सच्ची जीत

सच्ची जीत

“अजानी-मानी लेखिका। अब तक तीन कहानी-संग्रह तथा अनेक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित। बहरीन में हिंदी अध्यापन। मॉरीशस ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन में ‘घर-गृहस्थी’, ‘आपकी चिट्ठी मिली’ तथा अन्य सामाजिक कार्यक्रम प्रस्तुत। बहरीन में ‘फाइन आर्ट सोसाइटी’ द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत।

अरे कर दिया न, सत्यानाश कलफ, चर्क चढ़ी ताँत की बंगाली साड़ी का।”

शिखा ने अपनी आठ वर्षीय रिपा को अपनी साड़ी लपेटे देखा तो गुस्से से चीख उठी।

गरमी की छु‍‍‌ट्टियाँ थीं, रिया बालकनी में अपनी गुड़ियों का संसार सजाए बैठी थी। साथ में दो सखियाँ और थीं। घर-घर का खेल हो रहा था। स्पष्ट था कि रिया घर की मालकिन बनी हुई थी तथा गृहस्‍थन का रोल निभा रही थी।

माँ की डाँट से खेल में खलल तो पहुँची ही, रिया ने सखियों के समक्ष अपने को अपमानित महसूस किया।

“वह जो परसों नायलॉन की साड़ी दी थी, वह क्या हुई?”

“वह क्या हमारे पहनने लायक थी, वह तो हमने अपनी महरी को दे दी।”

“महरी को?”

शिखा ने देखा कि एक कोने में दुबली-पतली सी लड़की बाल बिखेरे सिंबेटिक साड़ी पहने गुड़िया के किचन सेट के बरतन धोने में लगी थी। बाकी दो सखियाँ शायद बच्चों का रोल निभा रही थीं, क्योंकि वे मग में काल्पनिक दूध पी रही थी और बिस्कुट खा रही थीं।

शिखा को अपनी लाडली की गृहस्‍थी देखकर प्यार आ गया। थोड़ा सा चना-चबेना में ही गृहस्‍थी चल रही थी। उसने अंदर से लाकर ऑरेंज और मैंगो जूस तथा नमकीन, बिस्कुट, ब्रेड और दे दिया। रिपा ने कृतज्ञता से माँ को सधन्यवाद देखा। गरमी बहुत थी परंतु बालकनी में पंखा चल रहा था। शिखा ने बालकनी की चिक डाल दी तो थोड़ा वातावरण ठंडा हो गया।

और अंदर जाकर ए.सी. चलाकर लेट गई। रोहरा चार दिन के लिए कैंप में गया था। बच्चों के पापा टूर पर दिल्ली गए थे। उसने सोचा था, शाम को मिसेज आप्टे के घर हल्दी-कुंकुम में जाएगी तो यही साड़ी पहन जाएगी। अब कोई और निकालनी पड़ेगी।

वह लेटे-लेटे सोच रही थी कि यह कहावत सच ही है। “पहन ले, पहन ले, जब तक धी नहीं, खा ले, खा ले, जब तक बहू नहीं।”

दूसरी कहावत चरितार्थ होने में अभी अरसा पड़ा है, परंतु पहली कहावत तो चरितार्थ हो ही रही है। रिया को साड़ी लपेटने का बहुत शौक है, उसकी जो भी साड़ी देखेगी, लपेट लेगी। बच्चे भी जो माँ को देखते हैं, वही करते हैं। वह भी लिये-दिए की सिंथेटिक साड़ियों को महरी-म‌िसरानी को बाँट देती यह कहकर कि यह क्या हमारे पहनने की है। सो रिया ने भी यही किया।

चलो, पहनने दो, जब मौका आएगा पहनने का तो जींस-टॉप पहनेंगी। आजकल कौन साड़ी पहनता है। कल मिसेज धवन के कीर्तन में सारी औरतें सलवार कुरते में थीं, बस वही अकेली साड़ी में थी। परंतु साड़ी उसकी प्रिय पोशाक है। सलवार-कुरता तो वह मार्निंग वॉक और बाजार हाट में ही पहनती है। ढेर साड़ियाँ हैं, आखिर कब पहनी जाएँगी। वह तो जब किरी में साड़ी पहनकर जाती है तो उसकी हम प्रिय सखियाँ भी उसे आंटी-आंटी कहती हैं। उसे बड़ा ताव आता है उन औरतों को देखकर, जो न शरीर देखती है और न उम्र। सोचती हैं कि जींस, कैपरी और स्कर्ट पहनकर बहुत कम उम्र दिख रही हैं।

लेकिन साड़ियों में भी क्या आग लग रही है, कोई भी ट्रेडीशनल साड़ी दस-पंद्रह हजार से कम नहीं आती। इतनी देर में नीचे हॉर्न की आवाज सुनाई दी। कार शिखा के पति को एयरपोर्ट से लेकर आ गई होगी। वह दरवाजा खोलकर सीढ़ियों पर आ गई, उधर पापा की आवाज सुन रिया भी खेल-वेल छोड़ साड़ी उतार पापा की ओर भागी। सभी सहेलियाँ भी चल दीं। शिखा की साड़ी बालकनी से लेकर कमरे तक फैल गई। महरी बनी लड़की भी साड़ी उतार यह जा और वह जा।

इशिता और तान्या को तो वह पहचानती थी, पर यह तीसरी लड़की नहीं पहचान में आई। दोनों साड़ियाँ बालकनी से कमरे तक लिपटती चली गई। साड़ियों की दुर्दशा देखकर उसे रोना आ गया। बालकनी में अलग फैलावा फैला हुआ था। सोचा था, पतिदेव के साथ वहीं बैठकर चाय पिएगी, वहाँ से पार्क का दृश्य बहुत अच्छा लगता है। पर डाँटती किसे, रिया रानी तो अपने पापा की गोद में चढ़ी लड़ रही थीं। ऐसे नाजुक मौके पर बिटिया रानी को कुछ भी कहना खतरे से खाली नहीं था।

डाइनिंग टेबल पर चाय-नाश्ता लगाती शिखा ने रिया से पूछा, “क्यों री, वह तीसरी लड़की कौन थी, जो महरी बनी थी।”

“वो लक्ष्मी!”

“हाँ आ, आ!”

“वह तो रामदेई की लड़की है रामदेई, जो इशिता की महरी की लड़की है। अब महरी किसे बनाते, वही मेहरी बन जाती है घर का झाड-पोंछा और बरतन साफ करती है। बाजार से सामान लाती है। वह हमारी हेल्पर है।” रिया ने इतराते हुए कहा।

“अच्छा, वह नौकरानी है तो पहले सारा घर साफ कराकर तब उसे भेजा करो।” शिखा ने सख्ती से कहा।

“वह हमारी सहेली है उससे कैसे कहें।” रिया ने मुँह फुलाते हुए कहा।

“अच्छा भई, अब यों बेटी की चखचख बंद होगी या नहीं।” शिखा के पति ने कहा।

“सही तो कह रही है सहेलियों से कैसे सफाई करवाए।”

“हाँ, उसके लिए तो यों है।” शिखा ने सामान समेटते हुए कहा।

“अच्छा अब दोनों इधर आओ, देखो में दिल्ली से क्या लाया हूँ।”

“यह देखो प्रगति मैदान में ट्रेड फेयर चल रहा था, वहाँ से आंध्रा की स्टॉल से तुम्हारे लिए पोचमपल्ली की खूबसूरत साड़ी लाया हूँ। और अपनी रानी गुड़िया के लिए यह रशियन डॉल।”

“हाय कितनी खूबसूरत है, कितने की है?” शिखा ने हुलसते हुए कहा।

और बिटिया रानी की निगाह तो डॉल-वाल छोड़ उसकी फिरोजी पोचमपल्ली पर थी।

“और उस पैकेट में क्या है?”

शिखा ने सफेद सी मारकीन में लिपटे एक बंडल को देखकर कहा, “इसमें तो बहुत ही कीमती चीज है, यह तुम्हारे लाडले बेटे रोहन के लिए है।”

“अच्छा, अब की उसके भी भाग्य खुल गए, वरन् तो हमेशा बिटिया रानी के खिलौने ही याद रहते हैं।”

“भाग्य, यह भाग्य सब खिलौनों पर भारी है। रोहन कल आएगा, वही खोलेगा।”

“फिर भी क्या है आखिर।”

“अरे भई, वहाँ सचिन तेंदुलकर आया हुआ था, मैंने एक बल्ला खरीदा और उस पर सचिन तेंदुलकर के हस्ताक्षर करवाए और बेटे के लिए ले आया।”

“अरे वाह! रोहन तो बहुत खुश हो जाएगा।”

शिखा ने गुड़िया शो केस में सजा दी, परंतु तब तक पोचमपल्ली खुल चुकी थी और लंबे शीशे के सामने पहनी जा रही थी।

शिखा ने अपना माथा ठोक लिया।

जहाँ पापा यह देखकर सौ जान से फिदा हो रहे, वहाँ शिखा की मुनमुनाहट चालू थी, पारा सातवें आसमान पर था।

“अब इसकी तह कैसे बनेगी। बड़ी मुश्किल से इन साड़ियों की तह बनती है।”

“अपनी गुड़िया की ओर तो नजर उठाकर नहीं देखा। चली हैं साड़ी पहनने। ऊँह।”

“अरे भाई, मेरी बेटी को मत डाँटा करो, मैं तह करवा दूँगा। अब चलो, तैयार हो जाओ, आज माथुर ने बुलाया है खाने पर, उसकी मैरेज एनीवर्सरी है।”

“अच्छा!”

दूसरे दिन रोहन भी लौट आया, सच अपना गिफ्ट देखकर बहुत प्रसन्न हुआ अपने कमरे की अलमारी में हिफाजत से रख दिया।

परंतु रिया रानी की गुड़िया एक दिन भी जो शोकेस में सजी हो।

दूसरे दिन पापा से कहकर ठुनक-ठुनक कर वह ग‌ुड़िया उतरवा ली।

“अरे भाई, यह गुड़िया खेलने के लिए लाया हूँ, सजाने के लिए नहीं।”

“अरे, चार दिन तो इसकी शोभा बनी रहे, वरन् और गुड़ियों की तरह यह भी बन जाएगी। ‘चयर बसक्को’ बाल-वाल शैंपू से नहा धोकर साड़ी लपेट दी जाएगी। इनके मामा लंदन से गुड़िया लाए, क्या गत बनी। आप जापान से लाए, वह भी क्या हाल में है। बार्बी तो कोई भी अपने असल लिबास में नहीं हैं। ले लो हमें क्या है।”

शिखा ने मुँह फुलाते हुए कहा।

गरमियों की छु‌ट्टियाँ खत्म हुईं। खेल-खिलौने बंद हुए। पढ़ाई व किताबों का काम शुरू हो गया।

बेटा रोहन धीर-गंभीर सीधा-साधा सा था। रिया की ही भिनभिन चलती। कभी कपड़े चाहिए तो कभी जूते। रोज ही सहेलियों की बर्थ डे होती। हर बार नई ड्रेस चाहिए थी। भय्या तो बेचारा पास से नहीं निकल जाता तो चिल्लाना शुरू हो जाता। “मम्मी भय्या हमारा खेल बिगाड़ रहा है।” वैसे भय्या के बगैर काम भी नहीं चलता।

ऐसे ही खेलने-खाते दिन गुजरने लगे। बच्चे बड़े होकर कॉलेज में पहुँच गए। रोहशा आई.आई.टी. रुड़की चला गया। शिखा के पति की ट्रांसफर वाली नौकरी थी। इसलिए रिया को दिल्ली यूनिवर्सटी में बी.ए. ऑनर्स में दाखिला दिला दिया।

रिया के पापा जिस शहर या प्रदेश में जाते, वहाँ की प्रसिद्ध दो साड़ियाँ अवश्य लाते, एक शिखा की दूसरी रिया की। रिया का बक्‍शा बनारसी, टिशू, पैंठनी, गदवाल, पोचमपल्ली, कांजीवरम, परोला, बालूचरी, घारचोला, रांगाइल, असमी, वल्लकलम, केरला साड़ी, मणिपुर की रानी साड़ी, जयपुरी लहरिया, बोंधनी, कोसा सिल्क, राजकोट गुजरात की सुंदर साड़ियों, महेश्वरी कोटा आदि साड़ियों से भरता जा रहा था। उसका दहेज तो यों ही तैयार हो रहा था। रिया छुट्टि‍यों में घर आती तो एक बार साड़ी का बक्‍शा खोलकर अवश्य देखती, जो कमी होती वह पापा को बताती, वही साड़ी आ जाती। वैसे वह जींस-टॉप ही रोजमर्रा में पहनती थी, कभी-कभी सलवार-कमीज।

उसके कॉलेज में फ्रेशर की पार्टी थी। कॉलेज क्वीन चुनी जानी थी। उसने गुलाबी मैसूर क्रेप पहनी, जो उसके गुलाबी तन पर बहुत खिल रही थी। कमर तक लहराते काले घने केश खुले छोड़े थे। सबका कहना था कि वही जीतेगी। परंतु जीती लाल वेस्टर्न गाउन में स‌ज्जित एक लड़की और वह रनर-अप रही। खैर, उसे कुछ भी मलाल नहीं हुआ अपनी पारंपरिक सज्जा पर।

रिया ने बी.ए. ऑनर्स किया और फिर एम.ए. इकोनॉमिक्स और फिर लंदन भी गई इकोनॉमिक्स पढ़ने। वहाँ से लौटकर आई तो उसका विवाह तय हो गया। उसका भावी पति प्रतीक एक विदेशी कंपनी में मुंबई में था। दिल्ली में ही ससुराल थी। इत्तफाक से रिया के पिता भी दिल्ली में पोस्टेड थे। ससुराल वालों के यहाँ आना-जाना रहता, सास-ससुर बहुत अच्छे थे, एक ब्याही हुई ननद थी। वह भी दिल्ली में ही थी।

उन लोगों की कोई भी डिमांड नहीं थी, फिर भी रिया के पापा उसका दहेज भरने में लगे थे। उसकी ननद और सास उसे प्रायः बुलवा लेतीं जेवर पसंद करने, कपड़े पसंद करने।

एक दिन अपनी साड़ियों का निरीक्षण करती रिया बोली, “पापा, मेरे ट्रूसो में चंदेरी साड़ी नहीं है।”

“ठीक है, आ जाएगी। अगले हफ्ते में ग्वालियर जा रहा हूँ, तभी लाऊँगा।”

रिया के पापा ने अपना वादा पूरा किया।

वह आए तो बोले, “तुम्हारी साड़ी सट्टी पर बुनकरों को दे आया हूँ। पंद्रह दिन में आ जाएगी। असल में चंदेरी में भी वह पहले वाली साड़ियों की बात नहीं रही, सब सूती कपड़े में बना रहे हैं। कहते हैं, साहब, वह पहले वाला सिल्क बाई सिल्क कपड़ा कहाँ अाता है। बुनकरों की भी हालत बदतर है। खैर, तुम्हारी तो बहुत खूबसूरत साड़ी आएगी।

वास्तव में साड़ी आई तो बहुत खूबसूरत थी, काली मुलायम सतह पर रुपहली बूँटियाँ खूबसूरत कामदार पल्ला। रिया बाग-बाग हो उठी, साड़ी के साथ का नेक स्टाइलिश लंबी बाँहों का ब्लाउज बनवाया गया। कुछ अनारकली सूट भी खरीदे गए और रिया का ट्रूसो सज गया।

रिया की प्रतीक से फोन पर बातचीत होती। उसी ने बताया कि वे लोग हनीमून पर यूरोप जाएँगे। लौटते समय दो दिन के लिए सैशल जाएँगे। एक दिन उसकी ननद आई, बोली, “भाभी, चलिए मॉल चलिए। कुछ कपड़े खरीदते हैं।”

“कपड़े तो बहुत हैं मेरे पास।” वह धीरे से बोली।

“अरे नहीं, हनीमून पर ये कपड़े नहीं चलेंगे। सब वेस्टर्न खरीदते हैं। भय्या को वेस्टर्न ड्रेसेस पसंद हैं।”

वह चुपचाप साथ चली तो गई परंतु वेस्टर्न ड्रेसेस देखकर जरा भी रोमांचित नहीं हुई। एक ट्रॉली भी खरीदी गई।

हनीस की भी अटैची तैयार हो गई। शिखा ने सलाह दी, एक-दो साड़ी व सलवार-कमीज भी अवश्य रख लेना तथा उससे मैचिंग ज्वैलरी भी। क्योंकि तेरी बड़ी भाभी जो वहाँ रहती हैं, अपनी बीमारी के चलते यहाँ शादी में नहीं आएँगी। मिलने जाना तो साड़ी पहनकर। तुम्हारे ससुरालिए भी तो वहाँ बहुत हैं, मिलने जाना तो साड़ी या सलवार-कमीज में।

रिया ने ऐसा ही करना चाहा, परंतु उसके पति ने सारी भारतीय पोशाकें निकलवा दीं। अब उन पोशाकों के साथ सिंदूर बिंदी व चूड़ियाँ भी क्या जँचती। हाथों में हीरे के कंगन और कानों में हीरे के टॉप्स, नाक में हीरे की छोटी सी लौंग, बस यही शृंगार था। यदि मेहँदी नहीं होती तो वह कॉलेज में पढ़ने वाली लड़की लगती। उसके पति को उसका यही गेटअप पसंद था। लंबा छरहरा गोरा शरीर व खूबसूरत बड़ी-बड़ी आँखों व सुतवाँ नाक वाला सलोना चेहरा।

रिया पूरे यूरोप में वेस्टर्न ड्रेस में ही घूमी। रिश्तेदारों से भी उसी गेटअप में मिली। सच पूछो तो उसे छोटी-छोटी स्लीवलेस मिनी में सबसे मिलने में लज्जा ही आई। इससे तो जींस ही ठीक थी, पर उसके टॉप भी छोटे-छोटे थे। इससे पूर्व दिल्ली में रहते हुए भी उसने ऐसे कपड़े नहीं पहने थे। उसका मन तो अपनी उन साड़ियों में अटका हुआ था, जिन्हें वह बक्से में उपेक्षित छोड़ आई थी। देश-प्रदेश की रंगीन रेशमी साड़ियों का कलेक्‍शन, जो कितने उमंग व चाव से उसके माँ-पापा ने एकत्र किया था। सच में वह साड़ी में लगती भी मॉडल सी थी।

रिया जब ब्याह कर आई तो बक्सा खुलाई की रस्म हुई। उसकी सास ने काली चंदेरी देखते ही कहा कि साल भर तक काली साड़ी मत पहनना, हमारे यहाँ अपशगुन माना जाता है।

यह सुनते ही उसकी ननद ने वह साड़ी खींच ली, “भाभी, मैं तो यही साड़ी लूँगी, तुम तो अभी पहन भी नहीं सकतीं।”

रिया की क्या दशा हो सकती है अपनी प्रिय साड़ी को हाथ से जाते देखकर। वह खिसियाकर मुसकराकर रह गई।

और अब जो प्रतीक रोज काली, नीली ड्रेस ही पहना रहा है, वह कुछ नहीं। उसे तो फोटो खिंचाने में भी दिलचस्पी नहीं आ रही थी।

मुंबई लौटकर आए तो यहाँ भी अभी रातें सुनहरी और दिन चाँदी के हो रहे थे। रोज ही कहीं-न-कहीं डिनर होता और प्रतीक अपने मनपसंद कपड़े पहनाकर ले जाता। कहीं उसे प्रशंसा की दृष्टि से देखा जाता तो कहीं व्यंग्यात्मक दृष्टि से एक-दो परिवारों में जहाँ उसे पता चलता कि वहाँ बुर्जुग माता-पिता भी हैं, वह जिद्द कर साड़ी पहनकर ही गई। और पूरी पारंपरिक सज्जा से गई। लोगों ने बहुत प्रशंसा की।

यदा-कदा रिश्तेदारों के घर या पूजा-पाठ में अपनी प्रिय पोशाक ही पहनती, साथ ही मैचिंग ज्वैलरी चूड़ियों से सज-धजकर वह जाती तो नई नवेली मुग्‍धा दुलहन लगती।

पर अपनी प्रिय साड़ी के ननद के हाथों जाने का उसे बहुत दुःख है। उसने कई बार प्रतीक को बताना चाहा कि हर जगह वेस्टर्न ड्रेस नहीं चलती है। “कहो तो मैं जींस व कुरती ही पहना करूँ, पर शार्ट्स अच्छी नहीं लगती, छोटी भिड़ी भी अच्छी नहीं लगती।”

एक दिन प्रतीक बहुत खुश होकर आया—

“मेरी जान, हमारी कंपनी का फैशन शो है, रैंप पर चलना है, तुम्हारी जैसी सुंदरी का नाम दे आया हूँ।”

“अरे नहीं, नहीं, मैं नहीं जाऊँगी, तुम्हारी कंपनी में तो कितनी सुंदर अवविवाहित लड़कियाँ हैं, मैं कहाँ हूँ।”

“क्यों नहीं हो!” प्रतीक ने उसे आलिंगनबद्ध करते हुए कहा।

“मैंने पेरिस के एक स्टोर से लाल रंग का गाउन भी मँगवाया है। पिछली बार टूर पर गया था, देखकर आया था। वही पहनोगी।”

रिया पति का उत्साह देखकर स्वयं भी उत्साहित हो गई। रोज कैट वॉक की प्रैक्टिस करती। एक दिन वह गाउन भी आएगा। खूबसूरत पीस जिस पर लाल सतह पर मोती जड़े थे। साथ ही मोतियों की ज्वैलरी।

शिखा देखकर अभिभूत हो गई अपने पति की पसंद पर। प्लास्टिक लपेटकर टाँग दिया गया। परंतु रिया ने तो कुछ और सोच रखा था, उसने भी अपने मन में एक निर्णय लिया।

कंपनी के प्रोग्राम की तैयारी जोर-शोर से थी, कोई विदेशी कंपनी के साथ लांच हो रहा था। अनेक प्रोग्राम थे, डिनर था व गहमा-गहमी थी।

प्रोग्राम से एक दिन पूर्व रात्रि में देर ग्यारह बजे घंटी बजी—

“कौन होगा,” कहते हुए प्रतीक ने होल से देखा। दरवाजा खोला तो रिया के भाई साहब रोहन थे।

“अरे भय्या आप, सरप्राइज, फोन तो किया होता।”

“अच्छा हुआ भय्या! आप आए, कल कंपनी का एनुअल फंक्‍शन है, आपकी बहन भी भाग ले रही है। मैं कल्चरल कमेटी का इनचार्ज हूँ। कल देखिएगा। आपकी बहन ही जीतेगी।”

“हाँ, वो तो है।” रोहन ने कहा।

दूसरे दिन प्रतीक दोपहर को ही चला गया, रिया को तरह-तरह के निर्देश देकर। “पीछे के दरवाजे से ग्रीन रूम में चली जाना। देर मत करना। भय्या आप यह कार्ड लेकर हॉल में आ जाइएगा, मैं मिल जाऊँगा।” रिया का दिल धक-धक कर रहा था, वह थोड़ी नर्वस भी थी। रोहन ने सांत्वना दी।

शाम हुई, प्रोग्राम आरंभ हो गए, रोहन और प्रतीक पास-पास बैठे थे। फैशन शो आरंभ हुआ, मद्धिम-मद्धिम संगीत और स्टेज पर प्रकाश एक के बाद एक सुंदरियाँ आती गईं। प्रतीक की निगाहें तो बस रिया पर थीं। रिया का नाम एनाउंस हुआ। प्रतीक के माथे पर पसीने की बूँदें थीं। वह भी नर्वस था, रिया कैट वॉक करती रैंप पर आई, पर यह क्या? रिया ने काली  रुपहली साड़ी पहनी थी। कोहनी तक बाँह का बैकलेस ब्लाउज, कानों में बड़े-बड़े हीरे के कर्णफूल तथा लंबे घने बालों का ऊँचा जूड़ा और गले में झिलमिलाता हीरे का हार।

हॉल तालियों से गड़गड़ा गया। ‘वन्स मोर’ के नारे से हॉल गूँज उठा।

प्रतीक का मुँह खुला का खुला रह गया। रोहन ने कनखियों से प्रतीक को देखा—

“क्या समझते हो मियाँ, तुम पेरिस से मँगवा सकते हो तो क्या वह चंदेरी से साड़ी नहीं मँगवा सकती।

प्रथम पुरस्कार रिया ने ही जीता

जीत भारतीयता की ही हुई।

ई-११५, सेक्टर-५२

नोएडा (उ.प्र.)

दूरभाष : ९१३६१११९९९

—मंजु मधुकर

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