रसना के फेर में

रसना के फेर में

जिन लोगों का बचपन कस्बों या बहुत छोटे शहरों में गुजरता है, वे स्वत: संस्कारी और कुछ ज्यादा ही मर्यादित हो जाते हैं। मेरे बचपन का एक बड़ा हिस्सा ऐसी आर्डिनेंस फैक्टरी की आवास बस्ती में गुजरा, जो उत्तर प्रदेश के एक जाट-बहुल कस्बे से सटी हुई थी। वहाँ उन दिनों आर्य समाज का बहुत प्रभाव था और बड़ी संख्या में फैक्टरी के लोग अपने परिवार सहित आदर्श आर्य आचरण संहिता का पालन करते थे। बाकी बचे परिवार सनातनी थे और वे इस संदर्भ में और अधिक सात्त्विक बने रहने का भरपूर प्रयास करते थे। जाहिर है कि ऐसे माहौल में सामिष भोजन ग्रहण करनेवाले गिने-चुने ही थे, ज्यादातर दूसरे हिंदीतर प्रांतों से आए हुए। बड़ों का उनके यहाँ आना-जाना होता था, मगर बच्चों को उनके यहाँ आने-जाने को सामान्यत: निरुत्साहित किया जाता था। ले-देकर वहाँ के छोटे से बाजार के पीछे में एक मीट की दुकान थी, जिसे मैंने कभी नहीं देखा। मीट तो छोड़िए, कभी अंडा तक छूकर नहीं देखा। हाँ, मुर्गियों का एक बड़ा सा पिंजड़ा पड़ाेस में रहने वाले मिस्टर डोमिंगो के क्वार्टर के बरामदे में रखा देखा था। उसके पास से गुजरने में एक असहनीय दुर्गंध आती थी। धीरे-धीरे यह वितृष्णा में परिवर्तित होती गई। वहाँ की फिजा ही कुछ ऐसी थी कि अपने निरामिष होने पर श्रेष्ठता का एहसास होता था और कभी-कभी गर्व भी। रही सही कसर महात्मा गांधी की आत्मकथा में उनके सामिष भक्षण के असफल प्रयोग को पढ़कर पूरी हो गई और कभी स्वप्न में भी ऐसा कदाचरण नहीं हुआ। हाँ, एक बार यह जानते हुए भी कि केक में अंडा होता है, मैंने क्रिसमस पर एक सहपाठी के घर वाल्नट केक का एक बड़ा सा टुकड़ा खा लिया, इसमें खाने से भी आपत्तिजनक बात यह थी कि मुझे उसका स्वाद अच्छा लगा। इसलिए कभी भी, किसी को भी यह बात नहीं बताई। और इस लिहाज से वह कालखंड ठीकठाक गुजर गया।

हाई स्कूल के बाद तबादले पर हम देहरादून आ गए। यह परिवेश का बड़ा बदलाव था। यहाँ फैक्टरी एस्टेट मुख्य शहर से भले कुछ दूर थी, मगर नगरीय माहौल था। देहरादून उन दिनों उत्तर भारत के सबसे फैशनेबल शहर माना जाता था, भले ही महानगर न रहा हो। आते ही मेरा दाखिला डी.ए.वी कॉलेज में हो गया और जैसे एक नई दुनिया के द्वार खुल गए। मगर अपने कस्बाई व्यक्तित्व को बदलने में समय लगा। कपड़े-जूते-हेयरकट ही नहीं बोलचाल की भाषा को भी काफी चमकाना पड़ा। कॉलेज से सटे हुए बाजार में आमने-सामने दो रेस्तराँ थे—अलका और अंबर। उनमें हमेशा छात्रों की भीड़ जुटी रहती थी। पूरे समय रेडियोग्राम पर फिल्म संगीत गूँजता रहता था। मैं जहाँ से आया था, वहाँ कोई भी रेस्तराँ नहीं था, बस हलवाइयों की दुकानें थीं, जहाँ चाय भी मिलती थी। मैंने चाय का शौक अपनी माँ से विरासत में पाया था। जब भी मौका मिलता मैं अलका या अंबर में जाकर बैठ जाता और चाय के कप पर दुनिया-जहाँ की बातें सोचते हुए देर तक बैठा रहता, साथ ही लड़के-लड़कियों की वेश-भूषा और अनोखी अदाओं का अवलोकन और अध्ययन भी चलता रहता।

यों तो छात्रों के कारण ही गुलजार रहनेवाले ये रेस्तराँ सिर्फ एक प्याली चाय के लिए देर तक बैठे रहने पर कोई खास प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करते थे, लेकिन कभी-कभार अपने जमीर की खातिर साथ में कुछ मँगा भी लेता। अब का तो पता नहीं, लेकिन उन दिनों देहरादून में हर बड़ी-छोटी चाय की दुकान में हर समय पकौड़ियाँ बनती रहती थीं, जैसे की उत्तर भारत के अन्य शहरों में समोसे बना करते हैं। इसके अलावा वहाँ अंडे अनेक रूपों में बड़े शौक से खाए जाते थे। मसलन आधे उबले हुए, पूरे उबले, आधे तले हुए या फिर आमलेट या एग चाप आदि। रेस्तराओं में इसके अलावा पेस्ट्री, केक आदि मिलते थे, जिनमें अंडा पड़ता ही पड़ता है। मेरे पास पकौड़ी या बटर टोस्ट माँगने के अलावा कोई और विकल्प नहीं था। अलका-अंबर में अकसर मेरे आस पास कोई-न-कोई, किसी-न-किसी रूप में अंडा खाया करता। अपने श्रेष्ठ शाकाहारी संस्कारों के कारण मुझे शुरू-शुरू में तो अंडा-भक्षियों के सामीप्य से अरुचि और मिचलाहट सी होती रही, मगर प्रकारांतर से यह सह्य होता गया। उबले हुए तो नहीं मगर तले हुए अंडे से एक भीनी-भीनी, विशिष्ट गंध आया करती है, जिसे मैं जल्दी ही पहचानने लगा। उन दिनों होटलों ही नहीं घरों में भी तलने के लिए डालडा, यान‌ी वनस्पति घी के प्रयोग का प्रचलन था। हमारे घर सुबह नाश्ते में बननेवाले डालडा के पराँठों की महक पूरे घर को अपने आगोश में ले लेती थी। अलका-अंबर में बैठ कर मैंने महसूस किया की आमलेट या तले अंडे से उठाने वाली खुशबू एकदम अलग और अधिक उत्तेजक है। लेकिन वह आत्मसात् करने योग्य किसी तरह भी नहीं लगी। इस तरह रूप और गंध का अनुभव चाहे-अनचाहे हो ही गया, मगर रस के बारे में तो सोचने की हिम्मत नहीं थी।

कथा-साहित्य पढ़ने का शौक यहाँ आकर पनपने लगा। कॉलेज में अच्छी-खासी लाइब्रेरी थी। उसके अलावा पलटन बाजार की एक किताबों की दुकान पर मिलनेवाली अल्पमोली रूसी साहित्य की पुस्तकें खूब खरीदीं। रूसी कहानियों और उपन्यासों में चाय के समोवार के साथ-साथ ब्रेड, अंडों और गोश्त से बनानेवाले अनेक अजनबी नामों के व्यंजनों के नाम पढ़ते-पढ़ते मैं मानसिक रूप से पहले जैसा शाकाहारी नहीं रहा। धीरे-धीरे रूसी ही नहीं भारतीय कथा-कृतियों में भी आमलेट और रोगन जोश आदि पढ़ने को मिले। एक बार एक यात्रा-वृत्तांत में मैंने पढ़ा क‌ि सोलन से शिमला के रास्ते में बस रुकी और उबले अंडे बेचनेवाले कई आ गए। मुसाफिरों ने नमक-गोल मिर्च के साथ उबले अंडे खाए। मैंने अपनी माँ से पूछा कि यह गोल मिर्च क्या होती है? उन्होंने बताया की यह काली मिर्च का ही दूसरा नाम है। उसके बाद कई बार कल्पना में मैंने कई बार गोल मिर्च और नमक के साथ उबले अंडे खाए, लेकिन उसका स्वाद एक रहस्य ही बना रहा। चूँकि कल्पना में ऐसी वस्तु खा रहा था, जो कभी चखी नहीं थी, इसलिए मैंने पनीर के स्वाद से काम चला लिया, लेकिन शंका बनी रही। एक नॉन वेजेटेरियन मित्र से पूछा कि अंडे का स्वाद कैसा होता है। वह पहले तो चक्कर में पड़ गया, फिर खूब सोचकर उसने बताया कि उबले हुए अंडे का स्वाद उबले हुए आलू से काफी-कुछ मिलता-जुलता हुआ होता है। मैंने एक दिन माँ से एक उबला हुआ आलू लिया और नमक-गोल मिर्च छिड़ककर बहुत सावधानी से खाया और उस अनुभव को अंडे के स्वाद के रूप में दर्ज कर लिया। हालाँकि दिलजमई पूरी तरह से हुई नहीं।

माँ को ताज्जुब हुआ कि मैंने उबला हुआ आलू क्यों खाया? मैंने सच्ची बात बता दी। उन्हें हँसी आई, मगर शायद इस बात पर संतोष भी हुआ कि मैंने लक्ष्मण रेखा लाँघने के बजाय एक निरापद प्रयोग किया है। उन्होंने कहा, “स्वाद तो मैं भी नहीं जानती मगर तुम्हारे लिए शाकाहारी आमलेट बना दूँगी। उससे तुम्हें काफी कुछ आइडिया हो जाएगा।” उन्होंने बेसन के घोल में बारीक कतरा प्याज, हरी मिर्च, अदरक और हरा धनिया डालकर उसे तवे पर चीले की तरह तल दिया और टमाटर की चटनी के साथ प्लेट में रखकर दिया। खाया नहीं था मगर अगल-बगल की टेबलों पर देखा हुआ तो था ही, माँ का बनाया शाकाहारी आमलेट रूप-रंग में बिल्कुल वैसा ही था। बस महक वैसी नहीं थी। खाने में अच्छा लगा। उसके बाद नाश्ते में मैं अकसर बेसन के आमलेट की फरमाइश करता और माँ खुशी-खुशी बना देतीं।

जब मैं सेकेंड ईयर में पहुँचा तो जमाने की हवा मुझे लग चुकी थी। क्लास बंक करके फिल्म देखना और खूबसूरत नजारे देखने में आनंद आने लगा था। अलका-अंबर के अलावा शहर के कई अच्छे रेस्तराँ देख लिए थे। कुछ बहुत अच्छे दोस्त मिल गए, जिनके साथ अच्छा समय गुजरने लगा था। स्नो-फाल के समय पैदल चढ़ाई करके मसूरी घूम आया था, शहर से खूब परिचित हो गया था, मगर खान-पान का संयम किसी तरह भी भंग नहीं हुआ था। जो नए दोस्त बने उनमें भी एक-आध ही मेरे जैसे शाकाहारी थे। एक तीसरी श्रेणी और नजर आई, जिन्हें एगेटेरियन कहा जाता था। ये मीट-चिकन नहीं खाते थे, मगर अंडे से परहेज नहीं था। इनका तर्क था कि वेजिटेरियन अंडा भी होता है, अर्थात् वह अंडा, जिससे चूजे का प्रजनन अभीष्ट नहीं है। उसे खाना निरापद है।

अब दोस्त बने तो सामाजिक संपर्क भी विस्तृत हुआ। मेरे अलावा सभी शहर में रहते थे। किसी का जन्मदिन हो या अन्य कोई उत्सव सभी मित्र यथासंभव उसमें सम्मिलित होते थे। मैं अकसर चार-छह किलोमीटर का फासला साइकिल से तय करके जाता-आता था। ज्यादातर निमंत्रण रात्रि भोजन के होते थे। मुश्किल तब होती थी, जब किसी मांसाहारी परिवार में हम एक-दो शाकहारियों को मुख्यधारा से अलग निरामिष भोजन परोसा जाता था। कहीं-कहीं एगेटेरियन के मतलब के भी व्यंजन होते थे। तब मैं लगभग अकेला पड़ जाता था। मेरे मित्रों को यह अखरता तो होगा ही। अंततोगत्वा कुछ ने यह मिशन बनाया कि किसी तरह मुझे खाद्य-अखाद्य की रूढ़ि से मुक्ति दिलवाई जाए। और कुछ नहीं तो एगेटेरियन तो बना ही दिया जाए। घरेलू जन्मदिन आदि पार्टियों में मित्रों के लाख इसरार करने पर भी मैं लक्ष्मण-रेखा लाँघने को तैयार नहीं हुआ। कुछ समय बाद उनका दिल रखने के लिए मैंने एक पीस केक खा लिया। खाने से पहले उसे सूँघकर देखा कि उसमें कोई अप्रिय गंध है कि नहीं। नहीं मिली।

उन दिनों देहरादून में जब जाड़ा अपनी पूरी रंगत में होता तो मसूरी में स्नो-फॉल हुआ करता था। उस समय हिमपात के इस दुर्लभ और खूबसूरत नजारे का आनंद लेने के लिए सैकड़ों युवा और छात्र राजपुर से पैदल पहाड़ पर चढ़ते हुए पाँच-छह किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई के बाद मसूरी पहुँच जाते। पूरे रास्ते एक-दूसरे को बर्फ के गोले मारते, हँसी-ठिठोली करते और रोमांस लड़ाते। हम कई मित्र सवेरे ही साथ निकाल लिए। बर्फबारी का यह मेरा पहला अनुभव था। दो स्वेटर, कोट, टोपी और दस्ताने पहने होने के बावजूद कँपकँपाने और हाड़ गला देनेवाली सर्दी थी। रास्ते में एक-दो जगह चाय जरूर मिली, जो उस समय बहुत बड़ी नियामत मालूम पड़ी।

मसूरी बर्फ की अत्यंत धवल चादर ओढ़े जैसे हम सबकी प्रतीक्षा में थी। सड़कों और बाजार में सन्नाटा पसरा था, जो देहरादून से आनेवाले शोर मचाते और जाम कर मस्ती करते लड़के-लड़कियों ने तोड़ दिया। वहाँ पहुँचकर देखा कुछ होटल और ढाबे खुले थे। चढ़ाई की थकान और भूख के मारे सबका बुरा हाल था। ढाबे में ऑर्डर देने लगे तो पता चला कि आफ सीजन होने के कारण मीट की कोई भी डिश नहीं है और बनाने में देर लगेगी। तत्काल तो अंडे ही मिल सकते थे। मेरे लिए राहत की बात यह कि आलू दम और दाल उपलब्ध थी। बाकी सबके लिए दो अंडों के आमलेट का ऑर्डर दे दिया गया। सहसा टेबल पर मेरे साथ बैठे एक मित्र ने मुझे अपनी तरफ खींचकर कहा, ‘ओए, देखो यह बुरी तरह काँप रहा है।’ उसके बाद सबने मुझे घेर लिया और मेरे हथेलियाँ मली जाने लगीं। उनमें आपस में कुछ गुफ्तगू हुई और मुझसे कहा गया कि अगर मैंने अब भी अंडे न खाने की जिद कायम रखी तो मेरा पैदल वापस लौटना मुश्किल है और सर्दी खाकर तबीयत ज्यादा बिगड़ सकती है। मैं असहज महसूस कर रहा था, मगर कुछ बोल नहीं सका। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यकायक यह क्या हो गया, ढाबे में दाखिल होने से पहले तक मैं बिल्कुल सामान्य था। मित्रों की चिंता उनके हाव-भाव से स्पष्ट हो रही थी। किसी ने मेरी हल्की और इकहरी टोपी उतारकर बंदर टोपा पहना दिया, गले में जाने कितने मफलर लपेट दिए गए। ढाबेवाला यह सब देख रहा था, वह एक गिलास में गरम पानी में कोई दवा डालकर लाया और बोला, “भैया को ठंड लग गई है, इन्हें यह पिला दीजिए, तुरंत आराम मिलेगा।” जब तक मैं कुछ सोचता, मित्रों ने गिलास मेरे मुँह से लगा दिया। था तो गरम पानी ही, मगर उसमें से बहुत तेज महक आ रही थी। बड़ी न मुश्किल से वह हलक के अंदर गया।

जब तक खाना बनाकर परोसा जाए, ठंड लग जाने के कारणों पर गंभीर विमर्श होता रहा। मैंने महसूस किया कि धीरे-धीरे मेरी कँपकँपी कम होती जा रही थी। थोड़ी देर बाद गरमी लगी तो मैंने बंदर टोपा उतार दिया, फिर एक-एक करके मफलर उतारकर तह किए और टेबल पर रख दिए। यह देखकर टेबल पर खुशी की लहर दौड़ गई। दवा सचमुच कारगर साबित हुई। पहले टोमॅटो कैचप की बोतलें आईं, फिर प्लेटें लगाई जाने लगीं, छुरी काँटे रखे जाने लगे। तले हुए अंडों की महक से ढाबे का कमरा भर गया। अब सबके सामने ब्रेड के स्लाइसों पर आराम से पसरे आमलेट थे और मैं आलू-दम और रोटी की राह देख रहा था। बाकी सब भी हाथ रोके बैठे थे। कुछ देर बाद यवनिका उठी और मेरे सामने भी आमलेट रख दिया गया। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सा इधर-उधर देखने लगा। अचानक वे सब हाथ जोड़कर समवेत स्वर में बोले, “महात्माजी, अपने प्राण बचाना सबसे बड़ा धर्म है। आप इसे दवा समझकर खा लीजिए। वैसे ही जैसे आप सर्दी खा गए हैं।” दवा के असर से या वैसे ही मैं पूरी तरह से कंफर्ट जॉन में आ चुका था, इसलिए बिना किसी प्रतिवाद के मैंने छुरी और काँटा उठा लिया तो सब तालियाँ बजते हुए बैठ गए।

चूँकि आपने धैर्यपूर्वक पूरा किस्सा सुना, इसलिए मेरा फर्ज बनाता है कि मैं उस वर्जित स्वाद को ग्रहण करने से हुई अनुभूति भी आपसे साझा करूँ। उसकी भीनी-भीनी खुशबू से तो मैं परिचित करा सी चुका हूँ तो अब कुछ स्वाद के बारे में बताऊँ। आमलेट का पहला टुकड़ा जो छुरी से काटकर और काँटे में फँसाकर मैंने मुँह में रखा, वह किसी भी तरह न तो आलू की तरह था न ही पनीर की तरह। तले जाने से उसकी सतह सफेद और स्वर्णिम के मेल से बनी मालूम पड़ रही थी। चबाते ही आभास हुआ कि संरचना में वह काफी मुलायम और थोड़ी किचकिची है। उसमें प्याज और हरी मिर्च के टुकड़े थे, इसलिए उसका अपना स्वाद दब सा गया था। इसलिए विलंब से समझ में आया। कुछ सोचना भी पड़ा। रूप और खाने से पहले की गंध मैं बता चुका हूँ, रस भी उसमें था, एकदम अपरिचित सा लेकिन ग्राह्य। एकदम नए अनुभव की तरह। याद आया कि इससे पहले मैंने केक का एक स्लाइस खाया था, जिसमें अंडा जरूर पड़ा होगा, उसमें डाली गई तमाम फ्लेवर आदि के बावजूद इस रस का एक अंश उसमें जरूर रहा होगा। बाद में तो अन्य लोगों की तरह मैं भी टोमेटो कैचप में लगा-लगाकर खाता रहा तो अन्य कोई खास बात पता नहीं चली। बाद में गरम चाय के साथ सबकुछ जैसे धुल गया।

वापसी में हिमपात के बीच मसूरी से ढलान पर देहरादून आते हुए मुझे लग रहा था, जैसे मैं किसी उच्च पर्वत-शिखर तक आरोहण करके लौट रहा हूँ। सर्दी तो नाम को भी नहीं थी।

३७४ ए-२, तिवारीपुर, जे.के. रेयन गेट नंबर २ के सामने

जाजमऊ, कानपुर-२०८०१०

दूरभाष : ९९३५२६६६९३

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