दृष्टि

दृष्टि

जानी-मानी लेखिका। दो काव्य और एक कथा-संग्रह तथा अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। कविताओं के अलावा कहानियाँ, संस्मरण और उपन्यास आदि लिखने में अभिरुचि। विश्व हिंदी सचिवालय द्वारा अमेरिका भौगोलिक क्षेत्र से प्रथम पुरस्कार प्राप्त।

“दरवाजा बंद कर लेना, स्कूल निकलने से पहले।” सीता अपने बेटे से बोलती हुई बाहर निकली। आजकल मौसम सुहाना था, इसलिए जल्दी चलने से पसीने से तर नहीं होती। यदि मौसम एक महीने पहले का होता तो अभी बेहाल हो गई होती। नियम है, सब कुछ बदल जाता है! सुबह के सात बजे थे, वैसे तो काम के लिए सही समय होता, लेकिन आज मद्रासी मैडम को अस्पताल जाना था, इसलिए पारसी मैडम को रुकना पड़ेगा। उसको तो रोज स्कूल जाना पड़ता है, फिर भी वह किचकिच नहीं करती। देर भी हो जाए, तो स्कूल चली जाती है। मुसकराती रहती है, जैसे उसके जीवन में दुःखी होने का कोई कारण नहीं हो। वैसे तो इन दोनों के कारण ही अपना घर चलता है, अपने को तो पगार से मतलब, किसी के साथ लफड़े में क्यों पड़ना? सबकुछ अपना फर्ज मानकर झेल लेने का। घंटी बजते ही सीता के दिल की धड़कन तेज हो गई, अभी बुरा-भला बरसना शुरू हो जाएगा।

आज तक मैडम से उसके नमस्ते का सीधा सा जवाब नहीं सुना, कभी ‘इतने देर से क्यों आया?’ कभी ‘तुम हमेशा मुझे नमस्ते बोलता है, पर ठीक से काम नहीं करता।’ कभी मुँह से कुछ न कहती, पर अपनी भौंहें तान लेती, जैसे अब तुम बूझो कि तुम्हारी गलती क्या है! सीता काम करते हुए सोचने भी लगती कि आज की नाराजगी का कारण क्या हो सकता है? फिर कुछ समय बाद सोचती कि बस उसे देखते ही बिगड़ जाती है! दरअसल बात यह थी की उनके दो कमरे का फ्लैट था। इसलिए काम आसान था, पैसे तो अच्छे मिल रहे थे। उनकी सेहत हमेशा बिगड़ी रहती, जाने क्या-क्या बीमारी थी उन्हें! शक्कर, बी.पी. और कैंसर तो थे ही, दमे का रोग भी था! सीता अपने रोज के दो-ढाई घंटे किसी तरह काट लेती। कभी जब दया आती, तो लगता अपने सेहत से नाराज होकर ही शायद इतनी चिड़ा चिड़ी हो गई हो, वरना उनको क्या तकलीफ हो सकती है? जब साब जिंदा थे तो वे उन्हें प्रेम से रखते थे। मैडम मुझसे भी इतना खीज नहीं दिखाती थी, छुट्टी माँगने पर मुँह बनाती थी, पर रोज इस तरह लगातार बड़बड़ाती नहीं रहती। पिछले साल साब चल बसे, पता नहीं उन्हें क्या हुआ था? उनके जाने के बाद मैडम दो महीने तक अपनी बेटी के घर गई थी। गार्ड को पूछा था, पर उसे भी कुछ बता कर नहीं गई। चार महीने बाद जब लौटीं तब तक सीता ने किसी और घर का काम पकड़ लिया था। पर मैडम तो उस पर अपना अधिकार समझती थी! सीता जानती थी की उनके घर कोई बाई टिकती भी नहीं। आजकल बाई लोग भी किटकिट बिल्कुल नहीं सहते। अधिक-से-अधिक एक हफ्ते में अपना हिसाब करके अपने रास्ते निकल पड़ते। सैकड़ों घर हैं काम करने को, फिर कोई समझौता क्यों करे?

सीता का दिल थोड़ा नरम था, सत्तर से ऊपर की उम्र में किसी से काम कैसे हो? खासकर ऐसी मैडम से, जिसने यौवन में भी काम न किया हो! अब तो मैडम बीमार भी रहती हैं। कुछ कह भी दे तो क्या फर्क पड़ता है? बुर्जुग लोग हैं बेचारे, जाने कितने दिन और रहना है इस जग में! आज उनके शक्कर का टेस्ट हैं, इसलिए सुबह नाश्ता साथ लेकर जाना है, इस वास्ते जल्दी बुलाया था। उनका नाश्ता बनाकर, बरतन धो देती, तो वे अस्पताल चली जातीं। सीता उनके लिए कभी सुबह पहुँचती तो कभी शाम को, पारसी मैडम तो एडजस्ट कर लेती है। रोग भी कोई अपनी मरजी से आता है भला? डॉक्टर को भी तो अस्पताल नियम से चलाना पड़ता है। लेकिन इस सुबह के खून टेस्ट ने हम सब को परेशान कर दिया था। जब साब थे तो वे घर पर चुपचाप अपना अखबार पढ़ते रहते, मैडम अकेले अस्पताल जाती। वे सीता के लिए दरवाजा खोल देते और आगे कुछ नहीं कहते। वह शीघ्रता से अपना काम करके दूसरे घर निकल जाती। साब खाना नहीं पकाते, लेकिन सब्जी काट देते, तब सीता केवल रोटी ही बनाती थी। आजकल मैडम के हाथ से कोई काम नहीं हो पाता, इसलिए सीता का इंतजार करती है। अपनी बेबसी के चलते तेवर चढ़े ही रहते हैं! कोई उनकी इच्छा के विरुद्ध कोई बात, सुझा भी नहीं सकता। एक बार सीता ने पूछा कि जिस दिन जाँच करनी हो, उससे पहले दिन ही सब्जी काट दे तो उन्हें सीता के कारण सुबह देरी नहीं होगी। वह शाम को आ जाया करेगी, बाकी सारे काम करने के लिए? मैडम तो आग बबूला हो गई, एक सीधा सपाट उत्तर था, “नहीं होता।” सीता समझ गई कि वे नहीं मानेंगी। बाकी दोनों घर के मैडम ठीक थे, इसलिए अब तक सब जगह नौकरी टिकी हुई थी।

घंटी बजाए तो पाँच मिनट हो गए थे, क्या हुआ, अब तक मैडम ने दरवाजा क्यों नहीं खोला? क्या वे सो गईं? शायद कॉलिंग बेल काम नहीं कर रहा। सीता ने दरवाजा हाथों से खटखटाया। प्रतीक्षा की, पर अब भी कोई हरकत नहीं हुई। दूसरी बार खटखटाया तो कुछ जोर से और आवाज भी दी। अचानक बगल के फ्लैट से उनकी पड़ोसी शीला भाभी बाहर आ गई। “क्या हुआ सीता, आंटी घर पर नहीं है?” सीता जोर की दस्तक सुनकर हैरान थी। “नमस्ते दीदी, आज आप घर पर हैं?” “हाँ दो दिन की छुट्टी ली है, दोस्त के साथ शॉपिंग करनी थी। ठहर, मेरे पास चाबी दी थीं उन्होंने, मैं देखती हूँ।” जैसे ही वे चाबी खोलकर अंदर गई, सीता भी उनके साथ भीतर चल दी। बाथरूम से हलकी कराहने की आवाज आ रही थी। मैडम वहीं गिर गई थीं और उनसे अपने आप उठा नहीं जा रहा था। किसी तरह पड़ोसिन के साथ सीता ने उन्हें सहारा देकर उठाया। यह तो ईश्वर का शुक्र था कि हम दोनों के उठाने से वे उठ सकीं। पंजाबी मेमसाब को तो ऐसे उठाना मुश्किल होता। किसी तरह से वे बिस्तर पर बैठा दी गईं। “थैंक यू!” वे शिष्टता से हाँफती हुई बोलीं, उनके शरीर पर बाहर वाले कपड़े थे, जो अब अध-भीगे थे।

“सीता तू चाय चढ़ा दे और मैडम के नए कपड़े ला दे।” सीता तुरंत काम में जुट गई तो शीला भाभी ने मैडम से पूछना शुरू किया। कुछ देर तो मैडम कुछ न बोली, अपनी साँस काबू में लाने का इंतजार करती रही। फिर इत्मीनान से उन्होंने अपने उबले पानी के बोतल से पानी पीया। “आंटी अस्पताल जाना है क्या? रिक्शा बुलवा लें?” “नहीं, आज मैं कहीं नहीं जा सकता, बहुत दर्द हो रहा है। सोचा था कि शक्कर का टेस्ट करेगा, लेकिन गीजर बंद करने गया, तो एकदम पानी में फिसल गया।” अब की बार उनकी आँखों से आँसू बह निकले। “कोई बात नहीं आंटी, अच्छा हुआ, सीता ने आवाज लगाई, वरना मैं तो आज सुबह शॉपिंग जाने के लिए तैयार थी। आपको सीता को ही थैंक यू बोलना चाहिए। आप उसे भी एक चाबी दे दो, ऐसे ही अगर आप को कुछ हो गया, जब मैं ऑफिस में हूँ तो कहीं देर न हो जाए।”

सीता ने जब चाय का कप पकड़ाया तो उसके साथ ओट्स का दलिया भी दिया। “मैडम आप दर्द की दवाई ले लीजिए, बाद में बहुत दर्द होगा।” मैडम ने सीता की ओर कृतज्ञता से देखा। “सीता तुमने नाश्ता खाया?” “नहीं मैडम, अभी तो आप ही गिरे हैं न, आपको ही खिलाना है।” बत्तीसी निकालकर हँसने लगी सीता। इसी बीच शीला भाभी का फोन बजा। “आंटी, अब तो आप आराम करो और सीता अगर जरूरत हो तो मुझे फोन लगा देना, एक बजे तक पास के मॉल में रहूँगी।” “जी अच्छा भाभी।” “शीला तुम जाओ बेटा, मैं ठीक हूँ, दो दिन आराम कर लूँगी तो बिलकुल ठीक हो जाऊँगी। काम करके नाश्ता खा लेना और मेरे लिए दो रोटी और सब्जी बना देना।” मद्रासी मैडम आँखें बंद करती हुई बोली।

सारा काम निपटाकर जब सीता जाने लगी तो मैडम को जगाया, “मैडम मैं जाने वाली हूँ, कुछ चाहिए क्या?” “हाँ, तुम्हें कैसे मालूम कि दो दिन के बाद दर्द वापस आता है?” सीता खिलखिलाकर हँसी, “मुझे हुआ था न, मैडम। पिछले हफ्ते जब खूब बारिश पड़ रही थी और मैं जल्दी चल रही थी न यहाँ आने के लिए तो सीढ़ी से पहले जो पानी जमा था, मैं उसमें जबरदस्त फिसल गई! तब तो पता नहीं चला, फिर बाद में ऐसा दर्द उठा न बाबा!” “फिर तुम क्या किया?” “क्या किया माने, क्या करेगा मैडम, कुछ नहीं किया।” “कोई दवा लिया?” “ऐसे थोड़ा दवाई हम लेते हैं मैडम! वो विशाल को दर्द होएंगा या बुखार होगा तबइच खरीदते।” “विशाल कौन है?” सीता मन ही मन हँसने लगी। मैडम के घर में पाँच साल से काम करती हूँ और उन्हें नहीं पता विशाल कौन है? “एक ही तो बच्चा है न अपना मैडम? सातवीं में पढ़ता है इस साल। मैं उसको पूरा पढ़ा-लिखाकर नौकरी में देखना चाहती। अपने और अपने मर्द के माफिक ऐसा घर में काम नहीं करवाना चाहती।”

आज मद्रासी मैडम चुप थी, थक गई थी बेचारी। कुछ देर बाद पूछा, “उसको बीमारी है?” “नहीं मैडम, वैसा कुछ नहीं है। कभी-कभी उसको बुखार आता न और कभी खेलने के बाद चोट लग जाती न, तब उसको दर्द की दवा देती मैं। अभी जाऊँ? दूसरी मैडम राह देख रही होगी।” “हाँ, थैंक यू, तुमने आज मुझे बचा लिया। तुम मेरे लिए ड्राइंग रूम से दवाई का डब्बा लेकर आना और मेरा उबला पानी इसमें भर दो।” बोतल पकड़ाती हुई बोली। “तुम जब आगे गिरेगा या दर्द होएगा, तो तुम मुझे बताना?” “क्यों मैडम, ऐसे बहुत बड़ी बात नहीं है!” सीता दोबारा हँसने लगी। “मैं तुम्हें दवाई देगा, तुम्हारा शरीर भी थक जाता है। अभी तुम दरवाजा बंद कर दो, मैं थोड़ा सोऊँगी।” सीता को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ, “अच्छा मैडम, मैं अभी जाती हूँ।”

सीढ़ियाँ उतरते हुए सीता सोचने लगी, मद्रासी मैडम आज उसकी ओर पहली बार इनसान की नजर से देख रही थी। उनके यहाँ इतने लंबे समय से काम करती है, पर कभी यह नहीं पूछा कि कहाँ रहती है, घर में कौन-कौन है? जब मन किया तब नाश्ता दे दिया। हाँ, गरमी में ठंडा पानी जरूर पूछती रहती। बस, इससे अधिक कोई नरमी नहीं। जब उसे देरी हो जाती या कोई गलती हो जाती, तब खूब डाँटती। बच्चों की तरह, सीता सारी डाँट एक कान से सुनती और एक से बाहर करती। अब ऐसा नहीं करती तो जीवन कैसे काटता? बचपन से हर बात पर हँसते रहने की आदत थी। मैडम उसे डाँट देती, पर जल्द ही वह उसे भूल जाती।

पारसी मैडम के यहाँ वह दो साल से काम सँभालने लगी है। उन्हें सुबह साढ़े सात बजे स्कूल के लिए निकलना पड़ता है। सीता सुबह ठीक सात बजे आ जाती और अपना काम करती रहती और वे तैयार हो जातीं। वे तो अपना खाना खुद बनाती हैं, वैसे भी अकेली रहती हैं। घर भी साफ रहता और बरतन भी कम होते हैं। छुट्टी के दिन सीता से बात करती रहती इसलिए, उनके घर का काम जल्दी से निपट जाता। उन्होंने विशाल के बारे में जानने के बाद उसे रोज शाम को पढ़ाना शुरू किया। जब से ट्यूशन पढ़ने लगा, उसके नंबर अच्छे आने लगे हैं। पहले विशाल उनसे मिलने में बहुत डरता था, क्योंकि पारसी मैडम उससे सिर्फ अंग्रेजी में बोलती थी। “अंग्रेजी बोलने से आती है, रटने से नहीं।” “सचमुच आई, मैं अब अंग्रेजी बोलने लगा हूँ और मुझे सब समझ भी आ रहा है।” सीता अपने बटे की बातें सुनकर खिल जाती। “अरे वाह विशाल, वे तो कोई पैसे भी नहीं लेती!” सीता उनके लिए कभी त्योहार में पूरन पोली तो कभी करंजी बनाकर ले जाती। मैडम कहती, विशाल जिस दिन अच्छी नौकरी पा लेगा, उस दिन ही वो उससे सीधे पैसे लेगी और हँस देती।

सीता सोचती रहती कि इनसान तो मद्रासी मैडम भी बुरी नहीं है, अकेली रहती हैं और बीमार भी। साब साथ होते तो इतनी चिड़चिड़ नहीं करती। वे उनकी सेवा भी करते और बाजार जाकर सारी खरीदारी भी करते, प्यार से उनकी बातें सुनते रहते। पारसी मैडम तो जवान है, स्कूल में टीचर है, अपने स्कूल में खुश है। वह मद्रासी मैडम की तकलीफ सुनती, तो उनकी आँखें भर आती। एक दिन तो सीता के साथ मिलकर उनके घर भी आई थी। उनके जन्मदिन पर पनीर की सब्जी और रोटी बनाकर लाई थी। मद्रासी मैडम बहुत खुश थी उस दिन, क्योंकि उन्हें पनीर की सब्जी बहुत प्रिय थी। जिस दिन उन्हें अस्पताल जाना पड़ा, पारसी मैडम उन्हें अपने साथ ले गई थी।

“तुम आज बहुत अच्छा कपड़ा पहन कर आया है!” सीता के गुलाबी सलवार कुरते को देखकर मद्रासी मैडम ने टिप्पणी की तो हमेशा साड़ी पहनने वाली सीता हँसने लगी। “अच्छा है न मैडम, पारसी मैडम ने दिया। उन्होंने कहा, अब उनके लिए तंग हो गया है।” “कौन, शहनाज?” “हाँ मैडम, मैं तो उनको पारसी मैडम ही कहती हूँ।” मद्रासी मैडम मुसकराई। “तुम जाने से पहले मेरी तीन साड़ियाँ ले जाना, अभी तो मैं साड़ियाँ नहीं पहन सकती। अभी मैं भी पंजाबी ड्रेस पहनता है।” “होऊ, आप पर मस्त दिखता है” सीता की आँखें चमकीं। कई बार उनकी दीवार पर टँगी तस्वीरें देखकर सोचती, जवानी में मद्रासी मैडम कितनी सुंदर थी, एकदम मस्त! “एक जमाने में तो सब बहुत पहनने का शौक था, अब क्या करें? साड़ी सँभालना मुश्किल, चलना ही मुश्किल है।” एक लंबी साँस छोड़ती हुई बोली।

दो-चार दिन तक सब कुछ सामान्य चल रहा था, अचानक एक दिन सीता सड़क पार करते-करते, तेजी से आते हुए एक रिक्शे से टकराई और बुरी तरह घायल हो गई। आसपास खड़े लोगों ने रिक्शे के चालक को खूब डाँटा-फटकारा और उसी रिक्शे में लादकर उसे सरकारी अस्पताल ले गए। सौभाग्य से मंगला उसके साथ वापस घर जा रही थी और उसने शिंदे भाऊ को फोन पर सारी बात बताई। सिर और दाएँ पैर के घाव गहरे थे, खून भी बहुत बहा। सीता बुरी तरह घबरा गई, उसका गला बिल्कुल सूख गया। कभी सुई तो कभी सेलाइन चढ़ा तो कभी एक्स-रे! एक के बाद एक कार्यक्रम चलता रहा। जब तक शिंदे सीता के पास न पहुँचा, मंगला उसके साथ रही। दस टाँके भी लगे, कुछ दिनों तक यों ही इलाज चलता रहा। तीनों मैडम को अपनी एक्सीडेंट के बारे में बताया। पारसी मैडम पूछने लगी, “किस ऑटो ने मारा तुम्हें, नंबर लिया? कोई हड्डी टूटी तो नहीं? काम के बारे में चिंता मत करना।” मद्रासी मैडम कुछ देर तो चुप रही, फिर बोली, “तुम हॉस्पिटल में हो? डॉक्टर क्या बोलता है, ऑपरेशन करेगा?” सीता हँसने लगी, “मैडम वह तो बोलता है हड्डी ठीक है, पर घाव भरने में अभी टाइम लगेगा। पैर में दस टाँके लगे हैं, सिर पर पाँच, उसको सँभालना पड़ेगा। दो हफ्ता काम करने को मना किया है।” “तुम मंगला या नंदा से बात करना मेरे लिए, दो हफ्ता कैसे काम चलाएगा?” “हाँ, मैडम, मंगला को तैयार किया है मैंने आपके लिए। ग्यारह बजे तक आएगी, अपना काम करने के बाद।” “ठीक है, ठीक है, सीता थैंक यू” सीता हैरान रह गई कि मद्रासी मैडम देर से आने के बारे में सुनकर भड़की नहीं।

सीता चौथे दिन घर पहुँची, तो पड़ोस से उसके घर में खाना पहले ही पहुँचाया जा चुका था। दर्द अभी भी जोरदार था, पर उसे तो खाट पर लेटने की बिल्कुल आदत नहीं थी। घर पहुँचकर आश्वस्त थी, अस्पताल की दवाई की गंध और सब जगह उदास, थके-हारे चेहरे देखकर उसे बहुत बुरा लगता था! घर पर बढ़िया गद्देदार बिस्तर तो नहीं था, पर जगह अपनी थी। विशाल को देखे, तीन दिन हो गए थे। पति ने जबरदस्ती लेटने का आदेश दिया, तो बिना तर्क के अपना पैर सँभालती हुई लेट गई। दोपहर से कब शाम हुई, पता ही नहीं चला। कुछ आवाजें सुनाई दी तो अचानक आँखें खुलीं। सामने मद्रासी और पारसी मैडम कुरसी पर बैठे थे, विशाल से बात करते हुए। “नमस्ते मैडम!” कहते ही दोनों उसकी ओर मुड़े। मद्रासी मैडम के हाथ में फलों से भरा थैला था। “तुम अच्छी तरह रेस्ट करना, जब फिट हो जाएगा तब आना, ओके?” “जी मैडम, मुझे तो लेटने को जमताइच नहीं।” सीता ने दाँत निपोरे, “पर डॉक्टर ने बोला है, वरना टाँका खुल जाएगा।” अब तो विशाल भी नसीहत देने लगा, सीता चुपचाप मुसकराने लगी।

रात को सोने से पहले शिंदे ने सीता का माथा चूमते हुए कहा, “पता है, अस्पताल में तुम्हें देखकर डर गया था। तुम घर आ गई, अब अच्छा लग रहा है। तुम कहती थीं, मद्रासी मैडम हमेशा बिगड़ी रहती है। देखो तुम्हारे पूरे महीने की तनख्वाह देकर गई है और इतने सारे दर्द की दवाई भी पकड़ाकर गई। कहने लगी, सीता दर्द सहती है, लेकिन शरीर तो उसका भी सबके जैसा है। उसे दर्द सहने की जरूरत नहीं है। कहकर गई है, रोज खाने के बाद दो बार लेना, बहुत अच्छी दवा है।” सीता मन ही मन मुसकराने लगी।

“अच्छा दे दो, एक दवाई अभी ले लेती हूँ, दर्द तो सुबह से हो रहा है।” दिल में सैकड़ों सुंदर फूल खिले थे, वहाँ दर्द नहीं, शीतल हर्ष था। उसकी कल्पना दृष्टि में मद्रासी मैडम जैसे एक छोटी नटखट बालिका थी, जिसने अभी-अभी अपना खिलौना किसी को प्रेम से पकड़ाया था फिर खिलाकर हँस पड़ी सीता। “तुम हमेशा क्यों हँसता रहता है?” मद्रासी मैडम का रूठा सा स्वर फिर कानों में गूँजा!

 

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—प्रीति गोविंदराज

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