आचार्य महाप्रज्ञ का कवि रूप

आचार्य महाप्रज्ञ का कवि रूप

प्रतिष्ठित कवि, दोहाकार, शायर, नुक्कड़ नाट्यकर्मी और संपादक। विभिन्न विधाओं में सात कविता-संग्रह प्रकाशित। हिंदी अकादमी दिल्ली सरकार का साहित्यिक कृति सम्मान सहित अनेक सम्मानों से सम्मानित।

र्ष २०२० आचार्य महाप्रज्ञ के जन्म शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया गया। आचार्य महाप्रज्ञ एक मुनि, एक संत, एक संन्यासी, एक दार्शनिक, एक चिंतक, एक विचारक, एक ऋषि के अतिरिक्त एक कुशल वक्ता और एक उत्कृष्ट कवि भी थे। स्वयं एक कवि होने के नाते आचार्य महाप्रज्ञजी को मैंने हमेशा एक असाधारण और बड़े कवि के रूप में देखा। वे जैन संप्रदाय की ‘तेरा पंथ’ शाखा के नियंता और नियामक भी रहे। वे बहुत पहले से मुनि नथमल के नाम से लिखते रहे थे। उनकी बचपन की अनेक घटनाओं को जोड़कर देखें तो मालूम पड़ता है कि वे बहुत ही संवेदनशील प्रवृत्ति के रहे और उनकी दृष्टि में अलौकिकता का भरपूर प्रभाव रहा। शुरू से ही उनकी रुचि साहित्यिक थी और दार्शनिक भी। उन्होंने स्वयं माना कि “मेरी साहित्यिक रुचि और दार्शनिक रुचि में किस को प्राथमिकता दूँ, यह निर्णय कठिन है। इतना निर्णय दे सकता हूँ कि दोनों रुचियाँ साथ-साथ चलती रहती हैं। प्रारंभ में साहित्यिक रुचि प्रबल थी और दार्शनिक रुचि कमजोर। दो दशक तक यह स्थिति बनी रही। उसके बाद दार्शनिक रुचि प्रबल हो गई और साहित्यिक रुचि कमजोर। प्रवृत्ति में कुछ अंतर आया, क्षमता में अंतर नहीं आया। आज भी दोनों रुचियाँ, दोनों प्रवृत्तियाँ और दोनों क्षमताएँ एक साथ हैं, ऐसा मैं अनुभव करता हूँ।”

स्वाध्याय से ही आचार्य महाप्रज्ञ ने बहुत ही कम समय में संस्कृत, प्राकृत, व्याकरण, दर्शन, न्याय, काव्य आदि विषयों का गंभीर अध्ययन कर लिया था। जैन संप्रदाय में दीक्षा लेते हुए मुनि नथमल के रूप में उन्होंने अपनी गणना अत्यंत मेधावी मुनियों की पंक्ति में करवाई थी। उन्होंने अपने गुरुवर आचार्य तुलसी के अणुव्रत आंदोलन को नई दिशा ही नहीं दी, अपितु इस आंदोलन की दार्शनिक पृष्ठभूमि भी लिखी। अपने कार्यकाल में इसे और अधिक व्यापक और प्रभावी भी बनाया। उन्होंने कभी यथास्थितिवाद को नहीं स्वीकारा। निरंतर नए अन्वेषण में रत रहकर उन्होंने विस्मृत जैन साधना पद्धतियों को फिर से खँगाला और प्रेक्षाध्यान के रूप में एक नई साधना पद्धति की परिकल्पना भी हमारे सामने रखी। इस उपलब्धि और खोज के कारण स्वयं आचार्य तुलसी ने उन्हें ‘जैन ध्यानयोग का कोलंबस’ तक कहा।

आचार्य महाप्रज्ञ हमेशा से कुछ नया करने में प्रसन्नता अनुभव करते थे। प्रयोग धर्म का उनका विशेष गुण था। जब अधिकतर तुकांत कविताएँ लिखने का ही प्रचलन था, तब आचार्यजी ने अतुकांत कविता लिखने की ठानी। हर नई बात का विरोध होता ही है, तो उनका भी हुआ। उनका यह नयापन कुछ को बहुत अटपटा सा भी लगा। बाद में उनकी ऐसी कविताओं को समर्थन और प्रोत्साहन भी मिला।

एक रोचक घटना है। आचार्य तुलसी के सान्निध्य में एक बार पटना में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. जाकिर हुसैन ने लंबा-चौड़ा भाषण देते हुए कहा था कि हमने औद्योगिक प्रगति करते हुए बड़े-बड़े कारखाने तो खोले हैं, लेकिन मनुष्य के निर्माण का कोई कारखाना नहीं खोला। आचार्य तुलसी के द्वारा प्रारंभ किए गए अणुव्रत आंदोलन को उन्होंने मानव निर्माण के कारखाने की संज्ञा देते हुए कहा कि यही आंदोलन हमें विकास की सही दिशा दिखाएगा। उनके लंबे वक्तव्य का आचार्य महाप्रज्ञ ने अपनी काव्य भाषा में तब जो गुंफन किया था, वह इस प्रकार है—

 

विकास का मंत्र?

गति

गति का मंत्र?

गहरी नींद

गहरी नींद का मंत्र?

उफनती हुई चाँद की चाँदनी!

इस प्रकार आचार्य महाप्रज्ञ पूरे व्याख्यान को मंत्र रूप में व्यक्त करने की सामर्थ्य रखते थे। वे जानते थे कि साहित्य में ही वह ताकत है कि वह स्वयं को सर्व तक का और सर्व से स्वयं तक का रास्ता तय कर सकता है। पूरे बरगद को एक बीज में और एक बीज को पूरे बरगद में सिमटते और फैलते देखने की दिव्यदृष्टि आचार्यवर के पास सदा से रही।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, मैथिली शरण गुप्त, सियाराम शरण गुप्त, हरिवंश राय ‘बच्चन’, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, जैनेंद्र कुमार, कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’, विष्णु प्रभाकर, हीरानंद सच्चिदानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, काका कालेलकर जैसे प्रतिष्ठित मूर्धन्य कवियों-साहित्यकारों से आचार्य महाप्रज्ञ का बार-बार संपर्क होता रहा। कविताएँ सुनने-सुनाने के अवसर भी मिलते रहे और इस प्रकार इन मुलाकातों से प्रेरणा भी मिलती रही। एक बार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने एक रात्रि प्रवास के दौरान आचार्य महाप्रज्ञ की कविता को सुनकर खूब प्रशंसा भी की थी। कविता इस प्रकार थी—

बीज में विस्तार होता

बीज क्या? विस्तार क्या है?

चित्र में संसार होता

चित्र क्या? संसार क्या है?

मृत सलिल का योग पाकर

बीज ही विस्तार बनता;

वासना का भोग पाकर

चित्त ही संसार बनता

जब आचार्य महाप्रज्ञ मुनि नथमल के नाम से लिखते थे, तब उनका गद्य गीतों और लघु निबंधों का एक संकलन भी आया था—‘अनुभव चिंतन मनन’। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस किताब का प्राक्कथन लिखा था। उन्होंने इस प्राक्कथन के अंत में कहा था कि “इस छोटी सी पुस्तक को पढ़कर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मुझे आशा है कि हर सहृदय को इस पुस्तक से आनंद और प्रेरणा, दोनों की प्राप्ति होगी।”

आचार्यवर ने अपना कविता लेखन राजस्थानी भाषा से प्रारंभ किया था। राजस्थानी, हिंदी और संस्कृत भाषा में उनकी अनेकानेक कविताएँ उपलब्ध हैं। उनकी एक राजस्थानी कविता की बानगी देखिए—

दिल तो है पण दर्द कोनी

दर्द कोनी जद ही दिल है

नहीं तो आज ताईं रेतो ही कोनी

कदेई टूट जातो...

परायो दर्द कुण देखे...

आचार्य महाप्रज्ञ ने जैन संस्कृति के आदि पुरुष ऋषभदेवजी के जीवन-चरित्र पर आधारित महाकाव्य ‘ऋषभायण’ की भी रचना की है। इस महाकाव्य को पढ़ने का मुझे भी अवसर मिला। मैं मानता हूँ कि आदि पुरुष ऋषभदेवजी के चरित्र-चित्रण के अभाव में मानवता के विकास का इतिहास अधूरा ही रहता अगर ‘ऋषभायण’ की रचना नहीं होती। आचार्य महाप्रज्ञ ने ‘ऋषभायण’ का सृजन कर इसे पूर्णता प्रदान की है। ‘ऋषभायण’ के प्राचीन कथानक के माध्यम से आचार्यश्री ने आधुनिक युग की अनेकानेक समस्याओं पर जो टिप्पणियाँ की हैं। वे हमारे समाज को नई दिशा प्रदान करेंगी। इसमें समाज की पीड़ा, उस पीड़ा का निदान और समाधान सबकुछ सामने आया है।

आचार्य महाप्रज्ञ कृत ‘ऋषभायण’ में आदि पुरुष ऋषभ के चरित्र के माध्यम से मानव जाति के आदि युग की कथा महाकाव्य के रूप में कही गई है। आदिपुरुष ऋषभ ने युग-परिवर्तन के समय नई सभ्यता और नई संस्कृति का किस प्रकार सृजन किया, इसे विस्तार से इस महाकाव्य में कथा रूप में समझाया गया है। इसमें सृष्टि का विकास, समाज व्यवस्था का सूत्रपात, राजनीतिक तंत्र का विकास, दंड नीति का प्रादुर्भाव, मनुष्य का अकर्म युग से कर्म युग में प्रवेश—इन सब का विस्तार से वर्णन किया गया है। इसे पढ़ते हुए जेहन में मनु और श्रद्धा के माध्यम से कही गई जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ की कथा भी कहीं-कहीं गूँजने लगती है। आचार्य महाप्रज्ञ ने ‘ऋषभायण’ की कथा का अपनी साहित्यिक विद्वत्ता और सम्यक् ज्ञानदृष्टि से इस प्रकार ताना-बाना कसा है कि पूरा महाकाव्य सरस व रोचक तो बन ही पड़ा है, साथ ही साथ इसकी ऐतिहासिकता में कवि ने जिस खूबसूरती से वर्तमान की ज्वलंत समस्याओं के मूल का भी जगह-जगह जिक्र किया है, इससे इसमें आधुनिक-बोध भी समाहित हुआ है और इस ग्रंथ की प्रासंगिकता और सार्थकता सिद्ध हुई है। ऋषभ, भरत और बाहुबली की यह मर्मस्पर्शी गाथा असल में हमारी सभ्यता और संस्कृति की इतिहास कथा भी है। आचार्य महाप्रज्ञ ने इसे अतीत की कथा मात्र तक सीमित न रखकर इसमें वर्तमान का जो स्पर्श दिया है, उससे हमारे समाज को नई दृष्टि, नई दिशा और नई संचेतना का आस्वाद मिलेगा।

‘ऋषभायण’ के निम्नलिखित काव्यांशों में आप आचार्य महाप्रज्ञ की साहित्यिक दृष्टि की असाधारण झलक के दर्शन कर सकते हैं—

मानव, मानव विहित व्यवस्था

सबकुछ है परिवर्तनशील

अनुत्तरित है प्रश्न आज भी

अमुक श्लील है या अश्लील

निज पर शासन, फिर अनुशासन

शासन का यह मौलिक मंत्र

अपने शासन में शामिल था

स्वयं ऋषभ का जीवन तंत्र

सत्य इतना ही नहीं

जितना कि मैं हूँ मानता

व्योम इतना ही नहीं

जितना कि मैं हूँ जानता

सब अपने-अपने नेता हैं

फिर क्यों आवश्यक नेता?

अपनी मर्यादा अपना

अनुशासन जन यदि कर लेता

निज पर शासन जब-जब घटता

तब नेता लेता अवतार

वही कुपथ जाने वालों का

कर सकता है सहज सुधार

मुक्त पवन में श्वास लिया है

मुक्त गगन में किया विहार

उस पंछी का कैसे होगा

पल भर भी पिंजड़े से प्यार?

दु:ख जन्म देता दर्शन को

वितथ नहीं चिंतन धारा

दुख ने ही खोजा सुख का पथ

फिर भी सबको सुख प्यारा

मन से मन का मिलन ही

है वास्तविक विवाह

सामाजिक अब बन रहा

जीवन एक प्रवाह

सामाजिक सुख के लिए

महापुरुष की सृष्टि

शस्य श्यामला भूमि के

लिए जलद की वृष्टि

इच्छा से इच्छा बढ़ती है

इच्छा का अपना है चक्र

दूध जन्म देता है दधि को

दधि से फिर बनता है तक्र

हर प्रवृत्ति के पीछे-पीछे

चलती है अवधूत प्रवृत्ति

मन की चंचलता के पीछे

नई-नई होती है वृत्ति

शांति का मैं पक्षधर हूँ

किंतु उसका अर्थ है

एक पाक्षिक बंधुता का

अर्थ सिर्फ अनर्थ है

बाएँ-दाएँ में क्या अंतर

दोनों अवयव एक शरीर

एक धार है अमल सलिल की

केवल अलग-अलग हैं तीर

क्या शोणित से धुल जाएगा

सना हुआ शोणित से वस्त्र

नहीं वैर की ज्वालाओं को

बुझा सकेगा कोई शस्त्र

संशय की भाषा को पढ़ना

नेता की पहली पहचान

उसका निरसन करने वाला

होता है नेतृत्व महान्

आचार्य महाप्रज्ञ की बहुआयामी प्रतिभा और काव्य के प्रति उनका अनन्य अनुराग दरशाता है कि यदि वे पूर्णकालिक कवि होते तो उनकी गिनती निश्चित रूप से विश्व के शीर्षस्थ कवियों में होती।

आचार्य महाप्रज्ञ जी को समर्पित मेरे कुछ दोहे—

महाप्रज्ञ ब्रह्मांड थे, परमात्मा स्वरूप।

शिशु जैसी मुसकान थी, मेधा दिव्य अनूप॥

पारस जैसा स्पर्श था, नैनों में था नेह।

यों वे बेशक देह थे, यों थे मगर विदेह॥

प्रियदर्शी व्यक्तिव था, परम ज्ञान भंडार।

मनसा वाचा कर्मणा, किया जन्म साकार॥

मेधावी थे जन्म से, साहित्यिक थी दृष्टि।

पल, पल वे व्यक्ति से, होते गए समष्टि॥

तुलसी गुरुकुल में पढ़े, किया साधु सत्संग।

फैलाई निज पंथ में, निर्मल ज्ञान तरंग॥

योगी थे हर दृष्टि से, काम किए निष्काम।

ऊपर उठकर स्वयं से, जीवन जिया तमाम॥

दीन दुखी के हित किया, मन से मंगल गान।

जैसे बरसाते कृपा, भक्तों पर भगवान॥

शत्रु नहीं था एक भी, थे वे सबके मीत।

वे मानव के छंद में, थे ईश्वर का गीत॥

खुद को खोकर पूर्ण की, खुद में खुद की खोज।

मुनि नथमल से वे हुए, महाप्रज्ञ उस रोज॥

 

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