साहित्य में विविध रूपा लक्ष्मी

साहित्य में विविध रूपा लक्ष्मी

प्राचीन साहित्य में लक्ष्मी के संबंध में जो सामग्री प्राप्त होती है, उनमें उस काल की लक्ष्मी के स्वरूप का परिचय मिलता है, परंतु विस्तृत जानकारी प्राप्त नहीं होती। हमारे महाकाव्यों—रामायण और महाभारत में जो देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ प्राप्त होती हैं, उनमें लक्ष्मी के स्वरूप का वर्णन मिलता है। विभिन्न साहित्य में लक्ष्मी के विविध स्वरूप हमारे समक्ष आते हैं।

महाभारत में कुबेर की स्त्री भद्रा तथा ऋद्धि मिलती है और लक्ष्मी से भी इनका संबंध मिलता है। बौद्ध ग्रंथों में लक्ष्मी मणिभद्र की पुत्री कही गई है और ‘सिरिका लक्ष्मी जातक’ में लक्ष्मी को धतरथ की पुत्री कहा गया है, जो हमें यक्ष के रूप में भारहुत में प्राप्त होते हैं। मणिभद्र भी एक यक्षराज है, जो कुबेर के पार्षद हैं। महाभारत में यक्षिणी के एक मंदिर का राजगृह में वर्णन प्राप्त होता है और माना जाता है कि यह मंदिर लक्ष्मी का रहा है।

श्रीसूक्त को छोड़कर वैदिक काल में ‘श्री’ शब्द प्रायः शोभा, कांति, ऐश्वर्य, संपदा आदि के रूप में प्रयुक्त हुआ है। सर्वप्रथम ‘शतपथ ब्राह्मण’ में श्री के स्वरूप का वर्णन मिलता है। ‘तैत्तिरीय उपनिषद्’ में भी श्री वस्त्र, भोजन एवं धन प्रदाता देवी के रूप में वर्णित है।

पौराणिक साहित्य में लक्ष्मी का विष्णु से अथवा नारायण से संबंध मिलता है। वैदिक लक्ष्मी अदिति का संबंध विष्णु से वेदों में मिलता है। यही सर्व प्रदाता सबकी माता कही गई है। पौराणिक साहित्य में रामायण तथा महाभारत में भी उनका स्वरूप स्पष्ट होता है। रामायण में ये कुबेर के पुष्पक विमान पर गजलक्ष्मी के रूप में हाथ में पद्म लिये हुए वर्णित है। महाभारत में लक्ष्मी को ‘श्रीपद्मा’ कहा गया है और यहाँ ये क्षीर सागर के मंथन से उत्पन्न हुई बताई गई हैं। साथ ही यहाँ लक्ष्मी को वैष्णवी भी कहा गया है।

बौद्ध ग्रंथों में लक्ष्मी पूजा का निषेध है, लेकिन इनके पंथ का वर्णन और पंथों के साथ ‘मिलिंद पन्ह’ में मिलता है। अन्य ग्रंथों में यह उल्लेख मिलता है कि लक्ष्मी की पूजा विशेष रूप से गृहस्थों के घरों में होती थी और आज भी यह परंपरा अनवरत रूप से चल रही है। साहित्य में गजलक्ष्मी का स्वरूप भी विविध प्रकार से वर्णित हुआ है। खड़ी लक्ष्मी का स्वरूप, बैठी लक्ष्मी का स्वरूप, कमल का पुष्प हाथ में लिये चार भुजाओं वाली लक्ष्मी का उल्लेख मिलता है। बैठी तथा खड़ी द्विभुज लक्ष्मी तथा गजलक्ष्मी का स्वरूप भारहुत, साँची, बोधगया आदि स्थानों पर मूर्तियों में मिलता है। हाथ में कमल लिये गजलक्ष्मी अत्यंत शुभ मानी जाने के कारण पद्महस्ता, पद्मस्थिता स्वरूपों में सिक्कों तथा मोहरों पर भी मिलती है।

लक्ष्मी का एक और स्वरूप, जो हमें मिलता है, वह दीप लक्ष्मी का है। यह स्वरूप आज भी बहुत प्रचलित है तथा दक्षिण भारत के प्रत्येक मंदिर में मिलता है। इस स्वरूप में एक स्त्री को ‘सर्वाभरणभूषित’ अर्थात् सुंदर वस्त्र पहने दिखाया जाता है। दीप लक्ष्मी के हाथ में प्रज्वलित दीप रहता है। इस प्रकार की मूर्ति गांधार काल में भी प्राप्त हुई है। इस प्रकार दीपलक्ष्मी के संबंध में ऐसा माना जाता है कि इनका यह स्वरूप भी प्राचीन था और आज भी बना हुआ है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि वैदिक निराकार ‘श्री’ तथा ‘लक्ष्मी’ को कालांतर में साकार रूप दिया गया। संभवतः प्रचलित आदिवासियों की माता यक्षिणी को अपनाकर उनको आर्य देवी लक्ष्मी का रूप दे दिया गया। आज दीपावली के दिन लक्ष्मी का गजलक्ष्मी, दीपलक्ष्मी के रूप में पूजन हर घर में बड़े हर्षोल्लास के साथ किया जाता है।

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