खिड़की से झाँकती वे सूनी आँखें

खिड़की से झाँकती वे सूनी आँखें

सुपरिचित रचनाकार। दो आलोचनात्मक पुस्तकों का लेखन। चार पुस्तकों में सहयोगी लेखन। ‘कुमार हरेन्द्र’ उपनाप से चार दर्जन से अधिक लेख, पुस्तक, समीक्षाएँ प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में आलोचनात्मक लेख प्रकाशित।

'एशियाड-82' दिल्ली में खेले जाने के कारण दिल्ली के विद्यालयों में एक महीने की छुट्टी की घोषणा हुई थी। मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था उस समय, गाँव के विद्यालय में एक महीने की छुट्टी, बच्चों की खुशी का ठिकाना न रहा। मौज-मस्ती, खेल-कूद सब। टीवी. उन दिनों ऐसा नहीं था, जैसा आज है। रविवार को फीचर फिल्म और बुधवार को ‘चित्रहार’ सिर्फ दो ही कार्यक्रम देखने को मिलते थे और वे भी माता-पिता से नजरें चुराने के बाद, नहीं तो वे भी नहीं। मेरे ‘बड़े भाई’ का स्नेह मुझे खूब मिलता था और कभी-कभी उस स्नेह के कारण ही ‘छूट’ भी। भाई ही मेरी प्रत्येक बालहठ को पूरा करते थे और मुझे अपने साथ-साथ रखते थे।

उन दिनों मेरे गाँव से गोवर्धन-वृंदावन यात्रा के लिए एक टोली जाने लगी थी। मेरे पिताजी भी उस टोली में शामिल हो गए। मैं भी हर बार उनके साथ जाने की जिद करता और भाई यही समझाकर मुझे मना लेते कि छुट्टि‍यों में तुम्हें भेज देंगे। ‘एशियाड-82’ की छुट्टि‍यों ने मुझे वृंदावन-गोवर्धन यात्रा का सुअवसर दिलाया, मैं अपने पिताजी के साथ यात्रा हेतु चल दिया।

बस में बैठकर सफर करना ‘बालमन’ को बहुत भाता था। जैसे ही बस में हम सवार हुए, मेरा मन खुशी से भर उठा। भीड़-भाड़ में कैसे हम शाम को वृंदावन पहुँचे, अब याद नहीं, लेकिन वृंदावन मुझे ‘नीको’ लगा। वहाँ मेरे गाँव के आस-पास की कीर्तन मंडली पहले से मौजूद थी और हम सीधे किशोरीदास तिलपत वाले महाराज की राधावल्लभ धर्मशाला और मंदिर पहुँचे। मैंने तो ‘सूरदास’ स्कूल में पढ़ते हुए अध्यापक महोदय से ही ‘वृंदावन’ की खूबी सुनी थी। मुझे उस भूमि के दर्शन की कम, शायद यह खुशी ज्यादा थी कि अब मैं अपने सहपाठियों को बता सकूँगा कि मैंने भी वृंदावन देखा है। कुछ ही देर में हमारी पूरी मंडली वृंदावन परिक्रमा के लिए निकल पड़ी। मैं पिताजी का हाथ पकड़े-पकड़े आस-पास की दुकानों को देखता-प्रसन्न होता चलता रहा।

सबसे पहले हम श्यामा कुंज पहुँचे। द्वार के बाहर पिताजी ने चने लिये और मेरे हाथ में दे दिए। तुरंत एक बंदर ने कृपा की और चने मेरे हाथ से छीनकर भाग गया। अब मैं डरा-सहमा अंदर जाने का साहस नहीं जुटा पा रहा था। जब हम अंदर पहुँचे तो मंडली के एक सज्जन ने ‘श्यामकुंज’ का परिचय बताते हुए कहा कि इस मंदिर में रात्रि में अब भी भगवान् कृष्‍ण राधा के साथ रासलीला करने के लिए आते हैं और रात्रि ‌में जो भी इस स्‍थान पर उन्हें देखने के लिए रुकता है, वह प्रातः मृत पाया जाता है। इसलिए पक्षी तक यहाँ नहीं आ सकते। स्‍थान तो बहुत सुंदर था। छोटे-बड़े वृक्ष, जलकुंड सब कुछ मनोरम था। किंतु शाम होने को थी और परिक्रमा बड़ी लंबी। हम जल्दी ही वहाँ से चल दिए और सोने के खंबे वाले मंदिर में पहुँच गए। वहाँ भी एक कथा सुनने को मिली। इतना विशाल मंदिर मैंने पहली बार देखा था। जब मैंने पूछा कि इस खंभे की रखवाली कौन करता है तो एक बुजुर्ग सज्जन ने उत्तर दिया—‘भगवान।’ जो इस खंभे को चुराने का प्रयास करता है, वह अंधा हो जाता है। आज सोचता हूँ, शायद इसी कारण से खंभा बचा हुआ है। यह मंदिर ‘रंगजी’ का माना जाता है।

वृंदावन की इन कुंजों की परिक्रमा में रास्ते में कुछ सफेद धोती पहने बाल कटवाए हुए दोनों छोरों पर भिखारिनों की भीड़ थी। मैंने भिखारियों को वरदी में पहली बार देखा था। मैंने जब उनके विषय में पिताजी से प्रश्न किया तो मुझे उत्तर कुछ इस तरह मिला कि ये यहीं पर भगवान् का भजन करती है और इस भिक्षा से अपना जीवन चलाती हैं। परंतु मेरे बालमन में यह प्रश्न बना रहा कि कैसे रहती होंगी ये भक्तिनें।

रात्रि में वृंदावन परिक्रमा के बाद हम वापस धर्मशाला में आ गए। इस बार धर्मशाला में वैसे ही कपड़े पहने कुछ स्त्रियाँ ढोलक बजा रही थीं, भजन गा रही थीं। हमने देर रात्रि तक उन्हें सुना। मुझे तो ढोलक का बजना ही अच्छा लगा, भजन समझ नहीं आए। लेकिन उन सफेद कपड़ा वाली स्त्रियों के जीवन के प्रति मन में एक प्रश्न निरंतर बना रहा।

प्रातःकाल हम गोवर्धन यात्रा के लिए निकल पड़े। गोवर्धन की दो परिक्रमाओं में से हमने एक परिक्रमा की। कच्चे रास्ते, पानी के कुएँ और उन पर रखी राहगीरों के लिए पानी की बाल्टियाँ, अब केवल स्मृति में ही रह गई हैं। परिक्रमा करने के पश्चात् उसी रात हम वापस चल दिए और दिल्ली पहुँच गए। मैं अपने मित्रों को बहुत दिनों तक अपनी यात्रा के किस्से प्रसन्नतापूर्वक सुनाता रहा।

लगभग 22 वर्ष के बाद पीएच.डी. कार्य हेतु मेरा वृंदावन जाना हुआ तथा ‘राधावल्लभ संप्रदाय’ में भी जाने का कई बार अवसर मिला। जब जाना होता तो बाँके बिहारी के दर्शन की इच्छा मन में होती। इस लंबे अंतराल में मैंने महसूस किया कि अब सफेद कपड़ा वाली ‘भक्तिन’, जो ‘बाल-विधवा’ के रूप में वृंदावन भूमि में रह रही हैं, ज्यादा विवश और अशक्त दिखाई पड़ रही हैं। अब मुझे समझ आया कि इस विवशता और अशक्तता का नाम ‘भक्तिन’ है।

कई-कई दिन बीत जाते और मैं कभी-कभी अकेला ही वृंदावन की उन कुंजों में घूमता रहता। एक दिन मैं गुरुकुल वृंदावन के पास की बस्ती से गुजर रहा था, अचानक देखा कि कोई सूनी ‘दो आँखें’ मुझे खिड़की में से देख रही हैं। मैं कुछ पल के लिए वहीं खड़ा हो गया। वह स्‍थान एक आश्रमनुमा था, जिसमें मैली सफेद धोती में बिखरे बाल, सूखा मुँह और सूनी आँखें मुझे निहार रही थीं। मैंने किसी से पूछा तो उत्तर मिला कि यह ‘वृद्ध बाल विधवा’ आश्रम है। मेरे मन में 22 वर्ष पुरानी वह स्मृति कौंध गई कि ये सफेद वरदी में स्त्रियाँ ‘भक्ति’ करने के लिए आई हैं। जीवन के अंतिम दिनों में इन भक्तिनों की ऐसी दशा होती होगी, मैं अपनी आँखों से देख रहा था। अंदर जाने का साहस नहीं जुटा पाया और शायद जुटाता तो मुझे पता नहीं कोई जाने देता या नहीं। वे सूनी आँखें खिड़की में से मुझे एकटक देखे जा रही थीं और मेरा मन कह रहा था—‘मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।’

हिंदू कॉलेज,

दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

दूरभाष : ९८१०७७३११४

—हरींद्र कुमार

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