चुक जाती हैं जब इच्छाएँ

चुक जाती हैं जब इच्छाएँ

जानी-मानी कवयित्री। चर्चित कृतियाँ हैं—‘कुछ अलग’, ‘स्वत:’, ‘शब्द की लहरें’, ‘स्वयं’ तथा ‘एक युग के बाद’ (काव्य)। हिंदी अकादेमी के ‘साहि‌त्यिक कृति पुरस्कार’ समेत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित।

मीठे से दो शब्द

जो अच्छा लगता हो वह तो कर ही डालो

बुरा लगे जो भी मन को उसको तो टालो

पता नहीं किस घड़ी किसी का हित हो जाए

किया आपका उसका बिगड़ा काम बनाए,

धन्यवाद उसका बन सकता भाग्य तुम्हारा

काम दूसरे के आने की आदत पालो।

हँसी तुम्हारी हो सकता है हँसी उगाए

होंठों के बागीचों में जा फूल खिलाए,

मुसकानें बनकर खुशबू बिखरें हर दिल में

जितनी भी हो सके प्यार की हवा बहा लो।

मीठे से दो शब्द और सब मीठा-मीठा

जरा देखना औरों के दिल में क्या होता,

बदलो पटरी जैसे छुक-छुक रेल बदलती

मुँह फेरे बैठे जो उनको जरा मना लो।

भाग-दौड़ है बहुत मगर दम ले लो थोड़ा

कहीं पटक ही दे न तुम्हें पथ का ही रोड़ा,

क्षण दो क्षण के लिए दूसरों की भी सोचो

बाँटो अपने को थोड़ा तो समय निकालो।

बाँट रहा अपने को जो वह ही है पूरा

वरना तो जो भी है उसका रूप अधूरा,

प्रकृति पूर्ण है वह अपने को बाँट रही है

उसके रंग में अब तुम भी अपने को ढालो।

ले नसीहतें बैठे गुरुजन

वातावरण कहाँ सुधरेगा कोई उसे सुधारे तो

ले नसीहतें बैठे गुरुजन कोई उन्हें पुकारे तो

इतनी बेकदरी भी अच्छी नहीं यहाँ अच्छाई की

टँगी हुई सूली पर नीचे कोई उसे उतारे तो

दंगा भी फसाद भी मारामारी भी है मची हुई

हिंसा का यह कूड़ा-कचरा कोई जरा बुहारे तो

हम भी अलग-अलग हैं वे भी अलग-थलग सारे बैठे

यह अलगाव बड़ा दुखदायी कोई उसे नकारे तो

किसने किया तमाशा यह सब इस पर भी तो गौर करो

है कोई जो इस मुद्दे पर थोड़ा बहुत विचारे तो

अपने बस में तो बस यह है बात करेंगे खरी-खरी

झूठ कहा है, अगर लगे तो, कोई फिर ललकारे तो

ऐसा ही है देश कि जैसे सदियों से उलझी जुल्फें

प्यार मोहब्बत का कंघा ले कोई उसे सँवारे तो

मन थकता तो थकता तन भी

मन थकता तो थकता तन भी

काम न आता फिर चंदन भी

छायादार घने पेड़ों की

छाया देने वाला वन भी

तप्त विचारों की बौछारों

से नहलाने वाला घन भी

चुक जाती हैं जब इच्छाएँ

बेमतलब है जोड़ा घन भी

सपनों के बूढ़ा होने पर

याद नहीं आता बचपन भी

चलना चाहो चला न जाता

राह रोकती राह कठिन भी

होती कहाँ तसल्ली मन को

झूठा लगता अपना प्रण भी

चरम निराशा के क्षण में तो

साथ छोड़ता अपनापन भी

ऐसे में क्या नियमन संयम

आँख दिखाता जब जीवन भी

अरे क्या बात है!

मिलें खजाने भरे अरे क्या बात है!

डूबी किस्मत तरे अरे क्या बात है!

झोली फैला दी है उसके सामने

वह भी तो कुछ करे अरे क्या बात है!

कब तक दर्शक बने तमाशा देखेंगे

रहें परे ही परे अरे क्या बात है!

यह मजाक की बात नहीं तो फिर क्या है

कोई हमसे डरे अरे क्या बात है!

सीधी उँगली घी न निकलता सब कहते

टेढ़ी निकले खरे अरे क्या बात है!

कोई तो ईश्वर से भी यह पूछेगा

माथ चरण क्यों धरें अरे क्या बात है!

वह देवता कहाँ रहता है पता नहीं

जो सारे दुख हरे अरे क्या बात है!

किससे आशा की जाए उस शब्द की

फूल सरीखा झरे अरे क्या बात है!

उस विपदा की आरती उतारो जी

आकर जो खुद टरे अरे क्या बात है!

बड़ा कठिन है उसे ढूँढ़ना दुनिया में

एक बार जो मरे अरे क्या बात है!

एकमात्र वह ही क्षण है

बड़ा मजा आता है जब सब ठीक-ठीक चलता है

जैसे माँ की गोदी में पहला बच्चा पलता है

दूर-दूर तक कोई आहट देती जब न सुनाई

आशंकाएँ भीड़ लगाकर देतीं जब न दुहाई,

जब सपने आँखों में चुप-चुप अपने अंडे सेते

मन-मंदिर में तब पूजा का एक दीप जलता है।

तपती लू की जगह हवाएँ चलती हैं जब ठंडी

कहीं दुबककर सो जाती है जब खतरों की चंडी,

जब आकाश रोशनी के फव्वारों से भर जाता

तब लगता है विस्मृत कोई पुण्य कहीं फलता है।

जब रातों में बिना डरे भरपूर नींद आ जाए

दिन स्वागत में फूलों की मालाएँ लेकर आए,

समय स्वयं संगीत बना-सा उतरे जब जीवन में

उत्सव-सा तब भीतर-भीतर अपनापन ढलता है।

सुख जब चंचल नटखट बच्चे सा खेले आँगन में

दुख जाकर छिप जाए कहीं जब काँटों वाले वन में,

इधर-उधर सब ओर खुले हों जब सारे चौराहे

लगता है छल-कपट झूठ हैं, सच तो निश्छलता है।

नीचे से ऊपर उठकर या उठकर नीचे गिरना

दोनों स्थितियों में समान बहता जब मन का झरना,

विष या अमृत दोनों से परहेज न जब रहता है

एकमात्र वह ही क्षण है जब अहंकार गलता है।

 

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—पुष्पा राही

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