हरित मानसिकता की जरूरत

हरित मानसिकता की जरूरत

विचारक एवं संस्कृति के अध्येता लेखक। लिखित एवं संपादित अनेक पुस्तकें प्रकाशित। गोरखपुर, इलाहाबाद, भोपाल तथा दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापन के बाद महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के कुलपति पद से सेवानिवृत्त। पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। अनेक सम्मान एवं पुरस्कारों से सम्मानित।

ज सबके मन में पर्यावरण को लेकर एक खौफ बैठा हुआ है। ओजोन की परत में छेद से होकर आनेवाली सूर्य की रश्मियाँ खतरनाक हो रही हैं। हमारे खाद्य पदार्थ कीटनाशकों और अन्य रसायनों से प्रदूषित हो रहे हैं। पीने के लिए निर्मल शुद्ध जल प्राय: अनुपलब्ध है। जलवायु-परिवर्तन के क्या-क्या परिणाम हो सकते हैं, इसकी झलक आए दिन मौसम में हो रहे बदलावों से मिलती है। इनसे हरित गैसों से तप्त धरती का क्या हाल होगा, इसकी चेतावनी भी मिलती है। घर और बाहर की हवा हानिकारक रसायनों से भरी रहती है और साँस लेना दूभर होता जा रहा है। भोज्य पदार्थ की आनुवंशिक इंजीनियरिंग और बीजों के पेटेंट होने से प्राकृतिक भोज्य पदार्थों तक हमारी पहुँच घटती जा रही है और विश्व की अधिकांश जनसंख्या के लिए भोजन के साधन भी घट रहे हैं। जिस वेग से वैश्विक गरमी बढ़ रही है, वह दुनिया को ऐसे बिंदु पर पहुँचा रही है, जिससे बाढ़, भोजन और जल की कमी, विस्थापन, संसाधनों के लिए हिंसात्मक संघर्ष अवश्यंभावी होता जा रहा है।

सिर्फ अमेरिका में नौ बिलियन पशु प्रतिवर्ष भोजन के काम आते हैं। इसके चलते अनेक जीव-जंतुओं की प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। जल-प्रदूषण, मल और अपशिष्ट के निरंतर एकत्र होते रहने, वनों की कटाई आदि से ओजोन की परत को भी सतत हानि हो रही है। वर्षा-वन और समुद्र के भीतर का जीव-जगत् है, जो विविध जीव-प्रजातियों के संरक्षण का स्रोत है और जिससे जीवन के जटिल रूपों का विकास होता है, वह भी मनुष्य द्वारा दोहन के कारण बुरी तरह दुष्प्रभावित हो रहा है। धरती पर उपलब्ध संसाधनों की तुलना में जनसंख्या अधिक है और यह स्थिति सफल जीवन जीने के लिए उपयुक्त नहीं बैठ रही है। संतुष्टि न हो सकने वाली हमारी उपभोग-वृत्ति और लोभ के कारण निकलता कूड़ा और अपशिष्ट का स्वास्‍थ्य पर नकारात्मक प्रभाव बढ़ता जा रहा है। कैंसर  जैसे असाध्य रोग की बहुतायत चिंताजनक हो रही है। पहाड़ों, नदियों, घाटियों और वनोंवाले प्रकृति के रम्य सौंदर्य स्थल, जो आध्यात्मिक ऊर्जा के स्रोत हैं, खत्म होते जा रहे हैं। नाभिकीय ऊर्जा से सबकुछ समाप्त करनेवाले शस्त्रास्त्र बनाने की होड़ थमने का नाम नहीं ले रही है।

आज  हम प्रौद्योगिकी की बदौलत लाखों लोगों को बंदी बना सकते हैं और लोगों के व्यवहार को नियंत्रित कर सकते हैं, परंतु हमारी बुद्धि और लोभ के ये तकनीकी उत्पाद इस पृथ्वी को एक सुरक्षित स्थान नहीं बना पा रहे हैं। कुल मिलाकर परिवर्तन इतने बड़े पैमाने पर हो रहे हैं कि आदमी के लिए स्वाभाविक नैसर्गिक दशा में जीने और अपनी क्षमताओं का उपयोग करना असंभव सा हो रहा है। यह सब करते हुए हम अपनी मुख्य भूमिका से चूक गए। हमारी सामाजिक रचनाएँ, जो तथाकथित रूप से सत्य और उचित के निश्चय के लिए हैं, मनुष्य और मनुष्येतर प्राणियों की खुशहाली के बारे में मौन हैं, क्योंकि सोच-विचार की धारा परिस्थितियों के दुरुपयोग की ओर ले जाती है। एक निपट अकेले व्यक्ति का विकास ही उसके केंद्र में है और उसी की आत्मकेंद्रित सर्जनात्मकता पर बल दिया जाता है। मनुष्य और पशु-पक्षी तथा भौतिक पदार्थों के बीच एक कृत्रिम विभाजक रेखा बनाई गई, जो व्यापक दृष्टि से उपयोगी नहीं है। हमारे पास एक टिकाऊ विश्व व्यवस्था की कोई स्वीकार्य दृष्टि नहीं है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और व्यापार घोर वैयक्तिकता वाली विश्व दृष्टि पर टिके हुए हैं। यह नियति का खेल है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण के नियम को कॉर्पोरेट के संरक्षण में सहयोगी बनते हैं, ताकि उन्हें मुक्त व्यापार की छूट मिल सके, जो मूलत: संस्कृति के संरक्षण और पर्यावरण की सुरक्षा के विरुद्ध हैं।

उल्लेखनीय है कि वैश्विक दबाव सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को समाप्त करते हैं। वे एकरस मानसिक संस्कृति (मोनो कल्चर) रचते  हैं। यह सभी अनुभव कर रहे हैं कि विज्ञान और तकनीकी का विकास वस्तु की दुनिया पर स्वामित्व पाने के लिए है। परंतु स्पर्धा की दौड़ में जितना भी हासिल किया जाए, वह प्रतियोगी लोगों के बीच अपनी स्थिति को सुनिश्चित करने के लिए हमेशा ही नाकाफी रहेगा। इस तरह की संस्कृति में प्रचंड उपभोग के लक्ष्य तृप्त न होने के कारण सदैव काम्य बने रहते हैं। इसीलिए सत्ता संचित होती है, जो मनुष्य की संभावना को नष्ट करती  है। आज का सभ्य आदमी अपने ही द्वारा पैदा की गई प्रौद्योगिकी की व्यवस्था से जूझने में ज्यादा समय बिताता है। भोजन, यात्रा, संचार सब तरह के काम के लिए विशेषज्ञ की जरूरत पड़ती है। हमें प्रतियोगी इसलिए बनाया जा रहा है कि हम विस्तृत होते उस अर्थतंत्र के हिस्से बन जाएँ, जो धरती की नैसर्गिक संपदा का खतरनाक ढंग से दोहन करता है और सिर्फ उत्पादन एक उपभोग को ही महत्त्व देता है। वह स्थानीय लोगों और आदिवासियों के हित की रक्षा नहीं करता है। इन सबके चलते  वन की कटाई, धरती की ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी, औषधीय वृक्षों  का उन्मूलन, जल-प्रदूषण, तनाव, हिंसा, गरीबी आदि व्यक्ति और धरती के रिश्ते को त्रस्त कर रहे हैं।

आज एक पारिस्थितिक आत्म या स्व (सेल्फ) की अवधारणा पर विचार करना जरूरी होता जा रहा है, जो सभी प्रकार के जीवन का समावेश कर सके और उनके साथ एकता को भी ध्यान में रख सके। आधुनिक जीवन की बढ़ती जटिलताएँ अपने परिवेश को समझने, अधिकार में लेने और नियंत्रण करने की होड़ में हमारे जीवनानुभव के मुख्य हिस्से या जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। फलत: आज चिंता, अवसाद, संशय और अकेलेपन से जूझते व्यक्तियों का हुजूम दिख रहा है, जो अकेलेपन और असहायता की भावनाओं से विकल है। तकनीकी विकास, व्यवसाय में कठिन प्रतिस्पर्धा और वैयक्तिकता के चलते लोग तनाव के शिकार हो रहे हैं। प्रकृति के साथ जुड़कर एक संतोषदाई जीवन की संभावना आगे नहीं बढ़ रही है। अपने को अलग और सबसे श्रेष्ठ मानने के भ्रम से प्रकृति के साथ परस्पर निर्भरता वाले रिश्ते की अनदेखी हो रही है। फलत: हम पर्यावरण के लिए समस्याएँ पैदा करते जा रहे हैं। यदि हम मांस, प्लास्टिक, जीवाश्म ईंधन के कम उपयोग के साथ जीना सीख लें, यदि हमें विषैले रेडियो विकिरण या रासायनिक अपशिष्ट को नियंत्रित करें तो सृष्टि की देखभाल हो सकेगी। ऐसे में खुशहाली की मृग-मरीचिका वाली अनंत खोज की जगह दया और करुणा की संवेदना आवश्यक हो गई है।

आज का सभ्य आदमी अपने ही द्वारा पैदा की गई प्रौद्योगिकी की व्यवस्था से जूझने में ज्यादा समय बिताता है। भोजन, यात्रा, संचार सब तरह के काम के लिए विशेषज्ञ की जरूरत पड़ती है। हमें प्रतियोगी इसलिए बनाया जा रहा है कि हम विस्तृत होते उस अर्थतंत्र के हिस्से बन जाएँ, जो धरती की नैसर्गिक संपदा का खतरनाक ढंग से दोहन करता है और सिर्फ उत्पादन एक उपभोग को ही महत्त्व देता है। वह स्थानीय लोगों और आदिवासियों के हित की रक्षा नहीं करता है। इन सबके चलते  वन की कटाई, धरती की ऑक्सीजन की आपूर्ति में कमी, औषधीय वृक्षों  का उन्मूलन, जल-प्रदूषण, तनाव, हिंसा, गरीबी आदि व्यक्ति और धरती के रिश्ते को त्रस्त कर रहे हैं।

 

आधुनिक समाज को व्यसन से उबरना होगा। हमारी मानसिकता को हरित बनाना पड़ेगा। मनुष्य को पूरी प्रकृति के साथ जीवंत संबंध रखना होगा। समुद्र, नदी, पशु-पक्षियों की आवाजें हमें गहरे छू जाती हैं; बादल, फूल, संध्या काल में डूबते सूरज की आभा मनुष्य की आत्मा को पुनर्नवा करनेवाली है। मनुष्य होने का अर्थ अन्य मनुष्यों, प्रकृति और सृष्टि के साथ प्रामाणिक रिश्ता बनाना है। हमें सभी जीवन रूपों को आदर देना होगा। वास्तविकता यह है कि मनुष्य की प्रजाति का जीवन परिस्थितिकी के साथ गहरे संबंध की स्थापना की अपेक्षा करता है। ऐसे में हमें व्यापक पारिस्थितिकीय आत्मबोध का विकास करना होगा, जिसमें प्रदूषित दुनिया  की व्यथा हमारी व्यथा होगी और सामान्य रूप से जीवन का संरक्षण हमारे अपने जीवन को अर्थवान बनाएगा। यह याद रखनेवाली बात है कि समकालीन सभ्यता ने इस धरती का नक्शा दो सौ वर्षों में जितना बदला है, वह दो मिलियन वर्षों में प्रकृति की सभी शक्तियों से होनेवाले परिवर्तन से अधिक है।

देसी लोग बहुत कम परिवर्तन के वातावरण में रहे। उनकी जीवन शैली में प्रकृति की शक्ति के साथ समरस और समायोजन था। इतिहास गवाह है कि सुमेर, बेबिलोन, ट्राय, एथेंस, रोम, सभी उठे, बढ़े और नष्ट हो गए, परंतु भारत की सभ्यता और संस्कृति बहुत अंशों में सुरक्षित बची रही। यह उसकी समग्र पर बल देनेवाली जीवन-दृष्टि का ही परिणाम था, जो सर्वत्र प्रवहमान किसी अव्यय तत्त्व की उपस्थिति से अनुप्राणित थी। इस दाय को सँभालते हुए हमें प्रकृति के साथ परस्‍परावलंबन के आधार को सुदृढ़ करना होगा। इसी में हमारा भविष्य निहित है।

३०७, टावर-१ पार्श्वनाथ मैजेस्टिक फ्लोर्स, वैभव खंड

इंदिरापुरम्, गाजियाबाद-२०१०१४

दूरभाष : ९९२२३९९६६६

—गिरीश्वर मिश्र

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