हिरनी-बिरनी लोकनाट्य

हिरनी-बिरनी लोकनाट्य

शिक्षा : एम. ए. समाजशास्त्र।

प्रकाशन : पत्र पत्रिकाओं में नियमित रचनाएँ प्रकाशित। दिल्ली प्रेस का नियमित लेखक।

संप्रति शिक्षण संस्थानों का संचालन।

लोकनाट्‍य का लोकजीवन से घनिष्ट संबंध रहा है। यही कारण है कि लोक से संबंधित पर्व-त्योहारों, मांगलिक कार्यों के समय इनका अभिनय किया जाता है। अति प्राचीन काल से लोकनाट्‍य लोकजीवन में मनोरंजन का साधन रहा है। हिरनी बिरनी नाम का लोकनाट्‍य गाँवों में आदि काल से प्रचलित रहा है। आज भी जब दो बहनों को काफी तेज-तर्रार देखा जाता है तो उदहारणस्वरूप लोग बोलते हैं कि ये तो हिरनी-बिरनी हैं।

कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगास्नान करने का प्रचलन आदि काल से है। गाँव के मर्द-औरतें सुहागिन सोलहों शृंगार करके गंगा स्नान करने रास्ते से जा रहे हैं—यह देखने के बाद हिरनी-बिरनी दोनों बहनें आपस में बातें कर रही हैं। ये गीत की शैली में काफी मनोरंजक है—

धन्य भाग हई सब तिरियवा रे दइया,

स्वामी के सुहागिन सब ये राम।

लाली पीली कुसुमी के साड़ी रे दइया

चोली मखमलिया पेन्हे ये राम।

मोतियन भरल लीलरवा रे दइया

सोरहो सिंगरवा करि ये राम।

हिलमिली गावत झुमरिया रे दइया

गंगा असननीया जात ये राम।

सबही के मिले जोग बलमुआ रे दइया

स्वामी संग बिहार करे ये राम।

हमनी के जोग मिले न पुरुखवा रे दइया

केकर संग बिअहवा करी ये राम।

जनमे जग अकारथ रे दइया

स्वामी के मरम न जानली ये राम।

चढली जवानी बीतल जात रे दइया

सोना,सुखवा माटी भइले ये राम।

तिरिया के स्वामी जेकर नाहीं रे दइया

ओकर जियल अधमवा हई ये राम।

कउने अइसन कइली हम पपवा रे दइया,

ताही लागी ना बलमवा मिले ये राम,

तजबो परान यह अधमवा रे दइया!

जियलो मोर धिक्कार हई ये राम।

वे महिलाएँ धन्य हैं जो सुहागिन हैं। लाल-पीले कुंकुम रंग की साड़ी और मखमल की चोली, लिलार में मोती भरे हुए सोलहों शृंगार किए हुए मेलजोल के साथ झूमर गाते हुए गंगा स्नान करने के लिए जा रही हैं। सब लोगों को योग्य पति मिला है, जिसके साथ में घूमने के लिए लोग जा रहे हैं। अपने ऊपर अफसोस करते हुए कह रही हैं कि हम लोगों को योग्य पति नहीं मिल रहा है, जिसके संग हम लोग भी विवाह कर लेते। हम लोगों का यह जन्म ही बेकार चला गया। हम दोनों बहनें नहीं जान पाईं कि पति का सुख क्या होता है? जवानी भी समाप्त होती जा रही है। सोना जैसा सुख भी मिट्टी के समान हो जाता है, जिस औरत का पति नहीं है, उसे जिंदा रहना भी बेकार है। हम दोनों बहनों ने कौन सा ऐसा पाप किया है कि योग्य पति नहीं मिल पा रहा है। हम लोगों को जीना ही धिक्कार है। इससे अच्छा की हम लोग जान ही दे देती।

हिरनी के पछतावे पर उसकी छोटी बहन बिरनी संतोष दिला रही है और विवाह करने का उपाय भी गीत के माध्यम से बता रही है—

बिरनी

रामा सुनी लेहूँ बहिनी बचनियाँ रे ना।

रामा मनवाँ में धर हूँ धीरजवा रे ना।।

रामा अइसे नाहीं मिलिहें सजनवा रे ना।

रामा हमनी के जोग के पुरुखवा रे ना।।

रामा कहियो जे तोरा से बचनिया रे ना।

रामा सोई कर जल्दी उपइया रे ना।।

रामा बावन गढ़ बावनों अखड़वा रे ना।

रामा चली कर देहुँ यह डकरवा रे ना।

रामा नाथे जे मोर मोहन भैंसवा रे ना।

राम ताही संग करबो बिअहवा रे ना।।

रामा करि लेहु अब ई परनवा रे ना।

रामा तब योग मिलिहें पुरुखवा रे ना।

रामा जतिया में नाहीं योग पुरुखवा रे ना।

रामा जनम भरी रहबो कुँअरिया रे ना।

छोटी बहन बिरनी हिरनी को समझा रही है। मन में धीरज रखो, तभी अच्छा पति मिल पाएगा। हम लोग के योग्य कोई पुरुष नहीं है। इसके लिए एक उपाय यह है कि हमारे मोहन भैंसा को जो नाथ देगा, उसी के साथ हम दोनों विवाह करेंगी। हमारी जाति में हम लोगों के योग्य पुरुष नहीं हैं, इसका एकमात्र उपाय यही है।

इसके बाद बड़ी बहन बिरनी बोल रही है—

रामा सुनी लेहु बहिनी बचनिया रे ना।

रामा बड़ी निक तोहरो विचरवा रे ना।।

रामा जे नथीहें मोहन भैंसवा रे ना।

रामा ताही संग करबई बिअहवा रे ना।।

रामा चाहे कउनो जतिया रे ना।

एकर मत करहू विचरवा रे ना।।

रामा पहिले उनकर लेई कर जतिया रे ना।

रामा तब करबो उनकर संग सदिया रे ना।।

रामा हमरो हई एकबीर मुरगा रे ना।

राम नाही कभी हारत दँगलव रे ना।।

रामा जब जीते मुरगा दँगलवा रे ना।

रामा तब खाय सात मुरगा मसवा रे ना।।

रामा छाती छेदी निकली सुरूअवा रे ना।

राम पहिले खिआई मुरगा मनसवा रे ना।।

रामा जाति लेइ करबई बिअहवा रे ना।

रामा हम कईली आज यह परनवा रे ना।।

बड़ी बहन हिरनी छोटी बहन के विचार से सहमत हो जाती है और बोलती है कि तुम्हारा सुझाव अच्छा है। जो मोहन भैंसा को नाथेगा, उसी के साथ हम विवाह करेंगी, वह चाहे जिस भी जाति का हो। दंगल जीतने के बाद मुर्गा खिलाकर पहले अपने जाति में शामिल करेंगी, तब उसके साथ में शादी करेंगी।

इसके बाद हिरनी-बिरनी दोनों बावन गढ़ के अखाड़ा पर बड़ वृक्ष के नीचे मोहन भैंसा के साथ डेरा डाल देती हैं और ढोलक बजाकर पहलवान लोग को ललकारने लगती हैं—

रामा कोउ नाही जग में पुरुखवा रे ना।

रामा दुनिया नाही केहू बिरवा रे ना।।

रामा चलली गुजरात से हम नटिनिया रे ना।

रामा घूमी अइली देश बंगलवा रे ना।।

रामा कहूँ नहीं मिलले वीर पुरुखवा रे ना।

रामा नाथे जे मोहन भैंसवा रे ना।

रामा बिना वीर भइली धरतिया रे ना।।

रामा जे नाथीहें मोहन भैंसवा रे ना।

रामा उनके संग करबो बिअहवा रे ना।।

रामा न जो नाथीहें मोहन भैंसवा रे ना।

रामा धिक्क उनके हउवे जन्मवा रे ना।।

हिरनी बहन कह रही है कि दुनिया में कोई वीर नहीं है। हम नटिन गुजरात से बंगाल तक घूम आईं, लेकिन कहीं वीर पुरुष नहीं मिला। जो वीर मोहन भैंसा को नहीं नाथेगा, उसका जन्म बेकार है और माँ का दूध भी। उनके जन्म को धिक्कार है।

गुरु मोती लाल

रामा सुनी लेहुँ तीन सौ साठी चेलवा रे ना।

रामा बोले का नटिन बचनवा रे ना।।

रामा देई कर कठिन कसमवा रे ना।

रामा धर के पछारहूँ भैंसवा रे ना।।

रामा कर लेहुँ बंजारन से बिअहवा रे न।

रामा अइसन सुंदरी नाहीं कउनो तिरिअवा रे ना

गुरु मोतीलाल अपने तीन सौ साठ चेला को ललकारते हैं कि भैंसा के पछाड़कर बंजारन से विवाह कर लो। इतनी सुंदर औरत नहीं मिलेगी।

इतने पर एक पहलवान तैयार हो जाता है और बोलता है—

रामा खोली देहुँ मोहन भैंसवा रे ना।

रामा हम नाथब तोहरो भैंसवा रे ना।।

भैंसा खोल दिया गया। हिरनी बिरनी भैंसा के पीठ ठोक के मैदान में छोड़ देती है। भैंसा शेर के जैसा पहलवान पर टूट पड़ता है। एक-एक कर सभी पहलवान हार जाते हैं।

बिरनी आगे बोलती है—

रामा ना ही केहू वीर पुरुखवा रे ना।

रामा इहाँ हवे सब ही हिजड़वा रे ना।।

रामा सबही के देखली हिम्मतवा रे ना।

रामा तीन सौ साठी पहलवनवा रे ना।।

रामा धरती पर छरके भैंसवा रे ना।

रामा जइसे छरके हाथी पर शेरवा रे ना।।

रामा तइसे छरके मोहन भैंसवा रे ना।

रामा तीन सौ साठी चेलवा रे ना।।

रामा मिलिके धइले भैंसवा रे ना।

रामा नाथे ला तो बड़ी रहे दूरवा रे ना।

रामा नाहीं करी सकले बालबकवा रे ना॥

बिरनी कहती है कि कोई वीर पुरुष नहीं है। यहाँ सभी हिजड़े हैं। तीन सौ साठ पहलवान मिलकर भी मोहन भैंसा का बाल बाँका नहीं कर सके। आगे गुरु मोतीलाल कहते हैं—

रामा किया बंजारिन बोले कुबचनिया रे ना।

रामा सबके बनावेलु हिजड़वा रे ना।।

रामा अइसन जे बोललू बचनियाँ रे ना।

रामा तोहरा उखाड़बउ जिभवा रे ना।।

रामा हम नाथब तोहरो भैंसवा रे ना।

रामा हम करबो तोहरो से विअहवा रे ना।।

जब सभी लोग को हिजड़ा बना देती है तो गुरु मोतीलाल मोहन भैंसा को नाथ कर खुद विवाह करने का फैसला लेते हैं। लेकिन वे भी हार मान लेते हैं। हिरनी-बिरनी दोनों बहिनें मिर्जापुर के अखाड़ा जाकर ढोलक बजाकर पहलवान को ललकारने लगती हैं।

हिरनी कहती है—

रामा घूम अइली सगरे मुलुकवा रे ना।

रामा नाहीं कोई जग में मरदवा रे ना।।

रामा सबे हव मरद हिजड़वा रे ना।।

रामा नहीं कोई नाथे मोर भैंसवा रे ना।

रामा नाथी जो दीहें मोर भैंसवा रे ना।

रामा करी लीहें हमसे विअहवा रे ना।।

पूरा देश घूम लिया, लेकिन एक भी मरद नहीं मिला, जो हमारे भैंसा को नाथ सके। जो हमारे भैंसा को नाथेगा, उसी के साथ हम विवाह करेंगे। एक पहलवान कहता है—

रामा सुन बंजारन हमरी बचनियाँ रे ना।

रामा सबके बनावेलु हिजड़वा रे ना।।

रामा जानत सब संसरवा रे ना।

रामा मिर्जापुर के नामी हे मरदवा रे ना।।

रामा तहाँ आई कहेलू हिजड़वा रे ना।

रामा खोली देहुँ अपन भैंसवा रे ना।।

रामा हम नाथब तोहर भैंसवा रे ना।

रामा हम करब तोहसे बिअहवा रे ना।।

मिर्जापुर के नामी पहलवान चैलेंज करता है कि हम मोहन भैंसा को नाथकर तुमसे विवाह करेंगे, लेकिन वह भी हार जाता है। आगे पोसन सिंह कहते हैं—

रामा हमरो ही रहत जिंदगिया रे ना।

रामा गुरु मरले बिना मउतिया रे ना।।

रामा मारी दिहलस गुरु के भैंसवा रे ना।

रामा दरे पर भइले खतमवा रे ना।।

रामा मरद के होयब पयदवा रे ना।

रामा तब लेबई गुरु के बदलवा रे ना।

रामा माता के सात सोत के दुधवा रे ना।

रामा आज होइ तेकर परीक्षवा रे ना।।

रामा सात सोत के पिअले होअब दुधवा रे ना।

रामा तब आज नाथब भैंसवा रे ना।।

पोसन सिंह कहते हैं कि अपने गुरु का बदला हम लेंगे। अगर अपने माँ के सात सोत का दूध पिए हुए होंगे तो मोहन भैंसा को हम नाथेंगे। पोसन सिंह कहते हैं—

रामा नाथ दिहली तोहरो भैंसवा रे ना

रामा अब कर हमसे विअहवा रे ना।।

हमने तुम्हारे भैंसा को नाथ दिया, अब तुम हमसे विवाह कर लो।

हिरनी बोलती है—

रामा सुनऽ स्वामी हमरो बचनियाँ रे ना

रामा जब नाथल मोहन भैंसवा रे ना।

रामा तब होइ गइले विअहवा रे ना।।

रामा अब हम बनायब रसोइया रे ना।

रामा करि लेहुँ स्वामी तू भोजनवा रे ना।।

हिरनी कहती है कि जब आप ने भैंसे को नाथ दिया, उसी समय विवाह हो गया। अब हम खाना बनाएँगी। स्वामी, आप पहले भोजन कर लीजिए।

पोसन सिंह कहते हैं—

रामा तोहरो से करबो विअहवा रे ना।

रामा तब कउने खाये में उजुरवा रे ना।।

रामा करहूँ रसोई तइयरवा रे ना।

रामा खुशी से करबई भोजनवा रे ना।

पोसन सिंह कहते हैं कि जब तुमसे विवाह ही कर लेंगे तो खाने में क्या दिक्कत है। तुम भोजन तैयार करो, हम खुशी-खुशी खाएँगे।

 

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—शंभू शरण सत्यार्थी

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