्रय में कुछ झोंपड़‌ियाँ भी थीं। बेतरतीब और बेपरवाह सी। एक दूसरे से जुड़ी हुई, लेकिन कुछ खफा सी। ये आठ-दस झोंपड़ी वाले कच्चे मकान थे। गाँव का यह छोटा सा कोना सक्का जाति के लोगों का आवास था।

जिनमें उन गरीब मजदूरों का अपना-अपना कुनवा मेहनत-मजदूरी करके अपना भरण-पोषण करता। खेती तो थी नहीं। बस इन्हीं टूटे-फूटे मकानों के अलावा कुछ गायें एवं बकरियाँ ही इनकी दौलत थीं। और इसी दौलत द्वारा कभी-कभी एक दूसरे के घर में छोटा सा नुकसान कर देने पर सुबह से ही इस मोहल्ले में हो-हल्ला शुरू हो जाता। और गाँव का यह कोना उस हो-हल्ला से तब तक गुंजायमान रहता, जब तक कि वहाँ के आदमी व औरतें मजदूरी पर और बच्चे बकरियों व गायों को चराने न ले जाते। उन मजदूरों का यही काम था।

लेकिन इन सबसे अलग था ‘बशीरा’। अँधेरे से भरी एक कोठरी, उसके आगे टूटा हुआ छप्पर और उसके एक कोने में पड़ी खाट का वह मालिक था। बदरंग सा कंबल, दरी, लिहाफ और पुराना फटा गद्दे ही उसकी कुल जमापूँजी थी। उसकी दौलत खुले में पड़ी थी। उसकी कोठरी को हमने कभी भी खुला हुआ नहीं देखा। और न कभी दीपक की रोशनाई उस आलय से फूटती देखी। सिर्फ देखा तो अंधकार, बस अंधकार। बस इसी अंधकार का मालिक था बशीरा।

बशीरा की उम्र करीब पचपन-साठ होगी। पतले-लंबे और गोरे मुँह पर काले भूरे अनसुलझे बाल, जिन्हें देखकर लगता था कि उनका कभी कंघी से सामना ही नहीं हुआ होगा। झुर्रियों पतले भरे माथे के तले छोटी-छोटी भौंहों के नीचे भूरी बरोनियों से सजी हलकी काली-भूरी आँखें, जिनमें अनंत गहराई तक शांति-ही-शांति पसरी रहती। गालों के सपाट तट पर छितरी हुई बुढ़ापे का परिचय कराती खामोश सलवटें। और उन सलवटों के बीच उभरी पतली नाक, जिसके अंतिम छोर पर अतिव्यापक हुए नकुए किसी छोटी गुफा का अहसास कराते। इसी गुफानुमा नाक के नीचे लालिमा के आवरण को खो चुके पतले होंठों से दो पंक्तियाँ बनती नजर आतीं। लेकिन होंठों पर पसरी सूखी वीरान सी खामोशी, उस चेहरे की पुस्तक के पृष्ठ का कोरापन प्रकट कर देती।

कभी-कभी बशीरा के होंठों से कुछ शब्द ऐसे छिटकते, जैसे मटर की सूखी फलियाँ चटककर दानों को लुटा देती हैं। और लूटने वाले उन बिखरे शब्दों को लूटकर बशीरा से हँसी-मजाक करते। लेकिन बशीरा था कि कानों के पट बंद कर बुत बना बैठा रहता।

ईद या किसी अन्य शुभ अवसर पर बने गाढ़े कत्थई भूरे रंग के कुरते-पायजामे और एक धारियों वाली हरी पीली स्वाफी को कंधे पर डाले, पाँवों में प्लास्टिक के जूते पहने कंधों को झुकाए ही अकसर मैंने उसे देखा था। चलते समय उसकी निगाहों से ज्यादा उसके कदम रास्ते को खोजते थे। सर्दियों में किसी काश्तकार द्वारा दी गई गरम जर्सी पहने और हाथ के बने गरम मोटे लिहाफ को वह सिर पर पगड़ीनुमा बाँधकर जब दिखाई देता तो ऐसा लगता, जाने कितना बोझा बशीरा ने अपने सिर पर बाँधा है।

यों तो बशीरा के सिर पर कुछ भी वजन नहीं था। न घर-गृहस्थी का, न खेती-क्यारी, न ढोर-पशुओं का। पत्नी थी नहीं। शादी के कुछ वर्ष पश्चात् वह घर-गाँव छोड़कर दो बेटों को लेकर शहर चली गई थी। कहते हैं बशीरा ने उन्हें काफी रोका था, लेकिन वह गाँव की जिंदगी को बदतर मानती थी। उसके अरमान ऊँचे थे। वह नहीं रुकी। वह चली गई थी बशीरा को अकेला छोड़कर। बस उसी दिन वह बशीरा के जीवन का सारा रंग, सारी उमंग भी ले गई थी। तब से बशीरा के मन में एक अंधकार भर गया था और उसी अंधकार में मानो बहुत दूर कुछ ढूँढ़ने की अभिलाषा रहती थी उसकी।

वह मुरझा गया था। उसकी दृष्टि, वाणी और हाथ-पाँवों में शिथिलता बस गई थी। वह कभी-कभार काम-धंधा करता था। उसे देखकर लगता था कि वह मन का राजा था या राजा का मन था उसका। किसी के रोकने से रुकता नहीं था। किसी के कहने से करता नहीं था। न मस्ती का मालिक था और नहीं किसी दीवानगी का अंदाज था उसका। हाँ, कई बार उसको देखकर लगता था, जैसे कि उसका कुछ खो गया है। और वह उसे ढूँढ़ने में लगा है किसी संत की तरह। उसने अपना हाल कभी किसी को बताया नहीं, लेकिन मालूम तो सभी को था। जीवन का सबकुछ तो उसके हाथों से कब का फिसल चुका था। लेकिन बशीरा ने तो उस फिसले हुए को कभी उठाना नहीं चाहा। या यह लगता था कि बशीरा कभी उस स्थिति से उठ नहीं पाया।

बशीरा का जीवन जैसा था, वैसी ही उसकी दिनचर्या थी। कब जागा, कब सोया, कब कहाँ खाया यह तो शायद उसे भी पता नहीं होता था। बशीरा को कहीं भी कोई भी बैठा लेता, चाय, रोटी, सब्जी या जो कुछ बन पड़ता, कोई उसे खिला देता। और बशीरा बिना कुछ बोले, बिना किसी आशीर्वाद दिए उस भोजन को खत्म कर एक फकीर की तरह आगे बढ़ जाता। कई बार ताऊजी ने उसे अपने खाने में से खाना खिलाया था। उसे गुड़ बहुत पसंद था। ताऊजी उसे गुड़ जरूर देते थे। वह गुड़ की मिठास का खाने के अंत तक आनंद लेता था। उसे देखकर मुझे लगता था कि बशीरा को मिठास की आस है। और वैसे भी मीठे पल को कौन पाना न चाहेगा। हरेक मन हर पल एक मीठास की आस रखता है। और शायद ऐसी ही कोई आस बशीरा के मन के किसी कोने में पल रही होगी।

और यह आस खत्म हुई करीब पच्चीस वर्ष पश्चात्। उस दिन मोहल्ले में रौनक थी। जैसे बे-समय ही दीवाली आ गई हो सभी के घरों में। खास तौर पर बशीरा के उस टूटे-फूटे आश्रय पर। जाने कितने वर्षों बाद आज बशीरा की उस कोठरी के आगे लिपाई हो रही थी। सुबह-सुबह बकरियों को एक पुराने बाड़े में बाँध दिया गया था। बरगद के नीचे खुली जगह पर सुबह से ही पानी का छिड़काव किया जा रहा था। उस छोटे चबूतरे पर कुछ ठीकठाक खाट व पलंग डाल दिए गए थे। अपनी चमक न्योछावर करती एक-दो कोरी चादरें और टूटे-फूटे नाम के तकिए भी उस पलंग की शोभा बढ़ा रहे थे।

ऐसा लगता था, जैसे किसी का शादी समारोह है। अड़ोसी-पड़ोसी में यह नजारा आपसी चर्चा का विषय बन गया था। कुछ देर बाद बात तीर की तरह निकलकर आई। बशीरा का भाई सुल्तान बता रहा था, “आज बशीरा ते मिलिबै याकी घरवारी अरु बालक आय रहे हैं। बालक तो अब बड़े आदमी है गए हैं। गाड़ी-घोड़ा, मकानहू ले लीन्हे हैं। भैया! अच्छी नांय लगे। कैसेहू देखनी तो पड़ेगौ ही। घर कौ मामलो है।”

लेकिन इन सब से अलग बशीरा पर कोई चमक नहीं थी। उसके मन में किसी प्रकार का कोई उल्लास या कोई उमंग नजर नहीं आई। लगता था या तो वह जीवन के रंगों की पहचान भूल गया है। या शायद उसके मन में ही कोई खुशी का सागर उछालें ले रहा है, जिसे वह बाहर निकालना ही नहीं चाहता। हाँ, आज उसको नया कुरता-पायजामा पहनने को जरूर मिल गया था। लेकिन जूते उसके वही थे खस्ताहाल। जहाँ सभी की आँखों में इंतजार था, वही बशीरा की आँखें शांति का दृश्य छिपाए थीं।

इंतजार की घड़ियाँ खत्म हो गईं। कुछ समय बाद सफेद दूधिया चमचमाती कार उस खाली स्थान पर आकर रुकी। बच्चों का हो-हल्ला उमड़ पड़ा। घरों के दरवाजों पर औरतें और युवतियों के घूँघट से नेत्र उस नजारे को लूटने आ खड़े हुए। हर नजर उस गाड़ी पर टिकी थी। कैसे हैं बशीरा के साहबजादे। कैसी है बशीरा की वह समझदार घरवाली!

गाड़ी का दरवाजा खुला। उसमें से दो गोरे-चिट्टे युवा उतरे। वे शक्ल-सूरत से किसी अफसर से कम नहीं लग रहे थे। साथ में चमचमाते सलवार-कुरते में बुजुर्ग महिला भी उनके साथ थी। उन्होंने गाँव के इस अल्हड़ माहौल पर ज्यादा गौर नहीं किया। वे अनजान फिजाँ में अपनेपन की खुशबू ढूँढ़ने आए थे। न किसी से राम-राम न किसी से दुआ सलाम। गाँव की सभ्यता के सामने आज एक शहरी सभ्यता उतरी थी। दो नदियों की धाराओं का मिलन था। जहाँ सुल्तान, उसके पत्नी-बच्चे उन मेहमानों से लिपट पड़े। गले मिलने और हँसी-मजाक के साथ स्वागत करने लगे, वहीं उस शहरी सभ्यता ने हल्की हँसी के साथ एक शिष्ट अभिवादन किया। लेकिन वहाँ तो लूट मची थी खुशियों की। भतीजों ने चाचा-चाची व भाइयों के गले लगकर इस खुशी को दुगुना बढ़ा दिया था। गाँव वाले भी अनजानी खुशी पर उल्लसित थे। इस गरमी में हवा भी ठंडी बहने लगी थी। बरगद की पत्तियाँ भी खनक उठी थीं। हर ओर खुशी का आलम था।

लेकिन इस खुशी से परे था तो केवल ‘बशीरा’। उसके चेहरे पर अब भी वही बुझापन था, एक सुप्त दीपक सा। वह इस स्नेह-मिलन का दर्शक मात्र था। तब एक शीतल मंद बयार इस खुशी में उसे समेटना चाहती थी, लेकिन वह था कि उसे पकड़ना तो क्या, छूना भी नहीं चाहता था। लगता था, वह उस हवा से काफी दूर जा चुका है।

उस दिन सुबह का सूरज उमंग-उल्लास से भरा था। तभी तो मोहल्ले भर में धूम मची थी। सेवइयाँ और पकवानों से उन खास मेहमानों का स्वागत हुआ। गाँव के लोगों ने भी उत्सव में साझा किया। बशीरा के बेटों का पूरा साक्षात्कार हुआ। इतने वर्षों तक कहाँ रहे? क्या किया? अब कैसे आने का प्रयोजन हुआ? तब पता चला कि बेटे अपने बाप को ले जाने के लिए आए हैं।

गाँव वालों ने बेटों से काफी जानकारी ली। बेटों में भी वही अदा थी, जो माँ में थी। उन्हें अपनी कामयाबी और धन पर गुमान था। तभी तो बेटों ने गाँव और बिरादरी के सामने ऊँची बातों में कह दिया था, “यहाँ तो नरक का जीवन है, चाचा को इसीलिए लिवाने आए हैं।”

इस बात पर सभी कुछ एक दम ठहर सा गया। हँसी-खुशी के उफान पर शांति की चादर आ गिरी। सभी के मुँह पर ताले से लग गए। कोई उनका क्या जवाब देता। परिवार के मामले में कोई कैसे बोलता?

लेकिन तभी हाथ-पैरों में तीव्रता बढ़ाते हुए चबूतरे से उठकर शांत बैठा बशीरा उन सभी के बीच में आ खड़ा हुआ। टूटी, कँपकँपाती और लड़खड़ाती आवाज में वह चिल्ला उठा, “मैं कहूँ नाँय जाऊँगौ। मैं कहूँ नाँय जाऊँगौ। मैं यही पे रहूँगौ। मेरो जेई घर है। जेई है जेई है। मैं कहूँ नाँय जाऊँगौ।”

बशीरा के चेहरे पर उस समय उग्रता मिश्रित भय फैला था। उसकी आँखें फटी हुई थीं। बोलते हुए मुँह से लार गिर पड़ी थी। उसने गले में पड़ी स्वाफी को कसकर पकड़ लिया था और उसके पाँवों में कंपन दिखाई दे रहा था। वह इतना कहकर वहाँ रुका नहीं, सीधा अपनी कोठरी में जा घुसा।

बशीरा की इन बातों ने उस आँगन में उतरी उल्लास भरी रंगोली पर मानो राख डाल दी हो। बेटे और बीबी के मन के पंखों को उसने एक झटके में काट दिया था। सब वहीं का वहीं रह गया। सारे अरमान चढ़ी धूप की तरह शाम ढलते-ढलते ढल गए। शाम को गाड़ी और गाड़ीवाले हारे पहलवान की तरह चले गए। सुबह की रंगत शाम के चूल्हों में सुलगकर धुआँ बनकर हवा में जा मिली। बशीरा की कोठरी पुन: अपने अंधकार को सहेज और समेटकर बंद हो गई। और उसके बाद बशीरा पुन: सुप्त हो गया।

वह आज भी अनंत में विस्फरित आँखों से कुछ ढूँढ़ता है। कुछ पाने की लालसा रखता है। टकटकी लगाए जाने कितने समय तक कुछ अनुभव करता है। उसे देखकर लगता है, दूर विजन में कोई उससे बातें करता है। मैं कई बार उससे पूछना चाहता था, लेकिन सब जानते हुए पुन: चुप हो जाता था, क्योंकि मैं जानता था और आज भी जानता हूँ कि बशीरा का जवाब सिर्फ और सिर्फ खामोशी है, कुछ और नहीं।

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