सत्यमेव जयते...

भारत में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो, जिसने कभी-न-कभी दशहरे का मेला न देखा हो या रामलीला न देखी हो। दशहरे के मेले की भीड़ भी शायद सबके मानस में बसी हो। कुछ दशक पहले की याद करें तो सैकड़ों गाँवों से चलकर परिवार-के-परिवार बैलगाड़ियों में, इक्के-ताँगों में, साइकिलों में किसी कस्बे में होने वाले दशहरे के मेले में रावणवध देखने जाते थे। अब इक्के-ताँगों के साथ टैंपो या मिनीबस भले ही जुड़ गई हों अथवा मेले के स्‍थल कुछ नजदीक हो गए हों, किंतु रावणवध देखने की ललक तथा रामलीला के प्रति श्रद्धा में कहीं कोई कमी नहीं नजर आती। महानगरों में जहाँ मनोरंजन के सैकड़ों साधन हैं, लोग उतनी ही श्रद्धा के साथ दशहरे का मेला देखने उमड़ पड़ते हैं। दिल्ली महानगर के संभ्रांत इलाकों में भी मेला स्‍थलों पर लोग-ही-लोग नजर आते हैं—छतों पर, पेड़ों पर, मेला स्‍थल की मुँड़ेरों पर, जहाँ कहीं से मेले का मंच नजर आ जाए। ऐसा क्या जादू है, क्या आकर्षण है कि लोग सैकड़ों टी.वी. चैनलों का मोह छोड़ स्वयं आना चाहते हैं और बच्चों को भी दशहरा मेले से जोड़ना चाहते हैं। दशहरे के मेले में उमड़े अपार जनसमूह को ‘भीड़’ मानना निश्चय ही अनुचित प्रतीत होता है। यह जनसमूह निश्चय ही रावण के पुतले के प्रतीक के रूप में हर बुराई का अंत देखना चाहता है, हर बुराई को भस्म होते देखना चाहता है। तभी किन्हीं-किन्हीं मेला स्‍थलों में रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद के पुतलों के साथ-साथ ‘आतंकवाद’ या ‘भ्रष्टाचार’ आदि के पुतले जलाए जाते हैं, जो चर्चा का विषय बनते हैं। निश्चय ही यह असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की, अनीति पर नीति की, अधर्म पर धर्म की विजय के सार्वजनिक उद्घोष का ऐतिहासिक अवसर बन जाता है।

हम सब जैसे एक राष्ट्रीय संकल्प को दोहराते हैं, पूरे विश्व को भी एक संदेश देते हैं कि बुराई की शक्तियाँ कितनी ही बड़ी हों, क्रूर हों, शक्तिशाली हों, उन्हें अच्छाई पराजित कर ही देती है। कहाँ रावण की विराट् शक्ति, जिसे जाने कितने वरदान प्राप्त थे, विशाल सेना थी, साम्राज्य था, अथाह धन एवं वैभव था, तरह-तरह के मारक शस्‍त्र थे, विमान थे, हाथी, घोड़े, रथ थे और दूसरी ओर वनवासी राम-लक्ष्मण मात्र वानर सेना के साथ थे। तभी तो विभीषण अधीर होकर पूछ बैठते हैं—‘नाथ न रथ, नाहिन पदत्राणा।’ केहि विधि जीतब रिपु बलवाना॥’ तब विभीषण को प्रभु राम बड़ी शांति से, मुसकान के साथ समझाते हैं कि शक्ति बड़े-बड़े घातक हथियारों में नहीं है, वरन् उन मूल्यों-आदर्शों में निहित है, जो संपूर्ण मानवता को समृद्ध करते हैं, जो किसी भी सभ्य-सुसंस्कृत समाज के लिए हितकर हैं। साधनहीन राम और साधनसंपन्ना रावण के युद्ध में अंततः राम की विजय हर पीड़ित-दमित के भीतर एक आशा की किरण जगाती है, प्रेरणा देती है, निर्भयता का बल देती है अन्यथा समाज अराजक हो जाए, अन्यायी-अत्याचारी मनमानी करने लगें। इसीलिए आज से सौ साल पहले भी दशहरे के मेलों में जनसमूह उमड़ता था तथा सौ साल बाद भी जनसमूह उमड़ता रहेगा, क्योंकि हमारे आदर्श, हमारे महान् जीवन-मूल्य बदलनेवाले नहीं हैं। समय-समय पर विकृतियाँ जन्म लेती हैं, किंतु सत्य, न्याय एवं धर्म की विजय का मूल आदर्श हमें अक्षुण्‍ण उजाला बाँटता रहता है।

यह सच है कि रामलीलाओं का स्वरूप बहुत बदला है। दशहरे के मेले में राजनीतिक वर्चस्व की विकृति बढ़ी है, किंतु इस पवित्र अवसर को पवित्र बनाए रखना हम सबका दायित्व है। दशहरे के मेले में बच्चों को खिलौने दिला देने या उत्सव मना लेने मात्र से ही बात नहीं बनेगी वरन् हम सब को एक संकल्प लेकर लौटना होगा कि हम अपने स्तर पर हर अन्याय का, शोषण का, दमन का, भेदभाव का, विसंगति का विरोध करेंगे। अब तो हम विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के नागरिक हैं, इसलिए हमें कोई तीर-तलवार उठाने की भी आवश्यकता नहीं है, वरन् मात्र अपनी नागरिक चेतना को जाग्रत् करना है तथा देश में मौजूद संवैधानिक संस्‍थाओं तथा व्यवस्‍थाओं तक बात पहुँचानी है। प्रभु श्रीराम, जो विश्व के सबसे बड़े इसलामी देश इंडोनेशिया के लिए आदर्श महापुरुष हैं, जिन्हें बौद्ध देश थाइलैंड ‘अपना’ मानता है, जिनके नाम पर विश्व के हजारों नगर, कस्बे, गाँव, मोहल्ले हैं, जिनकी कथा विश्व की हर भाषा में है, उनके आदर्शों पर चलकर इस देश को उन्हीं जीवन-मूल्यों से सुसज्जित करें, जो इसे विश्वगुरु बनाते हैं। सीता के सम्मान के लिए रावणवध करने वाले राम के देश में बच्चियों तक से दुष्कर्म! पिता की आज्ञा से राजसिंहासन छोड़कर वन जानेवाले राम के देश में बढ़ते वृद्धाश्रम, अपनी ही संतानों से मुकदमे लड़ रहे बुजुर्ग। भ्रातृप्रेम का आदर्श स्‍थापित करनेवाले राम के देश में भाई-भाई के मुकदमे। मात्र एक व्यक्ति के आरोप लगाने पर सीता का त्याग करके लोक का सम्मान करना न भूलें। इस बार दशहरे के मेले में जाएँ या टी.वी. पर ही देखें, भगवान् राम के आदर्श जरूर अपनाएँ।

गांधी :  एक व्यक्ति, नहीं विचार

अमरीका ९/११ यानी ११ सितंबर के भयानक आतंकी हमले से हुई मौतों तथा अपूरणीय क्षति से उबर नहीं पाया था। नागरिकों में अथाह दुःख एवं आक्रोश था। अमरीकी युवा विशेष रूप से आक्रोशित थे। चूँकि इराकी या पाकिस्तानी या भारतीय एक जैसे ही दिखते हैं, एक भारतीय युवा कवि को चार अमरीकी युवाओं ने घेर लिया। किसी ने पिस्तौल निकाली, किसी ने चाकू। भारतीय युवक ने परिचय-पत्र निकाला और बोला, इं‌डियन-इंडियन, गांधी-गांधी...। गांधी का नाम सुनते ही पिस्तौल और चाकू वापस जेब में चले गए थे। अमरीकी युवक ‘सॉरी’ बोलकर आगे बढ़ गए। गांधी के नाम से जिस भारतीय युवक की जान बची, वह मेरा परिचित है। जब पेरिस नगर में बड़ा आतंकवादी हमला हुआ तो पूरे फ्रांस में दहशत फैल गई। कुछ दिनों बाद पेरिस के लेखकों, कवियों, मीडियाकर्मियों, बुद्धिजीवियों ने एक शांति जुलूस निकाला। प्रायः सभी के हाथ में गांधीजी की तसवीर थी तथा गांधीजी के वचनों वाली तख्तियाँ थीं।

इस जुलूस का एक ही संदेश था—यदि दुनिया को घृणा तथा हिंसा की आग से बचाना है तो गांधीजी के प्रेम तथा अहिंसा के अतिरिक्त दूसरा रास्ता नहीं है। यह जुलूस पूरी तरह पेरिस के बुद्धिजीवियों की पहल पर निकला था; न तो इसमें भारतीय दूतावास की कोई भूमिका थी, न ही किसी गांधीवादी संस्‍था की। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी एक साक्षात्कार में कहा था कि यदि महात्मा गांधी न होते तो मेरे (अश्वेत) राष्ट्रपति बनने की कल्पना करना भी कठिन होता।

आज अफ्रीका में अश्वेत राष्ट्रपति हैं, वहाँ की क्रिकेट टीम में अश्वेत खिलाड़ी हैं तथा ओलंपिक में खेल रहे हैं, लेकिन कुछ दशकों पहले तक स्थितियाँ कितनी भयावह थीं! अश्वेतों का जीवन पीड़ा, अपमान, उत्पीड़न, शोषण, दमन से भरा हुआ था। जब महात्मा गांधी वकालत के लिए अफ्रीका में थे, लंदन से बैरिस्टर, सूट-बूट-टाई में सजे-धजे सड़क पर चले जा रहे थे कि अचानक दक्षिण अफ्रीका की गोरी पुलिस उन पर डंडे बरसाने लगती है, क्योंकि अश्वेत सड़क पर नहीं चल सकते थे। उन्हें अलग फुटपाथ पर ही चलने की आज्ञा थी। हर कदम पर भेदभाव, अलग व्यवस्‍थाएँ। रेलयात्रा के दौरान प्रथम श्रेणी के डिब्बे से उनको नीचे धकेलने तथा सामान फेंकने की घटना से तो सभी परिचित हैं। तब गांधीजी ने भारतीयों तथा अश्वेतों को उनके भीतर छुपी शक्ति की याद दिलाई, उनके अधिकारों के प्रति उन्हें जागरूक किया और उन लाचार, दीनहीन भारतीयों को एकजुट कर दिया, जो पशुओं से बदतर जीवन जीने के बावजूद मौन रखकर सबकुछ सह रहे थे। दक्षिण अफ्रीका में ही उन्होंने समूचे विश्व को अन्याय से प्रतिरोध का अनूठा हथियार दिया ‘सत्याग्रह’, जिसमें हिंसा एवं प्रतिशोध की बजाय, अहिंसा तथा मानवीय मूल्यों को आधार बनाया गया। जब जनशक्ति का तूफान उमड़ता है तो बड़ी-से-बड़ी तथा क्रूर-से-क्रूर सत्ताएँ, चाहे वे कितनी ही शक्तिशाली क्यों न हों, ‌तिनके की तरह बिखर जाती हैं। दक्षिण अफ्रीका की सरकार को भी विराट् जनप्रतिरोध के आगे घुटने टेकने पड़े। गांधीजी ने शोषित, पीड़ित, दमित करोड़ों मनुष्यों के लिए सम्मानजनक जीवन की रोशनी से भरे एक नए संसार के लिए मुक्तिद्वार खोल दिया था। पूरे विश्व ने इस महान् मुक्ति संग्राम को चमत्कार की तरह देखा था, अहिंसा एवं सत्याग्रह की शक्ति को पहचाना था।

यहाँ एक प्रसंग का उल्लेख आवश्यक है। दक्षिण अफ्रीका की जेल में जनरल स्मिथ गांधीजी से बेहद अपमानजनक दुर्व्यवहार करता था, लेकिन गांधीजी ने जेल से रिहा होते समय जनरल स्मिथ को अपने हाथों से बनाई चप्पलें भेंट कीं। जनरल स्मिथ ने बाद में उन्हें अपने ड्राईंगरूम में एक महान् उपहार की तरह सजाया। जब एक पत्रकार ने पूछा कि आपने इन चप्पलों को ड्राईंगरूम में सजाने की बजाय पहना क्यों नहीं? तो जनरल ने आँखों में आँसू भरकर कहा कि मैं इस पवित्र उपहार को पैरों से छूने की कल्पना भी नहीं कर सकता। यही था गांधी का जादू। उनके लिए कोई भी ‘शत्रु’ नहीं था, मात्र मनुष्य था। उनका दर्शन ही था ‘पाप से घृणा करो, पापी से नहीं।’ गांधीजी ने जो कुछ साकार रूप में कर दिखाया, वह ‘अहिंसा’ का संदेश नया नहीं था—महात्मा बुद्ध, महावीर, ईसा मसीह ने भी सदियों पहले यही संदेश दिया था। आज की युवा पीढ़ी को गांधीजी को समझने की, पढ़ने की, उनके संघर्ष तथा दर्शन को गहराई से जानने की आवश्यकता है। आज हम प्रकृति का जो विकराल स्वरूप विश्व भर में देख रहे हैं, आतंक का कुरूप चेहरा देख रहे हैं, हिंसा एवं घृणा, गृहयुद्ध देख रहे हैं, उन सबका समाधान गांधीजी के रास्ते पर चलकर ही मिल सकता है। सौ साल से अधिक पहले गांधीजी का लिखा ‘हिंद स्वराज’ वर्तमान में अत्यंत प्रासंगिक हो गया है। आज भारत की अनेकानेक समस्याएँ गरीबी, भुखमरी, बेकारी, विषमता, सांप्रदायिक द्वेष, पर्यावरण प्रदूषण आदि का समाधान गांधीजी के रास्ते पर चलकर ही संभव है। दो अक्तूबर हमें यही याद दिलाता है।

(लक्ष्मी शंकर वाजपेयी)

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