सखा धर्ममय अस रथ जाके

सखा धर्ममय अस रथ जाके

 

सुपरिचित कवि-लेखक-निबंधकार। दो उपन्यास, तीन ललित निबंध-संग्रह, तीन नवगीत-संग्रह, दो लोकसाहित्य, एक कहानी-संग्रह, एक समसामयिक निबंध-संग्रह प्रकाशित। ‘बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ पुरस्कार’, ‘वागीश्वरी पुरस्कार’, ‘श्रेष्ठ कला आचार्य सम्मान’ सहित अनेक पुरस्कारों एवं सम्मानों से सम्मानित।

चपन से एक दोहा सुनता आ रहा हूँ—‘धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कछु होय। माली सींचे सौ घड़ा रितु आए फल होय।’ अधीर मत होइए, धैर्य रखिए, सब काम अपने समयानुसार ही होते हैं। प्रतीक्षा करना सीखें। उतावली न पालें। यह एक तरह का यथास्थितिवाद है। लेकिन यह जो मनुष्य है द्विपदी, इसकी दृष्टि ऊपर की ओर है—सुषुम्ना एकदम सीधी है—बाँहें आकाश की ओर उठी हैं। इसके भीतर एक त्वरा है, एक आवेग है, जड़ता की यथास्थिति को भंजित करने की एकदम वृक्ष की तरह, वृक्ष को उद‍‍्भिज संज्ञा दी गई है। धरती के गुरुत्वाकर्षण को भेदता बीज ऊपर की ओर अंकुर बनकर उठता और वृक्ष बनकर उन्नत शीर्ष होकर फैलता है किंतु वह स्थिर है। मनुष्य ने वृक्ष जैसी उद‍‍्भिज शक्ति तो पाई, वह भी गुरुत्वाकरर्षण परिधि को लाँघने की इच्छा से ग्रस्त हुआ, एक ओर आकांक्षा उसके भीतर से उठी होगी बेतहासा दौड़ लगाने की! शिकार करते हुए शेर, चीता, हिरण के पीछे उनकी गति से भागने की। उसने अपने पैरों की ओर देखा होगा। गति की एक सीमा तक उसके पैर भाग सकते थे, उसके आगे नहीं। उसे स्थिर चीजों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में दिक्कत पेश आ रही थी। शिलाखंड को एक निश्‍चित वजन के अनुभाव में इधर से उधर वह कर सकता था। फिर उसने जुगत भिड़ाई और चट्टानों को गोल शिलाखंडों को लुढ़काना शुरू किया। जड़त्व को गति में बदलकर उसने चक्र की खोज की, अब उसके पाँव चक्र का आश्रय लेकर सीमित समय में अधिक दूरी नापने लगे—यह अग्नि के बाद का सबसे बड़ा आविष्कार था।

इस गति ने मनुष्य को न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया। उसने रथों का निर्माण किया। रथ पर बैठकर वह अश्व शक्ति से दौड़ने लगा। रथ के प्रति वह अतिरिक्त सम्मोहित हुआ—उसकी सृजनक्षम मेधा ने रथ के अनेक रूपक गढ़े। रथ को उसने अपने भीतर उतार लिया। वैदिक ऋषि की कल्पना का रथ हम मन के शिव संकल्प में अनुभव कर सकते हैं—तन्मे मनः शिव संकल्पअसी की छह ऋचाओं में अंतिम दो ऋचाओं में रथ का रूपक है। पहले ऋषि रथ के चक्र की चर्चा करता है। साम, ऋक यजुः वेदों के तीन अरों वाला यह चक्र है। चक्र का प्रवर्तन ऊर्जा चाहता है। ऊर्जा ही गति में परिणत होती है। ज्ञान की ऊर्जा ने ही मनुष्य को विकास के सोपानों पर गतिशील होने की सामर्थ्य दी है। वह यह भी जानता था कि ऊर्जा का प्रबलतम आवेग गति को कुपथगामी भी बना सकता है। इसलिए इसके नियंत्रण के लिए मन का सारथी जरूरी है। दस इं‌द्रियाँ ही घोड़े हैं और मन इनकी वल्‍गा थामने वाला सारथी है। मन अत्यंत गतिशील है—चंचल है, फिर भी ऋषि ने इसे सारथी बनाया। उसके वश में सभी इंद्रियाँ हैं। मन की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह स्वयं भोंकना भाव से निरपेक्ष होना भी जानता और यह तभी संभव है, जब उसमें शिव संकल्प जाग्रत् हो। इस स्थिति में ही वह इंद्रियों से अधिक शक्तिशाली बनकर उनकी वल्गाएँ कस सकता है, अन्यथा मन भोगासक्त होकर इन पर अपना नियंत्रण खो सकता है। मन के इस दुहरे आचरण का उल्लेख गीता में भी है—मन ऐव मनुष्यागां कारणं बन्ध मोक्षयोः मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।

मन के वश में इंद्रियाँ तभी होती हैं, जब मन भोक्ता के रूप को त्याग दे। मैं अपने गाँव में अकसर बैलगाड़ी से यात्राएँ करता था। उसको हाँकने वाला भोक्ता भाव से रहित था। वह जानता था कि वह केवल गाड़ीवान है—उसके लाभ-अलाभ से एकदम अलग। बैल उसके बस में थे। रात में वह हँकनी लिये गाड़ी हाँकता जरूर था, किंतु कभी-कभी वह सो भी जाता था। उसके सोते रहने पर भी बैल विपथित नहीं होते थे। वे गाड़ी का संतुलन नहीं बिगाड़ते थे। बैल उसके सोते-जागते सभी स्थितियों में वशवर्ती थे। इस तरह का गाड़ीवान बनना आसान नहीं है—ऐसा बनते-बनते बना जाता है। ऐसा मन ही शिव संकल्प का आधार लेकर इंद्रियों के अश्वों की वल्गाएँ कुशलतापूर्वक साध सकता है—

सुसारथिश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभी शुभिर्वाजिन इव।

हत्प्रलिण्ठं यदजिर ‌जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमसा॥

“सारथी रथ की कुशल वल्गा लिये। नियंत्रित गतिशील कर ज्यों अश्वदल। अथक द्रुम जो। प्राणियों के हृदय स्थित। वही मेरा मन। सदा शिव संकल्पकारी हो।”

रथ का यह रूपक यजुर्वेद का है। ऋग्वेद का परवर्ती वेद है—यजुर्वेद! ऋग्वेद में अश्विनी कुमारों द्वारा भूमि के परिमापन का उल्लेख है। उनके पास जो रथ है—वह बिना घोड़ो का है। लगता है कि यह स्लेज जैसा कोई वाहन है। यह वाहन बिना चक्र के सरकता है। चक्र के आविष्कार के पहले की यह रथ-धारणा हो सकती है। उनके पास नौका बनाने की भी कला थी, जो जल और हवा में एक समान चल सकती है। हो सकता है, गतिशील होने की यह टेक्नोलॉजी चक्र रहित वाहन को घसीटकर चलाने की रही हो। चक्रीय गति ने मनुष्य की कल्पना को भी बेहद उत्क्रमिणी बनाया। उसने आकाश में चलते ज्वलित सूर्यप‌िंड को देखा। यह पिंड अलस्सुबह अपनी यात्रा प्रारंभ करता है और संध्या के समापन में अपनी यात्रा को विराम देता है। पूर्व से पश्चिम के इस यात्रा पथ को आकाशीय ऊँचाई में सूर्य अपनी गति से नाप लेता है। अब वह पैदल-पैदल तो चलता नहीं होगा। उसके पाँव दर्द देने लगते होंगे, लेकिन वह कहीं विश्राम नहीं करता है, किसी छाया के नीचे बैठकर सुस्ताता नहीं है। तब निश्चित ही वह किसी वाहन का सहारा लेता है। मनुष्य ने उसके वाहन की कल्पना की। इस कल्पना में महत्त्वपूर्ण यह है कि सूर्य का रथ एक चक्री है। धरती का यह यथा‌र्थ आकाश की कल्पना में पहुँचकर रथ के विकास की कथा ही कहता है। रथ अपनी आदिम अवस्‍था में हो सकता है—एक चक्री ही रहा हो। स्लेज से उठकर यह रथीय संरचना एक चक्र पर आधारित रही होगी। सूर्य एक चक्र वाले वाहन पर यात्रा करता है। उसके इस रथ में सात घोड़े जुटे हैं। ये घोड़े सात रंग की किरणों की धारणा से प्रभावित प्रतीत होते हैं। बाद में ये सप्ताह के सात दिन भी बन गए। एक विचित्र कल्पना-विधान यह भी है कि सूर्य का सारथी अरुण न्यून अंग है। क्या यह रथी के पराक्रम साहस और अनथक उपोग को प्रकाशित करने वाला प्रसंग है। इस रूप में कि अनेक अवरोधों के बाद भी सूर्य अपनी यात्रा नहीं रोकता।

दिन का सतत यात्रिक है—सूर्य, रात्रि का सतत चलने वाला पथिक है-चंद्र! फर्क बस इतना है कि चंद्रमा घटता-बढ़ता है। यह कुछ-कुछ आदिम व्यक्ति को अचरज भरा कारनामा लगा होगा। यद्यपि अचरज के लिए तो हर तरफ गुंजाइश थी, किंतु रात में चाँद को देखने का उस शून्य-सपाटे में आकाश के विस्तार में इस पीलाभ गोलक को देखतना और उसकी चाँदनी में लिपटते हुए चंद्र के विषय में कल्पना के घोड़े दौड़ाना सहज था। सूर्य की तुलना में चंद्र तो हलका-फुलका है। अपने प्रकाश में शीतल-शीतल, असृण और तिलिस्म निर्मित करने वाला है। भला वह कैसे पाँव-पाँव चल सकता है। उसे भी रथ की व्यवस्‍था की गई। उसका रथ द्विचक्री है। रथ का पूर्ण विकसित स्वरूप! लेकिन यहाँ कल्पना ने एक कुलाँच मारी और चंद्रमा के रथ में जोत दिए हिरण! चंद्रमा का रथ हिरण ही क्यों खींचते हैं? हिरण घोड़े से तो कम शक्तिशाली हैं—यदि घोड़े जुतते तो जब पुष्प-कलिका जैसा चंद्रमा बचता है, तब तो घोड़े बहुत उलट-फेर कर देते, छोटे वजन को बड़ा हार्स पावर तो खतरा ही खतरा है। हिरण से यह खतरा तो नहीं।

मनुष्य की फितरत पैसा है और पैसा ने मनुष्य को जानवर बना दिया। इसी के आधार पर मनुष्य ने मनुष्य को रथ में जोत दिया। गुलामों को अपने रथ में अश्व बनाकर उन पर कोड़े बरसाने वालों की कमी नहीं रही। कलकत्ता में यंत्र रथ रिक्‍शा को खींचने वाले अभी भी मिल जाएँगे। निराला कवि की कविता पंक्ति है—‘मानव जहाँ बैल-घोड़ा है।’ वैसे भी हमारे देश के प्रजातंत्र की बग्‍घी को खींचने वाले यही बैल-घोड़ा बनाए गए लोग हैं—और इस बग्‍धी पर सवार हैं—सत्ता-स्वार्थ से चिपके वे सभी, जो अट्सलिकाओं में रहकर इन बैल-घोड़ा को चना-चबैना देकर इन्हें जिंदा बनाए रखते हैं। रथ ने क्या-क्या नहीं दिखाया? रथ युद्ध है, रथ उत्सव है और रथ अध्यात्म भी है।

फिर चंद्रमा अकसर नायिका के सुंदर मुख का उपमान बनता है—तो हिरण की आँख, कजरारी आँखों को मात करने वाली ही है। मुख और आँख की जोड़ी मिल गई। कौन जाने चंद्रमा के रथ में जुते हिरण चाँदनी रातों में प्रेमी जोडों के हृदयों में कितनी छलाँगें लगाते होंगे? बिरह में बिसूरती सूरदास की गोपियाँ तो अपनी वीणा-वादिनी सखी को वीणा-वादन करने से बरजती हैं—वे कहती हैं, “दूर करहु वीणा कर धरनो।” सनाका खींचती इस चाँदनी रात में वीणा का सुर चंद्रमा तक पहुँच ही रहा है। यदि उसके रथ में जुते हिरण ऐसे हिरण, जो बेहद संगीत प्रेमी है, वीणा का सुर सुनकर मस्त होकर स्थिर हो गए तो गोपियों की जान पर आफत आ जाएगी। चंद्रमा नहीं चल पाएगा, स्थिर हो जाएगा। यह स्थिर चंद्रमा मंरणांतक विरह संताप जाएगा। सूरदास की कल्पना दृष्टि को मानना पड़ेगा। चंद्रमा, हिरण और रथ का कैसा रूपक बाँधा? चंद्रमा के रथ में हिरण जोतने वालों ने भी ऐसा कभी नहीं सोचा होगा?

इतिहास के राजपथ पर और लोक-स्मृतियों की पगडंडियों पर रथ के आकार-प्रकार के अनेक उपाख्यानों की चक्र-रेखाएँ विद्यमान हैं। न जाने कितनी गाड़ियों के रूपों में रथ की आकृतियों को अंतर्निहित पाया गया है। रथ बदले, रथी बदले, सारथी बदले और रथ में जुटने वाले रथवाह बदले। मनुष्य के शातिर दिमाग ने न जाने कितने प्राणियों को रथवाह बनाया है। बैल, घोड़ा, भैंसा, ऊँट, गधा, खच्चर और जो भी सामने आ गया। कुत्ता, बकरा सबसे उसने अपना रथ खिंचवाना है। मनुष्य की फितरत पैसा है और पैसा ने मनुष्य को जानवर बना दिया। इसी के आधार पर मनुष्य ने मनुष्य को रथ में जोत दिया। गुलामों को अपने रथ में अश्व बनाकर उन पर कोड़े बरसाने वालों की कमी नहीं रही। कलकत्ता में यंत्र रथ रिक्‍शा को खींचने वाले अभी भी मिल जाएँगे। निराला कवि की कविता पंक्ति है—‘मानव जहाँ बैल-घोड़ा है।’ वैसे भी हमारे देश के प्रजातंत्र की बग्‍घी को खींचने वाले यही बैल-घोड़ा बनाए गए लोग हैं—और इस बग्‍धी पर सवार हैं—सत्ता-स्वार्थ से चिपके वे सभी, जो अट्सलिकाओं में रहकर इन बैल-घोड़ा को चना-चबैना देकर इन्हें जिंदा बनाए रखते हैं। रथ ने क्या-क्या नहीं दिखाया? रथ युद्ध है, रथ उत्सव है और रथ अध्यात्म भी है।

राम-रावण का युद्ध प्रारंभ ही हुआ था कि विभीषण के मन में गहरा विषाद जाग उठा। ‘रावण रथी विरथ रघुवीरा।’ रावण रथ पर सवार है और राम रथहीन हैं। राम कैसे युद्ध करेंगे—यह भाव विभिषण के हृदय में ही नहीं आया, बल्कि उन्होंने राम के सामने इसे प्रकट भी कर दिया। राम ने विभीषण का समर्थन नहीं किया। उन्होंने एक रथ-रूपक विभीषण के सामने रख दिया। यह रथ रूपक व्यक्ति के पुरुषार्थ-प्रसंग को प्रकट करता है। रथ को जहाँ भी जिस रूप में अभिव्यक्त किया गया हो, किंतु राम द्वारा विवेचित यह ‘विजय रथ’ अप्रतिम है। राम जिस रथ की चर्चा कर रहे हैं। वह संसार के स्तर पर नित्य चलने वाले महासमर पर विजय प्राप्त करने का माध्यम है—रणभूमि में खड़े राम ने जिस रथ को आकल्पित किया है, वह धर्मरथ भी है। एक तरह से राम-रावण का युद्ध धर्म और अधर्म का संघर्ष है, इसलिए इस रथ की कल्पना में व्यक्ति के भीतर निहित आंतरिक शक्तियों का संतुलन और समन्वय है। इसी शक्ति-संधान के आधार पर बा आयुधों की अचूक मारक क्षमताओं का प्रयोग संभव होता है। जीवन ही जैसे यह रथ है। शौर्य और धैर्य जैसे गुण इस रथ के दो चक्र हैं। यह आनुपूरिकता है, समन्वय है। धैर्य रहित शौर्य आपराधिक श्रेणी में आता है। इस रथ की पहचान देने वाले पताका और ध्वज सत्य व शील हैं। आचरण रहित सत्य खतरनाक होता है। आत्मघाती होता है, इसल‌िए सत्य के साथ शील की दृढ़ता आवश्यक है। धर्म के साक्षात् अवतार युधिष्ठिर को अर्धसत्य का सहारा लेने पर उसके दुष्परिणाम भोगने पड़े थे। जो रथ चक्र दृ़ढ़तापूर्वक पृथ्वी में धँसकर चलता था, चार उँगली ऊपर चलने लगा था। इस रथ में जुते हुए चार अश्व हैं। बल, विवेक, दम और परिहत जैसे गुण ही अश्व हैं। बल के साथ विवेक शक्ति के संतुलन को प्रदर्शित कर रहा है। आत्म-निग्रह के साथ परहित को जोड़कर आत्म-प्रसार के अवसर सुलभ होते हैं—ये दोनों साथ-साथ हैं। रथ का वेग, रथ की दशा-दिशा इन पर ही निर्भर है। अब उन गुणों की चर्चा राम करते हैं, जिनसे युद्ध के संहारक स्वरूप में भी लोक-कल्याण की भावना निहित है। क्षमा, कृपा और समता के भाव की रस्सी या लगाम ही सारथी और घोडों के संबंध की नियामक शक्ति-तंत्र है। यह युद्ध पर शांति की विजय का जयघोष है। ईश्वर का स्मरण ही सुजान सारथी हो सकता है। कविवर तुलसीदास की अद्भुत काव्य क्षमता का परिचय देने वाली यह रथ की आकल्पना शाश्वत है। यह जीवन से पलायन नहीं है। यह द्वंद्व मुक्ति का अभियान है। आज जब तनिक सी असफलताओं से लोग आत्म-हंता हो रहे हैं, तब यह रथ उन्हें आश्वस्त करता है‌ कि विजय होगी, अवश्य होगी, यह आत्म विश्वास का रथ है। तुलसी के शब्दों में, “सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा-पताका। बल विवेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे। ईस भजनु सारथी सुजाना...।” इस रथ की फल श्रुति है—“महा अजय संसार रिपु जीति सकई सो धीर। जाके अस रथ होई दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।”

यजुर्वेद के तन्मे मनः शिव संकल्पमस्नु में मन को जो सारथी का रूपक दिया था—कविवर तुलसीदास अपने इस रथ के सांग रूपक में उसे जैसे विस्तार देते हैं—उनका सुजान सारथी जिस रथ पर सवार है, वह शाश्वत और सार्थक रथ है। रथ-चिंतन के ये सभी प्रसंग हमारे लौकिक और पारलौकिक आशयों के सहज साक्षी हैं।

 

श्री चंडी जी वार्ड, हटा,
दमोह-४७०७७५ (म.प्र.)

दूरभाष : ०९९७७४२१६२९

—श्यामसुंदर दुबे

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