भीलनी गाए गीत

भीलनी गाए गीत

सुपरिचित लेखक। आदिवासी लोक-साहित्य के अध्येता, हिंदी के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, जर्नलों में निबंध, शोध-पत्र एवं शोध-आलेख प्रकाशित। संप्रति माखनलाल चतुर्वेदी शासकीय, स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय, खंडवा।

स्वर से सृजन हुआ। एक स्वर गूँजते हुए समूचे ब्रह्मांड में व्याप्त हो गया। समय की टेगरी पर रखे अंतरिक्ष के अँधियारे माठ से, स्वर बूँदों सा रिंझने लगा। रिंझते-रिंझते (टपकते-टपकते) सरगम के स्वर निकलने लगे। एक झंकार के साथ शून्य में नाचती अंसख्य मंदाकिनियों के पैरों से तारे-नक्षत्रों, ग्रहों-उपग्रहों के घुँघरू टूट-टूटकर बिखरने लगे। कालपुरुष ने माटी घोली और भविष्य कुम्हारनी बन उस माटी को रौंधने लगा। माटी के थेपे पर थेपे जमने लगे। काल पुरुष सृष्टि सृजन करते हुए वैदिक ऋचाएँ गा-गाकर जीवन के गीत गाने लगा। उसके गीत सुन नर्मदा के पल्लू में बँधा निमाड़ अंचल और उसकी भीलनियों ने भी गाना शुरू किया—

घड़ रेऽ कुमारल्या सव्ऽ घडळेऽ सौन्नांचे।
त्या नाखजे रे ऽ कुमारल्या सूरमळ चांदूळ, तारऽऽ॥

कुम्हार तू सोने के घडे़ को घड़ना और उसमें सूरज-चाँद तथा तारे डालना। अंतरिक्ष के मटके में सूरज, चाँद, तारे, ग्रह-उपग्रह डाले हैं और इस अंतरिक्ष के मटके को मथने से ही सृष्टि का सृजन हुआ। सृष्टि-सृजन के संबंध में यह लोकगीत निमाड़ की भीलनियाँ गाती हैं।

विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि सृष्टि का सृजन ध्वनि से हुआ है। पहले वह अनंत स्वर हुआ, जिसे भारतीय परंपरा में ‘शब्द ब्रह्म‍’ कहा गया। उस शब्द ब्रह्म‍ की गर्जन से स्वर निकले और उस स्वर से विविध ध्वनियाँ, उन ध्वनियों से अक्षर-शब्द और बोली-भाषाएँ। उन अक्षर-शब्द और बोली-भाषाओं में प्रकृति ने संगीत भरा। गीत-संगीत प्रकृति के कण-कण से मुहाल (शहद) के रस सा निर्झरने लगा। उस रस को धरती ने चखा तो बीजों के रूप में अंकुरित हो गई और हरीतिमा की चुनर ओढ़ नाचने लगी। नदियों ने चखा तो कलकल का मल्हार गाने लगी। पंक्षी-पखेरुओं ने चखा तो भैरवी-हिंडोल रागों सा कलरव करने लगे। उसी संगीत से हवाओं ने सरसराहट का आशावरी राग गाया। नभ के चौडे़ सीने में जब यह संगीत धड़कने लगा तो, उसने धरणी के बिछोह में कजरी गाया। जीवधारियों में यह संगीत श्वासों की बीन बजाने लगा और राजनर्तकियाँ बन पलकें नर्तन करने लगीं। गीत का स्वर ही मानव के कंठ से शब्द, बोली, भाषा के रूप में स्पंदित हुआ। मनुष्य ने सांकेतिक भाव-भंगिमाओं के साथ नृतन करते हुए, गीत गाए। कालचक्र अवार (मोहल्ले) में दौड़ते बाल-गोपाल के चाकले (चक्के) सा घुमने लगा। मनुष्य के ज्ञान का रोटा सिका और अनुभव की अमाड़ी की भाजी (निमाड़ अंचल में खाई जाने वाली एक भाजी) चूड़ी और मानव अपने सुख-दुःख, भाव-संवेदनओं, हास-परिहास, हर्ष-उल्लास, विषाद आदि मनोभावों को लोकगीत की माला में मोती सा पिरोने लगा। लोकगीत सामुदायिक जनचेतना का अग्रदूत है और समस्त मानव जाति के इतिहास का साक्षी भी, क्योंकि लोकगीत गाए जाते हैं और विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेदों को भी गाया जाता है।

लोकज्ञान के रथ पर सवार होकर मनुष्य ने विकास की यात्राएँ प्रारंभ कीं। नर का विज्ञान बोध, गिलकी के रेले सा उन्नति के मांडवे (मचान) पर चढ़, महत्त्वकांक्षा की मुँडे़र पर जा बैठा। ऋतुएँ बेटियों सी पीहर आने-जाने लगी और मौसम बेटों सा बदलने लगा। टूटते परिवार में पिता अंबर सा आधार विहिन हो गया और माँ वृद्धाश्राम मे धरती सी मौन हो गई। लालच की जेठानी-देवरानी ने दिन भर चुगली का मोबाइल कानों धरा तो प्रेम और स्नेह के भाई-बहनों का नेटवर्क ही नहीं मिलने दिया और तो और क्या कहूँ, जबसे स्वार्थ की पड़ोसन विश्वास के ससुराल में घुसी तो रिश्तों की बहू का नांदना (ससुराल में रहना) दूभर हो गया। मित्रता का जेठ मुँह फुलाकर जड़ें खोदने लगा और अपनेपन के फूपाजी घमंड की दारू पीकर, मर्यादाओं की फूपी को मारने-पीटने लगा। आधुनिकता की दौड़ में पूरे घर-परिवार का सत्यानाश हो गया। गाँव में अपनी खेत-बाड़ी बेचकर, बेटे-बहू के नाम अपनी सारी जायदाद लिख देने वाली जानकी फूपू को बेटा-बहू वापस गाँव छोड़ गए। तब से याणी-संझा (सुबह-शाम) जानकी फूपू अपने दासे (ओटले) पर बैठ अपनी शहरी बहू के विषय में कहने लगी। ‘‘मी न मांजा धनी दुसरा कौनी येत त मारा पनी।’’ मैं और मेरा पति दूसरा कोई आए तो मारों उसे पनही। ऐसे समय और ऐसे माहौल में लोकगीतों का बीज कहाँ ढिसूर फोड़े। शहर वालों को तो अपने से ही फुरसत नहीं मिलती, वह सामुदायिकता की क्या बात करेंगे। शहरी लोक चेतना तो गमले में लगी सजावटी मनी प्लांट जैसी है। न गोढ़ मिले न जड़, अपने को ही हरा-भरा रखना, यही तो सीखा है शहर वालों ने।

हमारी दो चाकली फटफटी बड़वानी (म.प्र.) से निकल जैन तीर्थ बावनगजा की ध्यानस्थ सतपुड़ी पहाड़ियों के माथे में पड़ी जूँ सी तर-तर चलने लगी। सतपुड़ा की सूडौल काया-किसी सुंदरी की देहावष्टी की भाँति इस सावन में नैसर्गिक सौंदर्य से गदरा रहीं थी। जहाँ-तहाँ झरने सतपुड़ा के हृदय को चीर कलकल करते बगल रहे थे। सावन सेरे की बूँदें स्वश्तिवाचन करते हुए हमारे तन-बदन के प्रत्येक रोम छिंद्रों के रोमकेशों पर बैठ, मोती सी बत्तीसी बता रही थी।

दूर कही सतपुड़ा के शिखरों पर बारेला भील ग्वाला अपने ढौर-केर (मवेशियों) के पास बैठ अपनी पाउली (बाँसुरी) पर मधुरतान छेड़ रहा था। पाउली के स्वर सुमधुरता की घोंगडी (टाट का बरसाती कोट) ओड़ कर इधर-उधर भाग रहे थे। सावन सेरे (बौंछरें) की बौछारों ने अपनी तरुणाई छोड़ी और अपनी जवानी का जोश दिखाते हुए भदड़-भदड़ गिरने लगा। हम घबराकर, सड़क किनारे बाँस के झुरमुट में जा छिपे। पाटीदार सर ने निराशा भरे स्वर में कहा, शायद हम दोनों आज लैक्चर नहीं ले पाएँगे। लेकिन प्रकृति तो हर क्षण हमारा लैक्चर लेना चाहती हैं। मनुष्य ही लालच की कोचिंग करते फिरता है। उसे प्रकृति के निःशुल्क शिक्षण से क्या लेना-देना। वह तो अपने लिए ही गोर (कब्र) खोद रहा है। और उस गोर में बैठकर प्रकृति का निरंतर उपभोग कर रहा है। अच्छे-बुरे दोनों प्रयासों से वह प्रतिदिन प्रकृति के दोहन में लगा है। सृजन की नहीं, विध्वंश की बातें करता फिरता है। भविष्य में मानव जाति ही इसका परिणाम भोगेगी। आज तो उपभोक्ता बन, प्रकृति की अँतड़ियों को खींचो।

बाँस की उस घनी झुरमुट के गेहरे में पाँच-छह लोग और आ गए। उनमें नीमड़ी फाल्या (भील बस्ती) के सुमला बड़वा भी थे, जो बरसते पानी को देख लगातार बड़बड़ा रहे थे। ‘‘ज्यो पाणीबाबु आपणी माई कु नी हुयू’’ यह पानी बाबा अपनी माँ का भी नहीं हुआ। मन में जिज्ञासा जगी। बाबा से पानी की लोककथा सुनी। बरसते पानी ने अपनी माँ को वचन दिया। माँ जा पनघट से पानी भरने जा। मैं तब तक नहीं बरसूँगा। माँ निश्चिंत हुई। माँ को इतना विश्वास दिलाया कि माँ ने रंग-बिरंगे कागज के कपड़े पहने और पनघट गई। लेकिन पानी तो पानी है। वह भी बरसात का पानी। सावन के सेरे का पानी। उसका मौसम और वह बरसे नहीं वह तो भदड़-भदड़ करके बरसने लगा। माँ के कागजी कपड़े भीगे और गल गए। माँ भोंगली (निर्वस्त्र) हुई। नंगी-पुंगी घर आकर, बेटे से शिकायत की। पानी बेटा मुसकरा दिया। मैं पानी हूँ। बरसात का पानी। मैं तो बरसूँगा। जी खोलकर बरसूँगा। बरसते-बरसते संगीत के सप्त सुरों का सृजन करूँगा। मांदल पर बरसूँगा तो मस्ती और उन्माद का संगीत बनकर निकलूँगा। पहाड़ पर गिरूँगा तो नदियों का गीत हो जाऊँगा। धरती पर गिरूँगा तो बीज की धड़कन बन जाउँगा। भीलों के गाँव में गिरूँगा तो, बैरनी, नवाई, नाईपूजा आदि लोकपर्वों के गीत बन, प्रकृति के प्रति उपकार के गीत गाऊँगा। मैं भीलनीयों के गाबडे (गरदन) में, झिबड़ा, आमडी, महुडी, आंबा, पिपल्या की गोंदी गई आकृतियों से झाकूँगा और भीलनियों के कंठों में राब (गुड़ की चासनी) की मिठास बन लोकगीतों के रूप में बरसूँगा। मैं तो पानी हूँ वह भी बरसात का पानी मैं तो बरसूँगा।

सूमला बाबा की लोककथाएँ आगे भी चलती रहीं। लोकमानस जब विस्तार पाता है तो उसका कोई अंत नहीं होता। समूचा ब्रह्मांड लोक के सूपड़े में फटकार खाता है। लोक समाज को झाड़-फटकारने और सुधारने का काम करता है। लोक के रूखड़े (गोया/घूरा) से ही सभ्यता और सामाजिकता का कंपोस्ट खाद तैयार होता है। मानवीय सभ्यता के विकास के लिए लोक संस्कारों की घुट्टी अनिवार्य है।

मेघों ने अपना घनघोर रूप धारण कर लिया। बांस का झुरमुट अँधियारे मेघों की कजलाई से ढक गया। नन्हीं बदराएँ आसमानी झीरे से पानी उलीच-उलीच धरती की गागर में डालने लगी। हमारे पीछे बागड़ के पार छान (ओसारे) से, एक मधुरतान सुनाई। झाँह आई जाऊँ (यहाँ आ जाओ) उस बारेला भीलनी का आग्रह सबने सहर्ष स्वीकार कर लिया। अपने टाप्रे के ओसारे में हमें बिठा, वह पुनः सूपड़े में ज्वार फटकारते हुए गाने लगी—

पुळा गाऊँ नेऽ डुंगरे पडझै रे पाणी बाबा।
नौंदीऽ आवसे रेऽ पाणीबाबा।
पुळा नाऽ खेतेऽ पौडझै रेऽ पाणीबाबा।
ओनाज पकसेऽ रे पाणी बाबा।

परले गाँव के पहाड़ पर गिरना रे पानी बाबा। वहाँ की नदियाँ सूख गई हैं। वहाँ की नदियों में पानी आएगा। परले गाँव के खेतों में ही बरसना पानी बाबा। वहाँ अनाज अच्छा पकेगा। गीत का भाव जानकर मन पसीज गया। यह होता है लोक, यह होता है, लोक कल्याण। अपने से पहले दूसरों का हित और दूसरों की चिंता। लोक चिंता स्वयं के लिए नहीं होती। लोक की चिंता तो समूचे जड़ चेतन के लिए होती है। लोक संवेदनाओं की नदी सबके मन को लोक संस्कारों के जल से सींचती है। सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय और वसुधैव कुटुम्बकम् का यह भाव इस अनपढ़ आदिवासी महिला ने कहाँ से सीखा होगा। यह लोक का ही चमत्कार है। यहाँ कोई विश्वविद्यालयीन डिग्रियाँ नहीं दी जातीं। परंतु मानवीय भाव-संवेदनाओं से युक्त हृदय अवश्य दिया जाता है। जो जन कल्याण सीखाता है। प्रकृति के प्रति उपभोक्ता नहीं अपितु उपासना की दृष्टि देता है। अपूर्णता की नहीं संपूर्णता की बात करता हैं। लोक ‘मैं’ की नहीं ‘हम’ की बात करता है।

उस भीलनी का लोकगीत सुन, बरसाती बूँदों सा मेरा मन भी उमड़ने-घुमड़ने लगा। भीली लोककथाएँ, गाथाएँ, गायणे, वार्त्ताएँ,  लोकगीत और भीली इतिहास से जुड़ी वह सारी बातें, दिमागी खोदरे (नाले) में अनाचक पुर ले आई। भील जब गाता है तो दुनिया सुनती है। निराकार-अंधकार में माई गऊँरा (गौरा-पार्वती) का मन नहीं लगा। समाधि से मादेव (महादेव) को जगाया। मैं किसके साथ बातें करूँ। मेरे साथ कौन खेलेगा। गौरी-महादेव ने विचार-विमर्श किया। गौरा की प्रेरणा से महादेव सृष्टि-सृजन में लग गए। नारी सृजन की प्रेरणा है। अपनी कोख की उपजाऊँ बाड़ी में सृजन के बीजों का पल्लवन करती है। पुरुष सृजन का बीज हो सकता है, किंतु उन बीजों में अंकुरण की क्षमता तो नारी है। अंकुरण के बीना बीज का कोई अस्तित्व नहीं। सुलायले और घुन पड़े बीजों को किसान फेंक देता है। बीज कितना भी उन्नत कोटि का क्यों न हो उसका अंकुरण। उसका विकास माटी की कोख में ही होता है। जीव सभ्यता ने माँ की कोख से ही विकास पाया है। इसलिए देवादिदेव महादेव अर्धनारीश्वर है। गौरी की प्रेरणा से उस निराकार-अंधकार में महादेवजी ने अपने भाल के मेल से भील को बनाया और कंठ के मेल से भीलनी। भील को महादेव ने अपने डमरू से भीलों का वाद्यमंत्र ‘ढॉक’ बनाकर दिया, और कहा की मैं सृष्टि-सृजन करूँगा, तूने इसे बजाना है। भीलनी से कहा की तुम सृष्टि सृजन को देख-देख, सृष्टि-सृजन के गीत गाना। भीलनी ने धरती के गीत गाए। आसमान के गीत गाए। जल के गीत गाए। वायु-अग्नि के गीत गाए और जीव व जगत् के गीत गाए। भीलनी के गीत सुन-सुन, महादेव हाइबाप (जल्दी-जल्दी) से सृष्टि-सृजन करने लगे। भीली लोककथा की इस सुंदर परिकल्पना में मानव मन का कोमल भाव अभिव्यक्त हुआ। सृष्टि-सृजन नारी की प्रेरणा से संगीत की तान और गीत की लय पर हुआ। पुरुष जीवन-जगत् का संगीत है तो स्त्री प्रकृति और जीवन की लय। मानव-मन की गुनगुनाहट ने ही संगीत में सात स्वर और रागनियाँ भरीं, और अपने जीवानुभव को लोक-गीतों के माध्यम से अभिव्यक्त किया। लोकगीतों की रचना मानव के कोमल और कवले मन से हुई। लोकगीत प्रकृति का सहचर है। लोक एवं लोकगीत। वेद, पुराण, शास्त्र और सुसंस्कृत मानव साहित्य के परे है। लोक-साहित्य, लोक-संस्कृति, लोकगीत, संगीत का रूप ऐस ही है, जैसे घट्टी में दलने के पूर्व अनाज। लोक समाज की खड़ी फसल है और शास्त्र वैज्ञानिक तकनीकी से सुसंस्कृत समाज की चक्की में पीसा पीठा (आटा) है। दोनों का अनाज एक ही है, लेकिन स्वाद और स्वरूप भिन्न हो गए। लोकसाहित्य विशाल समुद्र है और शास्त्र ताल-पोखर। एक असीमित और दूसरे की सीमा मानवीय मेधा द्वारा निर्धारित होकर सीमित हो गई। किंतु लोक और लोकगीतों का निर्धारण, सीमाकंन और संग्रहण संभव नहीं। समाज व शास्त्र की यशोदा लोकस्वरूप कान्हा की कमर को नियमों के उखल से बाँध नहीं सकती। लोकगीतों का स्वर स्वार्थ के लिए नहीं अपितु परमार्थ के लिए गूँजता है। मैं से हम तक की यात्रा। नाम से अनाम हो जाने की यात्रा। एक से अनेक होने की यात्रा। स्वंय से सामुदायिक और समग्रता के भाव की यात्रा। लोक के अनंत मार्ग पर ही होती है। जीव-प्रकृति और परमात्मा तीनों का एक हो जाना ही लोक है। इसलिए लोकगीतों में व्यक्तिगत सुख-दुःख व्यक्त नहीं होते अपितु लोकगीतों में समस्त प्रकृति, जीव के माध्यम से अपनी बात कहती हैं। लोक में मैं होने का भाव जलकर भस्म हो जाता है। ‘‘जो घर जाले, आपणा सौ चले हमारे साथ।’’ कबीर ने सांसारिक घर की नहीं अपितु मैं के भाव को जलाने की बात कही थी। शरीर रूपी घर को लोकज्ञान की अग्नि में स्वाह कर, प्रकृति को ही अपना घर मानना और लोकमय हो जाना ही लोकतत्त्व की प्राप्ति है। लोकगीतों का मधुर स्वर मैं और अहं के मुंड पर शोभा नहीं देता। इसलिए कबीर कहता है—‘‘कबिरा यह घर प्रेम का, खाला का घर नाहिं। सीस उतारे भुंई धरे तब पइसे घर माँहि।’’ लोक में अंहकार का मुंड धड़ पर धरा नहीं होता, लोक में तो जनकल्याण की गंगा प्रत्येक प्राणी के माथे की शोभा होती है। इसलिए लोक में जड़-चेतन, देव-दानव-मानव और जीव-जंतु-जानवर सभी के प्रति समभाव की दृष्टि होती है। और लोकगीतों में करुणा का यही सर्वव्यापी स्वरूप मुखरित होता है। बरसते पानी में बारेला भीलनी के गीत सुन मन की गोदड़ी के सारे धागे मैंने उधेड़ डाले। बरसात में भीगने से ज्यादा उस भीलांगना के लोकगीतों के पावन स्वरों से मेरा तन-मन तरबतर हो गया। अब का पावस लोकगीतों का हरापन लेकर, तन की बागड़ पर जंगली ककोडे (जंगली सब्जी) की बेल सा हरिया गया। बौछारों की ठंडी-झड़प में भींझते-भींझते (भीगते-भीगते), बचपन में घर का काम करते वक्त माँ एक गीत गुनगुनाया करती थी—

झिलमिलऽ-झिलमिलऽ मेहुलड़ा बरसळाऽ।
आंगन कन्हैया भींझऽ रेऽ।
मांजा चतुर कन्हैया।
माता जसौदा हटीऽ हटी पूछऽ।
अथळी वारऽ कोड्ऽ लागळी रेऽ।
मांजा चतुर कन्हैया।

बेटा देर से आए। बरसात में भीगकर आए। बेटे पर कोई भी संकट का बादल गहराए। यशोदा जैसे दुनिया की असंख्य माताओं की हृदय नदी ममता के नीर से उफन पड़ती है। ममता और करुणा के भाव को पा कर माताओं ने तो बौद्ध के बौधीसत्त्व पाने के पहले ही बौधीसत्त्व पा लिया था। उनकी ममता और करुणा ने ही उनसे असंख्य लोकगीत गवाए। मन के गुंताडे में सोचते-सोचते, पानी बरसना बंद हो चुका था। हम सब उस टाप्रे से एक-एक कर अपने गतंव्य को निकलने लगे। जाते हुए मैं उस भीलनी के लोकगीत की अंतिम पंक्तियाँ बिल्ली जैसे कान खड़े कर सुन रहा था—

सूदे-सूदे घौर जाणे दीझै रे पानी बाबा।
जौगेत हाट भौरने दीझै रे पानी बाबा।
आऊणु-जाऊणु चाल्या कौरसे रे पानीबाबा।
डूळा पाणी राखजै रे पाणीबाबा।

हे पानी बाबा! तू सीधे-सीधे घर जाने देना। इस संसार का घर नहीं, उस परमात्मा के घर हमें सीधे-सीधे ही पहुँचाना। इस दुनिया के हाट-बाजार को यों ही लगने देना और जन्म-मृत्यु का खेल सदा चलने देना, पानी बाबा। लेकिन एक बात सुन, तू इनसानों में आँखों के पानी को हमेशा बनाए रखना। आँखों का आँसू मानवता की निशानी है। इनसानों में सरलता-तरलता और संवेदनशीलता आँसू ही व्यक्त करता है। इनसानों में इनसानियत का प्रमाण आँसू ही है। आँखों का यह पानी आँखों में सदा बनाकर रखना। हमारी फटफटी स्टार्ड होकर फटफट कर ठुनकने लग गई। मैं पीछे सीट पर जा कर बैठ गया। लेकिन वह भीलनी गाए जा रही थी। दूर तक उसकी खनकती आवाज हमारा पीछा करते हुए, सतपुड़ा की विशाल बाँहों में विलुप्त होकर देर तक गूँजती रही।

 

माखनलाल चतुर्वेदी शासकीय
स्नातकोत्तर कन्या महाविद्यालय, खंडवा (म.प्र.)
दूरभाष ः 9009093349

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