गिटजे

स समय यदि कोई हमारे बचपन और लड़कपन के वर्षों की बाबत—ब्रगीटा वान डर प्लास के नाम और रूप की बाबत पूछता तो हम उत्तर देते—‘तुम्हारा किससे मतलब है? हमें किसी ऐसी महिला को जानने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ।‘ यदि इसका प्रत्युत्तर होता—‘क्या, तुम ब्रगीटा वान डर प्लास को नहीं जानते? वह सिलाई करनेवाली दर्जिन जो वर्षों तुम्हारे माता-पिता की सेवा में रही?’ तो हम पुन: चिल्लाहट से उत्तर देते—‘आह, तुम्हारा मतलब गिटजे, हमारी दर्जिन से है! हाँ, हम वास्तव में उसे अच्छी तरह जानते हैं। हमें कैंची और कागज का टुकड़ा दो तो हम तत्काल उससे मिलती-जुलती तसवीर बना देते हैं, परंतु हमें किस तरह मालूम हो कि ब्रगीटा वान हर प्लास हमारी गिटजे ही थी।’

तुम्हें विश्वास होना चाहिए कि हमने गिटजे के अतिरिक्त उसे किसी दूसरे नाम से नहीं पुकारा। भविष्य में मालिक और मालकिन बननेवाले बचपन से ही नौकरों को दुर्भाग्य और हालात के प्रति रईसी तथा अच्छी शिक्षित उदासीनता दिखाने लग जाते हैं, परंतु कामगारों के बच्चों की भी रईसी भावनाएँ होती हैं। हम, जो धनी लोगों के बच्चे थे, ने कभी नहीं सोचा था कि गिटजे ब्रगीटा का ही संक्षिप्त नमूना हो सकती थी या हमारी दर्जिन अपने को परिवार के नाम की विशिष्टता दे सकती थी। फिर भी तुम कह सकते हो कि वान डर प्लास काफी विनीत और सादा प्रतीत होता है।

सप्ताह में तीन-चार बार अपने व्यापार का अभ्यास करने हमारे माता-पिता के घर वह आती थी। नीली और सफेद धारीदार जनाना कुरतियों की मरम्मत करना उसके नियमित व्यापारों में से एक था; कुरतियों की बाँहों में अद्भुत ढंग से बड़े छिद्र करने में हम सक्षम थे। दूसरे अवसरों पर वह ऊपर नर्सरी में कपड़ों पर लोहा करती थी। नर्सरी की खिड़कियाँ बाग की ओर खुलती थीं और उसमें खंड-खंड करनेवाला और वस्त्र-प्रेस भी लगा था। वह सुंदर ढंग से लोहा करती थी। जब वह इस्तिरी आग पर रख देती और सबकुछ ठीक-ठाक होता तो इस्तिरी करने का तख्ता उठाती जो दीवार के साथ झुका हुआ होता था, और उसको सामान्य तरीके से रखती अर्थात् पुल की भाँति, एक सिरा मेज के ढाँचे पर और दूसरा कुरसी की पीठ पर। इस प्रकार गिटजे मध्य में खड़ी होती तो हाथ चलाने और कपड़े नीचे रखने के लिए काफी जगह मिल जाती थी। तख्ते को आधे गीले ऊनी कंबल से ढक देती तो हमें फलालीन की वास्कट में ढकी हुई पतली औरत की याद दिलाती। गिटजे को हमारी बहनों की नाचने की पोशाक को लोहा करते देखने से और अधिक मनोरंजक कुछ नहीं था। उनको गीला और काफी लंबा करने के बाद वह पोशाक को लेती और इस्तिरी करनेवाले तख्ते को एक सिरे से उठाकर उसपर फ्रॉक को सरका देती थी। फिर लोहे के लाल गरम बरतन से इस्तिरी को बाँईं तरफ से उठाती, थोड़ी देर अपने गाल के पास यह देखने के लिए कि वह उतनी गरम हो गई है जितना वह चाहती है, ले जाती थी और दाईं ओर रखे कपड़े पर हलके से फेरती और फिर अपना वास्तविक कार्य आरंभ कर देती थी। नाचने की पोशाक जो पहले मुलायम, गंदी, निराकार ढेर थी, इस्तिरी के छूने से कुरकुरी होकर आकारवाली बन जाती थी। गिटजे के अतिरिक्त यदि कोई दूसरा बहनों की पोशाक इस्तिरी करता तो नाचघर जाते समय वह आधी संतुष्ट होती थी।

महीने में एक बार गिटजे नीचे नाश्तेवाले कमरे में अपने परिश्रम की प्रदर्शनी करती थी। यह तब होता था जब कपड़े घर आते थे। जिस परिवार से हम संबद्ध थे, वह बहुत बड़ा था और परिणामस्वरूप हमारी धुलाई भी बड़ी थी। तब हम एक बड़ा धुलाई वर्णन व्युत्पत्ति रूप में नहीं बल्कि तकनीकी रूप से करने का इरादा करते थे। गिटजे की सहायता परित्याग करने योग्य नहीं थी। वह बच्चों के कमरे की कम पवित्र स्थिति से नीचे आई और पूरी तरह साफ नाश्ते के कमरे में हमारी माँ के पास बैठ गई। माँ और गिटजे को मेजपोश और चादरें बिछाते देखने से और मनोहारी कुछ नहीं था। वे इनको अत्यंत सफाई से करती थीं, सफाई ही नहीं, बल्कि शक्ति और शौक से! वह आयताकार मेज के किनारों पर खड़ी होती थी। बिना बिछाई चादरें धीरे-धीरे कम होते ढेरों में बाईं ओर पड़ी थीं और फैलाई हुई बढ़ते ढेरों में दाईं ओर। मध्य में उसकी वर्तमान बलि पड़ी थी—कई गज लंबी, मृत्यु की तरह पीली, जबकि वे अपनी अंगुलियों के बीच चिकटी भरती थीं। उनकी कोहनियाँ उनकी बगलों में ध्यानपूर्वक दबी हुई थीं; दाएँ पैरों को आगे और शरीर के ऊपरी भाग को पीछे किए हुए दो औरतें—मालकिन एवं नौकरानी खड़ी थीं और जितनी जल्दी फैला सकती थीं, फैला रही थीं, फैलाती ही जाती थीं—सादगी और कर्तव्य-संतुष्टि की मूर्ति और हॉलैंड के घरेलू जीवन की तसवीर बनी खड़ी थीं। हमारे लिए जो निराशाजनक, परंतु जिसे हम अत्यंत रुचि से देखते थे, प्रश्नों-का-प्रश्न था—क्या गिटजे हमारी माँ को अब मेज पर खींचेगी या हमारी माँ उससे जल्दी करेगी और उसको खींचेगी? और हमारी माँ चादर गिरा देगी या गिटजे अपनी अंगुलियाँ खोलेगी और आत्मरक्षा के लिए केवल प्रवृत्त प्रतिबंधक उपाय के तौर पर हमारी माँ से कोई खेल खेलेगी? या चादर बीच में से फट जाएगी? क्या गिटजे एक किनारा अपने हाथ में रखेगी और माँ दूसरा? और क्या इस दु:खद मामले का अंत होगा—गिटजे का सिर अँगीठी से टकराकर या माँ का लकड़ी की प‍‍ट्टि‍यों से टकराकर और इस प्रकार दोनों को चोट लगेगी!

इस बीच निपुण औरतें निश्चल और संतुष्ट एक-दूसरे के सामने होने का प्रयत्न करती खड़ी रहीं। दाएँ हाथ का ढेर बड़ा, और बड़ा होता गया और दोपहर के भोजन से पहले बाएँ हाथ का लुप्त हो गया।

शरद् ऋतु शुरू होते ही सब्जियों और फलों को रक्षित करने का समय आ गया। उसकी कृपा और गिटजे की सहायता से बहुत चीजें हमारे घर में लाई गईं, विशेषकर फलियाँ। फ्रेंच फलियों को काटकर परोने में, जो हम गिटजे के मार्गदर्शन में बचपन में करते थे, थोड़ी सहायता करना, यदि जरूरत पड़े, हमने कभी भी अधिक श्रेष्ठ नहीं समझा था। बाद में, जब चाकू के खतरे से हमपर विश्वास हो गया तो हमने भी बड़ी फलियों में, जिनको संभालना अति कठिन होता है, जैसा तुम जानते हो, सहायता की। इसके अतिरिक्त, हमने गिटजे को अनगिनत सफेद बंद गोभी के फूलों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर पीपे में डालते देखा। फिर लकड़ी के डंडे से उनको नीचे दबाया और अंत में उनको तख्ते, जो लगभग पीपे जितना चौड़ा था, के ऊपर भारी पत्थर रखकर ढक दिया। यह सब पीपे में पड़े माल में कहावत के विरुद्ध खमीर पैदा करने के लिए किया गया—‘जो पीपे में पड़ा है, उसमें खमीर नहीं उठेगा।’

जो पीपे में पड़ा है वह खट्टा नहीं होता, ऐसा लोग कहते हैं, और इस कहावत में कही गई बात में आशायुक्त विश्वास को भविष्य में नष्ट करना नीचता होगी। गिटजे भी इसी अंदाज में बोली जब भी उसने लीनडर्ट वान कुइक के बारे में सोचा था और ऐसा कभी-कभी होता था। तुम पूछते हो—क्यों? ठीक है, यहाँ हमारा वृत्तांत एक नया मोड़ लेता है। वह कई वर्षों और दिनों तक इसका प्रेमी रहा था। इस समय जब हम बात करते हैं, उनकी सगाई का रजत विवाह उनके बहुत पीछे रह गया। ‘अविश्वासनीय’! तुम पुकारोगे। ठीक है, मैं तुम्हें श्रद्धा नहीं दिला सकता। हम तुम्हें विश्वास दिलाते हैं कि यह सूक्ष्म तौर पर परीक्षित और अच्छी तरह से प्रमाणित तथ्य है कि ब्रगीटा वान डर प्लास सत्ताईस वर्षों तक लीनडर्ट वान कुइक की प्रेमिका रही थी और फिर? लीनडर्ट वान कुइक की हैजे से पचपन वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई थी।

मछली उठाने का सामान बनाना उसका व्यवसाय था। हम उसकी छोटी सी दुकान से मछली पकड़ने की छड़ी, धागा, काँटे काफी मात्रा में खरीदा करते थे और निर्धन होते हुए भी वह कभी-कभी गिटजे के नाते हमें उपहार दिया करता था। उस समय हमें वास्तव में मालूम नहीं था कि वह निर्धन का जीवन व्यतीत कर रहा था। इसके विपरीत हमारा विचार था कि वह वाकई धनी आदमी था। उसकी छोटी सी दुकान में बड़ा भंडार था—मछली पकड़ने के यंत्रों का ईर्ष्या की हद तक प्रचुर भंडार। उसकी मछली पकड़ने की छड़ियाँ, नकली समीर मक्खियाँ, फेरीदार मक्खियाँ, घूमनेवाली मक्खियाँ, गोबरैले तथा अन्य प्रकार की ललचानेवाली वस्तुएँ देखकर क्या मुँह में पानी नहीं आता था? रखने के लिए बनाए गए छपे टिन के डिब्बों के अतिरिक्त हमें कोई वस्तु इतनी कीमती और वांछित नहीं लगती थी। ये डिब्बे घुड़सवार सेना के अधिकारी की तरह, जैसे वह गोलियों का बक्स ले जाता है, पट्टी के साथ कंधों पर लटकाए जाते थे, परंतु यदि हमें लीनडर्ट के दयनीय हालात का ज्ञान होता तो हम उसके उपहारों को स्वीकार नहीं करते। बच्चे केवल अभिमानी ही नहीं होते, वे लालची भी होते हैं। देखो, छोटे भाई या बहन की मृत्यु के बाद, बच्चे किस प्रकार उसके खिलौने हड़प कर लेते हैं—असली बालों एवं आँखोंवाली गुड़ियाएँ, जादू की लालटेनें, गुनगुनाते लट्टू—और मिलकीयत के लिए झगड़ा करके बाँट लेते हैं। पता चल जाता है कि बचपन में ही प्रौढ़ लोग हैं। उनमें सदा भेड़िये का स्वभाव होता है। जब वे पहले-पहल पैतृक संपत्ति का बँटवारा करते हैं तो तुम देखते हो कि किस तरह लालच से आक्रमण करते हैं जब तक वे इस दौरान समाज की जरूरतों के अनुसार अपने व्यवहार को ठीक नहीं करते।

लीनडर्ट और गिटजे का जोड़ा देखने में अच्छा नहीं था, मगर अप्रिय भी नहीं था। वे उन प्रेम करने योग्य लोगों में से थे जिनके साथ दो दिन रहने के बाद भी उनके रूप पर कोई ध्यान नहीं देता। उन दोनों के चेहरों से उनके चरित्र और ईमानदारी की झलक टपकती थी। गरमियों की छु‍‍ट्टि‍यों में, दिन चढ़ने से पूर्व, लीनडर्ट हमें मछली पकड़ने के लिए ले जाता था; फिर उसकी दया का पारावार नहीं रहता था। वह हमें घंटी बजाकर जगाता और जब तक हम तैयार न हो जाते, वह शांतिपूर्वक गली के द्वार पर हमारी प्रतीक्षा करता; हमारे लिए पीपों को ले जाता, वह स्थान बताता जहाँ ढेर सी मछलियों पकड़ी जा सकती थीं; हमें अपनी लई और कीड़े देता और मछलियों का बड़ा भाग भी। वह शानदार ढंग से मछली पकड़ता था। यह कल्पना मत करो कि हर कोई जैसे चाहे मछली पकड़ सकता है। मछली पकड़ने में विशेषकर स्वाभाविक प्रवृत्ति और लंबे अनुभव की जरूरत होती है। लीनडर्ट ने अपने सौभाग्य और कारनामों की कहानियाँ सुनाईं कि किस तरह उसने मीठे पानी के छोटे से गड्ढे से तीन-तीन पाउंड की मछलियाँ एक-एक करके पकड़ी थीं; ईल मछली की कहानी सुनाई कि किस प्रकार उसकी दुम काटकर उसे काँटा निकालना पड़ा था; पाईक मछली की कहानी जो उसकी छड़ी लेकर तैर गई थी; रुधिर स्रावित टेंच मछली की कहानी जो नवजात शिशु की तरह होती है; बड़ी ईल मछली की कहानी जिसकी खाल उसने प्रात:काल छीली थी और सायंकाल उसने इसकी अंगुली को काट लिया था! अलिफ लैला की कहानियों की तरह हमने सब कहानियों पर विश्वास किया। दो बातें विशेषकर उससे हमने सीखीं। पहली यह कि धागे में नया काँटा कैसे लगाते हैं और उसको राँगे की महीन पत्तर से कैसे ढकते हैं ताकि तैरनेवाली लकड़ी से सीधा लटका रहे जोकि मछली पकड़नेवाले के लिए अनिवार्य स्थिति है ताकि वह जान सके कि कितना मुँह मारा गया है। दूसरा पाठ जो गिटजे के आज्ञाकारी प्रेमी के स्कूल में सीखा, यह था कि जब मछली वाकई काट चुके और मछली पकड़नेवाला पकड़ने के लिए तैयार हो, उसे धक्का देकर पटके, न कि खींचकर। दूसरी स्थिति में जब छोटी मछली अच्छी तरह नहीं काटती तो वह पीछे की ओर मुँह में काँटा लिये तैरती है और तुम्हें केवल रुधिर स्रावित गलफड़ा की प्राप्ति होती है। पहली स्थिति में तुम जंतु को पलटने का अवसर देते हो और इस प्रकार भयानक शक्ति से सींगनुमा वस्तु उसके खुले मुँह में काँटे को बैठा देती है।

गिटजे का रूप वसंत ऋतु की तरह था जब वह तेईस वर्ष की थी और अपने प्रेमी लीनडर्ट के साथ रह रही थी। हमारी अपेक्षा वह स्वयं इसे अधिक बता सकता था, यदि मृत्यु उसे छीनकर न ले जाती। इस समय जब हम बात कर रहे हैं, उसकी स्त्रियोचित सुंदरता मिट चुकी है। तब वह पचास वर्ष की थी—लंबी, कोमल और दुर्बल सी, सरदी, जुकाम और जोड़ों के दर्द से ग्रसित, हमेशा अपने साथ घटिया नसवार और टोंका फली से भरी चाँदी की डिबिया रखती थी। अब जबकि हम बड़े और बुद्धिमान् हो गए हैं, हम इन विलक्षण चीजों को हास्यकर नहीं समझते। इसके विपरीत, लीनडर्ट की विवाहिता जो पचास वर्ष की थी और जो टोंका फली को अपनी जेब में रखती थी, उसे इस छोटी कहानी की नायिका बनाने का हमें अधिकार है। जबकि बच्चा होते हुए और अपनी कला के मूल तत्त्व को मन में न तोलते हुए, हम गिटजे के कठिन लंबे विवाह और उसकी पुरानी सेविका संबंधी शिकायतों पर हँसते थे; क्योंकि बच्चे केवल अभिमानी नहीं होते, वे लालची भी होते हैं—वे भी निष्ठुर होते हैं। वे दुर्भाग्य पर हँसते हैं जिसको वे समझते नहीं। हमने ऐसी निष्ठुरता नहीं की। यह किसी प्रकार के स्वभाव के सौजन्य से नहीं था परंतु चूँकि लीनडर्ट की अंत्येष्टि तक हमें उसके और हमारी दर्जिन के असली संबंधों का पता नहीं चला था। इसलिए हमें हैरानी ही नहीं हुई थी कि वह हमारे साथ इतनी दयालुता से पेश क्यों आता था!

तुम विश्वास करो कि लीनडर्ट की मृत्यु और गिटजे से लंबी मुलाकात पर हमें हँसी नहीं आई थी। इससे साबित होता है कि यदि हमें पहले पता चल जाता तो हम गिटजे और उसके प्रेमी का निस्संदेह बड़ा मजाक उड़ाते। हमारे पूछने पर माँ ने बताया था, “क्या कारण है कि आज गिटजे नहीं आई?”

“लीनडर्ट की मृत्यु हो गई है, वह इस समय दफनाया जा रहा है।”

—कोनार्ड बसकेन ह्य‍ूट

—भद्रसैन पुरी

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