डायबिटीज

ब्जी की दुकान पर भीड़ लगी थी। बड़का-बड़का झोला थामें लोग घूम रहे थे, मौका मिला नहीं कि झोले का मुँह सुरसा की तरह खोल देते। कोरोना और इस लॉकडाउन के चलते ऐसा न हो कि बाजार से जरूरी सामान गायब हो जाए। सरकार के आश्वासन के बाद भी लोगों के मन से डर-भय नहीं खत्म हो रहा था। सभी इसी चक्कर में थे कि अपना घर अनाज-पानी से भर लिया जाए।

मैं भी झोला लिए अपनी बारी का इंतजार कर रही थी। तभी एक बुजुर्ग बंदे को देखा जो झोला आगे बढ़ा दुकानदार को 15 किलो आलू भर देने को कहा।

दुकानदार ने सिर ऊपर उठाया और कहा, ‘साहब इतना आलू आपको ही थमा दिया तो बाक‌ि लोगों का क्या होगा? आलू तो सबको चाहिए।

इस पर बुजुर्ग बिफर पड़े और सख्ती से कहा, ‘तुम्हारे पास आलूओं की कमी नहीं। मुझे १५ किलो आलू चाहिए। मेरी मरजी।’

दुकानदार ने तराजू पर आलू रखना शुरू किया और बुदबुदा उठा, ‘आप कोरोना से भले बच जाए, लेकिन इतना आलू खाकर डायबि‌टीज से जरूर मर जाएँगे...’

 

हाजीनगर,

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—माला वर्मा

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