आमने-सामने

आमने-सामने

रामलाल आनंद कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) में बत्तीस वर्षों तक अध्यापन करने के पश्चात् रीडर (एसोसिएट प्रोफेसर) के पद से अवकाश ग्रहण। एम.ए. कक्षाओं के अध्यापन और शोध-निर्देशन का भी अनुभव। अब तक आठ पुस्तकें प्रकाशित। पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कविताएँ, यात्रा-वृत्तांत आदि प्रकाशित।

ह अच्छा विद्यार्थी था। बी.ए. ऑनर्स की कक्षा में वह छोटा, मासूम सा विद्यार्थी पढ़ने में भी ठीक-ठाक था। वैशिष्ट्य यह था कि वह बहुत अच्छी गजलें लिखता था। ‘पास-आउट’ हो जाने के बाद भी वह मेरे मन-मस्तिष्क में बसा रहा। कॉलेज से निकलने के बाद भी वह गजलें लिख-लिखकर ‘सर’ को भेजता रहा। प्राध्यापक हर गजल पर उसे प्रोत्साहित करता। एक दिन पूछा, ‘तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं?’

‘सर, साबुन की दुकान है।’

‘क्या तुम भी दुकान पर बैठते हो?’

‘हाँ सर, बैठता ही हूँ। जब तक आगे कुछ तय नहीं होता तो दुकान पर बैठने के अलावा और चारा ही क्या है?’

साबुन की दुकान और गजलें लिखना कुछ बात जुड़ती नहीं थी। कभी-कभी मुझे संदेह होता कि गजलों में प्रयुक्त ठेठ उर्दू के शब्द उसे कैसे आते हैं? कहीं इधर-उधर से पढ़-उतारकर तो नहीं भेज रहा?

मैंने पूछा एक दिन। ‘तुम्हें उर्दू के इतने शब्द कैसे पता हैं? तुमने कहीं पढ़ी है?’

‘नहीं सर, मेरे दादाजी हैं, उन्हें शेर-ओ-शायरी का बहुत शौक है। पाकिस्तान में उन्होंने उर्दू पढ़ी थी। वहाँ शिक्षा का माध्यम उर्दू ही था। उन्हीं की ‘गाइडेंस’ है।’

कई बरस बीत गए।

सुदीप मेरे मन-मस्तिष्क के किसी कोने में पलता-पनपता रहा, अनजाने, अनायास रूप से। सुदीप... यही नाम था उसका। कई और बरस बीत गए।

अब मैं अवकाश ग्रहण कर चुका हूँ।

एक दिन उस प्रिय विद्यार्थी को खोज निकालने का मन बना लिया।

कॉलेज के पुराने रिकॉर्ड के पन्नों की गर्द छानकर मैंने उसका पता नोट किया-१६१५, अकबरपुरी, जे.जे. कॉलोनी यानी झुग्गी-झोपड़ी कॉलोनी।

मेरे मन में अजीबो-गरीब तस्वीरें बन-मिट रही थीं। कितनी भाव-लहरियाँ उठ-गिर रही थीं। उसे कैसा लगेगा, जब इतने वर्षों बाद उसका वृद्ध प्राध्यापक उसके सामने अकस्मात् प्रकट हो जाएगा? मुझे कैसा लगेगा, जब वह सौम्य, मासूम सा विद्यार्थी अब बड़ा होकर मेरे सामने सचमुच में खड़ा होगा। अभिभूत हो जाएगा। हो सकता है, पैरों पर गिर पड़े। वह तब भी बहुत काव्यमय व्यक्तित्व वाला था।

कॉलोनी बहुत गंदी थी। जगह-जगह कूड़े के ढेर थे। खुली नालियों में और कहीं-कहीं नालियों के ऊपर भी बालकों की बिष्ठा ठहरी हुई थी। मक्खियों के झुंड-के-झुंड जहाँ-तहाँ चिपके पड़े थे। हाथों पर दो-चार मच्छर काट गए। मैंने खद को कोसा। बेकार ही यहाँ आया। क्या लेना उसे उस विद्यार्थी से? कितने आते हैं, चले जाते हैं।

वह वार्ड नं. १६ में रहता था। मैं ढूँढते-ढूँढते परेशान हो गया। आखिर एक से पूछ ही लिया, ‘भाई साहिब, ये वार्ड नं. १६ किधर है?’

‘वार्ड नं. १६ तो आप उधर पीछे छोड़ आए बाबूजी।’ ‘लेकिन वहाँ के लोगों ने तो मुझे इधर भेजा है। तो पीछे होगा... पार्क के पीछे।’ मैं पार्क में से होता हुआ वार्ड १६ में पहुँचा। वार्ड १६ तो बहुत बड़ा है भाई साहब। कितना नंबर पूछ रहे हैं? मैंने नंबर बताया तो बोले, वो दुकान बंद कर गए हैं।

‘अब कहाँ गए हैं?’ ‘मुझे नहीं पता... बहुत साल पहले की बात पूछ रहे हैं आप!’

‘हाँ... आँ...आँ...’ मैंने दीर्घ विश्वास लेकर कहा, ‘तुम्हारे घर में कोई बुजुर्ग हैं? शायद उसे पता होगा।’

‘हाँ, मेरी दादी है। जरा बुला दो या पूछ कर बता दो। कोई जरूरी काम है?’ उसने पसीने से लथ-पथ मेरी काया देखकर पूछा। ‘हाँ... नहीं... नहीं... काम तो कुछ खास नहीं।’

उसकी दादी ने बाहर निकलकर बताया कि वे सब एल ब्लॉक में चले गए थे। सुदीप के भाई ने वहाँ राशन का डिपो खोला था।

हारे-थके शरीर किंतु उत्साह और जिज्ञासा भरे मन से मैं एल ब्लॉक की ओर चल पड़ा।

एक से भी ज्यादा का समय हो गया था। चमकीली धूप थी। कमीज के नीचे पसीने की धाराएँ बह रही थीं।

सुदीप का बड़ा भाई राशन तौल-तौलकर दे रहा था। बी.पी.एल. कार्डधारियों की लंबी लाइन थी।

मैंने कहा, ‘मैं सुदीप से मिलना चाहता हूँ।’

‘सुदीप तो यहाँ नहीं। पीछे घर है। वहाँ होगा। कोई काम हो तो बुलाऊँ।’

मंजिल इतनी निकट है इस अहसास से मन पुलकित हो गया। काफी सीमा तक थकावट मिट गई।

उसने घर के सामने खड़े होकर सुदीप को पुकारा। वह निकला। दहलीज पर ३०-३५ वर्ष का एक अधेड़ खड़ा था।

मैंने अपना नाम और कॉलेज बताया। वह एकदम पहचान गया, लेकिन वह तुरत-फुरत न आगे बढ़ा, न उसने कोई तीव्र प्रतिक्रिया ही दिखाई। कुछ सोचता-सा बस खड़ा रहा। ‘कहिए सर, किस तरह आए?’ उसने ठंडे लहजे में पूछा। मैं सिर्फ तुम्हें मिलने आया हूँ। मुझे कोई काम नहीं है। मुझे आपसे क्या काम हो सकता है भला? ‘नहीं सर, कोई तो काम होगा! ऐसे इतनी दूर धूप में इतने बरसों बाद कौन आता है? जरूर किसी कारण से आए होंगे। आप कुछ छिपा रहे हैं।’

मैं अवाक् था; नि:शब्द... कुछ आहता सा...। वह मूर्तिवत् था। मैं भी मूर्तिवत् था। उसकी आँखों में दुनियादारी के अनबूझे सवाल तैर रहे थे। अविश्वास के एक धक्के से मेरा मन चूर-चूर हो गया था। मेरी आर्द्र आँखों में उसके सवालों का जवाब नहीं था।

 

सी-4, बी/110 (पॉकेट-13)

जनकपुरी, नई दिल्ली-110058

दूरभाष : 9870103433

—ओमप्रकाश शर्मा ‘प्रकाश’

हमारे संकलन