सरिता हो मेरा जीवन

सरिता हो मेरा जीवन

विसर्जन

निशा को धो देता राकेश

चाँदनी में जब अलकें खोल,

कली से कहता था मधुमास

बता दो मधुमदिरा का मोल;

बिछाती थी सपनों के जाल

तुम्हारी वह करुणा की कोर,

गई वह अधरों की मुसकान

मुझे मधुमय पीड़ा में बोर;

झटक जाता था पागल वात

धूलि में तुहिन कणों के हार;

सिखाने जीवन का संगीत

तभी तुम आए थे इस पार!

गए तब से कितने युग बीत

हुए कितने दीपक निर्वाण!

नहीं पर मैंने पाया सीख

तुम्हारा सा मनमोहन गान।

भूलती थी मैं सीखे राग

बिछलते थे कर बारंबार,

तुम्हें तब आता था करुणेश!

उन्हीं मेरी भूलों पर प्यार!

नहीं अब गाया जाता देव!

थकी अंगुली हैं ढीले तार

विश्ववीणा में अपनी आज

मिला लो यह अस्फुट झनकार!

मिलन

रजतकरों की मृदुल तूलिका

से ले तुहिन-बिंदु सुकुमार,

कलियों पर जब आँक रहा था

करुण कथा अपनी संसार;

तरल हृदय की उच्छ्वास

जब भोले मेघ लुटा जाते,

अंधकार दिन की चोटों पर

अंजन बरसाने आते!

मधु की बूँदों में छलके जब

तारक लोकों के शुचि फूल,

विधुर हृदय की मृदु कंपन सा

सिहर उठा वह नीरव कूल;

मूक प्रणय से, मधुर व्यथा से

स्वप्न लोक के से आह्वान,

वे आए चुपचाप सुनाने

तब मधुमय मुरली की तान।

चल चितवन के दूत सुना

उनके, पल में रहस्य की बात,

मेरे निर्निमेष पलकों में

मचा गए क्या-क्या उत्पात!

जीवन है उन्माद तभी से

निधियाँ प्राणों के छाले,

माँग रहा है विपुल वेदना

के मन प्याले पर प्याले!

पीड़ा का साम्राज्य बस गया

उस दिन दूर क्षितिज के पार,

मिटना था निर्वाण जहाँ

नीरव रोदन था पहरेदार!

कैसे कहती हो सपना है

अलि! उस मूक मिलन की बात?

भरे हुए अब तक फूलों में

मेरे आँसू उनके हास!

अतिथि से

बनबाला के गीतों सा

निर्जन में बिखरा है मधुमास,

इन कुंजों में खोज रहा है

सूना कोना मंद बतास।

नीरव नभ के नयनों पर

हिलती हैं रजनी की अलकें,

जाने किसका पंथ देखतीं

बिछकर फूलों की पलकें।

मधुर चाँदनी धो जाती है

खाली कलियों के प्याले,

बिखरे से हैं तार आज

मेरी वीणा के मतवाले;

पहली सी झनकार नहीं है

और नहीं वह मादक राग,

अतिथि! किंतु सुनते जाओ

टूटे तारों का करुण विहाग।

मिटने का खेल

मैं अनंत पथ में लिखती जो

सस्मित सपनों की बातें,

उनको कभी न धो पाएँगी

अपने आँसू से रातें!

उड़-उड़कर जो धूल करेगी

मेघों का नभ में अभिषेक,

अमिट रहेगी उसके अंचल

में मेरी पीड़ा की रेख।

तारों में प्रतिबिंबित हो

मुसकाएँगी अनंत आँखें,

होकर सीमाहीन शून्य में

मँडराएँगी अभिलाएँ।

वीणा होगी मूक बजाने

वाला होगा अंतर्धान,

विस्मृति के चरणों पर आकर

लौटेंगे सौ-सौ निर्वाण!

जब असीम से हो जाएगा

मेरी लघु सीमा का मेल,

देखोगे तुम देव! अमरता

खेलेगी मिटने का खेल!

जीवन

तुहिन के पुलिनों पर छबिमान,

किसी मधुदिन की लहर समान;

स्वप्न की प्रतिमा पर अनजान,

वेदना का ज्यों छाया-दान;

विश्व में यह भोला जीवन—

स्वप्न जागृति का मूक मिलन,

बाँध अंचल में विस्मृति धन,

कर रहा किसका अन्वेषण?

धूलि के कण में नभ सी चाह,

बिंदु में दुख का जलधि अथाह,

एक स्पंदन में स्वप्न अपार,

एक पल असफलता का भार;

साँस में अनुतापों का दाह,

कल्पना का अविराम प्रवाह;

यही तो है इसके लघु प्राण,

शाप वरदानों के संधान!

भरे उर में छबि का मधुमास,

दृगों में अश्रु अधर में हास,

ले रहा किसका पावस प्यार,

विपुल लघु प्राणों में अवतार?

नील नभ का असीम विस्तार,

अनल के धूमिल कण दो चार,

सलिल से निर्भर वीथि-विलास

मंद मलयानिल से उच्छ्वास,

धरा से ले परमाणु उधार,

किया किसने मानव साकार?

दृगों में सोते हैं अज्ञात

निदाघों के दिन पावस-रात;

सुधा का मधु हाला का राग,

व्यथा के घन अतृप्ति की आग।

छिपे मानस में पवि नवनीत,

निमिष की गति निर्झर के गीत,

अश्रु की उर्मि हास का वात,

कुहू का तम माधव का प्रात।

हो गए क्या उर में वपुमान,

क्षुद्रता रज की नभ का मान,

स्वर्ग की छबि रौरव की छाँह,

शीत हिम की बाड़व का दाह?

और—यह विस्मय का संसार,

अखिल वैभव का राजकुमार,

धूलि में क्यों खिलकर नादान,

उसी में होता अंतर्धान?

काल के प्याले में अभिनव,

ढाल जीवन का मधु आसव,

नाश के हिम अधरों से मौन,

लगा देता है आकर कौन?

बिखरकर कन-कन के लघुप्राण,

गुनगुनाते रहते यह तान,

“अमरता है जीवन का ह्रास,

मृत्यु जीवन का परम विकास”

दूर है अपना लक्ष्य महान,

एक जीवन पग एक समान;

अलक्षित परिवर्तन की डोर,

खींचती हमें इष्ट की ओर।

छिपाकर उर में निकट प्रभात,

गहनतम होती पिछली रात;

सघन वारिद अंबर से छूट,

सफल होते जल-कण में फूट।

स्निग्ध अपना जीवन कर क्षार,

दीप करता आलोक-प्रसार;

गला कर मृतपिंडों में प्राण,

बीज करता असंख्य निर्माण।

सृष्टि का है यह अमिट विधान,

एक मिटने में सौ वरदान,

नष्ट कब अणु का हुआ प्रयास,

विफलता में है पूर्ति-विकास।

अतृप्ति

चिर तृप्ति कामनाओं का

कर जाती निष्फल जीवन,

बुझते ही प्यास हमारी

पल में विरक्ति जाती बन।

पूर्णता यही भरने की

ढुल, कर देना सूने घन;

सुख की चिर पूर्ति यही है

उस मधु से फिर जावे मन।

चिर ध्येय यही जलने का

ठंडी विभूति बन जाना;

है पीड़ा की सीमा यह

दुख का चिर सुख हो जाना!

मेरे छोटे जीवन में

देना न तृप्ति का कणभर;

रहने दो प्यासी आँखें

भरती आँसू के सागर।

तुम मानस में बस जाओ

छिप दुख की अवगुंठन से;

मैं तुम्हें ढूँढ़ने के मिस

परिचित हो लूँ कण-कण से।

तुम रहो सजल आँखों की

सित असित मुकुरता बनकर;

मैं सब कुछ तुम से देखूँ

तुमको न देख पाऊँ पर!

चिर मिलन विरह-पुलिनों की

सरिता हो मेरा जीवन;

प्रतिपल होता रहता हो

युग कूलों का आलिंगन!

इस अचल क्षितिज रेखा से

तुम रहो निकट जीवन के;

पर तुम्हें पकड़ पाने के

सारे प्रयत्न हों फीके।

द्रुत पंखोंवाले मन को

तुम अंतहीन नभ होना;

युग उड़ जावें उड़ते ही

परिचित हो एक न कोना!

तुम अमर प्रतीक्षा हो मैं

पग विरह पथिक का धीमा;

आते जाते मिट जाऊँ

पाऊँ न पंथ की सीमा।

तुम हो प्रभात की चितवन

मैं विधुर निशा बन आऊँ;

काटूँ वियोग-पल रोते

संयोग-समय छिप जाऊँ!

आवे बन मधुर मिलन-क्षण

पीड़ा की मधुर कसक सा;

हँस उठे विरह ओठों में—

प्राणों में एक पुलक-सा।

पाने में तुमको खोऊँ

खोने में समझूँ पाना;

यह चिर अतृप्ति हो जीवन

चिर तृष्णा हो मिट जाना!

गूँथे विषाद के मोती

चाँदी की स्मित के डोरे;

हों मेरे लक्ष्य-क्षितिज की

आलोक तिमिर दो छोरें।

—महादेवी वर्मा

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