विज्ञानसम्मत भारतीय संवत्सर

विज्ञानसम्मत भारतीय संवत्सर

सुप्रसिद्ध विज्ञान-लेखक। पुरातन एवं अद्यतन विज्ञान विषयों पर हिंदी में ५० से अधिक पुस्तकें, सहस्राधिक विज्ञान आलेख एवं शताधिक शोध-पत्र प्रकाशित। पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों एवं सम्मानोपाधियों से अलंकृत।

मय का हिसाब रखना आज के मानव के लिए कोई कठिन कार्य नहीं है। छपे कलेंडर, हाथ में बँधी घड़ी, मोबाइल फोन, कंप्यूटर आदि अनेक साधन समय का हिसाब रखने में मनुष्य की मदद करने को तत्पर हैं। जब इनमें से कोई भी नहीं था, तब भी हमारे बुजुर्गों ने आम आदमी को समय जानने का अद्भुत उपकरण उपलब्ध करा दिया था। अंतर केवल इतना था कि प्राचीन काल में विकसित वह उपकरण आदमी के पास व्यक्तिगत रूप से उपलब्ध नहीं था। उस सार्वजनिक साधन को दुनिया का कोई भी व्यक्ति कहीं से भी देख सकता था। उसी उपकरण को ‘संवत्सर’ के नाम से जानते हैं। संवत्सर को एक ऐसा कलेंडर माना जा सकता है, जो आज भी आकाश में उसी तरह टँगा है, जैसा हजारों वर्ष पूर्व टाँगा गया था। वर्तमान में समय जानने के अन्य सरल एवं अधिक प्रभावी साधन उपलब्ध हो जाने के कारण आम आदमी ने उसे देखना छोड़ दिया है। कई लोग तो उनके विषय में जानते भी नहीं हैं।

क्या है संवत्सर?

प्रकृति में एक ऋतुचक्र के पूर्ण होने में लगने वाले कालखंड को भारत में ‘संवत्सर’ नाम दिया गया है। मोटे तौर पर देखा जाए तो संवत्सर वह समय है, जिसमें पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेती है। यहाँ यह जानना उचित ही होगा कि संवत्सर केवल सूर्य आश्रित नहीं है। संवत्सर सूर्य, चंद्रमा तथा नक्षत्र, तीनों की समन्वित स्थिति पर आधारित है। हमारे मनीषियों ने संवत्सर का आविष्कार बदलते मौसम की पूर्व सूचना पाने के उद्देश्य से किया होगा। ऐसी सूचना के अभाव में खेतों में सही समय पर बुआई-कटाई आदि कार्य का होना संभव नहीं होता। ऐसी स्थिति में पर्याप्त उत्पादन के अभाव में लोगों के भूखे मरने की स्थितियाँ निरंतर बनी रहती थीं। भारतीय संस्कृति का आधार-स्तंभ ऋतु त्याहारों, जैसे दीपावली, होली, मकर संक्रांति, बसंत पंचमी, चातुर्मास आदि को मनाने की परंपरा भी संवत्सर के अभाव में फलीभूत नहीं हो पाती है।

आज आम भारतीयों के जीवन में संवत्सर का अर्थ जीवन के कुछ विशिष्ट अवसरों की तिथियाँ, मुहूर्त तथा तीज-त्या‘हार का दिन जानने तक ही रह गया है। अंग्रेजी वातावरण में विकसित युवा पीढ़ी तो इसे काल मापन की रूढ़िवादी विधि मानकर हेय दृष्टि से भी देखती है। वस्तुतः संवत्सर अनेक ऋषियों के सैकड़ों वर्षों के वैज्ञानिक अनुसंधान का परिणाम है। जिस समय वैज्ञानिक उपकरण के नाम पर मनुष्य के पास कुछ नहीं था, तब मात्र अपने नेत्रों से किए गए अवलोकन तथा चिंतन-मनन से आविष्कृत संवत्सर किसी आधुनिक आविष्कार से कम नहीं है।

भारतीय परंपरा की सृष्टि का वर्णन सबसे विलक्षण है। यहाँ के चातुर्वणीय समाज द्वारा जितने भी धार्मिक क्रियाकलाप संपन्न किए जाते है, उनमें संकल्प करने का विधान है। संकल्प करवाने में संवत् अयन, ऋतु, मास, तिथि, वार तथा नक्षत्र का उच्चारण होता है। भारतीय काल गणना कल्प, मन्‍वंतर, युगादि के पश्चात् संवत्सर से प्रारंभ होती है। सत्युग में ब्रह्मा संवत्, त्रेता में वामन संवत्, द्वापर में युधिष्ठिर संवत् और कलियुग में विक्रम संवत् प्रचलन में है अथवा रहे हैं। तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो भारतीय काल गणना वैदेशीय काल गणना की तुलना में अत्यंत प्राचीन है। भारतीय काल गणना का पुण्य प्रवाह जहाँ कल्पाबद्ध संवत् १ अरब ९७ करोड़ २९ लाख ८५ हजार १०८ वर्ष, सृष्टि संवत् १ अरब ९५ करोड़ २९ लाख ८५ हजार १०८ वर्ष, श्रीराम संवत् १ करोड़ २५ लाख ६९ हजार १०८ वर्ष, श्रीकृष्ण संवत् ५ हजार २३२ वर्ष, विक्रम संवत् २०७७ वर्ष से प्रवाहित है। वहीं वैदेशीय संवतों में चीनी संवत् ९ करोड़ ६० लाख २ हजार ३१९ वर्ष; पारसी संवत् १ लाख ८७ हजार ९८८ वर्ष; मिस्र २७ हजार ६७५ वर्ष; तुर्की ७६२८ वर्ष; यूनानी ३५९४ वर्ष; ईस्वी २०२१ वर्ष तथा हिजरी सन् मात्र १४४२ वर्ष पुराना है।

भारतीय काल गणना की सबसे छोटी इकाई कलियुग की है, जो कि ४ लाख ३२ हजार वर्ष का है। वर्तमान काल श्वेत वाराह कल्प के वैवस्वत मन्‍वतंर का अट्ठाईसवाँ कलियुग है। इसकी भी यदि आयु निकाली जाए तो वह भी आज ५१२२ वर्ष होती है। यह तुलनात्मक स्थिति सिद्ध करती है कि भारतीय काल गणना अत्यंत प्राचीन एवं वैज्ञानिक है। इतना ही नहीं, भारतीय वाङ्मय में संवत्सर प्रारंभ करने की भी शास्त्रीय विधि का उल्लेख मिलता है। अपने नाम से संवत्सर चलाने वाले सम्राट् को संवत्सर प्रारंभ करने से पूर्व अपने राज्य के प्रत्येक जन को ऋण-मुक्त करना पड़ता है।

अंग्रेजी महीनों का नामकरण

वर्तमान में प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कलेंडर के महीनों से हम सभी परिचित हैं। इन महीनों का नामकरण किस प्रकार हुआ, ये महीने किस प्रकार प्रारंभ हुए तथा इनके नामों से हमें क्या सूचना मिलती है, इसकी जानकारी भी रोचक है।

इस कलेंडर का प्रारंभ रोम के पौराणिक राजा रोम्युलस ने किया। रोम्युलस के इस कलेंडर में वर्ष दस महीनों में बँटा हुआ था। मार्टियुस, एप्रिलिस, मेयुस, जूनियुस, पिवंटिलिस, सेफ्टिलियस, सैटेंबर, ओट्टोबर, नवंबर और दिसंबर। इस प्रकार इस कलेंडर में पहला महीना जनवरी न होकर मार्टियुस यानी मार्च था। इसमें फरवरी माह भी नहीं था। वर्ष में बारह महीनों का विचार राजा न्यूमा पोंपीलियुस के शासन काल में विकसित हुआ। उन्होंने ही इस कलेंडर में जैन्युएरियुस और फुब्रेएरियुस नामक दो महीने और जोड़े। यह कलेंडर ई.पू. ४६ के आसपास तक चलता रहा। इस दौरान नया वर्ष मार्च से प्रारंभ होता रहा। इसके पश्चात् जूलियस सीजर से मार्च के बजाय जनवरी को वर्ष का पहला महीना बनाया।

जूलियस सीजर के कलेंडर का संशोधित रूप पोप ग्रेगरी १३वें के नाम पर मार्च १५८२ से चलन में आया। ब्रिटेन में इसे न्यू स्टाइल कलेंडर ऐक्ट नामक विधेयक पास करके लागू किया गया। इसमें महीनों के सुधरे हुए नाम रखे गए। इनके नामकरण के बारे में निम्न बातें कही जाती हैं—

जनवरीः यह शब्द लातीनी के जैन्युएरियुस शब्द से बना है। इसका नामकरण रोमन देवता जानुस के नाम पर किया गया है। इस देवता को सामान्यतः दो मुख वाला तथा कहीं-कहीं चार मुखवाला बताया गया है। रोम के गणतंत्रीय कलेंडर में यह महीना ग्यारहवाँ महीना था तथा इसमें २९ दिन थे। इस कलेंडर में वर्ष में ३५५ दिन होते थे। बताया जाता है कि जूलियस सीजर ने एक आज्ञा जारी करके जनवरी के दिनों की संख्या बढ़ाकर ३१ कर दी।

फरवरीः यह शब्द लातीनी के फुब्रेएरियुस का बदला हुआ रूप है। रोम के गणतंत्रीय कलेंडर में यह अंतिम महीना था। यह शब्द फबुअरी धातु से बना है, जिसका अर्थ है—शुद्ध करना। प्राचीन रोमन सभ्यता में यह महीना आत्म-शुद्धि, प्रायश्चित्त और परिमार्जन का माना जाता है। इस महीने में आत्म-शुद्धि की अनेक रस्में अदा की जाती थीं।

मार्चः यह प्राचीन रोम कलेंडर का पहला महीना था। उनके धार्मिक पर्वों और व्रतानुष्ठानों का प्रारंभ इसी महीने में होता था। यह शब्द लातीनों भाषा के मार्टियुस से बना है। यह महीना युद्ध और वृद्धि के रोमन देवता के नाम पर आधारित है।

अप्रैलः यह शब्द लातीनी भाषा के एप्रिलिस शब्द से बना है। एप्रिल का महीना उर्वरता की देवी एप्रेरिते के नाम पर आधारित है। इसीलिए अप्रेल को फसल के अंकुरित होने का महीना भी माना जाता था।

मई ः यह लातीनी भाषा के ही मेयुस शब्द से बना है। संभवतः इसका नाम बसंत की देवी मेईया के नाम पर आधारित है। मई का महीना शस्य और वनस्पति की बुद्धि का सूचक था। रोमनवासी इस समय कृषि संबंधी धार्मिक अनुष्ठान किया करते थे। यूरोप में इस महीने में मई राजा तथा मई रानी के साथ हरी-भरी टहनियों का जुलूस निकला जाता था।

जूनः इस महीने का नामकरण लातीनी भाषा के जुनियुस शब्द से हुआ है। यह उनकी मुख्य देवी जूनों की याद दिलाता है। जूनों शब्द जूवेनिस धातु से बना है, जिसका अर्थ है—विवाह योग्य कुमारी।

जुलाईः यह रोमन कलेंडर का पाँचवाँ महीना होता था, लेकिन आज से कलेंडर का यह सातवाँ महीना है। जुलाई को प्राचीन रोमनवासी पिवंटिलिस कहते हैं। इस महीने में ही जूलियस सीजर का जन्म हुआ था।

अगस्तः यह लातीनी भाषा के आगुस्टस शब्द से बना है। जब रोमन कलेंडर मार्च से प्रारंभ होता था, तब यह महना सेफ्टिलियस यानी छठा महीना कहलाता था। जूलियस सीजर के उत्तराधिकारी रोमन सम्राट् आगस्टम सीजर के नाम से इसका नया नाम रखा गया।

सितंबरः यह लातीनी भाषा के सेष्टेम शब्द पर आधारित है, जिसका अर्थ होता है सात। उस समय यह सातवाँ महीना होता था। आज यह महीना ३० दिन का है तथा वर्ष का नौवाँ महीना है।

अक्तूबरः प्राचीन रोमन में यह आठवाँ महीना होता था। अलग-अलग रोमन सम्राटों के साथ इस महीने के नाम को बदलने की कोशिश की गई, परंतु यही नाम बना रहा। रोमनों के युद्ध के देवता मार्स की इस महीने में विशेष पूजा होती है।

नवंबरः यह लातीनी भाषा के नोवज् शब्द पर आधारित है। इसका अर्थ नौ है। प्राचीन रोमन कलेंडर में यह नौवाँ महीना होता था। रोमन सम्राट् टाइबेरियस के नाम पर इसका नया नामकरण करने का प्रयास किया गया, परंतु स्वंय टाइबेरियस ने ऐसा नहीं होने दिया।

दिसंबरः यह लातीनी भाषा के डेसेज शब्द से निकला है, जिसका आशय है दस। प्राचीन रोमन कलेंडर में यह दसवाँ महीना था। आधुनिक कलेंडर में यह बारहवाँ तथा अंतिम माह है। इसमें ३१ दिन हैं। प्राचीन रोमनों में यह उत्सवों का महीना माना जाता है।

इस प्रकार वर्ष के बारहों महीने अपना विशिष्ट अर्थ लिये हुए हैं। प्रत्येक महीने में अलग-अलग देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना तथा विभिन्न उत्सवों का आयोजन किया जाता रहा है।

भारतीय वाङ्मय के अनुसार सृष्टि का प्रारंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है। परंपरा के साक्ष्य से हम जानते हैं कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने इसी दिन ब्रह्मांड की रचना प्रारंभ की। भारतीय काल-गणना के अधिकांश संवत्सर इसी दिन से प्रारंभ होते हैं। खगोलीय दृष्टिकोण में देखें तो भी यह दो खगोलीय पिंडों की कलाओं में पूर्ण सामंजस्य रखते हुए ऐसी ऋतु से प्रारंभ होता है, जब सूर्य भूमध्य रेखा पर होता है और पृथ्वी पर वातावरण सर्वथा सम होता है। जबकि ईस्वी सन् का प्रारंभ १ जनवरी से होता है, उस समय पृथ्वी के दो गोलाद्धो में सर्वथा विपरीत ऋतुएँ रहती हैं।

टूटती तिथि की वैज्ञानिकता

संवत्सर में प्रतिदिन की तिथि देखने हेतु चंद्रमा का उपयोग किया गया। भारतीय पंचांग में तिथि एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक चलती है। जिस दिन चंद्रमा सूर्य के साथ उदय होकर सूर्य के साथ ही अस्त होता है, उसे अमावस्या कहते हैं। जिस दिन चंद्रमा सूर्यास्त के बाद उदय होता है, उसे पूर्णिमा नाम दिया गया। आकाश में चंद्रमा का पथ वृत्ताकार होने के कारण ३६० अंश का होता है। एक माह में ३० दिन होने के कारण इसे ३० बराबर भाग बाँटने से प्राप्त एक भाग १२ अंश का होता है। चंद्रमा के अपने पथ पर १२ अंश चलने को एक तिथि माना गया है। यह वैज्ञानिक विभाजन है। चंद्रमा आकाश में सदैव एक समान चाल से नहीं चलता। कभी १९ घंटे में १२ अंश चलता है तो कभी इसी दूरी को तय करने में २६ घंटे ले लेता है। इस कारण तिथि परिवर्तन प्रतिदिन सूर्योदय के समय नहीं होकर दिन में किसी भी समय हो सकता है। इस कारण एक ही दिन में दो तिथियाँ भी हो जाती हैं।

संवत्सर में प्रतिदिन की तिथि देखने हेतु चंद्रमा का उपयोग किया गया। भारतीय पंचांग में तिथि एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक चलती है। जिस दिन चंद्रमा सूर्य के साथ उदय होकर सूर्य के साथ ही अस्त होता है, उसे अमावस्या कहते हैं। जिस दिन चंद्रमा सूर्यास्त के बाद उदय होता है, उसे पूर्णिमा नाम दिया गया। आकाश में चंद्रमा का पथ वृत्ताकार होने के कारण ३६० अंश का होता है। एक माह में ३० दिन होने के कारण इसे ३० बराबर भाग बाँटने से प्राप्त एक भाग १२ अंश का होता है। चंद्रमा के अपने पथ पर १२ अंश चलने को एक तिथि माना गया है। यह वैज्ञानिक विभाजन है।

समय के साथ-साथ सभ्यता का विकास हुआ। उद्योग, व्यापार, बाजार, धार्मिक व सामाजिक कार्यों के लिए मनुष्य को अलग-अलग दिन निश्चित करने की आवश्यकता पड़ने लगी। प्रारंभ के हर दस दिनों को विभिन्न कार्यों के लिए तय किया जाता रहा। कुछ दूसरे स्थानों पर हर पाँच दिन या सात दिनों को इन कार्यों के लिए तय किए जाने लगा। प्रारंभ में बेबेलोनिया में हर सातवें दिन को एक विशेष दिन माना जाता था। यहूदियों में भी हर सातवें दिन केवल धार्मिक पूजा किए जाने का रिवाज था।

एक ही दिन में दो तिथियों का होना व्यवहार की दृष्टि से उचित नहीं जान पड़ा तो यह तय किया गया कि सूर्योदय के समय जो तिथि होगी, उसे ही पूरे दिन की तिथि माना जाएगा। इस नियम के कारण जब कोई तिथि २४ घंटे से लंबी होती है तो एक ही तिथि में दो सूर्योदय हो जाते हैं और दो दिन एक ही तिथि रहती है। इसके विपरीत कोई दूसरी तिथि सूर्योदय के बाद प्रारंभ हुई तथा छोटी होने के कारण अगले सूर्योदय से पूर्व समाप्त हो जाती है। इस कारण इसकी गिनती नहीं हो पाती। इसे ही तिथि का क्षय होना या ‘तिथि टूटना’ कहते हैं। यदि किसी दिन सूर्योदय से पूर्व ही कोई तिथि प्रारंभ होकर अगले दिन सूर्योदय के बाद भी चालू रहती है तो उस दिन तिथि की वृद्धि हो जाती है। यह स्थिति असुविधाजनक भले ही हो, मगर है वैज्ञानिक। आकाश में चंद्रमा की स्थिति तथा चंद्रमा की कला देखकर बिना कलेंडर व घड़ी के समय व तिथि का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है।

सनातन काल गणना सूक्ष्मतम से विराटतम तक

दो परमाणु

=

१ अणु

२ नाड़िका

=

१ मुहूर्त

३ अणु

=

१ त्रसरेणु

३० कला

=

१ मुहूर्त

३ त्रसरेणु

=

१ त्रुटि

३० मुहूर्त

=

१ दिन-रात

१०० त्रुटि

=

१ वेध

७ दिन-रात

=

एक सप्ताह

३ वेध

=

एक लव

२ सप्ताह

=

१ पक्ष

३ लव

=

एक निमेष

२ पक्ष

=

१ माह

३ निमेष

=

एक क्षण

२ मास

=

१ ऋतु

५ क्षण

=

एक काष्टा

३ ऋतु

=

१ अयन

१५ काष्टा

=

एक लघु

२ अयन

=

१ वर्ष

१५ लघु

=

१ नाड़िका

एक वर्ष

=

१ संवत्सर

 

कलेंडर के विभिन्न रूप

मानव ने देखा कि हर मौसम एक निश्चित क्रम के अनुसार बदलता रहता है। चंद्रमा के दिखने का क्रम भी निश्चित है, जो  दिनों में पूरा होता है, इस समय को उसने एक महीने का नाम दिया। पृथ्वी  दिनों में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर लेती है, इस समय को एक वर्ष की इकाई माना, ताकि काल-गणना में सुविधा रहे।

इस तरह मानव ने अपनी सुविधानुसार समय को बाँटा, परंतु उसके तरीके अलग-अलग थे। उसका रोचक विवरण प्रस्तुत है—

माया कलेंडर

इसका निर्माण प्राचीन में मेक्सिको के लोगों ने किया। इसमें वर्ष के ३६५ दिन होते थे तथा हर वर्ष में १८ महीने तथा हर महीने में २० दिन होते थे। बाकी बचे ५ दिन अलग से हर वर्ष में जोड़ दिए जाते थे। इस कलेंडर के महीनों के नाम थे—पोष, उओ, जिप, जोटा, जेक, जुल, याक्सकिम, मोल, चेन, वाक्स, जैक, सेट, मेक, कावकिन, मुआन, पैक्स, कायाब और कुम्हूं।

माया कलेंडर मुख्यतः उत्सवों तथा तांत्रिक कार्यों में ही काम आता था। इसे केवल पुजारी व धार्मिक लोग ही पढ़ते थे, क्योंकि इसकी भाषा जनसाधारण की भाषा नहीं थी।

प्राचीन यूनानी कलेंडर

यह यूनान का अत्यंत प्राचीन कलेंडर था, जिसका वर्ष चाँद के दिखने के साथ शुरू होता था। इस कलेंडर में वर्ष में १२ महीने होते थे तथा हर महीने का नाम यूनानी पर्व, उत्सव से संबंधित था। इसमें १२ महीनों के नाम थे—हेक्टमबियन, मेटोगेनियन, बेड़ोमियन, पियोपसियन, मेमेक्टोरियन, पेसीडियन, गेमिलियन, एंथेस्टेरियन, इलाफेबोलियन, मूंचियन, थारगेलियन और सिरोफेरियन।

यूनान के प्राचीन गिरजाघरों में कहीं-कहीं आज भी इस कलेंडर का उपयोग किया जाता है।

भारतीय पंचांग

भारत में करीब ३० प्रकार के पंचांग प्रचलित हैं। हिंदी में कलेंडर का अर्थ पंचांग-पत्रा या तिथि-पत्रक होता है। सूर्य तथा चंद्रमा की गति के आधार पर भारत में कई पंचांग बने व प्रचलित हुए। परंतु सबसे पहला प्राचीन कलेंडर था ‘कलियुग संवत्’, यह ईसा से ३१०२ वर्ष पहले बना था।

भारतीय कलेंडरों में से जो दो सबसे अधिक प्रचलित हैं, वे हैं—

विक्रम संवत्

यह सर्वाधिक प्रचलित संवत् ईसा से ५७ वर्ष पहले बना। इसे उज्जियनी के प्रसिद्ध राजा विक्रमादित्य ने शुरू किया। इसमें साल में १२ महीने होते हैं, जिसके नाम हैं—चैत्र, बैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन।

शक संवत्

इसकी शुरुआत शक राजा कनिष्क ने ७८ ई. में की। यह कलेंडर नक्षत्रों पर आधारित है, जिससे यह अपेक्षाकृत अधिक वैज्ञानिक है। इसमें भी साल में १२ महीने होते हैं। जिनके नाम विक्रम संवत् वाले ही हैं। भारत सरकार ने इसे राष्ट्रीय पंचांग के रूप में मान्यता दे रखी है।

रोम का प्राचीन कलेंडर

इसमें एक साल में १० महीने होते थे, ४ महीने ३१ दिनों के तथा ६ महीने २९ दिनों के। ३१ दिनों वाले महीनों के नाम थे—मार्टियस, मेयस, क्विन्टिल्स और अक्तूबर। २९ दिनों वाले महीनों के नाम थे—एप्रिलिस, इथुनस, सेक्सटिलिस, सेप्टेमबर, नवंबर और दिसंबर।

बाद में इसमें २ महीने और जोड़ दिए गए, इनुएरियस २९ दिन का तथा फेबुएरियस २८ दिनों का।

यहूदी कलेंडर

इसमें भी साल में १० महीने होते थे, जो २९ व ३० दिनों के थे। पर इसमें हर तीसरे, छठे, आठवें, ग्यारहवें, चौदहवें, सत्रहवें और उनतीसवें वर्ष में ३० दिनों का एक महीना और जोड़ दिया जाता है। इस कलेंडर के महीनों के नाम थे—निवासान, सिवान, आब्र, तिश्ती, शेबत, अदर, प्रथम, इय्यार, तम्युज, इलुलतेवेत और अदर उन्नीस।

जूलियस कलेंडर

ईसा पूर्व पहली शताब्दी में रोम के सम्राट् जूलियस सीजर ने ‘रोम के प्राचीन कलेंडर’ में कुछ सुधार किया। उसने प्रत्येक वर्ष में १२ महीने ३६५ दिनों का बनाया और यह बढ़ा हुआ। १ दिन फरवरी मास में जोड़ा गया, क्योंकि प्राचीन रोम के कलेंडर में जब दस महीने होते थे तो फरवरी उसका अंतिम महीना पड़ता था। इस नवीन कलेंडर की जूलियस कलेंडर कहा जाने लगा।

जूलियस सीजर ने रोमन कलेंडर में से ‘क्विनिटल्स’ महीने का नाम बदल कर अपने नाम के आधार पर, उस महीने का नाम ‘जुलाई’ रख दिया। उसके कई सालों बाद आगस्टम सीजर ने रोमन कलेंडर में से ‘सेक्सटिलिस’ महीने का नाम अपने राम के आधार पर ‘अगस्त’ रखा।

प्रेगरियन कलेंडर

जूलियस कलेंडर करीब सारे ईसाई देशों में लोकप्रिय हो गया। पोप ग्रेगरी ने जूलियस कलेंडर में थोड़ा और सुधार किया व बताया कि एक वर्ष ३६५) दिन का न होकर ३६५ दिन ५ घंटे ४८ मिनट ४६.०५४ सेकंड का होता है। (यानी ३६५.२४२२ दिन का) अतः हर चौथे साल १ दिन बढ़ाकर फरवरी २९ दिन की कर देने से थोड़ा सा समय ज्यादा जुड़ जाता है। (०.०३१२ दिन)। जो १०० साल से बढ़कर ०.७८ दिन हो जाता है। उसे हटाने के लिए यह निश्चित किया गया कि हर शताब्दी १८००, १९०० आदि ३६५ दिन की हुआ करेगी, चाहे उसमें ४ का भाग चला जाए।

इससे फिर ०.२२ दिन घट जाता है, जो ४०० साल में बढ़कर .३८ दिन हो जाता है। उसे जोड़ने के लिए यह निश्चित किया गया कि हर ४०० साल बाद १६००, २००० में फरवरी २९ दिनों की होगी तथा साल में ३६६ दिन होंगे। पर १७००, १८०० में फरवरी २८ दिनों की ही होगी।

इस कलेंडर को अठारहवीं शताब्दी में इंग्लैंड ने अपना लिया। आज सारे संसार में यही कलेंडर प्रचलित है।

चीनी पंचांग

सूर्य तथा चंद्रमा की गतियों के आधार पर चीन ने एक पंचांग बनाया, जिसे ‘सौर-चांद्र-पंचांग’ कहा जाता है। उस साल में ३६५.२५ दिन होते थे।

आजकल प्रायः सभी देशों में व्यावहारिक रूप से ग्रेगेरियन कलेंडर ही प्रचलित है। धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार हिंदू-मुस्लिम व अन्य धर्मावलंबी धार्मिक कार्यों के लिए अपने-अपने पंचांग इस्तेमाल करते हैं। सरकारी कामकाज के लिए ‘वित्त वर्ष’ १ अप्रैल से ३१ मार्च तक माना जाता है, बैंकों में भी इसी का प्रचलन है। पंजाब में लोग बैसाख से नया साल आरंभ होना मानते हैं तो दक्षिण भारत में ओणम से तथा असम में बाहाग से। व्यापारी लोग दीवाली से अगली दीवाली तक एक वर्ष मानते हैं।

विदेशों में सप्ताह का नामकरण कैसे हुआ?

एक सप्ताह में सात दिन होते हैं और प्रत्येक दिन को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इनके नामकरण का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है। हजारों वर्ष पूर्व मनुष्य केवल महीनों के बारे में जानता था। प्रत्येक माह के प्रत्येक दिन के लिए वह अलग-अलग नाम रखता था।

समय के साथ-साथ सभ्यता का विकास हुआ। उद्योग, व्यापार, बाजार, धार्मिक व सामाजिक कार्यों के लिए मनुष्य को अलग-अलग दिन निश्चित करने की आवश्यकता पड़ने लगी। प्रारंभ के हर दस दिनों को विभिन्न कार्यों के लिए तय किया जाता रहा। कुछ दूसरे स्थानों पर हर पाँच दिन या सात दिनों को इन कार्यों के लिए तय किए जाने लगा। प्रारंभ में बेबेलोनिया में हर सातवें दिन को एक विशेष दिन माना जाता था। यहूदियों में भी हर सातवें दिन केवल धार्मिक पूजा किए जाने का रिवाज था।

मिस्र के लोगों ने भी सात दिनों की पद्धति अपनाई। उन्होंने सातों दिनों के अलग-अलग नाम भी रखे। ये नाम पाँच ग्रहों सूर्य व चंद्रमा के आधार पर रखे गए। मिस्र के लोगों में सप्ताह के सात दिनों के नाम रविवार, चंद्रवार, बुधवार, बृहस्पतिवार, शुक्रवार तथा शनिवार रखे और सप्ताह के दिनों के इन्हीं नामों को रोम वालों ने भी अपनाया।

वर्तमान में सप्ताह के नामों को पद्धति के आधार पर निर्धारित किया गया है। सप्ताह के इन सात दिनों के नाम देवताओं के नामों के आधार पर रखे गए हैं। सूर्य वाले दिन को सुनानदेग या संडे (रविवार) कहा जाता है। चंद्रमा वाले दिन को मोननदेग या मंडे (सोमवार)। मंगल ग्रह के दिन को टिवैसदेग या ट्यूजडे (मंगलवार)। बुध के दिन को बौडेल या वैन्सडे (बुधवार), बृहस्पति के दिन को थौर या थर्सडे (बृहस्पतिवार), देवता शुक्र के दिन को फिग या फ्राइडे (शुक्रवार) और शनि के दिन को सैंटसंदिग या सैटरडे (शनिवार) कहा जाता है। इस प्रकार देवताओं के नाम पर आधारित सप्ताह के सात नाम काफी प्रचलित हुए और आज भी सारे विश्व में सप्ताह के सात दिनों के यही नाम प्रचलित हैं। 

वारों का वैज्ञानिक क्रम

वस्तुतः अथर्ववेद के ‘अथर्व ज्योतिष’ में वारों के नाम का क्रम तथा वैज्ञानिक आधार मिलता है, जो कि हजारों वर्ष पुराना है, जबकि पश्चिमी देश वारों का प्रयोग मात्र दो हजार वर्षों से कर रहे हैं।

भारत ऋषि-मुनियों ने ठोस वैज्ञानिक आधार पर सप्ताह के चारों का क्रम निर्धारित किया है। पृथ्वी और सूर्य से घनिष्ठ संबंध रखने वाले सात ग्रहों की कक्षाओं के अनुसार सात वार निश्चित किए गए हैं, जो संपूर्ण विश्व में प्रचलित हैं। वस्तुतः वार शब्द (वासर) दिन का ही संक्षिप्त रूप है। आज भी कई समाचार-पत्र रविवारीय अंक के स्थान पर रविवासरीय अंक लिखते हैं। एक अहोरात्र (दिन-रात) एक वासर अर्थात् एक दिन होता है। अहोरात्र से ही होरा शब्द लिया गया है, जो कालमान की एक छोटी इकाई है। होरा एक अहोरात्र का २४वाँ भाग होता है, जिसे अंग्रेजी में ऑवर्स कहते हैं।

दिन-रात्रि में २४ घंटे होते हैं। अतः एक होरा एक घंटे अथवा  घटी के बराबर होती है। इसी होरा से वारों की गणना प्रारंभ हुई। यह उल्लेखनीय है कि भारतीय ज्योतिष में संपूर्ण गणना पृथ्वी को केंद्र मानकर की गई है, जबकि वास्तव में सौर परिवार का केंद्र सूर्य है, जिसके चारों और अपनी-अपनी कक्षाओं में पृथ्वी सहित सभी ग्रह परिक्रमण करते है। परंतु भारतीय ज्योतिष दृश्य स्थिति को स्वीकारता है। पृथ्वी से देखने पर विभिन्न राशियों में से अन्य ग्रहों की भाँति सूर्य भी परिक्रमण करता हुआ प्रतीत होता है। अतः सूर्य को भी ज्योतिष विज्ञान में एक ग्रह माना गया है। अंतरिक्ष में ग्रहों की कक्षाओं की वास्तविक स्थिति इस प्रकार है—“सूर्य, बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, गुरु, शनि। वास्तव में यही कक्षा-क्रम सप्ताह के वारों के क्रम का आधार है।

अतः वर्तमान परिप्रेक्ष्य में हमें हमारी काल गणना की पुरातन वैज्ञानिक संवत्सर परंपरा को पुनः जाग्रत् करना होगा और हमें हमारे जन्मदिन, पर्व, त्योहार, विवाह एवं प्रतिष्ठान की वर्षगाँठ, पूर्वजों की पुण्य तिथियों को भी भारतीय परंपरा अनुसार मनाना होगा, न कि अंग्रेजी दिनांक अनुसार। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ब्रह्माजी द्वारा सृष्टि रचना का प्रथम दिन, भगवान् राम के राज्याभिषेक का दिन, शक्ति उपासन का प्रथम दिन, आर्य समाज की स्थापना का दिन, डॉ. हेगेडवार का भी जन्म दिन होता है, अतः इन्हें हर्षोल्लास से मनाना चाहिए।

 

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