जनश्रुतियों का नगर चंबा

जनश्रुतियों का नगर चंबा

सुपरिचित लेखक। पीएच.डी. (हिंदी साहित्य) काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी। शोध विषय : आधुनिक हिंदी कवियों का लोक भाषा साहित्य।

चंबा यात्रा का पहला पड़ाव था पठानकोट, स्टेशन के बाहर निकलते ही यह एहसास हो जाना स्वाभाविक ही है कि आप अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से अधिक दूर नहीं हैं। खैर, मुझे तो चंबा जाना था पहाड़ों में, पहाड़ों के बीच बलखाती रावी को देखने, देवदार की छाव में कुछ पल गुजारने, लेकिन विश्राम गृह पहुँचने पर पता चला कि पठानकोट के किसी गाँव में जाना है, जहाँ से भारत-पाकिस्तान की सीमा नजदीक ही है। मैं भी बहुत उत्साहित हुआ, जल्दी-जल्दी तैयार हुआ, फिर जलपान करके सीधे गाड़ी में जा बैठा, कुछ देर चलने पर लीचियों का सुंदर बाग दिखाई दिया, मेरे मन की स्थापित अवधारणा में हलचल हुई कि लीचियाँ तो मुजफ्फरपुर में ही होती हैं, दरअसल इस अवधारणा की निर्मिति में नागार्जुन की काव्य पंक्तियों का विशेष योगदान है, उन्होंने अपनी पुण्यभूमि की स्मृति में क्या खूब लिखा था, “याद आता मुझे अपना वह ‘तरउनी’ ग्राम, याद आती लीचियाँ, वे आम।” खैर, चेकपोस्ट पर चौकन्ने सरदार जवानों को देखकर बिना किसी इंडीकेटर के यह तय किया जा सकता है कि यह रास्ता अवश्य ही सीमा तक जाता होगा।

रावी के पुल पर पहुँचने के साथ ही गाड़ी की गति में कुछ परिवर्तन हुआ, मेरे लिए रावी नई-नई थी, अपलक निहारता रहा, तभी किसी सहयात्री ने बताया कि रावी यहाँ से कुछ और दूर भारतीय सीमा में बहने के बाद पाकिस्तान को चली जाती है। हाँ, रावी बिल्कुल ठहरी हुई थी, बिल्कुल शांत, बेहद क्लांत जैसे किसी वेदना के भार से दबी जा रही हो। दरअसल यह वही रावी है, जिसे हमारी ऐतिहासिक स्मृतियाँ ‘परुख्णी’ नाम से जानती हैं। स्थानीय सहयात्री से मिली जानकारी के अनुसार रावी पर यह पुल कुछ वर्षों पूर्व ही प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता विनोद खन्नाजी के व्यक्तिगत प्रयासों से ही संभव हो सका था, इससे पहले बरसात के दिनों में रावी के उस पार के लोगों का संपर्क पठानकोट से लगभग टूट जाता था। गाड़ी अब पक्की सड़क छोड़कर पगडंडियों पर हिचकोले खा रही थी, आखिर कई मोड़ मुड़ने के बाद सीमा के आखिरी गाँव में पहुँचे, नाम था ‘ढिंढ़ा’, जी हाँ ‘ढिंढ़ा बॉर्डर’।

बॉर्डर से पाकिस्तानी चौकियाँ साफ देखी जा सकती हैं, बीच में कँटीले तारों की बाड़ बनी हुई है, जिसके उस पार भी ढ‌िंढ़ा गाँव के दिलेर किसान खेती के लिए जाते हैं। गाँव के एक किसान मित्र ने हम सबका जिस गर्मजोशी से स्वागत किया, उसे भूल पाना संभव नहीं। जिज्ञासावश मैंने उनसे पूछ लिया कि बाड़ के उस पार जाकर खेती करने में आपको डर नहीं लगता? उनका जवाब एक सच्चे किसान का जवाब है, ‘डर क्यों लगेगा साहब, जमीन भले ही बाड़ के उस पार हो, है तो हमारी और अपनी जमीन में खेती करने में क्या डर। हाँ, जाँच-पड़ताल के बाद जाते हैं और काम खत्म करके वापस आ जाते हैं।’

ढ‌िंढ़ा सीमा पर तैनात एक जवान की बात आज तक ताजा है। ‘पर मालूम होती हैं’, मैंने यों ही पूछ लिया कि ‘उधर की चौकियाँ हाइट पर हैं क्या?’ ‘नहीं साबजी, उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता, मिनट भर में दाब दिया जाता है।’ ये भारत के जवान का जज्बा है, जो प्रत्येक भारतीय को गौरवान्वित करता है। वास्तव में ढिंढ़ा की यह यात्रा अचानक जरूर थी, पर अनायास नहीं। लौटते हुए ऐसा लगा, जैसे कुछ छोड़कर आ रहे हैं। गाड़ी जल्द ही पगड़ियों को छोड़कर पक्की सड़क पर आ गई, अगला पड़ाव था पंजाब और जम्मू-कश्मीर की सीमा पड़नेवाला एक गाँव कठियालपुर, पोस्ट नरोट जैमल सिंह।

गाँव कमोवेश वैसा ही था, जैसा की एक गाँव को होना चाहिए। गाँव से बस दो-चार कदम चलने पर ही एक-एक छोटी सी नहर है, जिसके इस पार पंजाब का यह गाँव और उस पार जम्मू-कश्मीर। नहर के नजदीक पहुँचते ही सामान्य मोबाइल नेटवर्क का गयाब हो जाना आम बात है, जिसे स्थानीय नागरिक रुचि लेकर बताते हैं। खैर, ढेर सारी छोटी-बड़ी, लिखित-अलिखित जानकारियों के साथ पुनः रावी को पार करते हुए पठानकोट पहुँचे, जहाँ से तय यात्रा की शुरुआत हो गई अर्थात् चंबा के लिए निकल पड़े। थोड़ी ही देर में पहाड़ी सिहरन महसूस होने लगी, अब हम ऊँचाई की ओर जा रहे थे, पहला पड़ाव था बनीखेत। बनीखेत पहुँचते अँधेरा हो गया लेकिन गजब की रौनक थी यहाँ। आषाढ़ मेले का आयोजन अपने चरम पर था, नाग मंदिर को भी सुंदर सजाया गया था। दरअसल मेला तो परंपरा का निर्वहन था आधुनिक चकाचौंध के साथ, मेले में ज्यादातर दुकानें बिहारियों की थीं, अर्थात् मेला इतना ग्लोबल था कि क्या कहूँ? मंदिर में किसी बाल भक्त ने प्लास्टिक के खिलौने अपने भगवान् को पूरी श्रद्धा के साथ अर्पित किए थे, वास्तव में ऐसे दृश्य मुदित कर देते हैं, अपना बचपन याद आ जाता है। हम तो यात्रा पर थे साहब, कोई अतिथि थोड़े ही थे, जो ठहर जाते, पल-दो पल में ही आगे बढ़ने की घोषणा हो गई।

रात डलहौजी में बीती। यात्रा की थकान का चौकस पहरा, मानो अलसाई आँखों को अब और नहीं का निवेदन कर रहा हो। अगले दिन डलहौजी से कालाटोप की यात्रा आरंभ हुई। डलहौजी में इसी नाम से अनेक शिक्षण संस्थान भी हैं। दरअसल जब तक आप डलहौजी को पार नहीं कर जाते तब तक ‘डलहौजी ये, डलहौजी वो’ के बोर्ड दिखते ही रहेंगे। रास्ते में लक्कड़ मंडी से कुछ पहले ही ‘हरी बिछली घास पर’ स्थानीय नागरिकों से संवाद करते हुए, एक बात तो तय हो ही जाती है कि पर्यटकों की निर्भरता इन पर है ये पर्यटकों पर निर्भर नहीं हैं। नब्बे साल के पिता और साठ साल के पुत्र साथ बैठे थे देखकर फर्क करना मुश्किल हो रहा था, बीड़ी की कस पर कस लगाए जा रहे थे। पूछने पर बताते हैं कि ‘साहब हम तो कहीं जाते नहीं, हाँ एक बार लुधियाना जाना हुआ था, फिर नहीं गए कहीं दूर।’

हमारा अगला पड़ाव था कालाटोप वाया लक्कड़ मंडी। लक्कड़ मंडी अर्थात् पहाड़ी लकड़ियों का हब कहते हैं। पहले यहीं से लकड़ियों का व्यापार होता था। नदी के रास्ते लकड़ियाँ नीचे तक पहुँचा दी जाती थीं। कालाटोप देवदार का इतना घना जंगल की पूछिए मत, रोशनी ठीक से नीचे तक नहीं पहुँच पातीं। थोड़ी सी समतल जमीन पर वन विभाग की अतिथि शाला है, कहते ही कि रात के सन्नाटे में भालुओं की आमद यहाँ तक हो जाती है। अतिथिशाला के प्रांगण से थोड़ा नीचे उतरकर देवदार की छाँव में बैठना अच्छा लगा, दो-चार तसवीरें भी हुईं, श्रीधरजी के मार्गदर्शन में सार्थक संवाद भी हुए। सच तो यह है कि जंगल में पसरा सन्नाटा और रह-रहकर उस सन्नाटे को चीरते हुए कहीं दूर से आती पंछियों की सुमधुर ध्वनि जीवन में नया राग उत्पन्न करती है। कलाटोप से चंबा की ओर लौटते हुए रावी मानो साथ-साथ चलती हैं। ऊँचाई से देखने पर सर्पाकार रावी में तैरती नौका बमुश्किल दिखाई पड़ती है। ज्यों-ज्यों हम चंबा की ओर उतरते हैं, रावी बेहद करीब आती जाती हैं, इतना करीब की स्वर लहरियाँ साफ सुनाई देती हैं। हरीतिमा से अच्छादित रावी को यों ही ‘इरा’ (सुंदर पेय) नहीं कहा गया होगा। अब हम चंबा में थे, संयोग से बारिश भी खूब हुई, फिशरीज की अतिथिशाला के बाहर भयंकर उमस थी। रात यहीं गुजरी।

अगले दिन चंबा में ही रहे जनश्रुतियों और लोकाख्यानों के बीच। इन्हीं जनश्रुतियों की पड़ताल करते हुए, सँकरी गलियों को पार कर हम सभी मिर्जा साहब के घर पहुँचे। जी हाँ, मिर्जा साहब का पूरा नाम है मिर्जा ऐजाज बेग। मिर्जा साहब के पूर्वज सत्रहवीं शताब्दी में रघुवीरजी की डोली के साथ मुगल दरबार से चंबा आए थे और यहीं के होकर रह गए। कहते हैं कि चंबा रियासत के तत्कालीन राजा पृथ्वी सिंह के शौर्य की प्रतिष्ठा मुगल दरबार तक थी अर्थात् तत्कालीन मुगल शहनशाह राजा के पराक्रम से वाकिफ था। मुगल दरबार में घुड़सवारी, तलवारबाजी इत्यादि अनेक प्रकार की प्रतियोगिताओं का आयोजन होता रहता था। ऐसे ही किसी प्रतियोगिता में राजा ने भी भाग लिया और विजयी हुए। शहंशाह बेहद प्रसन्न हुए और उन्होंने राजा से इच्छा अनुसार पुरस्कार माँग लेने को कहा। राजा ने बिना देर किए मुगल दरबार में रखी शालिग्राम की प्रतिमा को ही माँग लिया। शहंशाह ने प्रतिमा दे तो दी, लेकिन प्रतिमा से भावनात्मक लगाव के कारण उन्होंने अपने एक सैनिक अधिकारी को राजा के साथ चंबा जाने का हुक्म जारी किया, जिनका नाम था सफी बेग मिर्जा। मिर्जा एजाज बेग अपना संबंध इन्हीं मिर्जा सफी बेग से जोड़ते हैं, अर्थात् सफी बेग ही उनके पूर्वज हैं।

चंबा में मिंजर मेले का खासा महत्त्व है। चंबा के चौगान में लगनेवाला यह मेला सावन के दूसरे रविवार से लेकर तीसरे रविवार तक चलता है। मेले में शाही परिवार से लेकर आमजन तक के शरीक होने की परंपरा रही है, जिसका यथावत् निर्वहन जारी है। राजपरिवार और मिर्जा परिवार के बीच संबंधों की एक कड़ी मिंजर भी है। मिर्जा परिवार द्वारा शाही परिवार को मिंजर भेंट करने की परंपरा रही है। यों तो मिंजर धान और ज्वार की बालियों का नाम है, जिसे बहनें अपने-अपने ससुराल से लाकर भाइयों को सौंप देती हैं, शायद उनकी समृद्धि के लिए। समय के साथ मिंजर का स्वरूप भी बदला गया, धान और ज्वार की बालियों के अलावा सोने-चाँदी एवं रेशम के मिंजर भी बनाए जाने लगे। खैर, पहली बार मिंजर देखा, मिंजर को बनते देखा, मिंजर के महत्त्व को समझा यह मेरे लिए नई चीज थी।

चंबा शहर में रावी नदी के प्रवेश की भी एक रोचक कथा लोक में प्रचलित है। चंबावासी जिस विश्वास के साथ उस कथा का वाचन करते हैं अद्भुत है। कथा कुछ यों है कि रावी नदी का पानी चंबा तक नहीं पहुँच रहा था अर्थात् चंबावासी पानी के लिए बहुत परेशान थे। चंबा का राजा अपने नागरिकों की इस समस्या को लेकर चिंतित था। रावी के जल को चंबा तक लाने के अनेक उपक्रमों की विफलता ने राजा को और अधिक चिंतित कर दिया। चिंता और विकल्पहीनता के इसी दौर में राजा एक स्वप्न देखता है, जिसमें रावी के जल को चंबा में प्रवेश दिलाने की शर्त होती है, राजपरिवार के किसी एक सदस्य की बलि। सपने की चर्चा राजा ने अपने नजदीकियों तथा राजपरिवार में आस्था रखनेवालों जनों से की। कहते हैं कि राजा स्वयं की बलि हेतु तैयार हो गए, लेकिन रानी ने उन्हें रोका कि आप तो राजकुल के गौरव हैं, जनता की आपसे अनेक अपेक्षाएँ हैं, इसलिए आपका वर्तमान रहना आवश्यक है, किंतु मैं चंबा के निवासियों के हित में स्वयं को अर्पित करना चाहूँगी और रानी ने ऐसा ही किया। तदोपरांत रावी ने चंबा में प्रवेश किया।

वर्तमान चंबा में रावी की धार के साथ-साथ रानी का बलिदान भी जन-जन की स्मृतियों में विद्यमान है। उनकी स्मृति में स्थापित मंदिर का चंबावासियों में विशेष महत्त्व है। ‘सुई माता’ के नाम से विख्यात इस मंदिर में न सिर्फ चंबावासी आते हैं बल्कि बाहर से आने वालों सैलानियों एवं श्रद्धालुओं के लिए भी यह मंदिर आकर्षण का केंद्र रहता है। इस मंदिर में वर्ष में एक बार मेले का आयोजन किया जाता है, जिसमें सिर्फ और सिर्फ महिलाओं का ही प्रतिभाग अपेक्षित है। कहते हैं कि रानी की इच्छा के अनुरूप ही ऐसा किया जाता है। स्नेहीजनों की कृपा से मुझे भी मंदिर तक पहुँचने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वहाँ कुछ स्थानीय नागरिक पहले से ही उपस्थित थे। जिज्ञासु मन सहज भाव से पूछ बैठा कि इस मंदिर का नाम सूईमाता क्यों है? क्या उसका संबंध रानी के नाम से है या फिर उसके पीछे भी किंवदंतियाँ हैं? उनमें से एक नागरिक ने हमें बताया कि सुई का अर्थ लाल होता है और जनश्रुति है कि रानी जब स्वयं को बलिदान हेतु प्रस्तुत करती हैं तो वे लाल रंग का वस्त्र धारण किए हुए थीं, जिसके कारण इस मंदिर का नाम ‘सूई माता’ मंदिर पड़ गया। त्याग की प्रतिमूर्ति रानी की यह गाथा चंबा में समय के साथ आगे बढ़ रही है। चंबा नगर की स्थापना और नामकरण को लेकर भी अनेक जनश्रुतियाँ प्रचलित हैं। कहते हैं कि राजा ने अपनी पुत्री चंपावती के कहने पर अपनी राजधानी भरमौर से चंबा में स्थापित की और राजपुत्री के नाम पर ही इस नगर का नाम ‘चंबा’ पड़ गया। चंपावती का संतमत के प्रति अनुराग था और ज्ञानकांड की इस परंपरा में उन्होंने स्वयं को अर्पित कर दिया। उनकी स्मृति में भी एक मंदिर की स्थापना की गई, जिसका नाम पड़ा ‘चंपेश्वरी देवी’ मंदिर।

चंबा नगर के एक छोर पर ‘देवी चामुंडा’ का मंदिर स्थापित है। मंदिर का गर्भगृह और उसके प्राचीर की बनावट आकर्षित करती है। चामुंडा देवी मंदिर के प्रांगण से चंबा नगर का सुंदर दृश्य और रावी की इठलाती धारा जीवन में नया आकर्षण पैदा करती है। चंबा नगर में लक्ष्मी नारायणजी का भी मंदिर स्थापित है। पहाड़ में स्थापित इन मंदिरों में काष्ठ का खूब प्रयोग हुआ है और उस पर हिंदू देवी देवताओं के चित्र उकेरे गए हैं। लक्ष्मी नारायण मंदिर की परिक्रमा करते हुए आदरणीय श्रीधर पड़ारकरजी ने एक चित्र की ओर संकेत करते हुए पूछा कि यह किसका चित्र है? शायद वरुण भगवान् का था, ऐसा उन्होंने ही बताया। इस प्रकार अनेक ऐसे चित्र मंदिर की दीवारों पर सहज ही उकेरे गए हैं, जिनका अपना विशेष महत्त्व है। प्रायः लोग गर्भगृह के दर्शन से ही विदा लेते हैं, लेकिन मंदिरों के स्थापत्य का सूक्ष्म विवेचन ही मनुष्य की ज्ञानात्मक संवेदना का विकास करता है।

लक्ष्मी नारायण मंदिर से उतरते हुए चौगान की ओर बढ़े ही थे कि तेज बारिश होने लगी। मुझे और कवि मित्र देवेंद्रजी को एक सँकरी सी दुकान में शरण लेना पड़ा। बारिश थोड़ी थमी कि बचते-बचाते डी.एस.ओ. ऑफिस के सभागार में पहुँचे, जहाँ स्थानीय साहित्य अनुरागियों के द्वारा एक कवि गोष्ठी का आयोजन सुनिश्चित था। सुबह से चलते-चलते थकान इतना हावी थी कि पूछिए मत, कविता कुछ भी पल्ले न पड़ी। गेस्ट हाउस पहुँचते-पहुँचते अँधेरा हो गया। सहयात्रियों के साथ गपशप करते कब नींद आ गई, पता भी न चला।

यों तो चंबा शहर के बसने-उजड़ने की भी अनेक दास्तानें लोक में प्रचलित हैं, लेकिन इस शहर का स्थापत्य पहाड़ी जीवन की गौरव-गाथा है। दुर्गम पहाड़ी रास्तों से चढ़ते-उतरते मन अतीत के उन लमहों की पड़ताल करने को विवश हो उठता कि कैसे आकर बसे होंगे लोग यहाँ। सहज ही नागार्जुन की कविता ‘बादल को घिरते देखा है’ की पंक्तियाँ स्मरण हो उठती हैं, ‘समतल देशों से आ-आकर, पावस की उमस से आकुल, तिक्त-मधुर बिसतंतु खोजते, हंसों को तिरते देखा है’। खैर, भावुक मन न जाने कहाँ-कहाँ की दौड़ लगा लेता है। पहले कविता कहानियों में, स्मृतियों में, अभिलेखों में पर्वतीय नगरों के लिए जो कुछ कहा गया लिखा गया, वही सच जान पड़ता था, लेकिन प्रत्यक्ष का अनुभव ही कुछ और होता है। सच कहूँ तो आजकल जितने भी नगरों की यात्रा कर सका, उनमें चंबा सबसे खूबसूरत है। पर्वतों को लेकर मेरे मन में सदैव से एक आकर्षण रहा है, लेकिन पर्वतों से प्रत्यक्ष होने का पहला अनुभव जम्मू की यात्रा के दौरान हुआ और मन कहीं पर्वतों में ही रम गया। कभी-कभी तो मन खुद से पूछता है कि कहीं पूर्वजन्म में मैं पर्वतवासी ही तो नहीं था और यही कारण है कि पर्वतीय यात्रा का प्रस्ताव मुझे सुखद अनुभूति प्रदान करता है। पर्वतीय सौंदर्य निहारने की मुदित भावना के साथ प्रारंभ की गई यात्रा प्रत्येक मनोहारी दृश्यों में कुछ-न-कुछ नवीन ढूँढ़ने का प्रयास करती है। पानी के प्रवाह में तराशी गई शिलाएँ प्राकृतिक स्थापत्य का इतिहास समेटे हुए हैं। आखिर वह कौन सी शिला थी, जिसने रावी को चंबा में चढ़ने न दिया। शायद राजप्रसाद से उसे ईर्ष्या हो गई होगी। धवलधारा से मनुहार करती शिलाओं का अद्भुत बिंब आकर्षित करता है। खंड-खंड हो लुढ़कती शिलाएँ और शिलाओं से टकराकर सतह से उठता जल, जल से उठती स्वर लहरियाँ नित्य नए गान का सृजन करती हैं। गगनभेदी वृक्ष कतारबद्ध खड़े हैं। यह प्राकृतिक अनुशासन की मिसाल है। हरीतिमा से आच्छादित वनों में पंछ‌ियों का मधुर संवाद, वृक्षों को झकझोरती कभी मंद कभी जोर की बयार से वर्षा की सी ध्वनि निकल पड़ती है। ऊँचे पहाड़ों की सिहरन ललचाती है। कहीं-कहीं गहरे सन्नाटे में भय का आभास भी होता।

चंबा से पठानकोट लौटते समय रास्ते में चमेरा डैम पड़ता है। पहाड़ों के बीच में लगभग ठहरी सी रावी, ओह अद्भुत! नौका-विहार के लिए सैलानियों की भीड़ जमा थी, सभी अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। गजब की रौनक थी यहाँ। खैर, मैंने भी रावी को जी भर निहारा, फिर स्पर्श कर प्रणाम किया, मानो कहते हुए कि फिर जाने कब मुलाकात हो।

 

ग्राम-अकबालपुर, पो. इटौरी

जिला-अंबेडकर नगर-२२४१५९ (उ.प्र.)

दूरभाष : ९४५२५६२८४७

deviprasadald@gmail.com

—देवी प्रसाद तिवारी

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