महादेवी का मन

महादेवी का मन

सुपरिचित लेखक, संपादक एवं निर्माता-निदेशक। केवल १२ वर्ष की वय में पितृविहीन हो चले ‘यायावर’। ५९ से अधिक क्रांतिकारी ग्रंथ, ४००० से ज्यादा लेख देश-विदेश के सभी अखबारों में प्रकाशित; २०० से ज्यादा वृत्तचित्र, कार्यक्रम, रूपक, फीचर, रिपोर्ताज टी.वी. पर प्रसारित। भारतीय दूरदर्शन में सबसे अल्पायु के आई.बी.एस. अधिकारी ‘अतिरिक्त महानिदेशक’। फ्रांस, यूरोप, मलेशिया, सिंगापुर, अमेरिका की यात्रा।

श्रीमती महादेवी वर्मा का यह जन्म-शताब्दी वर्ष है। ‘हिंदी की मीरा’ महादेवी के जीवन और साहित्य पर बहुत कुछ लिखा गया है। उनके संस्मरण और रेखाचित्र साहित्य पर भी बहुत कार्य हुआ है, होना भी चाहिए। उन्हें ‘भारतीय ज्ञानपीठ’ से ज्ञानपीठ पुरस्कार भी मिला, हालाँकि बहुत विलंब से। जब मिला था, तब भी एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था, “अब इस उम्र में इस पुरस्कार को लेकर मैं क्या करूँ? पहले मिलता तो इस रकम से सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का इलाज ही करवा देती। अब इस उम्र में गहने, शृंगार-पटार, कपड़े-लत्ते खरीदने से तो रही।’’ पुरस्कार भी उनकी बहुत युवावस्था में लिखी कृति ‘यामा’ के लिए मिला था, उस पर भी मजाक यह कि उनकी रचना से तो दूर का वास्ता, हिंदी भी न जानने वाली ब्रिटेन की प्रधानमंत्री ‘मार्गरेट थ्रेचर’ के हाथों दिलवाया गया, इस देश में जो भी हो जाए, वह कम ही है! महादेवी वर्मा मेरे पिता द्वारा संपादित पत्र ‘विक्रम’ (सं.- पं. सूर्यनारायण व्यास) की नियमित लेखिका थीं। उनकी आरंभिक अनेक रचनाएँ ‘विक्रम’ (मासिक) में प्रकाशित हुई हैं। उनके लिखे असंख्य पत्र मेरे पास सुरक्षित हैं। यहाँ मैं उसमें से सिर्फ चार पत्र दे रहा हूँ। प्रसंग क्योंकि बेहद महत्त्वपूर्ण है ।

प्रायः हम हिंदी वाले हिंदी के साहित्यकारों के देहावसान हो जाने पर, दिवंगत हो जाने पर गाल पीट-पीटकर, रो-गाकर फिर शांत हो जाते हैं। पर कोई साहित्यकार अगर अर्थाभाव में चला जाए, तो उसके परिवारजनों की सुध भी नहीं लेते। जबकि इसके ठीक विपरीत खेल-जगत् में भी किसी खिलाड़ी के रिटायर्ड होने पर प्रायः उसके लिए अनेक किस्म के अनेक तरह के ‘चैरिटी मैच’ और धन इकट्ठा करने के तरीके खोज लिये जाते हैं। राजनेताओं के परिवार की मदद के लिए भी असंख्य लोग खड़े हो जाते हैं। संगीतकार भी प्रायः अपने गुरुजन या निर्माताजन के लिए किसी-न-किसी प्रकार का धन इकट्ठा करने का प्रयोजन खोज ही निकालते हैं। पर हिंदी साहित्य के साहित्यकार अपने किसी ‘कॉमरेड’ के जाने पर ज्यादा-से-ज्यादा शासन की ओर मुँह ताकने लगते हैं। मानो सिर्फ शासन का ही ठेका हो कि उस दिवंगत साहित्यकार के परिवार की देख-रेख करने का। क्या यह दायित्व साहित्य-बंधुजनों का नहीं है, खासतौर पर संपन्न साहित्यकारों का? वर्षों पूर्व यह विचार पं. सूर्यनारायण व्यास ने अपने द्वारा संपादित ‘विक्रम’ (मासिक) में रखा था। प्रसंग दुःखद था। हिंदी के एक महान् कवि, आत्म प्रचार-प्रसार से सर्वथा दूर प्रो. रमाशंकर शुक्ल (जो श्री नरेश मेहता मुक्तिबोध के भी गुरु थे) का असमय देहावसान हो गया था। उनकी दो छोटी-छोटी बेटियाँ, एक बेटा और एक मुसीबत की मारी पत्नी को अपने पीछे छोड़ गए थे। व्यासजी ने एक विचार हिंदी के असंख्य साहित्यकारों को उस समय लिख भेजा था, जिनमें निराला, उग्र, महादेवी, पंत, रामकुमार वर्मा, प्रभाकर माचवे प्रमुख थे। विचार यह था कि ये सब रचनाकार अपनी एक-एक कृति प्रकाशन हेतु बगैर रॉयल्टी लिये, निःशुल्क प्रदान करें। उसके प्रकाशन, कागज, स्याही और वितरण का सारा खर्च ‘विक्रम’ प्रेस और स्वयं व्यासजी वहन करेंगे और उससे होने वाली आय ‘हृ्दयजी’ के परिवार को भेंट कर दी जाएगी। इसमें किसी के मुँह ताकने की जरूरत भी नहीं थी, न ही शासन के आगे हाथ पसारना था। व्यासजी इससे पूर्व असंख्य साहित्यकारों की आर्थिक मदद कर चुके थे और करते रहते थे, जिनमें ‘उग्रजी महाराज’, बनारसी दास चतुर्वेदी, महेश शरण जौहरी ‘ललित’, प्रो. भगवत शरण उपाध्याय, रतनलाल जोशी जैसे असंख्य नाम थे। उनकी इस योजना का हिंदी जगत् ने सम्यक् स्वागत किया। इसमें पहली रचना की ‘समिधा’ महादेवी को ही देनी थी और वे चूक गईं। पहले दोनों पत्र उसी संदर्भ में हैं। हालाँकि वे चूक गईं, उस पर ‘उग्र’ की दिलचस्प टिप्पणी भी दृष्टव्य है—(आवारा नाटक से )

“एक सुंदर और स्वर्गीय सहकर्मी या हमपेशा के स्वजनों के सहायतार्थ अपने इस नाटक ‘आवारा’ का सर्वाधिकार ‘सत्याहित्यिक-सेवक समाज’ को सौंप देने में मुझे हर्ष-विमर्ष या आत्मोत्कर्ष का अनुभव हो, इतना भावुक मस्त मैं नहीं।’’

हिंदी में क्या, सारे भारतीय साहित्य में अपने ‘कामरेडों’ की गौरव रक्षा के लिए (स्वयं साहित्यिकी द्वारा) यह अभिनव आयोजन है। और इस स्निग्ध मौलिकता की माला में पहला मनका मेरे ही मन के रूखे-सूखे फूल का है, मेरे हृदय के ठहरने की भूमिका यही है मात्र... और भपकी।

मैं कहता हूँ कि चूक गईं सुश्री महादेवी वर्मा। इस मौलिकता की माला में पहला मणि उनका होना चाहिए था, साथ ही अच्छे चूके श्री ‘निरालाजी’ श्री रामकुमार वर्मा, श्री हरिभाऊ उपाध्याय मेरे मित्र और परिचित। उक्त सभी सहृदयों ने ‘हृदय’ श्रद्धांजलि में अपने-अपने रचना कुसुम सजाने का वादा किया था। वे शौक से पंडित सूर्यनारायण व्यास के पास प्रयास-प्रसून प्रथम पूजार्थ प्रेषित कर सकते थे, मगर कहा जाता है—कोई अस्वस्थ रहा, कोई बहुव्यस्त तथा ढीगर महामस्त। सो मैं अपने सारे मित्रों की असुविधाओं से प्रतिष्ठित और मौलिक हूँ।

इस पुस्तक के प्रकाशन में जो भी व्यय लगा है उसे पंडित सूर्यनारायण व्यास ने ‘पर्सनल पर्स’ से प्रस्तुत किया है और ऊपरी टीमटाम रखते हुए भी मैं जानता हूँ, स्वाभिमानी व्यासजी पैसे से केवल गरीब हैं, सो केवल गरीबी की कठोर कमाई और लौह लिखाई से—प्रभु के प्रसाद से यह स्वस्थ-सुरभित-सुमन-माला सजाई जाएगी।

पंडित हरिभाऊ उपाध्याय से अनायास ही प्राप्त सुंदर सहयोग द्वारा ‘हृदय श्रद्धांजली’ की तथा ‘सत्साहित्यिक सेवक समाज’ की अन्य सभी पुस्तकें ‘सस्ता साहित्य मंडल’ अपनी देखरेख में छपाकर निजी निरीक्षण में उनकी बिक्री या विस्तार की व्यवस्था भी करेगा। पुस्तकों की बिक्री से जो आमदनी होगी, उसमें से अगली पुस्तक के प्रकाशन का खर्चा निकाल, बेचकों को जो कमीशनादि मुनासिब दे देने के बाद जो धन शेष रहेगा, हर संस्मरण का, हाँ—वह लेखक विशेष के स्वजनों को, विनय से समर्पित कर दिया जाएगा। इसी तरह ‘आवारा’ की सारी बचत दिव्यात्मा ‘हृदयजी’ के स्वजनों को सदैव सौंप दी जाया करेगी, ‘हृदय-श्रद्धांजली’ में १२ पुस्तकें उनके परिवारियों को भेंट की जाएँगी। (‘उग्र’ आवारा नाटक ‘भूमिका और भपकी’ से)

महादेवीजी के भी इसी विषय पर लिखे वे तीनों पत्र क्रम से यहाँ दिए जा रहे हैं—

(१)

तारीख ः ५/१२/४१

मान्य भाई, (पंडित सूर्य नारायण व्यास को संबोधन)

कृपापत्र के लिए धन्यवाद, इससे पहले तो मुझे आपका कोई पत्र नहीं मिला, केवल भाषण की प्रति प्राप्त हुई थी।

मई में मैंने आपको संग्रह के संबंध में लिखा था, पर उत्तर की प्रतीक्षा न कर सकी। फिर ग्रीष्मावकाश पर पहाड़ी गाँवों में घूमती रही, जहाँ पर पहँुचने की सुविधा ही नहीं थी। जुलाई में जबसे लौटी हूँ, तब से अब तक मलेरिया से पीड़ित हूँ, इसी से आपको न लिख सकी, कुछ स्वस्थ होते ही मैं संग्रह ठीक करके भेज दूँगी, परंतु उसकी प्रतीक्षा करने पर संभवतः आप ‘हृदयजी’ के श्राद्ध दिवस तक कुछ न छपा सकें, क्या यह उचित न होगा कि आप किसी और पुस्तक पर कार्य प्रारंभ कर दें?

मेरे लिए तो यह गौरव की बात होती कि मेरी ही भेंट पहली हो, पर यदि यह न हो सके तो किसी की भेंट तो रहे।

यदि जनवरी तक भेज सकी तो यही संग्रह छप जाएगा। आशा है, आप प्रसन्न होंगे।

‘यामा’ कुछ दिन बाद भेज सकूँगी। पिछली प्रतियाँ समाप्त हो चुकने के कारण नई जिल्द बँध रही है।

शुभेच्छुका

महादेवी

(२)

मान्य भाई,

पत्र मिला, उत्तर में विलंब होने में मेरी अस्वस्थता थी। आशा है आप क्षमा करेंगे। आपकी योजना मुझे पसंद आई, क्योंकि निरे विचारों में मेरी भी आपकी तरह अरुचि है, हमारे विचार जब तक क्रिया की कसौटी पर नहीं कसे जाते, तब तक उनके खरेपन की स्थापना उचित नहीं।

संग्रह मैं शीघ्र भेजने का प्रयत्न करूँगी, कुछ कविताएँ पहले ही मैं दे चुकी हूँ, अन्यथा उन्हीं में से देने का प्रयास करती। उत्कृष्ट में से चुनाव करना ही होगा। इस संबंध में भी आप मत देंगे।

आशा है, आप प्रसन्न होंगे।

१, एल्गिन रोड                                 शुभेच्छुका

    प्रयाग                                                महादेवी

(३)

तारीख ः ९/३/४२

मान्य भाई,

स्थानीय हिंदी मंदिर में एक सज्जन आपका संदेश लाए थे। उनके द्वारा उत्तर भिजवा चुकी हूँ। पिछले सप्ताह पत्र भी लिख चुकी हूँ, परंतु अब तक आपका निश्चय न जान सकी।

कोई ग्रंथ रचना मिल गई हो तो अच्छा ही है, क्योंकि उस दशा में मैं यहाँ के कार्य से अवकाश पाकर अपको संग्रह भेज सकूँगी।

आशा है, आप प्रसन्न होंगे।

शुभेच्छुका

महादेवी

चौथा पत्र उनकी अन्य रचनाओं के संदर्भ में है, जो उन्होने ‘विक्रम’ में प्रकाशनार्थ भेजी थी, उसमें तात्कालीन राजनैतिक परिस्थिति पर (वर्ष ४३) उनकी टिप्पणी और ‘बापू’ के प्रति उनकी श्रद्धा-भावना देखते ही बनती है।

(४)

इंदौर,

२६/०३/४३

मान्य भाई,

आपके पत्रों का उत्तर न देने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ। किसी अवज्ञा के कारण नहीं, किंतु मेरे पत्र कहीं पहुँच ही नहीं पाते। आज के राजनीतिक वातावरण में मेरे जैसे व्यक्ति का संदेह की परिधि से बाहर रहना सभंव नहीं। उस पर देहात में मेरा रिलीफ काम चल रहा है। इन्हीं सब कारणों से मुझे बहुत सी असुविधाएँ सहनी पड़ती हैं। पत्र न लिखने पर दूसरे इन असुविधाओं से बच जाते हैं। आशा है, आप मेरी स्थिति को समझकर क्षमा करेंगे।

(वर्ष १९४२ में अगस्त क्रांति के बाद)

मैने प्रयाग से आपके पास कविता भेज दी थी, परंतु मुझे संदेह है कि वह आप तक पहुँचने में बहुत समय लेगी। यहाँ मैं विशेष कार्यवश केवल एक दिन के लिए आई हूँ। सभंव है, यहाँ से भेजने पर शीघ्र मिल जाए, यही सोचकर उसकी एक प्रतिलिपि और भेज रही हूँ।

बापू के व्रत के दिनों में मैं इक्कीस कविताएँ लिखी थीं, क्योंकि मेरी प्रार्थना का रूप कुछ और हो ही नहीं सकता था—यह उनमें एक है।

आपको अच्छी लगे तो ‘विक्रम’ के लिए छापिएगा, अन्यथा सूचना-पत्र मिलने पर मैं और कुछ भेज दूँगी।

आशा है, आप प्रसन्न होंगे।

मैं कल ही प्रयाग लौट जाऊँगी। अतः उत्तर वहीं दीजिएगा।

शुभेच्छुका

महादेवी

यों महादेवीजी अनेक बार हमारे घर ‘भारती भवन’ भी पधारी हैं। मुझे तो मेरे बचपन की एक छोटी सी स्मृति है, जो आज तक मुझे मन-मस्तिष्क में ताजा है। जब वे वर्ष १९६८ में उज्जैन ‘विक्रम विश्वविद्यालय’ (इसके संस्थापक भी व्यासजी ही थे) के ‘दीक्षांत समारोह’ में आई थीं और घर भोजन के लिए पधारी थीं। शुभ्र-वसना महादेवी की वह सरस्वती सी छवि मेरे बाल-मन पर बरसों अंकित रही। लेकिन महादेवीजी के इन चार पत्रों के साथ पिता के पत्र-संग्रह में एक पत्र और इन्हीं पत्रों के साथ ‘नत्थी’ मिला है। इसे यहाँ देना समीचीन तो नहीं होता, लेकिन इस पत्र का रहस्य चूँकि मैं खोजी स्वयं भी नहीं खोज पा रहा हँू, सोचता हूँ शायद कोई पाठक, पुराना विद्वान् खोज सके या प्रकाश डाले, इसलिए दे रहा हूँ। विवाद खड़ा करना मेरा लक्ष्य नहीं है। हाँ, सत्य का शोधक हूँ और सत्य खोजना मेरा लक्ष्य अवश्य है। इस पत्र का रहस्य अबूझ न रह जाए एतदर्थ दिया जा रहा है।

(५)

दिल्ली

८ः३० बजे प्रातः

१०/०१/५१

परम प्रिय मित्र,

जय भारत! जय राम राज्य!

१. आपकी भेजी पुस्तक मिली—धन्यवाद। उसके बारे में नोट लिखा जाएगा और आपकी मार्मिक भूमिका भी आपके नाम से उर्दू तर्जुमा (तरजमा) छपेगी। हम लोग ज्योतिष विद्या की उन्नति चाहते हैं और ज्योति के उपासक हैं।

२. दिसंबर शाम (शनिवार) को श्री महादेवी वर्मा एम.ए. प्रयाग से यहाँ के लिए चलने के को तैयार हुई थीं। सारा सामान ले लिया। आठ बक्से दो पुलंदे। घरवालों ने समझा कि वह तो सर्वथा कहीं जा रही हैं। रोक दी गईं। क्या वे कभी और कब तक यहाँ आ सकेंगी? इसका उत्तर विचारपूर्वक दीजिएगा। उनके बिना भविष्य का काम हो ही नहीं सकता। वे विधवा हैं। मेरे साथ गंधर्व विवाह करने का पत्र भेज चुकी हैं। यह भेद अभी प्रकट न होने पावे। उत्तर की प्रतीक्षा है।

भवदीय

स्वामी पारसनाथ

‘रियासत’ प्रेस

दिल्ली

पुनश्च, नए विधान में एक यह कानून बन गया है कि गैर शादीशुदा आदमी—नायब सदर, सदर और वायसराय नहीं बन सकता। इसलिए शादी करनी ही होगी। फिर वे तो मेरी ‘अर्धक अर्धांग’ हैं।

—पारसनाथ

यह पत्र भी महादेवीजी के पत्रों के साथ संलग्न था। यह स्वामी पारसनाथ कौन है? और यह पत्र स्व. पं. व्यासजी ने महादेवी वर्मा के पत्रों के साथ ही क्यों संलग्न रखा? क्या महादेवीजी ने कभी अपने वैधव्य के बाद पुनर्विवाह का सोचा था? या यह पत्र इस अजाने आदमी का अनर्गल प्रलाप है, अपने मन से गढ़ी ‘राजकमल चौधरी सी कहानी’ है, पर यह रियासत प्रेस (जिसे उसने ‘रियास्त प्रेस’ लिखा है) कहाँ था? पता तो दिल्ली का दिया है। और ये सज्जन कौन थे? क्या हिंदी-उर्दू के कोई बड़े लेखक थे? जो नाम बदल-बदलकर पत्र लिख रहे हैं? ये सब बातें सोचने को विवश करती हैं। वाचस्पति पाठक, गंगा भाई, रामजी भाई, रतनलालजी जोशी होते तो पूछता भी?—वे महादेवी के निकट थे! क्या है ‘हिंदी की मीरा’ का यह अबूझ रहस्य? और कौन थे ये पारसनाथ?

 

अपर महानिदेशक

दूरदर्शन एवं आकाशवाणी, आकाशवाणी महानिदेशालय

संसद मार्ग, नई दिल्ली-११०००१

rajshekhar.vyas@yahoo.co.in

—राजशेखर व्यास

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