रामलीला

रामलीला

गोबरहा और खुराँव—ये दोनों गाँव एकदम पास-पास हैं। अंतर केवल एक बगीचे का है। दोनों में एक ही गोत्र के किसान हैं और प्राय: समान हसब-हैसियत के हैं। दोनों गाँव मिलकर रहते हैं, कोई दुराव नहीं रहता। परंतु गोबरहा गाँव वालों के सामने खुराँव का जिक्र आता है तब वे ऐसा भाव प्रकट करते हैं, जैसे उनके सामने वे ‘कुछ नहीं’ के बराबर हैं। कहते हैं, “अजी, इन खुराँववालों को तो हमारे गाँव का एक अदना बच्चा भी खड़े-खड़े चौराहे पर बेच देगा।” ऐसे अवसरों पर गोबरहा गाँव का हर आदमी यह भी कहते पाया जाता है कि हमारे गाँव का पागल भी उस गाँव के पागल को पाठ पढ़ा देता है।

आखिर एक दिन इस रहस्य का परदा खुल गया। मालूम हुआ कि बीस वर्ष पहले सचमुच गोबरहा में एक ऐसा सनकी व्यक्ति था, जो अपने गाँववालों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़-बढ़कर बातें करने का काफी दिलचस्प मसाला छोड़ गया।

बात उन दिनों की है, जब खुराँव की मठिया पर एक महंतजी बड़े मशहूर थे। देखने में एकदम दिव्य, परंतु परम सनकी। सच बात तो यह है कि ऐसे लोगों को होश में रहने की जरूरत भी नहीं। अकेला शरीर। लंबी जमींदारी। अपार संपत्ति। गद्दी का ऊँचा ओहदा यानी भगवान् से भी एक सीढ़ी ऊँचा गुरुपद प्राप्त। समस्त गाँव के कुलपूज्य, तिस पर भी गाँजे की संगति। गाँजा तो जैसे इस गद्दी की परंपरा ही रही और इसीलिए गाँव वालों के इस कथन में अचरज की कोई बात नहीं कि इस मठिया का जो भी महंत होता है, सनक जाता है।

तो हमारे महंतजी ने इस परंपरा की खूब रक्षा की। अंतर इतना ही है कि चिलम के दाँव पर खेत के बीघों के कुछ अंक झुक गए और जमाने के फेर से प्रतिष्ठा पर भी थोड़ी आँच आई। तब भी लक्ष्मी पैर तोड़कर पड़ी रहती थीं। वैशाख में जब अन्न खलिहान से आता, कहीं रखने की जगह नहीं रह जाती। किसी ने पूछा कि गुरुजी, इतना अन्न कैसे खर्च करेंगे? महंतजी ने चट चिलम का मुँह दिखा दिया और कहा, “बच्चा! इस पर रखते ही सब धुआँ बनकर उड़ जाएगा।”

ठाकुरजी का वह दरबार सबके लिए खुला रहता था। यह बात दूसरी थी कि भगवान् के लिए कम, परंतु उनका राग-भोग पाने के लिए ही अधिकांश लोग मँडराते रहते थे। गाँव-देहात के सारे चिलमचट्ट, सनकी, बेकार, बातफरोश, खाऊमल और शरीफ निकम्मों का वह अड्डा था। चिलम की सोहबत से महंतजी की महफिल सदा रौशन रहती थी। बाबा की गद्दी के नीचे, उनकी चरण-सेवा में भक्तों की यह भीड़ उस समय तक लगी रहती थी, जब तक उनके सनकने का सीजन नहीं आ जाता था।

जब लात, मुक्का, पनही, थप्पड़ और डंडों के साथ चुनी हुई गालियों की मूसलधार वर्षा होने लगती तो बड़े-बड़े धीर भक्तों का धीरज भी छूट जाता था। ऐसे में भी गाँजे के कुछ विकट रसिक बाबा के समस्त प्रहारों को आशीर्वाद स्वरूप झेलकर भी डटे रहते थे। महंतजी के ऐसे ही भक्तों में एक थे—गोबरहा गाँव के मर्दाना बाबाजी।

एक दिन कार्तिक के महीने में मर्दाना बाबा को ऐसा लगा कि वे भाँड़ हो गए और गाँव के पूरब बगीचे में अकेले कूद-कूदकर लगे घोड़ा छोड़ने। कहीं से एक लड़का आ गया। महाराज को इस विकट स्थिति में देखकर सिर पर पैर रखकर भाग खड़ा हुआ, पर क्षण भर भी नहीं बीता कि उसके नेतृत्व में बालकों का एक भरपूर दल आ धमका। अब पूरी जमात रम गई और रंग आ गया। ताली बजने लगी। लकड़ी के डंडे और सिकटे बजने लगे। संयोग की बात थी, एक पुराना टीन भी मिल गया। अब बाबा की भँड़ैती पूरे जोर पर थी। वे अपनी इस कला का प्रदर्शन गुरु महाराज के पास भी करना चाहते थे और यह पूरा जुलूस शंकरजी की बारात की भाँति खुराँव गाँव की ओर चला। चलना था ही कितनी दूर? बात की बात में पहुँच गए।

घोड़े की भाँति हिनहिनाते और उछलते हुए जिस समय मर्दाना बाबा मठिया पर पहुँचे, महँगी दम लगा रहे थे। यह उनकी मौजों का प्रलयकाल था, अत: बिहारी लोगों ने किनारा कस लिया था। यही कारण था कि वे अकेले थे। उन्होंने आव देखा न ताव, चट चिलम रखकर गरदन पर सवार हो गए। यही नहीं, “बड़ा कटहा घोड़ा है” कहकर एकाध एड़ जमा भी दिया। लड़कों का दल सहमा-सहमा सा दूर से ही आनंद लूट रहा था। बाबा ने दो-चार चक्कर लगाए और अंत में पसर गए।

“इसी ताकत पर फुर्र-फुर्र करता था रे, ऊँट की औलाद।” महंतजी बोले और धूल झाड़ू कर खड़े हो गए। मर्दाना बाबा कब चूकने वाले थे। बोले—

दाना घास जब पाऊँ,

तब दुलकी चाल दिखाऊँ।

“अच्छा, तब आ।” और दोनों धीर धर्मटाट पर जुट गए, तमाम कारपरदाज और नौकर-चाकर बाहर खेत की बुआई पर गए थे। अब थी बस मठिया और उसके बादशाह। खोल-खोलकर लगे निकालने—दही, चीनी, किशमिश, लड्डू भूँजा, गुड़-बताशा, मुरबा, घी और अचार आदि। लड़कों की थोड़ी हिम्मत बढ़ी और थोड़ा सरककर पास आ गए। बाबा की जीभ से पानी गिरने लगा।

“ऐसा इंतजाम तो राजा जनक ने भी जानकी की शादी में नहीं किया था।” बोले।

“तूने जानकी की शादी देखी है?”

“हाँ, देखी है।”

“कहाँ देखी है?”

“रामनगर में।”

“हम भी जानकी की शादी करेंगे। पहले लो यह प्रसादी।” और हर चीज महंतजी खुले हाथों बाँटने लगे। बालवृंद को मुँहमाँगी मुराद मिली और कहने की आवश्यकता नहीं कि बाबा भी खूब डटे।

अब निकली एक हाथ की चाँदी की मढ़ी हुई काली चमकती चिलम और मला गया भरपूर गाँजा।

“बम-बम शंकर, गड़े न काँटा-कंकर।” महंतजी ने जमकर दम लगाया और चिलम से एक बालिश्त ऊँची लपट उठ गई। मुँह मानो भट्ठे की चिमनी हो गया और धुआँ जैसे बादलों के बच्चे, जो घर में घुस आए हों। बाबा की अब बारी रही। चिलम दबोचकर जोर मारा कि चिलम पर ही लट गए। महंतजी ने एक लड़के को बुलाया, “लो बच्चा! बूटी है।”

लड़का पीछे सरकने लगा। अब महंतजी गरम हो उठे, “ऐं! फतिंगे की जात, कहाँ जाता है? धत्तेरी...।” बिजली की तरह झपटे, परंतु पहले से ही सजग बालमंडली हवा हो गई।

“जाओ साले, अकेले ही रामलीला होगी।” महंतजी बड़बड़ाए और फाटक बंद कर लौट आए।

“हाँ महाराज, कुतिया तो है ही।” बाबा ने मुसकराकर अर्ज किया।

“अरे मुरादाबाद का मल्लू! हनुमान तो मैं हूँ। जानता नहीं है?” महंतजी ने सीना तान दिया।

“तब आज कौन लीला होगी?”

“जो भी हो। लगे लंकाकांड।”

बरामदे में एक दरी बिछ गई। उस पर एक चौकी रखी गई। चौकी पर कालीन डाल दिया गया और रामायण की एक पोथी रख दी गई। महंतजी ने एक लाल रंग की जाँघिया कस ली। एक कच्चे बाँस की छड़ी से पूँछ बना ली और गदा लेकर फाँदने लगे।

मर्दाना बाबा ने जोर लगाकर पूरी लय बाँधते हुए चौपाई बोलकर रामलीला का शुभारंभ किया—

कपि बंधन सुनि निशिचर धाये।

कौतुक लागि सभा ले आये॥

फिर बोले, “देखो हनुमान, तुम बँधकर आ गए। मैं रावण हूँ। तुम बहुत बक-बक करोगे तो तुरंत फाँसी पर लटकवा दिए जाओगे।”

महंतजी ने एक पैंतरा बदलते हुए कहा, “एकदम गलत! अरे रावण के बच्चे, तुमको यह पूछना चाहिए कि तुम कौन हो और किसके बल से हमारा बगान चौपट कर दिया तथा हमारे सिपाहियों को भी मारा। खैर, आगे चौपाई बोलो।”

जिन मोहि मारा तिन्ह मैं मारा।

तापर बाँधे तनय तुम्हारा॥

चौपाई बोलकर बाबा ने व्याख्या शुरू की, “हे दस मूड़ी वाले रावण! जिन्होंने हमको मारा, उन्हें हमने पीटा। इस पर तुम्हारा बेटा हमको पकड़ लाया। अगर तुम खैरियत चाहते हो तो जानकी को दे दो। अन्यथा तुमको और तुम्हारी लंका को...।”

“क्या कर लोगे? अभी चाहूँ तो गरदन बाँधकर तुम्हें समुद्र में फिंकवा दूँ। रावण को तू मामूली समझता है?” महंतजी ने कहा।

“सब गड़बड़ हो गया। पता नहीं चल रहा है कि तुम रावण हो अथवा मैं हूँ। फिर यह कथा कहाँ की आ गई?” बाबाजी ने कहा।

“अच्छा, फिर से ठीक हो जाए। मैं रामचंद्रजी का दूत वीर हनुमान और तुम लंका के राक्षसराज रावण! बस, आगे चौपाई बोलो।” महंतजी गदा ठीक करते हुए बोले।

“आगे तो क्षेपक आ गया।”

“उसके बाद की कथा बोलो।”

“उसके बाद तो लंका ही जल गई है।”

“तब उसे जल जाने दो।” महंतजी गरजे।

रहा न नगर बसन घृत तेला,

बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।

मर्दाना बाबा बोले, “देखो हनुमान, नगर में बसन, घृत और तेल नहीं रह गया।”

“तो मैं क्या करूँ? मैं तो रामचंद्र के गोल का हूँ। तू ही निशाचर है न? लाओ घी-तेल सब खोजकर।”

महंतजी की आज्ञा पाकर बाबा मठिया में से खोज-खोज कर कपड़ा, चिरकुट, मिट्टी का तेल, कड़ुआ तेल, रेंडी का तेल, तिल का तेल और घी सब उठा लाए।

“यह छोटी सी पूँछ में कैसे बाँधा जाएगा।”

“अरे उल्लू के औजार! हमारी पूँछ तो लग्गी जैसी बढ़ती चली जाएगी? लाओ वह लाठी। उसी में बाँधो। बोलो एक बार, राजा रामचंद्र की जै।”

“जै! जै!! जै!!!” बाबा ने दुहराया।

“तू हमारी जै क्यों बोलता है? अपने बादशाह की जै बोल।”

मर्दाना बाबा ने जोर लगाया, “बोलो, बोलो पंडित जवाहरलाल नेहरू की जै!”

“लुच्चा कहीं का! रामलीला हो रही है कि वोट हो रहा है। फिर से बोलो!” महंतजी ने डाँटा।

बाबा ने रावण की जय-जयकार की। तमाम कपड़ा लाठी में लपेट दिया। उसे रस्सी से लपेटते भी गए। ऊपर से सारा तेल और घी गिरा दिया।

अब हनुमानजी एक हाथ से कंधे पर रखी गदा और एक से तेल-पट निर्मित लाठी की पूँछ पकड़े बरामदे में पैंतरा बदलने लगे। इसी समय मर्दाना बाबा चौपाई की लय में झूम उठे—

बाजहिं ढोल देहिं सब तारी।

नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी॥

महंतजी बोले, “देखो, मैं नगर में घूम रहा हूँ। तुम मेरे पीछे बाजा बजवा दो। बोलो, बजरंग बली की जै!”

वहाँ ढोल बजाने वाला कौन था? बाबा स्वयं उनके पीछे-पीछे देर तक ढोल बजाते रहे। जब थक गए तो बोले—

“ठहरो हनुमान! अब तुम्हारी पूँछ जलाई जाएगी।”

“जलाई जाएगी?” महंतजी चौंक पड़े। पुन: धीरे से कहा, “देखो यार, बड़ी वैसी लीला लग रही है। देखते नहीं, पसीना छूट रहा है। मैं तो थक गया। अब एक चिलम बादशाही कट जाए। क्यों?”

“ठीक है। हमारा भी दम फूल रहा है।”

अब दोनों वीर चिलम पर जम गए। तमाखू बना। चिलम पर रखा गया। रस्सी की बिठई जलकर लाल हो गई और चिलम पर बैठा दी गई। मुँह का इंजन चालू हुआ। एक गहरा सर्राटा और धुएँ के गल्ले से बरामदा भर गया। महावीरजी लाल हो गए और रावण पीला।

“अब बोल चौपाई,” महंतजी ने उठकर अपनी पूँछ सँभाली।

महाराज ने जोर से उठाया—

जरइ नगर भा लोग बेहाला।

...............॥

और महंतजी आधे में ही चौपाई काटकर मर्दाना बाबा के पास जाकर चिढ़ाने की मुद्रा में चौपाई में चौपाई मिलाकर बोले—

‘पावक देहु लगाइ कृपाला।’

बाबा को अपनी भूल मालूम हुई। “अरे...रे...रे...रे...यह तो भूल ही गया।” और चट से दियासलाई की जलती तीली कृत्रिम पूँछ में लगा दी।

महंतजी दूनी ताकत से बजरंग बली की जै बोलकर उछल पड़े। आगे भूसे की बखारवाली छानी थी। लुकाड़ के स्पर्श से वह आकाश चूमने लगी। बरामदे के पास रखे पुआल के बोझ धधक उठे। बरामदे की अगली ओर दो जगह फनफनाने लगीं। वह उत्तर का छज्जा बारूद हो गया। आनन-फानन में चारों ओर आग फैल गई। महंतजी और हुंकार भरने लगे। चौपाई बोलने की डाँट पर बाबा डरते-डरते बोले—

उलटि-पलटि कपि लंका जारी।

...............॥

“बोल...बोल... आगे क्यों नहीं बोलता है?”

“महाराज, सिंधु तो कहीं दिखाई ही नहीं पड़ता है, आगे क्या बोलूँ?”

“अबे सिंधु का बेटा सिंधौटा! जल्दी से कहीं सिंधु खोजो, नहीं तो तुम्हें भी इसी पूँछ से पोंछ दूँगा।” महंतजी ने कहा और फिर पैंतरे पर लौट गए। उनके आने तक बाबा को उत्तर देना था। जान मुसीबत में पड़ गई।

“खोजा कहीं कि नहीं?”

“नहीं...महाराज...पर हाँ...याद आया। सिंधु तो आपके दरवाजे पर ही है सरकार! काफी गहरा! पक्का! पानी भी खूब है।” बाबा ने कहा।

“तब ठीक! बोल चौपाई!”

उलटि-पलटि कपि लंका जारी।

कूदि परे तब सिंधु मँझारी।

मर्दाना बाबा ने फाटक खोलकर महंतजी को ‘सिंधु’ दिखा दिया और वे कुएँ में जलती लाठी फेंककर कूद पड़े।

मठिया कार्तिक के सुनसान में धाँय-धाँय जल रही थी। जब तक कोई आवे, मर्दाना बाबा जैसे आए थे, वैसे ही घोड़ा छोड़ते अपने गोबरहा गाँव की ओर चल पड़े।

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