वसंत को बुलाओ...

भारत में वसंत ऋतु का क्या महत्त्व है, इसे समझाने के लिए भगवान् श्रीकृष्‍ण का एक वाक्य ही पर्याप्त है, जिसमें वे कहते हैं, 'मैं ऋतुओं में वसंत हूँ।' संस्कृत साहित्य हो या भारतीय भाषाओं का साहित्य, वसंत ऋतु के वर्णन में कवियों ने लेखनी का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। कालिदास का वसंत हो, टैगोर का वसंत, निराला या सुभद्राकुमारी चौहान का वसंत या अज्ञेय या नागार्जुन का वसंत! हर वसंत की अपनी अनूठी छटा है, अनूठी भंगिमाएँ हैं।

वही वसंत, जो प्रकृति के नवजीवन का प्रतीक है और मानव जीवन के लिए नवनिर्माण का! वही वसंत, जिसमें रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं, जिन पर रंग-बिरंगी तितलियाँ मँडराती हैं, आमों पर बौर आता है, सरसों के पीले फूल अद्भुत दृश्य उत्पन्न करते हैं। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि महानगरों में, नगरों में या नगर बनने को आतुर कस्बों में कैसे फूल, कैसी तितलियाँ, कैसे सरसों के फूल या सीधे-सीधे कहें कैसा वसंत!

हम सबको विचार करने की गंभीर आवश्यकता है कि कुछ दशकों पहले ही जो वसंत इतने उल्लास, इतनी उमंग, इतने हर्ष के साथ देवालयों, विद्यालयों, गाँव-गाँव, घर-घर मनाया जाता था, उसके प्रति इतनी उदासीनता कैसे आ गई?

वसंत की मस्ती, वसंत की मादकता कहाँ खो गई! बंगाल, ओड़िशा, बिहार आदि कुछ प्रदेशों में सरस्वती पूजन के सांस्कृतिक समारोहों को छोड़ दें तो वसंत के वैभव को देख पाना, महसूस कर पाना कठिन हो गया है। यह भी कहा जा सकता है कि वसंत प्रकृति से जुड़ा पर्व है और जब हमारा प्रकृति से साहचर्य, सामीप्य निरंतर क्षीण होता गया है, सबकुछ मशीनी, यांत्रिक होता गया है, तब वसंत का उल्लास कैसे नजर आए!

विचारणीय यह भी है कि क्या वसंत का हर्षोल्लास से या बड़े पैमाने पर न मनाया जाना ही चिंता का विषय है। बिल्कुल नहीं।

हमारे समय और समाज से जुड़े अनेकानेक गंभीर प्रश्न हैं, जो हम सबसे जवाब माँगते हैं! इन प्रश्नों को हम सब गंभीरता से सोचें।

वसंत का संबंध सरस्वती पूजा से है, अर्थात् ज्ञान की प्रतिष्ठा, ज्ञान की महत्ता, ज्ञान की शक्ति! हमारे मनीषियों ने कहा, ‘स्वदेशे पूज्यते राजा, विद्वान् सर्वत्र पूज्यते’ अर्थात् विद्वान् का महत्त्व राजा से बढ़कर बताया गया। उसी देश में आज कुछ निहित स्वार्थों द्वारा जानबूझकर ‘अज्ञान’ फैलाया जा रहा है। तरह-तरह के झूठ फैलाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया  के वरदान को अभिशाप में बदला जा रहा है। हमारे पढ़े-लिखे ज्ञानी भी अकसर सनसनी भरे झूठ को बिना सोचे-समझे आगे बढ़ा देते हैं और अज्ञान के प्रसार में सहायक बन जाते हैं। शास्‍त्रार्थ वाले देश में जहाँ किसी गंभीर विषय पर लंबी सार्वजनिक बहसें हुआ करती थीं, वहीं यदि कोई विपरीत विचार रखता है तो गाली-गलौज, आक्षेप, आरोप का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है। ‘ट्रोल’ नामक शब्द ने अपनी गहरी उपस्थिति दर्ज कर ली है। हमारे चैनल आजादी के ७५ वर्ष पूरे करने जा रहे देश के विकासशील देश से विकसित देश बनने की यात्रा में भागीदार बनने की बजाय निरर्थक विषयों में दर्शकों को उलझाए रखते हैं। गरीबी, भुखमरी, बेकारी, बीमारी, विषमता, भेदभाव, शोषण, दमन, अन्याय, अत्याचार जैसे अनेक गंभीर विषय हाशिए पर चले जाते हैं। सरकारों द्वारा चलाई जा रही अनेकानेक योजनाओं तथा उनसे बदल रहे जीवन या तरह-तरह की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ आ‌दि भी दर्शकों तक नहीं पहुँच पातीं।

वसंत होली के त्योहार की आहट लेकर आता है। ऐसा त्योहार, जो सबको प्रेम के रंग में रँग देता है। अमीर, गरीब, ऊँच-नीच के भेद मिट जाते हैं। बस्ती के लोग घर-घर जाकर एक-दूसरे को होली की बधाई देते थे, अब व्हाट्सएप संदेश से काम निकाल लिया जाता है।

दरअसल वसंत एक विराट् प्रतीक है, जो भारत को, भारतीय संस्कृति को, भारतीय जीवन को, प्रेरणा का अथाह स्रोत बनकर बहुत कुछ दे सकता है, विशेषकर ऐसे वातावरण में, जब समाचार हमें भयभीत कर देते हैं, मनुष्यता पर हमारा भरोसा डिगाने लगते हैं।

वसंत हमें कितने ही संदेश देता है। शीत ऋतु के आतंक से मुक्ति पाकर, डरी-ठिठकी ‘जिंदगी’ फिर से नई सक्रियता का, स्वतंत्रता का आनंद महसूस करती है। वसंत संदेश देता है प्रकृति के स्वर-से-स्वर मिलाने का! वसंत संदेश देता है नई उमंग, नए उल्लास का! वसंत संदेश देता है त्याग का, उत्सर्ग का, जीवन की सार्थकता का!

वसंत संदेश देता है सरस्वती पूजा की सार्थकता को जीवन में उतारने का, अर्थात् ज्ञान की साधना का, बिना बहके हुए, बिना उन्‍माद का शिकार हुए, बुद्धि एवं विवेक से अच्छाई-बुराई का विश्लेषण करने का! संकुचित सोच से छुटकारा पाकर उदार सोच को अपनाने का!

तो आइए, हम सब मिलकर उसी ‘वसंत’ को पुकारें, जो हमारे जीवन में आनंद का अनुपम भंडार लेकर आया करता था! वसंत के हर संदेश को अपने जीवन में उतारें। अपने जीवन को अनेक निराशाओं, नकारात्मकताओं से निकालकर अपनी प्रतिभाओं, क्षमताओं को पहचानने का प्रयास करें तथा उसे स्वयं के लिए, परिवार के लिए, समाज के लिए सार्थक बनाने में जुटें।

विश्व पटल पर हिंदी-लेखन

बात है १९८९ की। प्रख्यात कथाकार हिमांशु जोशीजी से साहित्यिक चर्चाओं के दौरान, जब वे विदेशों में बसे उन भारतीयों की बात करते थे, जो हिंदी में रचनाकर्म कर रहे हैं तो बड़ी सुखद अनुभूति होती थी। ऐसे देश में रहकर न हिंदी में बोलना संभव हो, न हिंदी में पढ़ पाना। संचार-साधन इतने विकसित नहीं थे। भारत से पत्र-पत्रिकाओं या पुस्तकों का पहुँचना भी बहुत आसान नहीं था। जो रचनाकार हिंदी में लेखन करते भी थे, उनका भारत में छपना भी कठिन होता था। एक समय था, जब साहित्य का केंद्र इलाहाबाद हुआ करता था, जो कालांतर में दिल्ली हो गया। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के वरदान-स्वरूप इंटरनेट आया और एक क्रांति हो गई। अपनी रचनाओं के प्रकाशन के लिए संपादक के रहमोकरम पर निर्भरता या महीनों की प्रतीक्षा समाप्त हो गई। इस इंटरनेट क्रांति का सबसे बड़ा लाभ मिला भारत से बाहर रह रहे रचनाकारों को। अब वे, भारत में जो कुछ लिखा जा रहा है, पढ़ सकते हैं, भारत की समस्त पत्र-पत्रिकाओं की सामग्री देख सकते हैं, साथ ही अपना लिखा भारतीयों अथवा पूरे विश्व से साझा कर सकते हैं। तरह-तरह की इ-पत्रिकाएँ विश्व भर के रचनाकारों को अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान करने लगीं। कितने ही लेखकों ने अपने निजी ‘ब्लॉग’ बना लिये। इ-मेल से रचनाएँ भेजना सुगम हो गया। फेसबुक तथा व्हाट्सएप आने के बाद तो परिदृश्य और भी सुखद हो गया। अनेक देशों में हिंदी सेवी अनेकानेक कठिनाइयों, बाधाओं से जूझते हुए हिंदी को उस देश के युवाओं तक पहुँचाने के प्रयास में लगे रहे अथवा वहाँ के रचनाकारों के लिए जो कार्य करते रहे, उसमें नए पंख लग गए। पिछले दिनों ‘विश्व हिंदी दिवस’ जिस व्यापकता और उल्लास के साथ मनाया गया, उसने आशा का नया उजाला फैला है। विश्व भर के दूतावासों में जो कार्यक्रम हुए, उनका अपना महत्त्व है, किंतु दुनिया भर के कई दर्जन देशों में हिंदी-सेवियों तथा हिंदी के रचनाकारों ने जो सैकड़ा आयोजन किए, उनसे बड़ी आश्वस्ति मिलती है। कहाँ तो ३०-३५ वर्ष पहले किसी देश में हिंदी में लिख रहे कुछ लेखकों के नाम सुनकर मन प्रसन्न होता था और अब ‘कुछ’ नहीं, सैकड़ा रचनाकार! और ये रचनाकार शौकिया तुकबंदी नहीं कर रहे, वरन् स्तरीय एवं सार्थक लेखन कर रहे हैं। कनाडा से कुछ दिनों पहले दो संग्रह आए, जिसमें कनाडा के २१ रचनाकार हैं तथा एक कविता-संग्रह‌, जिसमें कनाडा के ४१ रचनाकार हैं। यह भी सुखद है कि ये दोनों संग्रह निःशुल्क उपलब्‍ध हैं। ऑस्ट्रेलिया के हिंदी कवियों के कई साझा संग्रह तथा निजी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि इन रचनाकारों में अधिकांश डॉक्टर, इंजीनियर आदि हैं।

पिछले दिनों ‘विश्वरंग’ नाम से एक विराट् आयोजन हुआ, जिसमें ४० से अधिक देशों के सैकड़ा प्रवासी भारतीयों ने भागीदारी की। इस आयोजन में साहित्य, संगीत, कला, संस्कृति आदि सभी का समावेश किया गया। अनेक विचार-विमर्श के कार्यक्रम हुए तो दुनिया भर के देशों के प्रवासी भारतीयों की रचनात्मक ‌प्रतिभा को ‌अभिव्यक्ति के अवसर मिले। आज अमेरिका में कितनी ही संस्‍थाएँ हिंदी के प्रचार-प्रसार में पूरे समर्पण के साथ लगी हैं। इसी प्रकार नीदरलैंड हो या सिंगापुर, कनाडा हो या ऑस्ट्रेलिया, नॉर्वे हो या स्वीडन, हिंदी अपने पंख फैलाती जा रही है। यह भी सुखद है कि त्रिनिदाद, सूरीनाम, फीजी, मॉरीशस जैसे देश, जहाँ भारतवंशी बड़ी संख्या में भी हैं तथा उच्च पदों पर प्रतिष्ठित हैं, हिंदी अपने बदले हुए स्वरूप में राष्ट्रभाषा के आसन पर भी विराजमान है, जो भारत के लिए दूरगामी स्वप्न बना हुआ है। साहित्य-सृजन के अलावा प्रवासी भारतीय अनेकानेक रूप में हिंदी को समृद्ध एवं संपन्न भाषा बनाने में लगे हुए हैं।

न्यूजीलैंड से एक हिंदीसेवी भारत एवं भारतीय संस्कृति के विविध पहलुओं की जानकारी देने के लिए ‘भारतदर्शन’ नाम का एक उत्कृष्ट ‘पोर्टल’ चला रहे हैं। यहाँ आपको भारत के स्वाधीनता सेनानियों से लेकर महापुरुषों, महान् संतों, विचारकों, साहित्यकारों आदि के साथ भारत के पर्यटन स्‍थलों आदि की जानकारियाँ मिल जाएँगी।

कुछ व्हाट्सएप समूह हैं, जहाँ दुनिया के ५० देशों के सैकड़ों रचनाकार हिंदी सेवी जुड़े हुए हैं। विचारों का आदान-प्रदान, रचनाओं का आदान-प्रदान, वह भी इतनी त्वरित गति से, कितना सुखद है और हिंदी की प्रगति के लिए महत्त्वपूर्ण। यहीं यह भी विचारणीय है कि ऑस्ट्रेलिया के एक विश्वविद्यालय में हिंदी के अध्यापन का विभाग बंद होने की खबर आई तथा उसे बचाने के लिए आवाजें उठीं; इसी प्रकार कोरिया में भी एक विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग बंद करने की खबर आई।

विश्वभर में हिंदी-सेवियों की सक्रियता हमें नई ऊर्जा देती है, हिंदी के सुखद भविष्य का संकेत देती है, वहीं हमें अपना घर भी देखना होगा। दिल्ली के द्वारका में एशिया के सबसे बड़े मॉल में से एक दावा करनेवाले मॉल में सारी मंजिलें घूम आइए, आपको हिंदी का आधा अक्षर भी ढूँढ़ने से नहीं मिलेगा। द्वारका या गुरुग्राम के बड़े-बड़े मॉल हों या कहीं और के। अब इस मानसिकता को क्या कहेंगे? तो विश्वभर में हिंदी के फैलाव पर खुश होने के साथ-साथ हमें अपने घर, यानी अपने देश, अपने प्रदेश, अपने नगर में हिंदी की ‌स्थिति पर विचार करना होगा तथा मूकदर्शक बनने की बजाय कुछ सार्थक कदम भी उठाने होंगे। हाँ, विश्वभर के देशों में सक्रिय हिंदी-सेवियों की निष्ठा, समर्पण, परिश्रम एवं लगन को हृदय से नमन!


(लक्ष्मी शंकर वाजपेयी)

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