उत्सव

उत्सव

कल पूरा दिन बेटे से बात नहीं हो पाई थी। इसलिए उसने सुबह लैंडलाइन पर फोन लगा दिया। जानती थी, आज रविवार है। रजत घर पर ही होगा। और जब वह घर में होता है, सबसे पहले दौड़कर वही फोन उठाता है। माँ से तो इतनी जल्दी चला भी नहीं जाता।

वही हुआ। फोन रजत ने ही उठाया। वह बोली, “अरे शाम को तुम लोग कहाँ चले गए थे? मैं बार-बार फोन लगा रही थी। कोई उठा नहीं रहा था।”

“हम लोग न कल संजना बुआ की शादी में गए थे।” रजत ने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए कहा।

“संजना की शादी। क्या बात कर रहे हो। जरा दादी को फोन देना।”

तब तक माँ ने खुद ही फोन उठा लिया था। बोलीं, “वह तो पगला है। शादी नहीं, हम लोग संजना की सगाई में गए थे।”

“सगाई?, पर एकदम कैसे?”

“एकदम कहाँ बेटा। पिछले महीने वे लोग देखने आए थे न! तभी तय हो गया था। तुम्हें गौतम ने बताया नहीं था क्या?”

“भूल गए होंगे। मैं पूरा महीना मम्मी के यहाँ था न।” कहते हुए उसने फोन रख दिया। इसके बाद किसी से बात करने की इच्छा नहीं हो रही थी। मन हो रहा था कमरे में जाकर चुपचाप पड़ी रहे। पर जानती थी, मम्मी-पापा नाश्ते के लिए प्रतीक्षा कर रहे होंगे। इसीलिए नाश्ते की टेबल पर चली आई।

“किसकी सगाई की बात हो रही थी?” मम्मी ने पूछा।

“संजना की।”

“संजना कौन?” पापा ने पूछा।

“मेरी ननद। गौतम की चचेरी बहन।”

“उसकी सगाई हो गई और तुझे खबर भी नहीं हुई?” मम्मी ने कहा, “कायदे से तो हमें भी निमंत्रण मिलना चाहिए था। पर जब घर की बहू को ही नहीं बुलाया तो हम लोग क्या लगते हैं। और अब तुम्हारी चाची, सास पूरी बिरादरी में कहती फिरेगी कि गौतम की बहू तो मायके में ही पड़ी रहती है। उसे ससुराल से कोई लेना-देना नहीं है। सोलह सोमवार वाली बात याद है न।”

“उस समय गलती हमारी थी।” पापा बोले, “ससुर की षष्ठिपूर्ति के दिन तुम्हारी बेटी वहाँ केक कटने तक भी नहीं रुकी थी। मैं सारे झंझटों में से समय निकालकर, दौड़ता-भागता समधीजी को बधाई देने पहुँचा था। सोचा था, लौटते समय बिटिया को लेता आऊँगा। पर पता चला, वह तो कबकी जा चुकी है। मैं इतना शर्मसार हो गया था।”

“पापा, मम्मी ने सुबह से इतनी बार फोन किया कि गौतम एकदम चिढ़ गए। बोले, तुम जाओ, यहाँ का हम सब निपट लेंगे। मुझे बिना बताए टैक्सी बुलावा ली। घर में इतने लोग थे। सबके सामने बहस करना अच्छा नहीं लगा।”

“अपने यहाँ कार्यक्रम तो शाम का था न, पापा,” मम्मी से बोले, “फिर उसे सुबह से बुलाने की क्या जरूरत था। उन लोगों ने अपने कार्यक्रम के कारण डिनर का प्रोग्राम कैंसल कर दिया था। वर्किंग डे होने के बावजूद उन्होंने लंच का कार्यक्रम रखा था।”

“पर उसी दिन करने की क्या जरूरत थी, अगले दिन भी तो कर सकते थे।”

“तुम सोमवार का उद्यापन मंगलवार को कर सकती थीं? हर तिथि का अपना महत्त्व होता है। जन्मदिन उसी तारीख को मनाया जाता है। केक काटने के बाद परिवार की स्त्रियों ने उनकी आरती उतारी थी, पर इस कार्यक्रम में घर की बहू नदारथ थी। सबने मन में क्या सोचा होगा। यह सोच-सोचकर मैं दुखी हुआ जा रहा था। आखिर उसे सुबह से बुलाने की क्या जरूरत थी।”

घर में कितना काम था। सब उसे समझाना था, नेग-दस्तूर व सामान सम्हलवाना था। हलवाई के लिए सामान निकालना था। पंगत के लिए दरी लगवानी थी। मैं चार बजे पूजा में बैठ जाती तो यह सब उसे कौन बताता?”

“तुमने उसके भरोसे यह कार्यक्रम किया था?”

“और मेरे पास कौन है?” मम्मी ने अपना ट्रंपकार्ड निकाला। पिंकी वहाँ से उठ गई। वह जानती है, अब रोना-धोना शुरू हो जाएगा। उसकी भावनाओं को इतनी ठेस पहुँची है, इसकी किसी का परवाह नहीं है। मम्मी अपनी शिकायतों का पिटारा खोलकर बैठ जाएँगी। उस दिन गौतम खाना खाकर आए थे, इस बात काे मम्मी ने अब तक क्षमा नहीं किया है। सोलह सोमवार के उद्यामन में आने वाले जो भी दिनभर व्रत रखते हैं। पर गौतम का तर्क था, मेरे घर में फंक्शन था—मैं वहाँ से बिना खाए कैसे आता?”

मम्मी बोलीं, “अच्छा हुआ, मैंने दो-तीन एक्स्ट्रा जोड़े न्योत रखे थे। नहीं तो मेरा व्रत हीं खंडित हो जाता। वैसे दामाद को खिलाने का पुण्य नहीं मिला तो नहीं मिला।”

पूरी दोपहर विचारों में खोई अपने कमरे में पड़ी रही। खाने का बुलावा आया तो मुँह बनाकर चली आई। मम्मी चिल्लती रह गईं। समझ में नहीं आ रहा था कि जो कुछ हुआ, उससे वह दुखी है या नाराज या दोनों।

रह-रहकर पाँच-छह दिन पहले वाली घटना याद आ रही थी। उसका परिणाम ऐसा होगा, यह तो सोचा न था। वह अपने आपको ही कोस रही थी।

उस दिन भैया-भाभी यू.एस. के लिए रवाना होने वाले थे। सुबह-सुबह पापा के पास गौतम का फोन आया था। सब लोग एयरपोर्ट कैसे जाएँगे? पापा ने बताया कि एक गाड़ी है, कर लेंगे। तब गौतम ने कहा था कि चिंता न करें। मैं अपनी गाड़ी लेकर पहुँच रहा हूँ। पापा तो एकदम गद्गद हो गए थे।

फिर गौतम का उसके पास फोन आया था, अगर घर आने का मन है तो सामान तैयार रखना। एयरपोर्ट से लौटकर हम लोग तुम्हारा सामान लेते हुए घर आ जाएँगे।

मना करने का कोई सवाल ही नहीं था, उसे पीहर आए पच्चीस दिन हो गए थे। केवल एक दिन के लिए बीच में घर गई थी, जब उसकी सास ने इन लोगों को खाने पर बुलाया था। मम्मी का आग्रह था कि जब तक भैया-भाभी हैं, वह यहीं रहा उसने सोचा, शाम को तो भैया-भाभी चले ही जाएँगे। वह भी गौतम के साथ निकल जाएगी।

वह जितना अपनी माँ को जानती थी, उससे यह तो अंदाजा था कि यह काम इतना सरल नहीं है। पर असंभव होगा यह नहीं सोचा था। एयरपोर्ट से लौटकर पापा ने मम्मी को उतारा और वे गाड़ी पार्क करने चले गए। अपनी गाड़ी से उतरकर वह भी गौतम और रजत के साथ घर में दाखिल हुई। देखा, डायनिंग टेबल पर सिर रखकर मम्मी फूटफूट कर रो रही है। यह रोने का कार्यक्रम शायद रास्ते से ही शुरू हो गया था।

वह कुछ क्षण मम्मी को देखती रही। फिर धीरे से अपना और रजत का बैग लेकर आ गई तथा सहमे से स्वर में बोली, “मम्मी, मैं निकल रही हूँ।”

मम्मी ने सिर उठाया। उनकी गीली आँखों से जैसे अंगार बरसने लगे। अच्छा, तुमने भी मुहूर्त निकाल लिया। जाओ, सब लोग जाओ, अब कभी वापस मत आना। मेरे मरने की खबर मिले तब भी नहीं।” फिर आकाश की ओर हाथ उठाकर कहा, “भगवान्! ऐसी पत्थर दिल बेटी दुश्मन को भी नसीब न हो।”

उसने असहाय भाव से पति की ओर देखा। वे यह नाटक देख रहे थे। उनकी आँखों में घोर वितृष्णा थी। रजत का बैग उठाकर बोले, “मैं इसे ले जाता हूँ। उसकी पढ़ाई बरबाद हो रही है। तुम्हारी जब मरजी हो आ जाना।” दरवाजे पर ही पापा से भेंट हो गई। “अरे, आप चल दिए। चाय तो पीकर जाते।” पापा ने कहा पर वे रुके नहीं। बस सॉरी कहकर चल दिए। पापा ने भीतर आकर माहौल देखा तो समझ गए। ऐसे में गौतम रुककर भी क्या करते।

“रजत चला गया।” पापा ने पूछा।

“हाँ पापा, पढ़ाई का काफी नुकसान हो रहा था। अपना बच्चा क्लास में पीछे रह जाए तो अच्छा नहीं लगता न। वैसे भी पलक और पुनीत के जाने के बाद वह यहाँ बोर ही होता।”

अपना सूटकेस उसने प्रयत्नपूर्वक छिपा दिया था, ताकि बाकी ड्रामे का पापा को पता न लगे।

उस दिन के बाद पति-पत्नी के बीच संवाद ही खत्म हो गया था। शायद संजना की सगाई के कारण ही वे उसे घर ले जाना चाहते थे। पर वह साथ नहीं गई तो उन्होंने या किसी ने भी उसे बताना या बुलाना जरूरी नहीं समझा। वह अपने आपको बहुत उपेक्षित महसूस कर रही थी।

इस विसंवाद को किसी तरह समाप्त करना होगा। इसके लिए उसे ही पहल करनी पड़े तो कोई बात नहीं। इतनी छोटी सी बात को प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाना ठीक नहीं है।

शाम को उसने गौतम को फोन लगाया, कहना चाहती थी कि कल ऑफिस से लौटते हुए मुझे लेते जाइए। फोन उठाते ही उन्होंने बड़े सपाट स्वर में कहा, “बोलो।” कोई आवेश नहीं, कोई उष्मा नहीं। ऐसे में कोई क्या कहे।

“प्रियंका”

“जी”

“फोन पर हो न! तो जल्दी बोलो क्या बात है, यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है।”

“कैसा काम?”

“संजना के ससुराल वाले डिनर पर आ रहे हैं। जरा हॉल ठीक करना है। टेबल सजाना है।”

उसे धक्का सा लगा। फिर भी उसने कहा, “और खाना? माँ अकेले सब कर रही है।”

“नहीं विमला मौसी को शाम को भी बुला लिया है। फिर चाची भी रहेंगी ही।”

“वे लोग भी आ रहे हैं?”

“अब उनके समधीजी को आमंत्रित किया है तो उन लोगों को छोड़ देंगे क्या?”

“चलिए, चाचीजी को एक और शगूफा मिल जाएगा।”

“क्या?”

“कुछ नहीं,” और उसने फोन रख दिया। उसे बेहद बुरा लग रहा था। संजना के ससुरालवाले खाने पर आ रहे थे तो उसे खबर तो कर सकते थे। सारा अभिमान छोड़कर वह खुद पहुँच जाती। जब सगाई जैसे महत्त्वपूर्ण आयोजन में उसे बुलाना जरूरी नहीं समझा गया तो डिनर तो मामूली चीज है।

वह पति को क्षमा करने को तत्पर थी, पर अब उसका मन फिर से धधक उठा था। सुबह नहाकर निकली ही थी कि फोन बज उठा। संजना का था—“हैलो भाभी!”

“बात मत करो मुझसे। चुपके-चुपके सगाई कर ली, तब भाभी की याद नहीं आई।”

“कसम से भाभी, आपकी इतनी याद आई थी कि बता नहीं सकती। मैंने तो कह दिया था कि मैं पार्लर-वार्लर नहीं जाऊँगी। मुझे भाभी ही तैयार करेंगी, पर फिर भैया न बताया कि आंटी बहुत सीरियस चल रही हैं। आप नहीं आ पाओगी। कल भी आपसे मुलाकात नहीं हो पाई थी, इसलिए सुबह-सुबह ही फोन लगा लिया। आंटी कैसी हैं अब? क्या हो गया था।”

क्षण भर को वह स्तब्ध रह गई थी, पर फिर उसने अपने आप को सँभाल लिया—“अरे होना क्या था। भैया-भाभी महीने भर यहाँ थे न तो लगी रहीं। उम्र का खयाल किया न अपनी तबीयत का। बस जुटी रहीं। अब जब वे लोग चले गए हैं तो पड़ गई हैं। शरीर से, मन से टूट गई हैं। इस बार भैया पूरे पाँच साल बाद आए थे। अगली बार पता नहीं कब आएँगे। मेरे जीते जी आएँगे भी कि नहीं, यही सोचकर हलकान हुई जा रही हैं।”

“यह तो अब घर-घर की कहानी हो गई है भाभी। पता नहीं लोग अपना देश, अपना घर-परिवार छोड़कर बाहर क्यों जा रहे हैं? पीछे जो लोग छूट गए हैं, उन पर क्या बीत रही है, इससे किसी को कोई मतलब ही नहीं है। ठीक है, भाभी आप अपना और आंटी का खयाल रखना। किसी दिन मैं और मम्मी उन्हें देखने आते हैं।”

फोन रखते ही उसका मन सुलग उठा। अपनी खुन्नस निकालने के लिए मेरी माँ को बीमार क्यों कर रहे हैं? इसका जवाब तो माँगना ही पड़ेगा। उसने तुरंत फोन लगाया, स्विच ऑफ आ रहा। दो-तीन बार यही हुआ तो उसने लैंडलाइन पर फोन लगाया—“माँ, इनसे कहिए, मुझसे बात कर लें। मैं लगा रही हूँ तो फोन स्विच ऑफ आ रहा है।”

“बेटा, वह फ्लाइट में होगा। वहाँ तो फोन बंद ही रखना होता है न!”

“फ्लाइट में? कहाँ गए हैं?”

“मद्रास। वह नया नाम क्या है मुझे याद ही नहीं रहता।”

“मद्रास किसलिए?”

“ऑफिस के काम से गया है।”

“कितने बजे की फ्लाइट थी?”

“क्या पता? घर से तो सुबह ही निकल गया था।”

उसे इतनी झुंझलाहट हुई। यह कोई जवाब हुआ, सुबह ही निकल गया था। सुबह मतलब कितने बजे? छह-सात-आठ...फिर उसने मन-ही-मन अनुमान लगाया और बारह बजे फोन लगाया। पता चला मीटिंग चल रही है। चार बजे वही जवाब मिला। जब आठ बजे डिनर चल रहा था। दूसरे दिन भी इसी की पुनरावृत्ति हुई। तीसरे दिन उसने शाम छह बजे का समय चुना—“हाँ, बोलो”, उधर से जवाब आया।

“आप क्या किसी मॉल में खड़े हैं। कितना शोर हो रहा है?”

“मैं साड़ियों की दुकान में खड़ा हूँ, और साड़ियों की दुकान में औरतें होती हैं। और जहाँ औरतें होती हैं, वहाँ शोर तो होता है। तुम अपनी कहो, फोन कैसे किया?”

“साड़ियों की दुकान में आप क्या कर रहे हैं?”

“साड़ियों की दुकान में कोई क्या करता है? साड़ी खरीद रहा हूँ।”

उसका मन एकदम लहलहा उठा। पर दूसरे ही क्षण उसकी खुशी काफूर हो गई। गौतम कह रहे थे, माँ ने कहा था, वहाँ जा ही रहे हो तो संजना के लिए साउथ की अच्छी सी साड़ी ले आना। अगले महीने उसकी शादी है न।

उसका मन एकदम बुझ गया। फिर भी उसने उत्सुकता का नाटक करते हुए कहा, “साड़ी ले ली? दिखाइए कैसी है?”

“पैक हो रही है।”

उसने खीझकर फोन रख दिया। अगले दो-तीन दिन वह रूठी ही रही। उसने रजत को भी फोन नहीं किया। पर शनिवार को बच्चे की आवाज सुनने के लिए वह व्यग्र हो उठी। उसने पहली बार उसे छोड़ा था। इतने दिनों तक वह उससे दूर कभी नहीं रही थी। उसे इतवार को अपने पास बुलाने का उसका मन हो आया।

उसने घर फोन लगाया। उसकी सास ने उठाया।

“माँ, रजत कहाँ है? जरा उसे फोन दीजिए।”

“बेटा, वह पार्क में गया है।”

“पार्क में अकेले।”

“अकेले कैसे भेज देंगे। उसके दादाजी साथ गए हैं।”

“पर बाबूजी इतनी दूर।”

ऑटो में गए हैं। ऑटो में ही आएँगे, क्या है बेटा? दिनभर तो खेलकूद में निकल जाता है, पर तुम दोनों नहीं होते हो न तो शाम को थोड़ा उदास हो जाता है। इसलिए...”

“ये अभी चेन्नई से लौटे नहीं हैं क्या?”

“कब से, मेरे खयाल से बुधवार को ही आ गया था।”

“बुधवार शाम को ही तो बात हुई थी—साड़ियों की दुकान में। पर उस समय वापसी के बारे में कुछ भी नहीं बोले थे।”

“तुम्हें पता नहीं था क्या?”

सास का यह सवाल उसने जान-बूझकर अनसुना कर दिया और बोले, “फिर आज कहाँ गए हैं?”

“आज वह अपने स्टाफ को पार्टी दे रहा है।”

“किस खुशी में?”

उसने तो व्यंग्य में पूछा था, पर माँ एकदम हुलसक्त बोलीं, “खुशी की तो बात ही है। उसका कोई बड़ा सा प्रोजेक्ट मंजूर हो गया है। कह रहा था, सब लोगों ने बहुत मेहनत की है। इसलिए पार्टी दे रहा है।”

पूरे स्टाफ को पार्टी दे रहे हैं, मतलब कोई बड़ी ही अचीवमेंट होगी। इतनी बड़ी खुशी पत्नी से शेयर करने का भी मन नहीं हुआ उनका?

ये किस बात का संकेत है?

रविवार के दिन उसने रजत को फिर से फोन लगाया। छुट्टी का दिन था। जानती थी देर से उठेगा, इसलिए नौ बजे के करीब लगाया। फोन रजत की दादी ने उठाया, बताया वह पिकनिक पर गया है।

“कहाँ, किसी पानीवाली जगह पर तो नहीं गया है?”

“नहीं तो टीचर लोग बात करती रह जाएँगी तो।”

“वह स्कूल की पिकनिक पर नहीं गया है। गौतम का एक दोस्त सपरिवार ऑस्ट्रेलिया से आया है। यहाँ के कुछ दोस्तों से मिलकर फैमिली पिकनिक प्लान की है। डैम साइट पर कोई नया होटल खुला है। वहीं गए हैं।”

पता है उसे। पिछली शादी को सालगिरह उन लोगों ने वहीं मनाई थी, पर फैमिली पिकनिक में गौतम को उसकी याद नहीं आई, क्या सचमुच अपने जीवन से गौतम ने उसे निष्कासित कर दिया है?

नाश्ते के लिए बुलावा आया तो वह चुपचाप जाकर बैठ गई। उसका चेहरा देखकर पापा ने पूछा, “रजत से बात नहीं हुई क्या?”

“वह पिकनिक पर गया है।” उसने बुझे स्वर में कहा।

“यह मौसम ही पिकनिक का है। बच्चे खूब एन्जॉय करते हैं। तुम भी एन्जॉय करो। संडे का स्पेशल नाश्ता है। और चिंता बिल्कुल नहीं करना। वे लोग खूब अच्छा खयाल रखते हैं। मुझे तो इतना आश्चर्य होता है। हमसे एक बच्चा नहीं सँभलता और वे लोग इतने सारे बच्चों को पता नहीं कैसे कंट्रोल कर लेते हैं।”

उसने यह नहीं बताया कि रजत कौन सी पिकनिक पर गया है। वह चुपचाप संडे का स्पेशल नाश्ता, यानी कि समोसा और जलेबी—एन्जॉय करने की कोशिश करने लगे।

“तुम खा रही हो कि चुग रही हो।” कुछ देर बाद मम्मी ने टोका—“घंटे भर से जलेबी का एक टुकड़ा दाँतों में दबाए बैठी हो। ध्यान कहाँ है तुम्हारा?”

“तुम कैसी माँ हो”, पापा ने कहा, “तुम्हें इतनी सी बात समझ में नहीं आती। अपने बत्तीस साल के बेटे के लिए रो-रोकर घर भर देती हो। उसका इतना नन्हा से बच्चा आठ-दस दिन से उसे देखा नहीं है।। उसे याद नहीं आएगी क्या?”

“तो भेजने की क्या जरूरत थी। उसकी पढ़ाई का ऐसा हौवा बना रखा है, जैसे बी.ए. की पढ़ाई हो।”

“मम्मी, एक बार बच्चों को स्कूल बेक करने की आदत पड़ जाती है तो बहुत मुश्किल होती है। और बी.ए. को न सही, जो भी है, उसके लिए तो वह पढ़ाई भारी ही है।”

“तुम एक काम करो बेटा।”

“क्या पापा?”

“यहाँ आसपास कोई अच्छा सा प्ले स्कूल हो तो वहाँ उसका एडमिशन करवा दो। जब यहाँ रहोगी, वह उस स्कूल में जाया करेगा। इससे यह होगा कि उसकी पढ़ाई भी बरबाद नहीं होगी और बच्चा भी पास बना रहेगा।”

“क्या बात कर रहे हैं पापा? ऐसा भी कहीं होता है।”

“ऐसा करना पड़ेगा। क्योंकि तुम्हें तो यहाँ आते ही रहना है। पापा टूर पर हों तो तुम्हें आना है। मम्मी का माइग्रेन सर उठाए तो तुम्हें आना है। मम्मी की किसी पार्टी है तो तुम्हें आना है। मम्मी के घर सुंदरकांड का पाठ है तो तुम्हें आना है। इन शॉर्ट—इस अंजुमन में आपको आना है बार-बार।”

ये आखिरी पंक्ति पापा ने अत्यंत बेसुरी आवाज में हावभाव सहित अदा की। पिंकी को तो हँसी आ गई, पर माँ एकदम चिट गई—मेरी मजाक बना रहे हो न।

मैं नाचीज तुम्हारी क्या मजाक बनाऊँगा। तुम खुद एक बड़ा मजाक बनी हुई हो। पता है, इस समय तुम बहुत सीरियस बीमार हो, इसलिए बेटी तुम्हारी सेवा पहल के लिए यहाँ रुकी हुई है।

“बीमार पड़े मेरे दुश्मन। किसने फैलाई है यह अफवाह?”

“जब परिवार की बेटी की सगाई में परिवार की बहू नदारद हो तो कुछ तो बहाना बनाना पड़ेगा।”

“तो हमें क्या सपना आया था। एक बार खबर तो करते।”

“खबर करते तो तुम कहते—जब भी लड़की यहॉँ आती है, तुम्हारे यहाँ कोई न कोई काम निकल आता है। जान-बूझकर करते हो तुम लोग?”

“माँ-बेटी दोनों चौंक गईं।”

“पापा, यह सब आपसे किसने कहा?”

“किसी ने भी कहा हो। बात सच है न। क्या हुआ था?”

पिंकी ने एक बार माँ की ओर देखा और बोली, “माँ की एक सहेली कनाडा से आई थी। उन्हें डिनर पर बुलाया था। नेचुरली वे मुझे और रजत को भी देखना चाहती थी। इसलिए ऑफिस जाते समय गौतम यह कहने आए थे कि शाम को तैयार रहना, मैं ऑफिस से आते समय दोनों को लेता जाऊँगा। सुबह ऑफिस जाते हुए छोड़ जाऊँगा।”

“फिर?”

“मम्मी ने मना कर दिया।”

“क्यों?”

“उस दिन मेरे यहाँ भी कार्यक्रम था। शाम को मैंने पंकज और पल्लवी के लिए पार्टी रखी थी। सारे रिश्तेदारों और मोहल्लेवालों को बुलाया था।”

“तो उसके लिए पिंकी को रोकने की क्या जरुरत थी? वह तो उन लोगों से मिलती ही रहती है।”

“घर में इतना बड़ा कार्यक्रम हो और...मैं कहाँ गया हुआ था क्या?”

“हाँ, आप चोपड़ा अंकल के घर नागपुर गए थे।”

“हाँ, मातमपुरसी पर गया था। तो फिर गौतम लेने नहीं आया, पर तुम्हें तो अपने घर का पता मालूम है न। टैक्सी करके चली जाती।”

“चली तो जाती, पर मम्मी तांडव मचा देतीं। यही न।”

“पापा, भैया-भाभी इतने दिनों बाद आए थे। उनके सामने तमाशा हो जाता तो अच्छा नहीं लगता।”

“काश! इतनी फिक्र तुमने अपनी सास की होती। उस दिन तुम चली जातीं तो उनका मन भी रह जाता और मान भी। अपनी सास को खुश करने का एक सुनहरा अवसर तुमने गँवा दिया। व्हेरी सॉरी।”

“अब बस भी कीजिए। तब से जुटे हैं। उपदेश देने के लिए यही समय मिला है। लड़की बेचारी एक कौर नहीं खा पाई है।”

“मत खाने दो। एक दिन नहीं खाएगी तो दुबली नहीं हो जाएगी। पर सच तो सुनना पड़ेगा, चाहे कड़वा क्यों न हो?”

“पिंकी” तीन बजे मम्मी ने आवाज दी—“बेटा, जरा चाय तो बना दे। तब तक मैं तैयार हो जाती हूँ।”

“इतनी दोपहर में कहाँ जा रही हो?”

“शुक्लाजी के यहाँ सुंदरकांड है। तू भी चल, मन शांत हो जाएगा।”

“मेरी चिंता मत करो। मैं बिल्कुल शांत हूँ। पर इतवार को सुंदरकांड कौन रखता है?”

“मिसेज शुक्ला जॉब में हैं न। उन्हें शनिवार की भी छुट्टी नहीं होती।”

“अच्छा तो है। उसी बहाने घर में रहनेवाले पतियों को थोड़ी शांति मिल जाती है।” पापा की इस बात पर मम्मी पलटवार करती, “इससे पहले ही उसने कहा, अब बहसबाजी में मत पड़ो और तैयार हो जाओ। भगवान् की चर्चा में जा रही हो तो शांत मन से जाओ। मैं चाय बना रही हूँ।”

मम्मी के जाने के बाद उसने पापा को आवाज दी—“सॉरी पापा, मैंने आपकी भी चाय बना दी है। (लो, आ जाइए)”

“इतनी जल्दी।” पापा ने बाहर आते हुए कहा।

“दरअसल मुझे आपसे कुछ जरूरी बात कहनी है। हनुमानजी ने मेरी प्रार्थना सुन ली है और कम-से-कम दो घंटे के लिए मम्मी को बाहर भेज दिया है, इसलिए प्लीज बैठ जाइए।”

“बोलो!” पापा ने अपना चाय का कप उठाते हुए कहा।

“पापा, सुबह मैं उदास जरूर थी, पर रजत के लिए नहीं। वह तो मजे में है। मैं घर में नहीं होती हूँ तो उसके खूब लाड़ होते हैं। वह मुझे याद भी नहीं करता।”

वह चुप हो गई। पापा उसके अगले वाक्य की प्रतीक्षा करने लगे।

“पापा, इन दिनों मुझे ऐसा लगने लगा है कि मैं उस घर के लिए, उन लोगों के लिए, गैरजरूरी हो गई हूँ।”

“मतलब।”

“देखिए, संजना की सगाई हुई, मुझे खबर भी नहीं की गई। अगले दिन उसके ससुरालवाले डिनर पर थे। मुझे बताया नहीं गया। गौतम चेन्नई गए थे, मुझे माँ से पता लगा। वे कब लौटे यह भी मुझे मालूम नहीं। कल रात उन्होंने अपने स्टॉफ को एक पार्टी दी। उनका कोई बड़ा प्रोजेक्ट पास हो गया था, पर उस खुशी में उन्होंने मुझे शामिल नहीं किया। और आज तो हद ही हो गई।”

“आज, आज क्या हुआ?”

“पापा, रजत स्कूल की पिकनिक पर नहीं गया है। इनके एक एनआरआई मित्र सहपरिवार शहर में अपने घर आए हुए हैं। तो दोस्तों ने मिलकर आज एक फैमिली पिकनिक का आयोजन किया है। इन्होंने उसमें भी मेरा रहना जरूरी नहीं समझा।”

कहते-कहते रो पड़ी थी वह। पापा कुछ क्षण चुप रहे। फिर बोले, “बेटा! तुम्हारी शादी के कितने साल हो गए हैं?”

“छह क्या?”

“इतने सालों में तुमने घर में अपने लिए क्या जगह बनाई है?”

“मैं समझी नहीं, पापा।”

“बेटा तुम घर से दो दिन के लिए, चार दिन के लिए, दस दिन के लिए और अब तो महीने भर से बाहर हो। पर इससे घरवालों को कोई फर्क नहीं पड़ता। किसी को तुम्हारी कमी नहीं अखरती, तुम्हारे बिना कोई काम नहीं रुकता, तुम्हें कोई भी, यहाँ तक कि तुम्हारा बेटा भी तुम्हें याद नहीं करता। इसका मतलब यही है कि तुम बहुत पहले से घर के लिए, उन लोगों के लिए गैरजरूरी हो गई हो। बस इसका अहसास तुम्हें अब हुआ है।”

पिंकी फटी-फटी आँखों से पापा को देखती रह गई।

“बेटा, गृहिणी वह होती है, जो अगर एक दिन भी घर में न रहे तो हाहाकार मच जाता है। तुम्हें याद है, पिछले साल जब गौतम की नानी माँ नहीं रही थी और तुम्हारी सास दस-बारह दिनों के लिए गाँव चली गई थीं—तब घर में कैसी अफरा-तफरी मची थी?”

“याद मत दिलाइए पापा, मैं तो उन दिनों एकदम पगला गई थी।”

“उस समय के कुछ किस्से तुमने ही मुझे सुनाए थे। तुम्हें यह भी पता नहीं था कि रोज घर में कितना दूध लिया जाता है। धोबी के कपड़े किसमें दर्ज किए जाते हैं यह भी तुम्हें मालूम नहीं था। हर पूर्णिमासी को पंडितजी के यहाँ सीधा जाता है, यह बात भी तुम्हें ससुरजी ने याद दिलाई थी और एक दिन घर में आज खत्म हो गया था तो तुम्हें यही पता नहीं था कि आज घर में रेडीमेड आता है कि गेहूँ पिसवाया जाता है। तुम्हारी कुक ने विमला मौसी ने स्टोर-रूम से गेहूँ निकालकर दिए थे और शाम को अपने बेटे को पिसवाने के लिए भेज दिया था। शादी के पाँच साल बाद भी घर के बारे में तुम्हें इतनी कम जानकारी थी, यह गर्व करने की बात थी कि शर्म करने की तुम्हीं सोचो।”

वह दिन भर माँ ही लगी रहती है—

“तो और क्या करेगी बेचारी। कोई हाथ बँटानेवाला तो हो तुमने कभी कहा कि सुबह का नाश्ता मैं बनाऊँगी या कि शाम का खाना मुझ पर छोड़ दीजिए। और तुम कह भी दिया तो वे भरोसा कैसे करेगी। आधे दिन तो तुम घर से गायब रहती हो। वे गाँव से लौटे नहीं कि तुम यहाँ चली आई। अच्छा लगता है।”

“मम्मी मातमपुरसी पर आई थीं तो बोलीं, बहुत थक गई हो। चार दिन चलकर आराम कर लो।”

“तुम मना तो कर सकती थीं। कह सकती थीं कि मेरा अभी आना मुमकिन नहीं है। माँ इतने दुख भरे वातावरण से आई है। मैं उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकती। तुमने इस घर की समस्याओं को कभी प्राथमिकता नहीं दी। कभी नहीं कहा कि माँ के नवरात्र का उपवास चल रहा है, मेरे घर में रहना जानती हो। घर में सुतहि बार रहे हो। मैं घर छोड़ नहीं सकती। बाबूजी के दोस्त खाने पर आ गए हैं। मुझे माँ का हाथ बँटाना होगा, तुमने इस तरह कभी सोचा ही नहीं। बस मम्मी का फोन आया कि तुम दौड़ी चली आई हो।”

“मम्मी फोन पर रोने लगती हैं तो फिर”

“वे तुम्हारी कमजारी समझ गई हैं। इसलिए तुम्हारा इमोशनल ब्लैकमेलिंग करती हैं। एकाध बार उन्हें निग्लेक्ट करो, कोल्ड शोल्डर दो समझ जाएँगी। एक और बात, पंकज आया था। भाई-बहन साथ रह लें, इस विचार से तुम्हें बुला लिया था। पर अब पंकज को गए भी दस-बारह दिन हो गए हैं। यह मत समझो, तुम्हारा यहीं रहना मुझे बुरा लगता है, बहुत अच्छा लगता है तुम रहती हो, आधा दिन शांति से कट जाती है। पर बेटा मुझे बहुत गिल्टीफील होता है। एक अपराध-बोध होता है, लगता है सामनेवालों के सौजन्य को हम गलत फायदा उठा रहे हैं।”

“पापा, मैंने आपको बताया नहीं था, पर भैया गए हैं, उस दिन एक कांड हो गया था।”

“कांड, कैसा कांड?”

पिंकी ने हकलाते हुए ही सारी बात बता दी। पापा बहुत नाराज हुए, यह बात तुम मुझे अब बता रही हो। उस समय बताती तो मैं खुद तुम्हें घर छोड़ आता। तुम्हारी मम्मी के रोने-धोने की परवाह नहीं करता। गाड़ी पार्क करके लौट रहा था तो माथुर साहब मिल गए। पाँच-छह मिनट उनसे बात करता रहा। लौटा तो गौतम रजत के साथ दरवाजे पर मिल गए। मैंने चाय के लिए कहा तो बड़ी रुसवाई से सॉरी कहकर चले गए। उस समय बहुत बुरा लगा था। वह रोज मेरे मन में बना हुआ था। उस दिन तुमने संजना की सगाई के बारे में बताया। तुम्हें उसमें बुलाया नहीं गया, इस बात का मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने उनसे फोन पर बात की। तब उन्होंने कैनडा वाली मौसी का किस्सा सुनाया। यह कोड वे फिर भी छिपा गए। यह उनका बड़प्पन है। मुझे इस बारे में पहले पता होता तो मैं उनसे जवाब तलब नहीं करता।”

वह सिर झुकाए सुनती रही।

“अब क्या इरादा है?”

वह कुछ नहीं बोली।

“घर जाना चाहती हो न।”

उसने एक बार पापा की ओर देख और नजरें झुका लीं।

“अपने घर जाने के लिए भी तुम्हें निमंत्रण की आवश्यकता है।” वह चुप। “देखो बेटे, रिश्ता को इतना भी मत खींचो कि वे तनाव न झेल सकें और टूट जाएँ। रहीम का दोहा पढ़ा है न—“टूटे से फिर न जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाए।”

“मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा, पापा।”

“तो मेरी समझ से काम लो। अपना बैग तैयार कर लो। कल ऑफिस जाते हुए मैं तुम्हें छोड़ते हुए चला जाऊँगा, लेकिन एक बात का खयाल रखना। तुम्हारी मम्मी को इस बात की हवा न लगने पाए। नहीं तो वह नौटंकी शुरू कर देगी और तुम्हारे पाँव रुक जाएँगे।”

“जी।”

“एक बात और मन को एकदम धो-पोंछकर ले जाना। कोई गिले-शिकवे नहीं, कोई ताने-उलाहने नहीं। क्योंकि अगर बहस पर उतर आओगी तो उनके पास भी कहने के लिए बहुत कुछ है, तुमसे ज्यादा ही है। तो फिर डन। सुबह तैयार रहना।”

सुबह आठ बजे से पापा ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया—

“नाश्ता लगा दो भाई। मुझे आज जल्दी जाना है।”

“इतनी जल्दी।”

“हाँ, घर में ब्रेड तो होगी न। वही सेंक दो। पिंकी कम ऑन, देर हो रही है।”

पिंकी आकर पापा के सामने बैठ गई।

“ये सुबह-सुबह तैयार होकर कहाँ जा रही है?”

“अपने घर जा रही है और क्या? तुम्हें क्या लगा, वह हमेशा तुम्हारे यहाँ रहने आई है। वह रहना चाहेगी भी तो मैं उसे रहने नहीं दूँगा।”

“अपने घर जाए, शौक से जाए। पर इतनी जल्दी क्या है?” मम्मी ने प्लेटे लगाते हुए कहा, “मैं ऑफिस जाते हुए उसे घर छोड़ता जाऊँगा, इसलिए जल्दी निकल रहा हूँ।”

“पर अभी मेरा नहाना-धोना भी नहीं हुआ है।”

“तुम्हारे नहाने का और हमारे जाने का क्या संबंध है। हद करती हो।”

“बसंती आएगी तो दरवाजा कौन खोलेगा?”

“बसंती के आने के बाद नहा लेना।”

“पूरा घर उसके भरोसे छोड़कर बाथरूम में घुस जाऊँ?”

“तो उसके जाने के बाद नहा लेना। पूरा दिन तुम्हारे पास है। दिनभर नहाती रहना। पिंकी चलो, देर हो रही है। इस बहस का कोई अंत नहीं है।”

“बाय मम्मा!” पिंकी ने कहा और बैग उठाकर चल दी। मम्मी फटी-फटी आँखों से उसे देखती रही। अगर वह गले लगती तो उनका रो पड़ना निश्चित था, इसलिए पिंकी ने दूर से टाटा कर लिया।

गाड़ी में बैठने के बाद पिंकी ने कहा, “पापा मुझे, मम्मी की बहुत चिंता हो रही है। उन्हें काउंसलिंग की सख्त जरूरत है। भैया यहाँ नहीं हैं, इसलिए वे बहुत इनसिक्योर फील कर रही हैं। इसीलिए मुझे पकड़े रहना चाहती हैं।”

“तुम्हें क्या लगता है, पंकज यहाँ होता तो स्थितियाँ दूसरी होतीं? बताओ कौन सी बहू इतनी पझेसिब्ट सास को बरदाश्त कर सकती है। पल्लवी का भी वही हाल होता, जो आज गौतम का हो रहा है। फिर या तो वे लोग अलग हो जाते या बाहर है, यही अच्छा है। कम-से-कम भ्रम तो बना रहता है।”

ससुरालवाले घर के सामने गाड़ी रोकते हुए पापा बोले, “बेटा मेरी बात याद है न। कोई बहसबाजी नहीं, कोई शिकवा-शिकायत नहीं। एकदम ठंडे मन से घर में प्रवेश करो।”

दरवाजा उसकी सास ने ही खोला, “अरे भाई साहब आप! आइए-आइए, देखिए जी, कौन आया है?” उन्होंने पति का ध्यान खींचा।

“आपको आपकी अमानत सौंपने आया हूँ।” पापा ने दोनों को प्रणाम करते हुए कहा।

“अच्छा किया, इसी बहाने आप आए तो। आइए बैठिए न।”

“नहीं भाभीजी, ऑफिस जाऊँगा।”

“चाय पीकर चले जाइएगा। ऐसे मैं नहीं जाने दूँगी।”

“ठीक है, आपकी आज्ञा टाली भी तो नहीं जा सकती।” पापा ने कहा, और जब पिंकी सास-ससुर के पैर छूकर खड़ी हुई तो बोले, “जाओ बेटा, जल्दी से चाय बनाकर ले आओ।”

“अरे वह क्यों बनाएगी? अभी तो आई है।”

“तो कौन सा पैदल चलकर आई है। पिंकी बेटा, फटाफट बनाकर ले आओ। नहीं तो मैं लेट हो जाऊँगा।”

पिंकी चाय बनाने चली गई। वे तीनों बैठ गए।

“बहनजी कैसी हैं?” पिंकी की सास ने पूछा।

“वैसी ही हैं और वैसी ही रहेंगी। यह असाध्य रोग है। ठीक नहीं होगा।”

“अरे, ऐसा क्या?”

“जब तक वे इस सत्य को स्वीकार नहीं कर लेती कि बेटा अब विदेश में बस गया है, लौटेगा नहीं, तब तक वे ठीक नहीं होंगी।”

“इस सत्य को स्वीकारना इतना आसान नहीं है।”

“वही तो, अगले साल रिटायर हो रहा हूँ। तब उन्हें घुमा लाऊँगा। बेटे की गृहस्थी दिखा दूँगा।”

“आप भी अपना ग्रीन कार्ड बनवा लीजिए।” समधी बोले।

“नहीं भाई साहब, दो-चार महीने घूमने जाना ठीक है। मैं अपना देश छोड़कर हमेशा के लिए वहाँ नहीं रह सकता। पिंकी की माँ चाहेगी तो उन्हें छोड़ आऊँगा। फिर उनके रोज के व्रत अनुपालनों से घबराकर बहू खुद उन्हें यहाँ छोड़ जाएगी।”

तभी अपना ब्रीफकेस लेकर गौतम नीचे उतरे—“अरे, पापाजी! आप कब आए?”

“तो आपने क्यों तकलीफ की? मुझे बता देते, मैं ले आता। आपको तो उलटा पड़ा होगा।”

“गाड़ी में चार-पाँच किलोमीटर कम ज्यादा हो जाए तो क्या फर्क पड़ता है बेटा। इसी बहाने आप दोनों के दर्शन हो गए।” उन्होंने समधी-समधिन को हाथ जोड़ते हुए कहा।

उसी समय पिंकी चाय ले आई। “बेटा, जाओ गौतमजी का नाश्ता लगा दो। टिफिन तैयार कर दो। चाय पीकर मैं निकल जाऊँगा।”

पिंकी समझ गई। पापा उसे संकेत दे रहे हैं कि उसे किस तरह अपने को घर में व्यस्त करना है, स्थापित होना है। वैसे तो गौतम का नाश्ता भी तैयार था और टिफिन भी।

“आओ बेटा, नाश्ता कर लें।” गौतम और पापा के निकल जाने के बाद माँ ने कहा।

“मैं घर से करके चली थी।” उसने प्लेटें लगाते हुए विनम्रता से कहा।

“थोड़ा सा हमारे साथ कर लो। मुझे मालूम है, घर से चलते समय कुछ खाया नहीं जाता। बस मुँह जुठारना होता है।”

माँ ठीक कह रही थीं। उससे सचमुच घर पर कुछ खाया नहीं गया था, पर उसका कारण था, मम्मी-पापा की जुगलबंदी। वह और पापा दोनो ही बस मुँह जुठारकर ही उठे थे।

माँ ने जैस उसके मन को पढ़ते हुए कहा, “मैं गौतम के साथ भाई साहब का भी नाश्ता लगा रही थी, पर वे जल्दी में थे। चाय के लिए ही बड़ी मुश्किल से राजी हुए।”

यहाँ से ऑफिस बहुत दूर पड़ता है न। करीब-करीब दुगना अंतर हो जाता है। कहते हुए याद आया, जल्दी के कारण आज पापा का टिफिन भी नहीं बन पाया था। बेचारे पापा, आज कैंटीन के खाने पर ही गुजारा करना पड़ेगा। शाम को भी मम्मी का मूड कैसा रहेगा, पता नहीं। कैंटीन में कम-से-कम शांति से तो खा सकेंगे।

बारह बजे रजत स्कूल से लौटा। उसे देखते ही खुशी से छलक उठा और दौड़कर उससे लिपट गया। और थोड़ी देर बाद ही उसकी रुलाई फूट पड़ी और वह हिचकियाँ ले लेकर रोने लगा, उसके भी आँसू निकल आए।

“बहुत याद करता था तुम्हें, पर हमने जान-बूझकर नहीं बताया। तुम्हारा मन बँट जाता और फिर तुम मम्मी की देखभाल ठीक से नहीं कर पातीं।”

तो मम्मी की बीमारी का सचमुच एक हौआ खड़ा कर दिया गया है, घरवालों के लिए भी।

खाना खाने के बाद वह रजत को लेकर कमरे में आ गई। पूरी दोपहर रजत उससे चिपटकर सोता रहा। उसने माँ को करवट भी नहीं लेने दी, जैसे उसे डर हो कि वह फिर उसे छोड़कर चली जाएगी। उसका मन भी वात्सल्य से ऊब-डूब हो रहा था। सोच रही थी इसे छोड़कर वह इतने दिन कैसे रह पाई। क्या उसका अभिमान ममता पर भारी पड़ गया था?

चार बजे उसने रजत के हाथ-मुँह धुलवाकर कपड़ा बदले और नीचे ले आई। उसका दूध गरम करते-करते उसने चाय का पानी भी चढ़ा दिया। दूध पीकर रजत पड़ोस में खेलने चला गया। उसने माँ-बाबूजी को चाय दी तो माँ बोलीं, “बेटा, जाओ अब चाय पीकर तुम भी फ्रेश हो जाओ। थकी-थकी सी लग रही हो।”

वह समझ गई। माँ चाहती है कि गौतम के आने से पहले वह तैयार हो जाए। कमरे में आकर उसने बाल सँवारे, मुँह-हाथ धोया और कपड़े बदलकर प्रतीक्षा करती रही।

कोई छह बजे गौतम ऑफिस से लौटे। एक क्षण को दरवाजे पर खड़े होकर उसे देखते रहे, फिर बोले—

वो आए हमारे घर पर, खुदा की रहमत,

कभी हम उनको, कभी घर को देखते हैं।

वह एकदम फट पड़ी—“क्या मतलब! घर सिर्फ आपका है, मेरा नहीं है।”

“क्या औरत है यार। इतन खूबसूरत शेर का कचरा कर दिया।”

“सॉरी, उसने सर झुकाकर कहा। पापा ने कितनी-कितनी समझाइश दी थी—कोई ताना-उलाहना नहीं, कोई गिला-शिकवा नहीं। क्योंकि अगर तुम बोलोगी तो उनके पास भी कहने के लिए बहुत कुछ है।”

दरअसल वह सुबह से तनाव में थी, गौतम का सामना करने से कतरा रही थी और जब इस शेर के साथ सामना हुआ तो बाँध टूट गया।

गौतम उसके सामने आकर खड़े हो गए और बोले, “तुमने अभी पूछा कि क्या यह तुम्हारा घर नहीं है? तो जवाब यह है कि हाँ—यह तुम्हारा घर नहीं है, होस्टल है। होस्टल जहाँ बच्चे मजबूरी में रहते हैं और हर पल छुट्टियों की प्रतीक्षा करते रहते हैं। छुट्टियां लगते ही घर भागते हैं और फिर जब छुट्टियाँ खत्म होती हैं, तब बेमन से लौटते हैं। उनके माता-पिता उन्हें जबरदस्ती छोड़ गए हैं। जैसे आज पापाजी तुम्हें छोड़ गए हैं।”

उसका चीखने का मन हुआ कि पापा मुझे गोद में बिठाकर नहीं लाए थे। मैं अपनी मरजी से, अपने पैरों से चलकर आई हूँ। पर उसने बमुश्किल तमाम अपने पर काबू किया। एक गलती कर चुकी थी। दूसरी करना नहीं चाहती थी।

तभी नीचे से आवाज आई। गौतम ने कहा, “शायद माँ बुला रही है। उनसे कहो, बस फ्रेश होकर आ रही हूँ।”

वह कमरे से बाहर आई तो देखा, सीढ़ियों के बीच में जो चौरस जगह होती है, वहाँ माँ ट्रे लेकर खड़ी है।

“अरे, आपने क्यों तकलीफ की? ये फ्रेश होकर बस नीचे आ ही रही थी।”

“नीचे क्यों आएगा? उसे आराम करने दो। ट्रे ले जा सकोगी न।”

“जी”, उसने कहा और ट्रे लेकर सधे कदमों से ऊपर आ गई। गौतम ने वॉशरूम से लौटकर चाय का ट्रे देखा तो बोला, “अरे, मैं नीचे आ रहा था न।”

“माँ आधे रास्ते ले आई थीं।”

“माँ ने सोचा होगा, दोनों अरसे बाद मिले हैं, थोड़ा प्रेमालाप होने दो। उन्हें क्या मालूम, यहाँ रात्र झिंझोटा चल रहा है।”

“चाय ले लीजिए, ठंडी हो रही है।” उसने जान-बूझकर अपनी बात को अनसुनी करते हुए कहा।

“तुम नहीं लोगी।”

“थोड़ी सी ले लेती हूँ। वैसे चार बजे बाबूजी के लिए बनाई थी, तब ली थी।”

“मेरी भी ऑफिस में बहुत हो जाती है, फिर भी घर आकर चाय पीने का मन करता है।”

कुछ क्षण मौन में कटे, फिर गौतम ने पूछा, “तुमने अपना सूटकेस अनपैक नहीं किया, क्या इरादा है?”

मन हुआ कह दूँ, यह तो आप पर निर्भर है। पर उसने मन को शांत किया और कहा, “समय ही नहीं मिला। पूरी दोपहर रजत मुझसे चिपका रहा। एक मिनट भी नहीं छोड़ा। उसने मुझे बहुत मिस किया न।”

“औरों ने भी किया, बहुत न सही, थोड़ा तो किया।”

“पर और लोग बताएँगे थोड़े ही। इसमें उनकी हेठी होती है न, बच्चा बेचारा सहज भाव से अपनी बात कह गया।”

“मन की बात कह देने से कोई छोटा नहीं हो जाता। पर मन की बात कहने के लिए हिम्मत चाहिए।”

“मैंने वह हिम्मत जुटाई और पापा से कहा, अब मुझे अपने घर जाना है। क्योंकि जानती थी कि पापा तो कभी नहीं कहेंगे कि बहुत हुआ, अब अपने घर जाओ।”

“माताराम मान गईं?”

“उन्हें हवा ही लगने दी। जब चलते समय टाटा किया, तब उन्हें पता चला और आज मैंने दिनभर अपना फोन भी स्विच ऑफ करके रखा हुआ है।”

“बेटा, तुम्हारी बहादुरी की तो दाद दे रही हूँ, इसके लिए इनाम तो बनता है। आँख बंद करो।”

“क्यों?”

“कहा न आँख बंद करो।”

“कुछ ऐसी-वैसी हरकत मत करना। रजत अभी आने वाला है।”

“आँखें बंद करो।” इस बार उनकी आवाज में सख्ती थी। उसने आँखें बंद कर ली और धड़कते दिल से प्रतीक्षा करने लगी। कुछ ही पलों में उसने अपने आसपास एक रेशमी सरसराहट अनुभव की। कुछ ही पलों में उस सरसराहट ने उसे घेर लिया। उसने आँख खोलकर देखा, एक रेशमी साड़ी में गौतम ने उसे कुरसी समेत लपेट दिया था।

मोर पंखी रंग की साड़ी थी। गहरे नीले रंग की जरी बॉर्डर थी।

“हाय, कितनी प्यारी साड़ी है।”

“पसंद आई।”

“कब खरीदी?”

“उसी दिन जब साड़ी की दुकान से बात हुई थी।”

“पर आपने तो सिर्फ संजना की साड़ी के बारे में बताया था।”

“यह हमारा सरप्राइज आइटम था।”

उसे याद आया, उस दिन वह एक ही पल में कितनी खुश और कितनी निराश हो गई थी। अपने ऊपर शर्म आई उसे। इतने सालों में भी पति को नहीं पहचान पाई है। उस दिन एयरपोर्ट से लौटने के बाद नाराज होकर गए थे। पर उसके लिए साड़ी लाना नहीं भूले।

साड़ी तह कर उसने कुरसी पर रखी और पति की छाती में मुँह छिपाकर कहा, “आपने ठीक कहा था। यह मेरा घर नहीं, होस्टल है। पर बेमन से हो सही, मैं बार-बार, यहाँ क्यों लौट आती हूँ, जानते हो?”

“बताओ।”

“मुझे रूममेट बहुत अच्छा मिला हुआ है।”

“वाऊ, लेटअस सेलीब्रेट दिस प्रेशस मोमेंट।”

और फिर सेलीब्रेशन

जिंदगी एक बार फिर उत्सव बनने जा रही थी।

 

१२०, मदनलाल ब्लॉक, एशियाड विलेज

नई दिल्ली-११००४९

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