अपराधी

अपराधी

सोमा को आज सुबह से ही रह-रहकर दर्द उठ रहे थे। उसे पता था कि उसका दूसरा बच्चा बस पधारने ही वाला है। पर करती क्या? गरीब की जोरू ठहरी, घर के सारे कामकाज निपटाने में लगी थी। चार साल की बेटी अनु भरसक अपनी माँ के साथ लगी थी, उसे लगता कि क्या न कर दे वह अपनी अम्मा के लिए, परंतु इतनी छोटी बच्ची चुपचाप छोटे-छोटे काम, जैसे बरतन धो दिए; बाहर से छोटी बाल्टी पानी भर-भरकर माँ को पकड़ा रही थी। बंद-बंद सा घर, दो कोठरीनुमा कमरे में अमरीश का छोटा सा परिवार रहता था। सामने आँगन खुला था, उसमें नल और शौचालय था। दोनों ओर आँगन में ऊपर की नालियाँ बहती थीं, जिनमें एक दिन भी मेहतर न आए तो भयंकर बदबू उठने लगती। अनु ज्यों ही पानी लेने आँगन में निकली, ऊपर से ताई उमा ने आवाज लगाई, “अरी अनु! कहाँ मर गई?”

डबडबाई आँखों से अनु बोली, “ताईजी, पापा गए हैं दाई को बुलाने, अम्मा काम निबटा रही है।” तभी सोमा के जल्दी-जल्दी दर्द उठने लगे, वह होंठ दबाकर पलंग पर लेट गई। थोड़ी ही देर में उसके पति अमरीश दाई को लेकर पहुँचे। सोमा ने गरम पानी, तौलिया और पुरानी धोती का प्रबंध कर लिया था। आते ही दाई ने सबकुछ अपने कंट्रोल में किया और एक घंटे में बड़ी सुंदर राजकुमारी जैसी बच्ची को इस दुनिया में प्रवेश कराया। बोली, “सोमा, क्या खावै तू जो इतनी सोनी-सोनी लौंडियाँ पैदा करै।” प्रसव के दर्द से निजात पा सोमा भी क्षीण सी हँसी हँसकर बोली, “चाची, रूखी-सूखी खाऊँ मैं तो, भगवान् की जैसी मर्जी।”

दाई ने छोटी का नाम ‘सोनी’ रख दिया। सौ रुपए ले के बाहर निकलने को थी कि बोली, “यों तेरी डायन जेठानी तो बहुत खुश होगी। जानै तू पिछले तीन बार इसनै अपना गर्भ गिराया कि लौंडिया है। अब चौथी बार फिर पेट से है। मेरे कू ना बुलाती, अस्पताल जावै, ताकि लौडिया ना हो जा। वो डॉक्टरनी है न संतोष! वो फोटू निकाल कै बता दै के छोरा है के छोरी! बता क्या जमाना आ गया?”

दाई के जाते ही जेठानी छज्जे पै फिर नमूदार हुई, देवरजी को आवाज लगाकर पूछा, “देवरजी, क्या हुआ छोरा या छोरी?” अमरीश बोला, “छोरी हुई है।” उमा ताली मारके हँसी, बोली, “ले, तुझे तो छोरियों ने घेर लिया।” कहकर फिर गायब हो गई।

अमरीश ने क्षुब्ध मन से अंदर आकर जल्दी-जल्दी स्टोव पर दूध उबाला, उसमें हल्दी डालकर सोमा को पिलाया। आज फिर वह ५०० रुपए उधार लाया था। आटे का हलवा सोमा ने बनाकर रख दिया था, वह तीनों ने खा लिया। सोमा में कुछ जान आई। बोली, “अब मैं ठीक हूँ, शाम को खिचड़ी बना दूँगी।” अमरीश ने फटी धोती में लिपटी अपनी गुड़िया को हाथ में लिया तो निहाल हो गया, बोला, “मेरी गुदड़ी में तो लाल पैदा हो रहे हैं।”

बच्ची का मुख देखकर तीनों ही मुग्ध थे, अपनी गरीबी, मजबूरी, दुःख सब भूल गए। ताईजी अब तक नीचे नहीं आई। अमरीश और रमेश दोनों भाई ऊपर नीचे रहते थे। रमेश पैट्रोल पंप पर पेट्रोल डालता था और मालिकों से मिलकर मिलावटी पेट्रोल भरना, कम भरना इन सब तरकीबों में महारत हासिल कर चुका था। बेईमानी में उसको भी हिस्सा मिलता था।

उसकी पत्नी उमा कर्कशा थी और बद्जुबान भी। अमरीश प्राइमरी स्कूल में पढ़ाता था और उसका खर्च मुश्किल से ही चलता। कई बार रमेश ने समझाया कि स्कूल के बच्चों के लिए जो राशन आता है, उसे बेच दो या और कुछ नहीं तो वहाँ का दूध ही ले आया करो, कौन देखता है? परंतु अमरीश को बेईमानी का पैसा जहर लगता, वह अपनी छोटी सी तनख्वाह में काम चलाता, साथ ही उसे पढ़ने-लिखने का बहुत शौक था, यदाकदा लिख भी लेता था, जो पत्रिकाओं में छपता रहता।

रमेश को तीन पुत्र हुए, उमा फूली न समाती थी, घमंड से कहती, “मुझे छोरी हो ही न सकती,” पर लोग जानते थे कि वह चार बार लड़कियों वाला गर्भ गिरवा चुकी है, इसमें उसके मायके वाले बहुत मददगार साबित होते।

इधर बेईमानी का पाठ पढ़ते, माँ की बद्जुबानी सीखते तीनों पुत्र बड़े होने लगे। इधर अमरीश की दोनों बच्चियाँ सुसंस्कृत और संवेदनशील थीं। पढ़ाई में भी अव्वल रहतीं। अमरीश ने तंग आकर नीचे का मकान छोड़कर मुहल्ले में एक रूम-किचन का घर ले लिया, जहाँ वह सुकून से रह सके और बच्चों पर ताई का गलत असर न पड़े।

सब दिन होत न एक समान! अमरीश के दिन भी फिरने लगे। उसे एक कहानी प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार राशि २०,००० रुपए मिली, फिर तो उसकी कहानियाँ हाथोहाथ ली जाने लगीं। संकलन छपकर बेस्ट सेलर (Best seller) बन गए और मध्य प्रदेश के छोटे से कस्बे से वह भोपाल में अपने बँगले में आ गया।

सोनी और अनु दोनों पढ़ाई में अव्वल थीं ही, उनका शांत और सुंदर स्वभाव सभी को प्रभावित करता। कालांतर में अनु पी.सी.एस. में उत्तीर्ण होकर अपने ही कस्बे में डिप्टी कलक्टर होकर पहुँच गई। इस बीच अमरीश और रमेश का संपर्क लगभग टूट ही गया था। रमेश ने बेईमानी कर-करके अपना पेट्रोल पंप खोल लिया था और उसका मिलावटी धंधा जोरों से चल रहा था। अब तो उसके तीनों बेटे भी नई-नई तरकीबें निकालकर ग्राहकों को लूटने में लगे थे। कस्बे में उनकी गुंडागर्दी मशहूर थी।

एक बार बड़े बेटे सुमित की किसी ग्राहक से कहा-सुनी हो गई। ग्राहक ने उनके पेट्रोल का पीपा भरवाकर लैब में भेज दिया। वहाँ पर उसमें भारी मात्रा में मिलावट मिली, सो उसने शिकायत कर दी, सुमित गिरफ्तार हो गया। दूसरे बेटे रोहित ने गुस्से में आकर उस ग्राहक पर हमला कर दिया, जिससे उसे भी हवालात की हवा खानी पड़ी। तीसरा बेटा विजय डर के मारे भाग गया और पेट्रोल पंप पर ताला लग गया। रमेश और उमा के तो प्राण सूख गए, पुलिस बहुत भारी रकम की माँग कर रही थी। क्या करे, कैसे करे, कोई वसीला भी तो नहीं! तभी पड़ोसी अखबार लेकर आया, बोला, “ये अपने अमरीश की छोरी अनुप्रिया डिप्टी कलक्टर होकै आई है? मुझे तो वह ई लग रही है।” दोनों पति-पत्नी में मानो किसी ने प्राण फूँक दिए, “अरे, ये तो वही लग रही है।”

पर क्या मुँह लेकर जाएँ! उमा बोली, “अरे, सरम वगैरा छोड़ो, अपने परिवार के लिए इतना भी न करेगी क्या?”

“परिवार! अपना परिवार! जब ये पैदा हुई थी, तब कितना तिरस्कार किया था इनका! देखने नीचे तक नहीं गई थी, हाथ मैं धेला तक न रखा था, न ताऊ ने, न ताई ने।” पड़ोसी बोल उठा।

“अजी, तुम चुप रहो, सब घरों में फूटे भांडे हैं, इससे क्या खून का रिश्ता मिट जावै।” उमा दार्शनिक होकर बोल उठी। पड़ोसी मुँह बिचकाकर चला गया। वह तो इन्हें चिढ़ाने आया था और उसका काम हो गया।

दोनों मियाँ-बीबी अनुप्रिया के ऑफिस पहुँचे। चपरासी ने बाहर रोक लिया, रमेश बोले, “कहो, उनके ताऊ-ताई आए हैं मिलने, हमारी भतीजी है वो!”

चपरासी अविश्वास से उन्हें देखते हुए अंदर गया। थोड़ी देर में बाहर आकर बोला, “मैडम कह रही हैं कि उनके तो कोई ताऊ-ताई हैं ही नहीं। जाओ-जाओ बड़े अफसरों के रिश्तेदार रोज पैदा होते रहते हैं।”

अपना सा मुँह लेकर दोनों लौट आए। दो बेटे हवालात में, एक भगोड़ा, बिजनेस चौपट। आज उमा का सर घूम रहा था, चार कन्याओं का भ्रूण मानो अट्टहास कर रहा था, उसे अपनी हत्या का अपराधी करार कर सजा मुकर्रर कर रहा था। उसकी हालत भीष्म पितामह की तरह हो गई थी, जो तीरों की शैया पर पड़े मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे। आज उमा भी चार भ्रूण कन्याओं के शव पर लेटी सिसक रही थी कि कोई अर्जुन आए और उसे इस पीड़ा से मुक्ति दिलाए।

डी ३०३, आम्रपाली

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