शिकारपुर के खास लोग

शिकारपुर के खास लोग

सिर्फ शिकारपुर ही नहीं, हर शहर में कुछ खास व्यक्ति पाए जाते हैं, जैसे पुरुषों में महापुरुष या फिर बीमारियों में महामारी। इनकी ख्याति इनके पूरे क्षेत्र में शीर्ष पर है, जैसे कचरे की दुर्गंध मोहल्ले में। इधर एक नया चलन प्रचलित है। प्रशासन का हर दावा टी.वी., अखबार में किया जाता है। अशिक्षित के लिए छपे शब्द का उतना ही महत्त्व है, जितना शब्दज्ञानी के लिए दूरदर्शन का। देखने वाला इस दावे की सच्चाई जानने के लिए कार्य-स्थल पर तो जाने से रहा। किसी और देश की उपलब्धि टी.वी. पर दिखा दें तो देखने वाला प्रभावित हुए बिना कैसे रहेगा? अपने शहर की हर सड़क को तो जैसे बनने के दिन से चेचक हो गई है। एक बार मंत्रीजी ने घोषणा की थी कि शहर की हर सड़क गड्ढा-मुक्त होगी तो शायद वह ‘गड्ढायुक्त’ कह रहे थे और हमने गलत सुन लिया। यह भी मुमकिन है कि वह गलत बोल गए हों। कौन कहे अंट-शंट बकवास उनके धंधे की शर्त है? जो बेचारे ऐसा करने में असमर्थ हैं वह मंत्री क्या, राजनीति में टिके रहने में भी असमर्थ हैं। झूठ के ढोल-नगाड़े के आगे सच की पिपहरी की हैसियत ही क्या है? यह आज के युग की पहचान है।

इन खास में भी प्रमुख वह धनपति है, जो है तो अँगूठा-छाप, पर पैसा कमाने की कला का विशेषज्ञ भी है। उसके आगे कई मैनेजमेंट एक्सपर्ट सलाम ठोंकते हैं और अपने बाजार-ज्ञान पर शर्मिंदा हैं। उन्होंने डिग्री के दौरान पश्चिम और अमेरिका के बाजार का अध्ययन किया है। भारत के बाजार का इनका अध्ययन भी उसी परिप्रेक्ष्य में है। इनका सारा नजरिया, अनुभव, ज्ञान, धनपति के सन्मुख पानी भरता है। यों उस निरक्षर की मूँछ के हर बाल, उससे छोटों के प्रति, बदतमीजी का द्योतक है। वह जानता है कि उसका काम कहाँ से निकलता है? नेता हो या अफसर अथवा उस विभाग का बाबू, वह उनके आगे तब तक बिछा रहता है, जब तक उसका उल्लू सीधा न हो जाए।

इसके पश्चात् उसे उन सबको विस्मृति के कूड़ेदान में फेंकने से भी कोई परहेज नहीं है। वह शिकारपुर से छोटे शहर में रहता है, इसीलिए स्वयं को इस शहर का टाटा, बिरला, अंबानी, अडानी आदि से कम नहीं समझता है। उसकी एक अन्य खासियत है, न उसे किसी राजनीतिक दल से परहेज है, न उसकी पैसे कमाने के अतिरिक्त कोई विचारधारा है। वह हर सियासी दल के प्रति सजग है। ठीक वैसे ही जैसे वह हर अफसर-बाबू के आगे नत है, जब तक वह सेवानिवृत्त नहीं होता है। क्या पता, कब वह फिर संबद्ध विभाग में न नियुक्त हो जाए? ऐसे सब उसकी विनम्रता के कायल हैं, जब कि उसके स्वयं के कर्मचारी एक स्वर में उसे गरियाने से बाज नहीं आते हैं।

अपने उत्पाद की बिक्री के लिए वह प्रचार, पत्रकार और पंडित यानी ज्योतिषी पर निर्भर है। वह इतना धर्म-पारायण है कि उसने दर में ही मंदिर बनवा रखा है। इसके कई फायदे हैं। एक तो इसमें समय की बचत है। कौन दूर के मंदिर में रोज मत्था टिकाने जाए? कौन कहे कब, उसका कोई दुश्मन वहाँ घात लगाए बैठा हो? वह शुरू से शारीरिक कष्ट से भयभीत है। यहाँ तक कि सुबह की सैर तक अपने लाँन में ही कर लेता है। सुबह दर के मंदिर में ही पार्ट-टाइम पुजारी उसका भविष्य यानी दिन का हाल ही नहीं बताता, पूजा भी करवा देता है। दिन भर, इसके बाद मंदिर में शाम तक फुरसत है। पुजारी दूसरे श्रद्धालुओं को ठगने में व्यस्त है। गौधूलि की बेला, पंडित फिर दर से मंदिर में पधारता है। इस प्रकार धनपति का हर दिन का पाप उसी रोज धोया जाता है। मंदिर, पंडित, धर्मकथाओं के बावजूद धनपति को अपनी नश्वरता का बोध नहीं है, वरना कैसे इतनी लगन से धनोपार्जन में लगा रहता? अपनी दो बेटियों का विवाह, वह दामाद खरीदकर कर चुका है और एकमात्र पढ़े-लिखे बेटे को, आन जात में, शादी करने को दर से निष्कासित।

उसके मन में यह खयाल कभी नहीं आया कि उसके जाने के बाद उसकी इस अपार संपत्ति का क्या होगा? उसकी पत्नी भी काला अक्षर भैंस बराबर है। उसे न धंधे का ज्ञान है, न उसे उसकी कुछ चिंता है। यह भी मुमकिन है कि उसका बेटा वापस आए और एक-एक पाई हथिया ले। पुत्रमोह में डूबी माँ उसके लिए आज भी सब करने को प्रस्तुत है। ऐसा नहीं है कि धनपति इस तथ्य से अनजान हैं। उसे कभी-कभार मृत्यु की अनिवार्यता का ध्यान आता है। अपनी पत्नी के भविष्य का भी, पर यह एक क्षणिक दौर है। इससे उनकी पैसा कमाने की लगन में न विराम लगता है, न कोई रोक-टोक आती है। दौलत उसके लिए आराध्य, देवता, पूजा-अर्चना सब कुछ है। कौन कहे ऐसों को अपनी नश्वरता का ध्यान आता तो है, पर धन की पिपासा के आगे ठहरता नहीं है। बस बेटे के निष्कासन के बाद दर पर बेटियों और दामादों के आने का सिलसिला कुछ प्रगति पर है। दो में एक बेटी तो माँ-बाबूजी की देखभाल के लिए, या उसके बहाने, टिकी ही रहती है। आदमी के रूप में जन्मी, धन-मशीन को, इस पर आपत्ति नहीं है। जब तक उसके कमाने के सिलसिले में कोई व्यवधान न आए, उसे दर में किसी के रहने पर क्यों आपत्ति हो? कभी-कभी भ्रम होता है कि धनपति में, दिल की जगह, स्नेह और संबंधों के स्थान पर, ऊपर वाले ने, नोट गिनने की मशीन फिट कर दी है। डॉक्टरों की विवशता है। वह मशीन ऐसी अदृश्य है कि किसी एक्स-रे की पकड़ में नहीं आती है। बहुत से ऐसे चारित्रिक दोष-गुण हैं, जो एक्स-रे की पहुँच के परे हैं। शायद धनपति के साथ भी ऐसा ही है, तभी कोई शारीरिक बनावट कैसे उससे बच के रहती है? संभव है कि धनोपार्जन के लिए व्यक्ति के अंतर में रिश्ते-नाते की कोई जगह न हो?

इसी प्रगतिशील शहर में शासन या सरकार के प्रतीक के रूप में, जिलाध्यक्ष व पुलिस कप्तान भी नियुक्त हैं। यों तो जिला स्तर के पदों की संख्या देश की आबादी के समान बढ़ी है, पर यह पद अंग्रेजों द्वारा सृजित हैं। अंग्रेज अधिकारी इन पर रहना पसंद करते, सचिवालय की तुलना में। तब संचार के साधन सीमित थे। जिलों में मुख्यालय के आदेश आते-आते समय लगता। उनके कार्यों पर निरीक्षण का अभाव, उन्हें किसी भी नियंत्रण से आजादी का अहसास कराता। इन दोनों के आवास जिलों के महल जैसे होते। आज भी हैं। जिलों में एक-दो सबसे महत्त्वपूर्ण अधिकारी हैं। जिलाधीश जिले का सबसे अहम पद है। बाकी अधिकारी, पुलिस के अलावा, उसके अधीन हैं। जनता की निगाह में वह जिले का राजा है। कुछ इस पद का उपयोग जनसेवा में करते हैं, कुछ निजी धनसेवा में। कई जिलाधीशों की तो प्रसिद्धि है कि वह किस जिले में रहे यह पता करना आसान है। बस उनके और पत्नी के स्वामित्व के मकानों की गिनती करनी है। कुछ ने मकान के बजाय रिश्तेदारों के नाम पर प्लॉट खरीदकर उनकी कीमत में वृद्धि के लिए छोड़ रखे हैं। जमीन का मूल्य बढ़ना ही बढ़ना। जमीन एक सीमित संसाधन है। कुछ की मान्यता है कि जिलाधीश का व्यक्तित्व ही जिले के विकास का द्योतक है। यदि अफसर में सेवा की लगन है तो जिला चमक जाता है। अन्यथा प्रशासन का क्या? वह तो चलता ही रहता है, पर तब सुविधाएँ ठप पड़ती हैं। निरीक्षण के अभाव में विकास जमीन पर न होकर, कागजों में होता है। जनता त्राहि-त्राहि करे तो करे?, शिकारपुर के बाबूराम टाइप अफसर इनके आदर्श हैं।

एक भुक्तभोगी अपने साथ घटी एक घटना बताया करते हैं। एक बार किसी काम के चलते जिलाधीश के पास समय लेकर गए। जिलाधीश ने उनकी पहनी हीरे की अँगूठी की प्रशंसा की। पास से देखने के लिए उतरवाई। अपनी उँगली में ट्राई की, जहाँ वह फिट आई। बस फिर क्या था, वह उनकी हो गई। जिलाधीशों की पत्नी की शान में कसीदे पढ़नेवालों की भी कमी नहीं है। एक कीर्ति उनकी खरीदारी के लगाव की है। वह मुख्यालय के बाजार में नियमित रूप से चक्कर लगाती, जो उन्हें पसंद आता, वह ले जातीं, ‘हिसाब में लिख लेना’ कहकर। हिसाब तो बढ़ता, पर उसके भुगतान का शुभ अवसर कभी नहीं आया। जिलाधीश आते-जाते रहे पर इन विभूतियों को लोग आज भी याद करते हैं। जैसे आज कोरोना का संक्रमण फला-फूला है, वैसे ही इन के भ्रष्टाचार का। इसके कई निरोधक टीके भी बने हैं, पर कोई सफल नहीं है। विजीलैंस, सी.बी.आई. जैसे अवरोधक स्वयं इसके शिकार हैं। दुर्दशा यह है कि पैसे लेकर काम करने वालों को अब ईमानदार माना जाता है। भ्रष्ट वह है, जो निश्चित रकम भी धरवा ले और काम भी न करे। बाबू-अफसर भी इतने चतुर हो गए हैं कि कोई सबूत भी नहीं छोड़ जाते हैं, बाबू राम की तरह। उनके मुखर आलोचक है, दफ्तर में। पर ऐसे भी उन जैसे बनने के प्रयास में भी सबसे आगे है। भारत भ्रष्टाचार में एक लगातार प्रगतिशील देश के रूप में प्रसिद्ध होता जा रहा है।

कई विद्वान् इस खोज में व्यस्त हैं कि कोरोना के अनपेक्षित संक्रमण का दुष्प्रभाव अधिक है कि निजी या सरकारी दफ्तर में व्याप्त भ्रष्टाचार का? अभी तक वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे हैं। फिर भी कुछ का मत है कि कोरोना एक अस्थायी प्रक्रिया है, जब कि भ्रष्टाचार हर दफ्तर की स्थायी बिधि। नतीजा जाहिर है भ्रष्टाचार देश के लिए अधिक हानिकारक हैं। यों बहस, वाद-विवाद विद्वानों का शौक ‘हाबी’ है। लाभदायी भी है, कमाऊ भी, खिलाऊ भी, और चाहिए ही क्या? आने-जाने का किराया, लंच-डिनर का सुभीता, रहना-खाना फ्री। फँसने को, कोई न कोई मुर्गा फँस ही जाता है। स्थानीय अखबार में फोटू अलग छपता है कि “फलाने विद्वान्, ढिकाने सेमिनार की शोभा बढ़ाने शिकारपुर को प्रस्थान कर रहे हैं।” वर्तमान विद्वान् कालिदास तो हैं नहीं कि जिस डाल पर बैठे हैं, उसी को काटने में जुटे। वह नए भारत के ज्ञानी और समझदार नागरिक हैं। ऐसे विचार-विमर्श कभी किसी निश्चित नतीजे पर नहीं पहुँचते हैं। कौन अपने पेट पर लात मारे? जो चलता रहता है, वह है विवादित बहस। उधर रोज भ्रष्टाचार चलता है, इधर गोष्ठी, सेमिनार, वेबिनार। यों वेबिनार आधिक लोकप्रिय नहीं है। लोकप्रियता में भ्रष्टाचार हर दफ्तर का प्रिय आकर्षण है।

पहले के या गांधी-लोहिया की पीढ़ी के नेताओं का एक जीवन लक्ष्य था। उनका मिशन भारत की अंग्रेजों से आजादी थी। उसके बाद से नेताओं में पीढ़ियों का बदलाव स्पष्ट है। कहने को चवन्नी चोर से लेकर पेशेवर गुंडे, बदमाश, हत्यारे, भू-माफिया जैसे, हर बदमुजन्ना नेता बनने को स्वतंत्र हैं। बहुत से शब्द ऐसे हैं, जो अपना अर्थ खो चुके हैं। इनमें एक प्रमुख शब्द ‘जनसेवक’ है। इसको कई, सार्वजनिक जनभक्षक भी कहते हैं। इनकी प्रमुख सेवा खुद की सेवा है। कई दाने-दाने को तरसते व्यक्ति नेता क्या बने, स्वयं को लोहिया का चेला घोषित कर सिद्ध समाजवादी भी हो गए। एक सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु के बाद राज अयाँ हुआ कि इनके कई फ्लैट और कोठियाँ हैं। जब वह चुनाव लड़े तो इन सबका कहीं जिक्र न था। वह स्व-घोषित बे-कार थे। उनके पास कोई चार पहिए का वाहन न था, न दो पहिए का अब अखबारों में प्रकाशित हो रहा है कि वह कई महँगी गाड़ियों के बेनामी स्वामी हैं। उनके दर के सेवक के पास एक ‘मर्सिडीज’ है। वह शायद कार से उनकी सेवा के लिए आता-जाता है। उनके बेटे ने उनका बचाव इस बयान से किया है कि जो अपने निजी सेवक को महँगी कार भेंट करे तो वह क्या समाजवादी न होकर पूँजीवादी होगा? “उन्होंने हमेशा जनसेवा में जनता की संपत्ति को लुटाया? यह फ्लैट और कोठियों का स्वामित्व कोई सिद्ध करके तो दिखाए, वरना हम उस अखबार और व्यक्ति के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा करेंगे।” कोर्ट का फैसला क्या पता उसके जीवन-काल में आए अथवा उसके ऊपर जाने के बाद। पर अब जनता के बीच उसके समाजवादी ढोल की पोल खुल चुकी है। काफी धन प्रचार में, लुटाने के बाद नेता का पुत्र चुनाव हार चुका है। जनता अपना निर्णय दे चुकी है, कोर्ट का फैसला पता नहीं कब आए?

आजादी के बाद नेतागीरी एक पापुलर धंधा बन चुकी है। पढ़ा-लिखा हो या अक्षर ज्ञानी अथवा बेरोजगार, यदि किसी बड़े नेता का बेटा है तो यह उसका स्वाभाविक पेशा है। बस उसे चुनाव जीतना है। उसके बाद की कमाई में ‘बाबूजी’ की सेवा में बिताए समय के कारण वह खुद सिद्धहस्त है। कैसे किसी के काम के लिए पत्र लिखने से लेकर किसी को फोन करने तक की नियत फीस है, यदि किसी प्रत्याशी को साथ लेकर सिफारिश के लिए जाने का प्रश्न है तो वह ‘केस टू केस’ निर्भर है। यों जात-भाइयों के बीच लोकप्रियता के लिए उसने एक और जुगत भिड़ाई है। इनके लिए रेट में रियायत है। पैसे सबको देने हैं। यह उसूल का प्रश्न है। बस अपनी जात के लिए ‘कन्सेशन’ है। जात-भाइयों का समर्थन उसे जमीनी नेता बनाता है। ऐसे नेताओं से उम्मीद करना कि वह एक सेक्युलर समाज बनाएँगे जिस में हर काम बिना करप्शन, केवल योग्यता पर होना वैसी ही प्रत्याशा है, जैसे कोरोना का खुद-ब-खुद, बिना इलाज ठीक हो जाना।

वास्तविकता यह है कि भारत में कोई भी दल न सेक्युलर हैं न कम्युनल बस यह केवल चुनावी जीत के चोंचले हैं। मुसलिम बहुल क्षेत्र में, नहीं तो क्यों, सिर्फ मुसलिम प्रत्याशी उतारा जाता? मंदिरों या गुरुद्वारे जाना केवल हिंदू और सिख वोट हथियाने की जुगाड़ है। कभी यह चाल सफल रहती है, कभी नहीं। विकास की बात हर दल वैसे ही दोहराता है, जैसे प्रशिक्षित तोता ‘राम-राम’। कोई इनसे पूछे कि यदि सब विकास के विषय में एकमत हैं तो भारत आज तक विकसित देश क्यों नहीं बन पाया? नल का पानी क्यों नहीं गाँवों तक पहुँच पाया? यही दुर्दशा बिजली की है। बड़ी योजनाएँ बनी हैं, पर सब निर्माण की प्रक्रिया में हैं। उनके काम में देरी है बस ‘कमीशन’ चालू है, हर स्तर पर। लक्ष्य का समय बढ़ाने का कमीशन है, माल की सप्लाई आने का कमीशन है और मजदूरों की उपलब्धता तक का भी। इसके उदाहरण हर बंदरगाह और हवाई अड्डे में मौजूद हैं।

हमारे एक मित्र ने समाज के खास लोगों के विषय पर हमसे चर्चा की। हमारे पैसे से दो कप चाय और समोसों का सफाया कर, उन्हें याद आया कि हमारे विश्लेषण में एक खास वर्ग छूटा हुआ है। हमने उस वर्ग के विषय में जिज्ञासा जताई। उन्होंने बताया कि इसमें माफिया का तो कहीं जिक्र ही नहीं है, जब समाज की कानून-व्यवस्था उसी के इशारे पर संचालित है? हमने उलटे उनसे ही प्रश्न किया कि इसमें नेता की महत्ता का वर्णन है कि नहीं? वह भला इससे कैसे इनकार करते? हमने उनकी स्वीकारोक्ति से सहमत होकर उन्हें सूचित किया कि नेता की प्रमुखता की चर्चा के बाद माफिया के वर्णन की जरूरत ही क्या है? यह तो केवल दिन की रोशनी में नेता की परछाईं हैं!

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