ठेले पर वैक्सीन

ठेले पर वैक्सीन

सुपरिचित लेखक एवं व्यंग्यकार। देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का निरंतर प्रकाशन।

ब से बाहर के देशों समेत अपने देश में वैक्सीन तैयार होने की खबरों के बीच पड़ोस में सोए-सोए भी निगेटिव रहने वाले पॉजिटिव निकले हैं, तब से नए साल के आगमन के तो छोड़िए, रुटीन के सारे सपने तक आने बंद हो गए हैं। हरदम सपने में भी बस यही डर लगा रहता है कि उम्र भर हर हाल में निगेटिव रहने वाला इन दिनों जो गलती से पॉजिटिव हो गया तो? गई सारी उम्र भर की जोड़ी निगेटिविटी पानी में। इसीलिए अपने भीतर की इस निगेटिविटी को बचाए, बनाए रखने के लिए मैंने अपने नाक के आगे हवा साफ करने वाला ईएमआई पर लिया विदेशी फिल्टर लगा लिया है, ताकि दिमाग के भीतर भले ही सबकुछ अनछना जाए तो जाए, पर कम-से-कम नाक के थ्रू जो भी अंदर जाए, वह ठीक ढंग से छनकर ही जाए।

इन दिनों जैसे ही बिस्तर पर पड़ता हूँ, रुटीन के सपने हाशिए पर चले जाते हैं और वैक्सीन की शीशियों के सपने आने शुरू हो जाते हैं। कभी चीन की वैक्सीन के सपने तो कभी ब्रिटेन की वैक्सीन के सपने। कभी अमेरिका की वैक्सीन के सपने तो कभी इटली की वैक्सीन के सपने। कभी फ्रांस की वैक्सीन के सपने तो कभी जापान की वैक्सीन के सपने। बीच-बीच में कभी-कभार अपनी वैक्सीन भी सपने में आ जाती है तो पता नहीं क्यों, एकदम डर से नींद टूट जाती है?

सच कहूँ तो, जिस पड़ोसी देश से अपनी आज तक नहीं बनी, अब तो उसकी वैक्सीन के सपने भी आने लगे हैं। मौत का डर जहर को भी दवा में ऐसे ही बदलता रहा है। हालाँकि इटली पर देश की जनता अब उतना विश्वास नहीं। पर हो सकता है, वैक्सीन पर तो कर ले। शुद्ध दवाई किसी रोगी को मिलने के बाद उतना सुकून नहीं देती, जितना उसके आने पर देती है। दवा आने के बाद दवा का सारा चार्म डर में भी बहुधा बदल जाता है।

आज रात ग्यारह बजे से लेकर सुबह आठ बजे तक मैंने एक बार फिर वैक्सीन के जी भर सपने देखे। सपने में मैंने देखा कि हमारे स्वच्छ शहर में किस्म-किस्म की वैक्सीनों की सेल लगी है। पहले जिन शहर की गंदी नालियों पर फल, सब्जी, मूँगफलियाँ बेचने वाले सजे रहते थे, उन्होंने अब गंदी नालियों पर फल, सब्जियों, मूँगफलियों के बदले वैक्सीन की शीशियाँ सजा रखी हैं थोक में। पानी-पूरीवाला पानी में मिर्च, इमली मिलाने के बदले शीशी में से कुछ पानी में डाल रहा है। चाय वाला चाय में दूध की जगह शीशी में से तरल निकाल बूँदे गिनता चाय में डाल रहा है। कोई एक वैक्सीन की डोज के साथ दो वैक्सीन के डोज फ्री दे रहा है तो कोई वैक्सीन के फैमिली पैक सजाए अपनी दुकान के काउंटर पर तना है। सड़क से लेकर पनघट तक कल तक अपने को बेचने वाला आदमी आदमी के पीछे वैक्सीन लिए भाग रहा है। धंधे के प्रति समर्पित की यही खासियत होती है कि वह जहाँ उसे दो पैसे अधिक मिलें, वह वहीं बेचने का काम पूरी निष्ठा से शुरू कर देता है। शहर के बाजार में नाड़े तक बेचने वाले भी, जिसने कभी पाजामा देखा तक नहीं, उसे वैक्सीन लिए उसे रोके हैं। बीस के पाँच! बीस के पाँच! शहर की रेड लाइट्स पर वैक्सीन-ही-वैक्सीन बेचने वाले। जरा सा ट्रैफिक रुकते ही बीसियों हाथ में वैक्सीन की शीशियाँ लिये जाम को और जाम करते हुए। हर मॉल पर माल की जगह वैक्सीन सजी हुई सोलह सिंगार किए। टीवी पर वैक्सीन के ऑनलाइन विज्ञापन के बाजार दिन-रात खुले हुए।

मैंने वैक्सीन से भरे बाजार में वर्चुअल टहलने के बाद देखा कि मेरे मुहल्ले में जो कल तक आलू, टमाटर, प्याज, गोभी बेचने आता था, उसने भी उस वक्त अपने ठेले पर से आलू, प्याज, टमाटर, गोभी हटा उस पर वैक्सीन भरी है। तरह-तरह के ब्रांडों की वैक्सीन।

अचानक वैक्सीन के ठेले वाला मेरे छह महीने से किराया न चुकाए किराए के कमरे के आगे रुकता है। जोर से अपनी सारी एनर्जी गले में जमाकर आवाज देता है,’ वैक्सीन ले लो! ताजी वैक्सीन ले लो! सस्ती ताजी वैक्सीन ले लो!’

...और मैं सपने में भी हड़बड़ाकर जाग जाता हूँ। बिन चाय पिए, बिन मुँह धोए, बिन कपड़े पहने ही वैक्सीन से लकदम ठेले की ओर नंगे-ही-नंगे पाँव दौड़ जाता हूँ।

सामने क्या देखता हूँ कि उसका ठेला वैक्सीन से इतना भरा हुआ, जितना पहले सब्जियों से भी नहीं भरा होता था। यह देखकर मन खुश हो जाता है कि चलो, महामारी से बचे हुए अब वैक्सीन से जरूर मरेंगे।

‘और बाबूजी क्या हाल हैं? पॉजिटिव तो नहीं हुए न? कौन सी वैक्सीन दूँ?’

‘वाह! ठेले पर वैक्सीन? आमद आदमी तक वैक्सीन की पहुँच? कौन-कौन सी वैक्सीन हैं तुम्हारे पास? पर आज सब्जियाँ छोड़ ठेले पर वैक्सीन?’

‘जन कल्याण बाबूजी! जन कल्याण! अपना पेट तो कुत्ते भी भर लेते हैं?’ आह रे कोरोना! सोचा न था, आज के दौर में तू हर दिमाग के आदमी को कूट-कूटकर देशभक्त कर देगा, ‘बाबूजी! महामारी में जिनके हाथ-पाँव भी नहीं, वे भी जब बहती महामारी में अपने सौ-सौ हाथ पाँव धोने निकले हैं तो मैंने भी सोचा कि जनता के कल्याण के लिए मैं भी बहती गंगा में हाथ धो ही लूँ। सच कहूँ बाबूजी! किलो के बदले नौ-नौ सौ ग्राम तौल-तौलकर अब आत्मग्लानि सी होने लगी है। आदमी जिंदा रहा तो आलू-प्याज तो बाद में भी खा लेगा। इन दिनों उसे आलू, प्याज की उतनी जरूरत नहीं, जितनी वैक्सीन की है। बस इसलिए...’

‘इत्ते सारे किस्मों के वैक्सीन? कहाँ से लाए?’ मैंने उससे नजरें छुपाते पूछा तो वह सीना तानकर बोला, ‘ये न पूछो बाबूजी कि कहाँ से आई? बस आप जैसों के भले के लिए आ गई तो आ गई। कुछ बातें छुपी हुई ही बेहतर लगती हैं, बाबूजी! वैसे आपको आम खाने हैं कि आम के पेड़ देखने हैं। आम कहीं भी लगें। इससे आपको क्या? आम में आम का स्वाद मिले तो वह चाहे अमरूद के पेड़ का ही क्यों न हो। बाबूजी! हम उस क्लास के जीव हैं, जो जन-कल्याण के लिए कुछ भी दाव पर लगा सकते हैं।

‘इत्ते सारे किस्मों के वैक्सीन? कहाँ से लाए?’ मैंने उससे नजरें छुपाते पूछा तो वह सीना तानकर बोला, ‘ये न पूछो बाबूजी कि कहाँ से आई? बस आप जैसों के भले के लिए आ गई तो आ गई। कुछ बातें छुपी हुई ही बेहतर लगती हैं, बाबूजी! वैसे आपको आम खाने हैं कि आम के पेड़ देखने हैं। आम कहीं भी लगें। इससे आपको क्या? आम में आम का स्वाद मिले तो वह चाहे अमरूद के पेड़ का ही क्यों न हो। बाबूजी! हम उस क्लास के जीव हैं, जो जन-कल्याण के लिए कुछ भी दाव पर लगा सकते हैं। सो मैंने भी सोचा कि जब पूरे संसार में वैक्सीन-वैक्सीन हो रही है तो क्यों न मैं भी अपने ग्राहकों को...धंधा तो मरने के बाद भी होता ही रहेगा, बाबूजी! जब बीड़ी-सिगरेट वाले तक इन दिनों बीड़ी-सिगरेट बेचना बंद कर वैक्सीन बेच रहे हैं तो ऐसे में मेरा भी कुछ सामाजिक फर्ज बनता है कि नहीं, इसलिए जब तक चलता है तब तक कुछ दिन आलू, प्याज देने के बदले वैक्सीन ही बेच लूँ, ताकि...’

...और मैं सरकारी राशन की दुकान का सड़ा आटा खाने वाला उसके वैक्सीन से लकदक ठेले पर वैक्सीनों में बेहतर-से-बेहतर वैक्सीन ढूँढ़ने लगा, उलट-पुलटकर उन पर लिखे रेटों को देखते हुए। मेरे जैसों के लिए रेट पहले होता है शुद्धता का वेट बाद में। ...तभी पता नहीं मेरे सोए के भीतर कहाँ से देशप्रेम जाग उठा। सो दूसरे देशों की वैक्सीनों को उलटते-पुलटते मैंने वैक्सीन के ठेले वाले से पूछा, ‘बंधु! अपने देश की वैक्सीन नहीं दिख रही इनमें? इस देश के होकर भी तुम अपने देश की वैक्सीन बेचना नहीं चाहते या फिर...’ मैंने पूछा तो उसने ठेले के निचले हिस्से में गंदी सी बोरी में भरकर रखी शीशियों में से एक शीशी निकालते कहा, ‘माँग ही रहे हो तो ये रही बाबूजी! ऊपर इसलिए नहीं रखी है कि अपने जागरूक ग्राहकों के साथ मुश्किल यही है कि गुण देशभक्ति के गाते हैं, पर बीमार होने के डर से दवा बाहर की खाते या लगवाते हैं। बीमार यहाँ होते हैं और इलाज करवाने बाहर जाते हैं। बस इसीलिए...’

‘पर यार! यह अमेरिका वाली वैक्सीन तो बहुत महँगी है?’

‘बाबूजी! छुप-छुपाकर आई भी तो सात समंदर पार से है। राम जाने! बेचारी हमारे कल्याण के लिए कैसे-कैसे आई होगी? अपने यहाँ के वैद की पुड़िया तो है नहीं कि...ऊपर से ब्लैक ओपनली बेचने पर पता है कितना खतरा है? पर हम सब मिल मिला जनता के कल्याण के लिए हर खतरा सिर पर बाँधे सरेआम ठेले पर बेचते फिर रहे हैं।’

‘तो कितनी की दोगे? सात समंदर पार की वैक्सीन हाथ में लेते ही लगा, ज्यों मेरी निगेटिविटी का ग्राफ तेजी से आसमान की ऊँचाइयाँ छूने लगा हो।

‘देखो बाबूजी! सुबह-सुबह बोहनी का टाइम है। सबसे पहले आपके मकान के बाहर ही आवाज दी है। आप जिंदा तो पूरा मुहल्ला जिंदा। आपसे झूठ क्यों बोलना, लिखे रेट से तीस प्रतिशत कम दे दो।’

‘बस, तीस? फिफ्टी-फिफ्टी नहीं चलेंगे?’

‘इतने की तो बाबूजी अपने को ही पड़ी है। पूरे-पूरे में बेचूँगा तो अपने बच्चों को लगवाऊँगा क्या? महामारी का डर तो मुझे भी है।’ उसने हाथ जोड़ते कहा।

‘पर...’

‘तो यह चीन वाली ले लो। इसे आधे में दे दूँगा। वह भी आपके लिए।’

‘पर यार! चीन के माल पर तो बैन है। फिर ये ठेला बाजार में कैसे?’

‘बाबूजी! बैन तो छोटे लोगों के लिए होता है। बड़े लोगों के लिए नहीं। वे बैन में ही हाथ की सफाई करते हैं। बड़े लोग ही इसे चोरी-छिपे अपने देश में लेकर आए हैं।’

‘पर इसमें दवा ही है न!’

‘अरे बाबूजी! दवा में भी दवा ढूँढ़ क्यों मेरा सुबह-सुबह टाइम वेस्ट करते हो। जब शीशी पर वैक्सीन लिखा है तो...कहे पर यकीन नहीं रहा तो कम-से-कम लिखे पर तो विश्वास कर ही लो, बाबूजी! तो कौन सी दूँ?’ पूछते-पूछते वह अपना वैक्सीन का ठेला आगे सरकाने लगा, सार्वजनिक रूप से वैधानिक हाँक देता हुआ, ‘वैक्सीन ले लो! विदेशी वैक्सीन ले लो! ताजी सस्ती वैक्सीन ले लो!’

 

गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड

नजदीक मेन वाटर टैंक,

सोलन-१७३२१२ (हि.प्र.)

दूरभाष : ९४१८०७००८९

—अशोक गौतम

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