अजनबी

मैंने कार पार्क करके विश्वविद्यालय की तरफ कदम बढ़ाए ही थे कि मोबाइल फोन की घंटी बज उठी। फोन लिया तो दूस1री तरफ से एक बहुत दुखी आवाज सुनाई दी—“हेल्प मी, प्लीज मेरी मदद करिए।”

मैं घबरा गई। मैंने चिंतित स्वर में पूछा, “क्या हुआ तुम्हें? ठीक तो हो न?” पहली बार ऐसे किसी ने मुझे फोन किया था।

एक क्षण थमकर आवाज आई—“मैं बेहद अकेली हूँ। मेरी मदद करें कृपया?”

उस आवाज में जो अकेलापन था, जो दर्द था, मैं बयान नहीं कर सकती। पाँच मिनट में मेरी क्लास शुरू होने वाली थी। मैं घबरा गई कि दो घंटे बाद जब तक मैं क्लास खत्म करूँगी, तब तक यह महिला उल्टा-सीधा कदम न उठा ले। मैंने उससे कहा, “देखो, मैं अभी पढ़ाने जा रही हूँ। दो घंटे में फोन करूँगी। मैं तुम्हारे लिए जरूर कुछ करूँगी। कृपया तब तक अपना खयाल रखो। ठंडा पानी पियो और टी.वी. देख लो। किसी को फोन कर लो, कहीं घूम आओ।”

दर्द भरी आवाज में वह बोली, “मैं बेहद अकेली हूँ। कोई नहीं है मेरा। किससे बात करूँ?”

“नहीं...दो घंटे बस, अपना खयाल रखो, मैं तुम्हें फोन करती हूँ। कोई खतरा तो नहीं है न? नहीं तो पुलिस को फोन कर लो अभी। डरने की जरूरत नहीं है।”

उसने वादा किया कि वह दो घंटे अपना खयाल रखेगी।

जैसे-तैसे क्लास खत्म की। रात के साढ़े आठ बजे यह कक्षा समाप्त होती थी, निकलते ही तुरंत उसे फोन लगाया—“कैसे हो? अब बताओ कैसी तकलीफ है?”

“मैं बेहद अकेली हूँ। यों तो मेरा पूरा परिवार यहाँ है, पर मेरा कोई नहीं है। कई साल पहले अपनी माँ को ऑस्ट्रेलिया बुलाने के लिए मेरे पति ने बहाने से मुझे मानसिक रूप से बीमार बताकर मानसिक अस्पताल में डाल दिया। उसके कुछ साल बाद मुझे तलाक दे दिया। मानसिक अस्पताल से मैं यहाँ, यानी हाउसिंग सोसाइटी के मकान में आ गई। बच्चों को मैंने पिछले पंद्रह साल से देखा नहीं है। मैं उन्हें देखने के लिए तड़प रही हूँ, कितने बड़े हो गए होंगे, कैसे लगते होंगे, पता नहीं।” कहते-कहते वह रोने लगी। उसको बहुत देर धीरज बँधाती रही। कहा, परेशान मत हो, हम अवश्य कुछ करते हैं। तुम अवश्य अपने बच्चों को देख सकोगी।

लगा कि वह थोड़ी आश्वस्त है। घर पहुँची तो रात के साढ़े नौ बज चुके थे। एक कप कॉफी और सैंडविच खाकर सो गई।

अगले दिन टी.वी. खोला, तो खबर थी, “भारतीय मूल की एक महिला ने हाउसिंग सोसाइटी में आत्महत्या कर ली। वह मानसिक रूप से विक्षिप्त थी। इस केस की जाँच चल रही है।”

मेरा हृदय चीत्कार कर उठा, एक अजनबी महिला का दुःख मेरा दुःख बन चुका था, आँसू बह निकले और लगने लगा कि यह आत्महत्या नहीं हत्या है। जो समाज ने, उसके पति ने, यहाँ के सिस्टम ने और मैंने ...हाँ, यह हत्या मैंने की है और मैं अपराध भाव से भर उठी।

सिडनी, ऑस्ट्रेलिया

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