बिंदु का सवाल

बिंदु का सवाल

 

सुपरिचित बाल-साहित्यकार। पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित एवं शिमला दूरदर्शन और आकाशवाणी से रचना पाठ। हिम साहित्य परिषद् (मंडी) द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता में कहानी ‘शारदा’ को द्वितीय पुरस्कार। साहित्य मंडल (नाथद्वारा) का सम्मान। संप्रति स्कूल शिक्षक (टी.जी.टी., नॉन-मेडिकल)।

गणित अध्यापक प्यार से नियति को समझाते हुए कहते हैं, ‘नियति बेटा, आपको पता है कि हम त्रिभुज को भुजा के आधार पर तीन भागों में बाँटते हैं—समबाहु, समद्विबाहु और विषमबाहु। समबाहु त्रिभुज की सारी भुजाएँ समान होने के कारण उसकी तीनों भुजाओं पर हम एक जैसे ही तीनों दोहरी, लेकिन बहुत छोटी रेखाएँ खींचते हैं। समद्विबाहु में दो समान भुजाएँ हैं तो हम वहाँ ऐसी दो भुजाओं पर रेखाएँ चि‌ति करते हैं। और रही विषमबाहु त्रिभुज की बात, तो इसमें तीनों भुजाओं की माप अलग-अलग है, इसलिए इसमें हम अलग-अलग भुजाओं पर एक, दो और तीन रेखाएँ लगाते हैं।’

सब बच्चे भी ध्यान से अध्यापक की बात को सुन रहे थे। परंतु नियति अभी भी एक उलझन में फँसी हुई थी। वह बोली, ‘सर, जब हम पैमाने से मापकर इन त्रिभुजों को बनाते हैं तो फिर ये रेखाएँ खींचने की हमें क्या आवश्यकता है?’

अध्यापक अबकी बार हलके से मुसकराते हुए बोले, ‘बेटा, जब आप भुजाओं के ऊपर माप लिखकर त्रिभुज बनाते हो, तब वे रेखाएँ खींचने की कोई जरूरत नहीं है। ये रेखाएँ तो तब लगाई जाती हैं, जब आप बिना माप लिये किसी त्रिभुज के प्रकार को दरशाते हो।’

‘जी सर, अब सारी बात समझ आ गई है।’

गणित अध्यापक अब आगे बढ़ते हैं। सब बच्चे दी गई इन ज्यामितीय आकृतिय को बड़े ही चाव से अच्छे से अच्छा बनाने की कोशिश में लगे थे। लेकिन इस कक्षा में अंकित एक ऐसा लड़का था, जो किसी गहरी सोच में डूबा अपने कोरे कागज पर आकृतिओं को नहीं, बल्कि पेंसिल से खूब सारे मोटे, पतले, बारीक बिंदुओं का पूरे कागज पर ढेर लगा बैठा था। कोई उसमें गहरे काले, कोई हलके फीके और कोई इतने छोटे थे, जो ढंग से दिखाई भी नहीं दे रहे थे।

अध्यापक की नजर जब अंकित पर गई तो वे उसके पास पहुँच गए। उसके कोरे कागज पर बने इन बिंदुओं को देखकर वे गुस्से में बोले, ‘अंकित, यह क्या हो रहा है?’

अपने ही खयालों में खोया अंकित अध्यापक की बात पर एकदम जागा और सकपकाते हुए बोला, ‘सऽ सऽ... सर, मैं बिंदु को समझने की कोशिश कर रहा था।’

‘मतलब?’ अध्यापक ने हैरानी से पूछा।

‘सर, आपने परसों हमें बताया था कि बिंदु वह है, जिसकी न लंबाई न चौड़ाई और न ही ऊँचाई होती है। लेकिन सर, मैं जब भी बिंदु बना रहा हूँ तो मैं देख पा रहा हूँ कि इसकी लंबाई और चौड़ाई हम माप सकते हैं। चाहे मिलीमीटर या फिर उससे कम पैमाने द्वारा ही सही।’

‘तुम बिल्‍कुल सही कह रहे हो, अंकित।’

‘तो सर, क्या फिर बिंदु की परिभाषा यहाँ गलत हो जाती है?’

‘नहीं अंकित! यह परिभाषा गलत नहीं है।’

‘वह कैसे, सर?’

‘देखो, इस बात को मैं तुम्हें एक बात के द्वारा समझाता हूँ।’

अध्यापक और अंकित की बात ने इस बार फिर से पूरी कक्षा का ध्यान खींच लिया था।

अध्यापक ने अपनी बात को जारी रखा।

‘तुमने अभी पेंसिल से खूब सारे मोटे-पतले बिंदु अपने कागज पर बनाए हैं! बनाए हैं न?’

‘जी सर, बनाए हैं।’

‘ऐसा करो, अब पेंसिल की नोक को और बारीक करके एक और बिंदु लगाओ।’

अंकित ने वैसा ही किया।

‘अब इसे और छीलो, ताकि इसकी नोक और बारीक हो जाए तथा फिर उस नोक के बराबर बिंदु लगाओ। फिर देखो, क्या इस बिंदु को भी मापा जा सकता है?’

अंकित ने वैसा ही किया।

‘जी सर! अभी भी इसे मापा जा सकता है।’

अध्यापक ने फिर कहा, ‘अब इसे और छीलकर पहले से बारीक बिंदु लगाओ और फिर उसे भी मापो।’

अध्यापक और अंकित के बीच चल रही इस रुचिकर बात को कक्षा के सभी बच्चे ध्यान से देख व समझ रहे थे।

‘सर, इससे बारीक बिंदु अब नहीं लग सकता।’

‘कोई बात नहीं, तुम मन में ही इससे पतले बिंदु को सोचो।’

‘जी सर, सोच लिया।’

‘क्या अब भी तुम उसको माप पा रहे हो?’

‘सर, मेरे हिसाब से अब भी इसे किसी निकटतम पैमाने से मापा जा सकेगा।’

‘ओके, अब इससे बारीक बिंदु का सोचो। मेरे कहने का मतलब है कि तब तक सोचो, जब तक तुम्हें यह न लगे कि इसे मापा नहीं जा सकता।’

हलकी सी चुप्पी के बाद, ‘सर, बहुत बारीकी तक सोचते-सोचते अब मुझे यह बिंदु जैसे आँखों से ओझल सा होता दिख रहा है।’

‘अब बताओ, क्या तुम अब इसको माप सकते हो?’

‘नहीं सर, अब तो इसे मापना बहुत मुश्किल लग रहा है।’

‘तो बस, यही बिंदु का स्थान है। इस स्थिति में हम बिंदु की बात करते हैं। हम जो अपनी कॉपी या फिर बोर्ड पर बिंदु को प्रदर्शित करते हैं, वह सिर्फ समझाने के लिए।’

पूरी कक्षा का ध्यान अध्यापक और अंकित की बातों में रमा हुआ था। वे भी इस बात को तसल्ली के साथ समझना चाहते थे।

परंतु अंकित अभी भी थोड़ी उलझन में था। अध्यापक ने अंकित के चेहरे को पढ़ लिया था। वे बोले, ‘देखो अंकित, इतना तो तय है कि बिंदु की हम पैमाइश नहीं कर सकते, लेकिन यही पूरी ज्यामिति का आधार भी है। ऐसे ही असंख्य बिंदुओं से हम रेखा के साथ अन्य असंख्य आकृतियों को जन्म देते हैं। बिंदु है, लेकिन इसके साथ इस बात को जोड़कर हम देख सकते हैं कि जैसे हवा है, इसे हम देख नहीं पाते, लेकिन महसूस कर सकते हैं। जैसे गुरुत्वाकर्षण बल है, इसे हम देख नहीं सकते, लेकिन इसके प्रभाव को हम हर समय महसूस करते हैं।’

अंकित अब धीरे-धीरे सामान्य हो रहा था। उसकी समझ में सारी बात आ रही थी।

अध्यापक अंकित को समझाते हुए फिर बोले, ‘इस बात को कुछ ऐसे भी समझा जा सकता है, जैसे मैं एक स्थान पर खड़ा हूँ। हम उस स्थान को शून्य मानकर चलते हैं। फिर जैसे ही मैं कुछ दूरी तय करता हूँ तो हम उस दूरी को किसी भी पैमाने को लेकर उस शून्य से ही मापते हैं। इसी तरह बिंदु भी एक शून्य के समान है, जो बार-बार, अनंत बार जुड़कर कोई रेखा या अन्य आकृति को जन्म देता है।’

‘जी सर, अब सारी बात समझ में आ रही है।’ अंकित अबकी बार संतुष्ट था। उसके चेहरे से अब सारा तनाव गायब हो चुका था। अंकित के साथ-साथ पूरी कक्षा ने भी बिंदु को गहराई से समझा था। वे सब अंकित का मन-ही-मन धन्यवाद कर रहे थे।

अंकित अब पूरी लगन के साथ दी गई आकृतियों को बनाने में जुट गया था।

 

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—पवन चौहान

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