शिकारपुर और उसके वासी

हले सिर्फ कहा जाता था। इक्कसवीं सदी के दो दशक बाद सिद्ध हो गया है कि यह मूल रूप से भौतिकता और प्रतियोगिता की सदी है। तभी तो बाबूराम आजकल शहर में सफलता के मानक माने जाते हैं। उन्होंने अपने सेवा काल में नगर विकास निगम के उपाध्यक्ष रहकर इतनी लूट की कि भ्रष्टाचार भी उससे शरमाए। एक बिल्डर का मामला उनके आगे आया तो उन्होंने उसे बुलाया। उसके स्वयं के हालचाल ही नहीं, परिवार की कुशल भी दरियाफ्त कर जुबानी भाई-चारा बनाया। चाय-बिस्कुट से उसकी खातिरदारी की। बाबूराम का वैयक्तिक सहायक समझ गया कि मोटा मुर्गा फँसा है। बस अब इसका शहीद होना बाकी है। दरअसल वह बाबूराम की इस स्टाइल से परिचित था। वह एक झटके में न मारकर धीरे-धीरे उसे जिबह करते थे। जिबह होने वाला, इस दौरान प्रसन्न रहता! उसके चेहरे की मंद-मंद मुसकान उसके होंठों का एक पल भी साथ न छोड़ती।

इसी बीच बाबूराम ने अपने निजी सहायक को सरकारी लाल बत्ती वाली गाड़ी लगाने का आदेश दिया। जब उन्होंने बिल्डर के लिए खुद दरवाजा खोला तो वह गद्गद हो गया। उसने बाबूराम की ‘अजगरी’ ख्याति सुन रखी थी। लूट में इसकी किसी से भागीदारी नहीं है, यह उसकी सारी की सारी रकम खुद-ब-खुद निगल लेता है, जैसे अजगर जीता-जागता इनसान। बिल्डर को एक पल को लगा कि नेक इनसान को लोग व्यर्थ में कैसे और क्यों बदनाम करते हैं। कुछ को इसी में आनंद आता है। लोग सहज में विश्वास भी कर लेते हैं। असल में यह सरकार, सचिवालय और दफ्तरों की सामान्य प्रक्रिया हो गई है। यहाँ तक कि किसी साधारण पत्र का उत्तर तक ‘पैसे दो, जवाब लो’ के सिद्धांत पर आधारित है। यदि इस नियम की अवहेलना कर कभी उत्तर मिला तो पाने वाला इतना कृतार्थ होता है कि मंदिर में प्रसाद चढ़ाने की नौबत आती है। बिल्डर को लगा कि प्रतियोगी वर्ग चाहते हैं कि लोग व्यक्तिगत रूप से इस सहज-सरल अधिकारी के संपर्क में न आएँ, वरना क्यों उसकी छवि ऐसी बनाई जाती? बिल्डर इन्हीं खयालों में गुम था कि गाड़ी एक नए विकसित प्लांट के सामने आकर रुक गई। बाबूराम ने पहले की भाँति शालीनता प्रदर्शित की। बिल्डर से अधिकारी की संक्षिप्त वात्ता हुई। ‘‘आप तो इस क्षेत्र में खासे अनुभवी हैं। कृपया अनुमान लगाकर बताएँ कि इसमें तीन बेडरूम, संलग्न टायलेट, लॉबी, किचन और डाइनिंग रूम बनाने में कितना वक्त लगेगा? व्यय की चिंता नहीं है किंतु फिटिंग्स सब ‘लेटेस्ट’ और आधुनिक होने चाहिए। ऐसे कल ग्यारह बजे तक ‘एस्टिमेट’ बनाकर मुझे दर्शन दें।’’

बिल्डर के पास अन्य चारा ही क्या था? उसने ‘यस सर’ की हामी भरकर कल आने का वादा किया। उसे पता तक नहीं था कि उस पर क्या बीतने वाली है? उसने एक बार शाम को स्वयं जाकर प्लांट का निरीक्षण किया, अपने आर्किटेक्ट के साथ एक रफ किस्म का नक्‍शा बनाकर, उसकी अनुमानित कास्टिंग की और आदेशानुसार समय पर हाजिर हो गया। आते ही बाबूराम की दिव्य उपस्थिति में उसे पेश किया गया। न प्रतीक्षा न अन्य कोई औपचारिकता। वह उनके आचार-व्यवहार से फिर से प्रभावित हुआ। वाकई अफसर हो तो ऐसा। आजादी के बाद देश को ऐसे ही जनसेवक की आवश्यकता है। बाबूशाही के किले में ऐसे ही अधिकारियों से जनसेवा की सेंध संभव है। चाय-बिस्कुट के बाद बाबूराम काम की बात पर आए, ‘‘तो कितना समय और खर्चा लगेगा?’’ बिल्डर ने नक्‍शा निकाला, उन्हें दिखाया और बताया, ‘‘सर! सब से बेहतरीन फिटिंग्स और निर्माण सामग्री लगाकर सत्तर-अस्सी लाख का खर्चा आएगा। चूँकि घर भूतल पर बनाना है तो हम इसमें फर्स्ट-फ्लोर का भी प्रावधान कर रहे हैं। निर्माण और सजावट में सात-आठ माह तो लग ही जाएँगे।’’

बाबूरामजी मुसकराए और बोले, ‘‘तो आप काम शुरू करवा दीजिए। जब तक यह फ्लैट बनेगा, हम सुनिश्चित करेंगे कि आपकी कॉलोनी का केस भी सुलट जाए और उसकी स्वीकृति भी। जिस दिन फ्लैट की चाभी मिलेगी, निर्णय और कॉलोनी की स्वीकृति आपको सौंप दी जाएगी।’’

बिल्डर हतप्रभ था। पहली बार उसका साबका एक ऐसे अधिकारी से पड़ा था, जिसने ‘बिना’ एक शब्द भी कहे, अपने हिस्से का बीस प्रतिशत से अधिक हिस्सा लूट लिया था। हालात और होते तो उसका कोई प्रतिनिधि पूरी ‘डील’ की सौदेबाजी करता। यहाँ ऐसी कोई बात नहीं थी। न कोई बिचैलिया था। बिल्डर को महसूस हुआ कि बाबूराम पैसा कमाने में खासे क्षमतावान व कुशल हैं। पूरी चर्चा में उसके पास कोई सबूत भी नहीं है कि जिससे बाबूराम के फँसने की गुंजाइश हो? वह फ्लैट की राशि लोन और सेविंग से दिखा ही देंगे। रही रसीद की उपलब्धता तो उसका प्रबंध तो वह खुद ही कर देगा, यदि इच्छा से नहीं, तो जबरन। उसका बड़ा काम भी तो बाबूराम की स्वीकृति पर ही अटका है। इतना ही नहीं, अब इसे सीट दर सीट भाग-दौड़ नहीं करनी है, नहीं तो कितना समय और पैसा बरबाद होता? इससे अच्छी तो बाबूराम की ‘सिंगल बिंडो क्लियरेंस’ है। उसकी भाग-दौड़ बची, पैसा भी—और सब बाबूराम की कृपा के कारण।

मन-ही-मन जैसे वह प्रसन्न था। यदि फिर से उसे कभी अवसर मिलता तो वह बाबूराम जैसे अफसर से ही संपर्क कर कृतकाय होता। हर क्षेत्र और धंधे के लोग भ्रष्टाचार की लूट का प्रावधान कर योजना बनाते हैं। सब की सी.बी.आई. और विजिलेंस से साँठ-गाँठ होती है, जैसे सियासी दलों के ऐसे कार्यकर्ताओं की, जिनकी हर क्षेत्र में वसूली नियत है। सही भी है। नहीं तो बेरोजगारी में उनका काम कैसे चले? अन्यथा दल के सत्ता में आने से उन्हें क्या लाभ?

दूरदर्शी अधिकारी अपने सेवाकाल में ही रिटायरमेंट का प्रबंध कर लेते हैं। यह कला जैसे बाबूराम में जन्मजात थी। तभी हर बाबू उन्हें अपना आदर्श मानता। वह बाबुओं के राम थे। उन जैसे अधिकारियों ने भ्रष्टाचार की मर्यादा बखूबी निभाई है। उनका कोई कार्य ऐसा न होता, जिसमें निजी लाभ का कोई-न-कोई जुगाड़ न हो। विशेषता यह थी कि मीडिया उसे सदाचार के रूप में प्रचारित करता। हर कार्य का श्रेय मंत्री-मुख्यमंत्री को देते, जिससे उन पर सियासी कृपा बनी रहे। वह स्वयं की छवि सरकार में भ्रष्टाचार के रावण के हनन की बनाते। छवि बनाने में टी.वी. से लेकर समाचार-पत्रों तक का अविस्मरणीय योगदान रहा है। ऐसे महानायकों की उपस्थिति के कारण शिकारपुर भी देश की ऐसी महानगरी बन गया है, जिसका अनुकरण करने को देश के शहर-महानगर उत्सुक हैं। बाबूराम के अपने सेवाकाल में ही पत्नी के नाम से समाजसेवी संस्थान का गठन किया है। इसके अंतर्गत एक शिक्षण संस्थान भी बनाया जा चुका है। उसकी जमीन में सरकार का सहयोग है और भवन में बिल्डरों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

शिक्षा का क्षेत्र बाबूराम का निजी चयन है। वह जानते हैं कि इसे किसी भी उद्योग की तरह लाभप्रद अंदाज में संचालित कर सकते हैं। शिक्षकों से रसीद अधिक की और वेतन कम का। हर बहाने छात्रों से फीस और वक्त-बेवक्त दान-चंदा। नकल की सुविधा की ‘वसूली’। फिर कहने को देश सेवा। अशिक्षा के अंधकार को दूर करने के प्रयास का पुण्य-प्रताप अलग। ऐसे व्यक्तियों का समाज में सम्मान और कीर्ति है। क्या पता अपने राजनैतिक संबंध का लाभ उठाकर वह किसी पद्म पुरस्कार के हकदार ही न बन जाएँ? ऐसे उन्हें किसी सम्मान की हसरत नहीं है। रहने को महल जैसा मकान है, कॉमर्शियल इलाके में दुकानों से लाखों का किराया है, पुत्र है, जिसके दहेज में तीन-चार करोड़ की आशा है।

यों बाबूराम का विचार है कि उनका बेटा कुछ अयोग्य किस्म का है। उसे प्रेम-प्रसंग दोहराने का उतना ही शौक है, जितनी काम-धंधे से अरुचि। स्वर्गीय कैलाश बाजपेयी के शब्दों में—‘बड़े बाप के बेटे हैं, जब से जन्म हुआ लेटे हैं।’ सबके जीवन में कोई-न-कोई ऐसी समस्या है कि जिसका कोई हल नहीं है। बाबूराम की यह समस्या उनका बेटा है। वह डिग्री प्राप्त कर भी सिर्फ डिग्री-याफ्ता है, शिक्षा-याफ्ता नहीं। कॉलेज-यूनिवर्सिटी में उसने सिर्फ प्रेम-प्रसंगों में प्रसिद्धि पाई है। वह भी अपने पिता के पैसे के कारण। वह लड़कियों का मुफ्तिया आवागमन या भ्रमण का साधना रहा है। यदि उसकी किसी परिचित कन्या को बस से कॉलेज-यूनिवर्सिटी जाना पड़ता तो इसे वह अपना व्यक्तिगत अपमान मानता। उनके लिए उनकी निजी कार-सेवा हाजिर है। उन्हें समय से यूनिवर्सिटी ले जाने और वापस घर लाने का वादा करता ही नहीं, निभाता भी। कैंटीन का खर्चा भी उसी का जिम्मा रहा है। इन्हीं सब नेक कार्यों से उसके तथाकथित प्रेम-प्रसंगों की संख्या दिनोदिन तरक्की पर रही है। जिसे वह प्रेम समझता, लड़कियाँ उसे उल्लू बनाना।

यों शिकारपुर ऐसे महानगर में यह संरक्षण महत्त्वपूर्ण है। नहीं तो आँकड़े साबित करते हैं कि अपहरण, बलात्कार, हत्या, डकैती जैसे अपराधों में शिकारपुर रोज नए मानक बना रहा है। हर शहर-महानगर उससे प्रेरित है, उसके अनुकरण में व्यस्त है, पर मजाल है कि उसकी ऊँचाई छू भी पाए? राज्य का सचिवालय वहीं स्थित है। वह शासन का ही नहीं, करप्शन का भी केंद्र है। लोग बहुधा बहुमंजिली इमारतों को भौंचक होकर देखते हैं और अकसर इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ‘भले ही इनकी कीमत सोने की हो, इनकी नींव शर्तिया भ्रष्टाचार की है।’ इसमें उच्चाधिकारियों और कई मझले बाबुओं की अट्टालिकाएँ भी शामिल हैं। ज्यादातर राजनेता इधर देखकर भी नहीं देखते हैं। उनकी इमारतें भी ऐसों के कारण ही निर्मित हुई हैं। मामला पारस्परिक पीठ खुजाई का है। प्रतियोगिता भी ऐसी ही ऊँची दुकानों और फीके पकवानों की है। कोई पास जाए तो उसे आभास हो कि वह किसी मंदिर के पास आ गया है। वहाँ जैसे मौखिक भजन कीर्तन है, यहाँ नैतिकता, जनसेवा, न्याय और सदाचार की गूँज है। स्वाभाविक है कि कोई इनकी सच्चाई पर संदेह करे। मंदिरों में तो श्रद्धावान भक्त हो भी सकते हैं, यहाँ सभी को शक है कि केवल बगुला-भगत हैं? कौन जाने इक्कीसवीं सदी, समय ही बगुला भगतों का है?

वह भी ऐसे-वैसे सामान्य बगुला-भगत नहीं, सिद्ध किस्म के। इन्होंने जीवन-पर्यंत सदचार का गुण-गान किया है। हरसिंगार की भाँति इनके मुँह से केवल नैतिकता के वाक्य झरते हैं। कार्यों में इन्होंने न कभी देश का सोचा है, न निर्धन-कल्याण। बस यह इनकी कहने की बातें हैं, करने की नहीं। जब चुनाव में इस जुबानी जमा-खर्च से जीत हासिल होती है तो और कुछ क्यों करें? यों जनता ने जब से पटखनी लगाई है, वह अपनी कागजी उपलब्धियाँ गिनाकर उसे ही कोस रहे हैं, खासकर युवा मतदाताओं को। ‘‘इन्हें हमारे परिवार की पुश्त-दर-पुश्त जनसेवा का लिहाज नहीं है, तो हमारी कल्याणकारी योजनाओं पर कैसे ध्यान दें? बस दूसरों के बरगलाने में आ जाते हैं। इतिहास पर भी थोड़ी नजर डालें। पर इसके लिए कितनों को फुरसत है! उनका एक सूत्रीय कार्यक्रम हमारा विरोध है।’’

जहाँ शिकारपुर का हर वासी दूसरे के शिकार पर अमादा है, वहीं कुछ इस तथ्य पर ताज्जुब करते हैं कि यह पशुवत् प्रवृत्तियाँ इनसानों में कैसे आ गईं। वह भी भरे पेट समृद्धों में। क्या वर्तमान के शहर-महानगर, कल के वन-जंगल का पर्याय हैं। यों इक्कीसवीं सदी की प्रतियोगिता सिर्फ समृद्धों तक सीमित है। सामान्य व्यक्ति का सपना लाखों-करोड़ों का न होकर दाल-रोटी का है। इसमें सब्जी की गुंजाइश बने तो क्या कहना? महँगाई की पतंग आकाश में विचरण कर रही है। सामान्य व्यक्ति उत्सुक है कि सरकार इसका पेंच काटे तो उसे भी आलू-प्याज खाने का सौभाग्य प्राप्त हो। अपनी-अपनी हसरत है। कुछ आयातित सब्जियों से संतुष्ट हैं, कुछ कीमतों के गगनचुंबी उछाल में आलू-प्याज के अभाव से।

 

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—गोपाल चतुर्वेदी

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