मलेशिया की धरती पर पहला कदम

मलेशिया की धरती पर पहला कदम

सुपरिचित लेखक। कहानी, गजल, हाइकु, यात्रा-वृत्तांत, साक्षात्कार एवं बाल-साहित्य की बीस कृतियाँ प्रकाशित। विभ‌िन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ तथा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, परंपरा, किताबघर प्रकाशन, प्रेस्टिज संस्थान समेत कई संस्थानों से सम्मानित। उत्तर प्रदेश वाणिज्य-कर विभाग से एड‌िश्नल कमिश्नर के पद से सेवानिवृत्त।

 

कितने पर्वत, कितने जंगल, सिंधु का विस्तार कितना,

जिंदगी जीने की खातिर है बड़ा संसार कितना!

३७७ सीटोंवाले विमान से यह हमारी पहली यात्रा थी। गेट खुलने से पहले विमान यात्रियों की हचलच से भर गया। ऐसे लग रहा था, जैसे किसी हॉल में पिक्चर का शो छूटा हो या किसी जनवासे में बैठे सारे लोग एक साथ उठ खड़े हुए हों।

कुछेक मिनट की प्रतीक्षा के बाद विमान का गेट खुला तो यात्री बाहर जाने के लिए उत्सुक दिखाई पड़े। हम तीनों भी कतार में थे। कुछ मिनटों में ही हम हवाई अड्डे के बेहद लंबे गलियारे के मुहाने पर थे। वहाँ से ऊपर-नीचे आधे कि.मी. की थकाऊ पद-यात्रा के बाद भूतल पर हमें इमीग्रेशन हाल दिखाई दिया। सभी हवाई अड्डों की तरह यहाँ भी स्थानीय पासपोर्ट धारकों तथा विदेशी पासपोर्ट धारकों के लिए अलग-अलग काउंटर बने थे। हम यहाँ देशी से विदेशी बन चुके थे! इन काउंटरों पर हमारा पासपोर्ट, वीजा चेक होना था। हम अलग-अलग लाइनों में खड़े हो गए। मेरे कागजात नूर इज्दिहार नामक महिला चेक कर रही थी। नाम उसकी वर्दी पर लगी नेमप्लेट से मिला। कई और काउंटरों पर भी महिलाएँ ही इस कार्य के लिए तैनात थीं। कुछ सुरक्षाकर्मी भी महिलाएँ ही थीं। सभी के सिरों पर करीने से बँधे हुए स्कार्फ थे, बाकी की वेशभूशा राजकीय नियमों के अनुसार आधुनिक ही थी। बुर्का जैसी कोई वेशभूषा वहाँ दिखाई नहीं दे रही थी, न कर्मियों में और न ही पर्यटकों में।

इमीग्रेशन में १५-२० मिनट से ज्यादा का समय नहीं लगा। उसके बाद कैबिन लगेज को एक एक्स-रे मशीन से होकर गुजारा गया, सब कुछ ठीक-ठाक निकला। हम आशंकित थे कि यहाँ हमारी दवाएँ, खाने-पीने का सामान एक-एक करके चेक होगा, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। अब हमें ‘एराइवल हॉल’ से बुक किया हुआ लगेज लेना था। यह कार्य भी जल्दी ही हो गया। सामान ट्रॉली में लादकर हम लोग बाहर निकले तो सामने ही एक गहरी साँवली सी नवयुवती जो पैंट-टॉप पहने हुए थी, विशाख भट्ट के नाम का बोर्ड लिये खड़ी थी। हमने उसे हाथ हिलाकर अपनी पहचान बताई तो उसने बाहर आने का इशारा किया। फिर हमें बगल की बेंच पर बैठाकर उसने बताया कि कैब आने ही वाली है। यह युवती हमारे टूर प्रोग्राम की प्रथम मेंटर थी, जो प्रथम दृष्टया तमिल लग रही थी। मगर अंग्रेजी में ही बात कर रही थी। कोई पाँच-सात मिनट की प्रतीक्षा के बाद ही युवती ने हमें इशारे से कैब के आने का संकेत दिया। हम ट्रॉली सहित बाहर सड़क पर खड़ी गाड़ियों की ओर बढ़ चले।

हमारी कैब नौ सीटर बड़ी सी थी। सामान पीछे डिग्गी में रखवाकर हम मनपसंद सीटों पर बैठ गए। गाड़ी की अगली सीट पर ड्राइवर के साथ ही वह मेंटर युवती भी बैठ गई। कैब बड़ी तेजी से कुआलालंपुर के रास्ते पर चल पड़ी। कैब ने एकदम से ८०-९० की स्पीड पकड़ ली। इस गति पर हम हैरान थे! आगे तो कैब १०० कि.मी. से ऊपर की स्पीड पर चल रही थी। दूसरी गाड़ियाँ और कैब भी ऐसी ही स्पीड से चल रही थीं। सबसे तेज बाइकों की गति थी। वे घूँ-घूँ ऽऽऽ करके लगातार दूसरी गाड़ियों को क्रॉस कर जाती थीं। कैब का ड्राइवर भी तमिल मूल का था। भारी भरकम कद-काठी का, गहरे साँवले रंग का यह जवान दरअसल कैब का स्वामी था, जो ड्राइवर के उपलब्ध न हो पाने के कारण स्वयं कैब लेकर आ गया था।

हवाई अड्डे से निकलते ही फ्लाईओवर हमारा स्वागत करने लगते हैं। जल्दी ही हम हाईवे पर आ जाते हैं और हमारे दोनों ओर घनी हरियाली आँखों को आकर्षित करने लगती है। इन वृक्षों में पाम, कोकोनट और दीगर वृक्ष शामिल हैं। इन्हीं पेड़ों के आस-पास तमाम वनस्पतियाँ, लताएँ हरियाली को और सघन बना रही होती हैं। मौसम २५-३० डिग्री के बीच सुहावना बना हुआ था। प्रथम दृष्टया कुआलालंपुर की यह सड़क-यात्रा आकर्षक और मनभावन लग रही थी।

हवाई अड्डे से कुआलालंपुर शहर की दूरी ६० कि.मी. के लगभग है, जिसको गाड़ियाँ ४० से ६० मिनट में तय करती हैं। हाइवे पर कई सारे टोल प्लाजा हैं, लेकिन कार्ड स्वैपिंग के चलते कुछ सेकंडों में ही काम हो जाता है। टोल प्लाजा की ऐसी लेन को सहजा (sahaja) लेन के नाम से अंकित किया गया है। ‘सहजा’ यानी हिंदी का सहज’ यानी आसान! कितनी करीब है मलेशिया की यह भाषा हिंदी के।

मलेशिया में यहाँ एक्सप्रेस-वे पर लालबत्तियाँ नहीं, बल्कि फ्लाइओवर हैं, जिससे ट्रैफिक को रुकने की आवश्यकता नहीं होती है। हमारी कैब इतने सारे फ्लाईओवर से गुजर रही थी कि हम हैरान से थे! एक रास्ते में इतने सारे फ्लाईओवर! लेकिन आगे जाकर पता चलता है कि पूरा कुआलालंपुर इन्हीं फ्लाईओवरों के नीचे बसा हुआ साँस लेता है, तेजी से भागता रहता है और कभी थकता नहीं। कहा तो यह भी जाता है कि यह शहर कभी सोता नहीं।

रास्ते के दोनों तरफ बड़े पैमाने पर हाईराइज बिल्डिंंगों का निर्माण प्रगति पर था। बड़े-बड़े साइन बोर्ड यहाँ भी दिखते हैं, लेकिन उनकी ऐसी बहुतायत नहीं है कि वे यात्रियों को भटकाएँ अथवा ट्रैफिक में व्यवधान का कारण बनें। यहाँ के विज्ञापनों में भी महिलाओं का उपयोग दिखाई दे रहा था, लेकिन बहुत सीमित मात्रा में।

आगे हाईवे पर दाएँ-बाएँ छोटी पहाड़ीनुमा ऊँची जगहें, उनकी चढ़ाइयाँ और ढलानें देखने को मिलती हैं। हाइवे की तरफ की इनकी दीवारों पर गहरा प्लांटेशन किया गया है, जो मनमोहक दृश्य उपस्थित कर रहा था! आस-पास से गगनचुंबी टावर भी गुजर रही थीं, जो नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गुरुग्राम जैसा दृश्य उपस्थित कर रही थीं।

हाइवे पर कहीं ६० कि.मी. तो कहीं ९० कि.मी. गति-सीमा के साइन बोर्ड दिखाई जरूर दे रहे थे, लेकिन शायद ही कोई गाड़ी इसका अनुपालन कर रही थी। सभी वाहन अधिकतम संभव स्पीड से चलने के लिए व्यग्र दिखाई दे रहे थे! हाँ दिल्ली के चौराहों की तरह चालान काटने की जुगत में लगे ट्रैफिक कांस्टेबिल कहीं नजर नहीं आ रहे थे। स्थानीय समय के अनुसार हवाई अड्डे से हम प्रातः ८:३० के आस-पास निकले थे और एक रोमांचक सफर पूरा करके कैब ने कोई ९:३० के लगभग हमें ग्रैंड पैसिफिक होटल पर उतार दिया था।

ग्रैंड पैसिफिक एक बजट होटल था, लिहाजा यहाँ बाहरी सजधज बहुत ज्यादा नहीं थी। एक महिला रिसेप्शन काउंटर पर खाली-खाली सी बैठी थी। हमने अपनी ‘प्रि बुकिंग’ के बारे में बताया तो उसने कंप्यूटर खँगालकर सूचित किया कि होटल का चेक इन टाइम २ बजे का है, आप उससे पहले चेक-इन करना चाहते हैं तो ५० रिंगिट प्रति कमरा अलग से खर्च करना पड़ेगा। हमने सोच-विचारकर एक कमरे में ‘प्रि चेक-इन’ कर लिया। यह कमरा ५२६ नंबर का था, जहाँ की खिड़की से पेट्रोनास ट्विन टावर साफ दिखाई दे रहा था। हमारे पास केवल एक घंटे का टाइम था, पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हमें १०:३० बजे ‘एक्वेरिया’ जाने के लिए नीचे ड्राइवर से मिलना था। लिहाजा हमारे पास अब फ्रेश होने और चाय पीने का ही समय शेष था।

चाय होटल में कांप्लीमेंट्री थी। उसकी सामग्री खत्म हो जाने पर दुबारा ली जा सकती थी। ज्यादातर होटलों में अब ऐसी ही व्यवस्था मिलती है।

होटल का कमरा साफ-सुथरा था। यहाँ ‘बेल सर्विस’ नहीं थी, अर्थात् हमें अपना लगेज खुद ही ले जाना था। होटल के सभी कमरों में वाई-फाई की सुविधा थी। अतः कमरे में प्रवेश करके सबसे पहले हमने अपनी कुशल-क्षेम कुसुम को बताई और उनकी कुशल-क्षेम पूछी।

पाँचवीं मंजिल पर कमरा होने से उसकी खिड़की से शहर के कई महत्त्वपूर्ण स्थान देखे जा सकते थे। पेट्रोनास ट्विन टावर तो जैसे ‘वाकिंग डिस्टैंस’ पर ही था दाईं ओर। बाईं ओर नीचे लाल सिगनल वाला चौराहा था जो बाईं ओर जाकर मेट्रो रेल लाइन के बगल कहीं खत्म हो रहा था। हर मिनट दो मिनट पर मेट्रो क्रॉस होती हुई देखी जा सकती थी।

नित्यक्रिया से निवृत्त होकर चाय की तैयारी हुई। घर से लाया हुआ नाश्ता निकालकर खाया गया और अंततः चाय पीकर ठीक १०:३० बजे हम होटल की लॉबी में थे। दरअसल इस होटल में आने की कहानी भी घुमावदार थी। यात्रा से दो दिन पूर्व विशाख ने जब कार्यक्रम के कागजों का प्रिंट आउट मुझे दिखाया तो कुआलालंपुर के होटल में चेक इन की तारीख ३ व चेक आउट की तारीख ५ अगस्त अंकित थी, जबकि ३ को तो हम दिल्ली से ही चलनेवाले थे तथा लंकावी के लिए हमारी फ्लाइट ६ अगस्त को सवेरे थी। मेरी इस आपत्ति पर विशाख ने टूर ऑपरेटर से बात की तो उसने आनन-फानन में कार्यक्रम संशोधित करते हुए हमें इस नए होटल के बाउचर उपलब्ध कराए थे। बाद में पता चला कि पहलेवाले होटल की बुकिंग फर्जी थी। यानी हम ठगे गए थे। विशाख ने तब आनन-फानन में यह वैकल्पिक व्यवस्था की थी!

आजकल आनलाइन ठगी के इतने मामले सामने आ रहे हैं कि हैरान रह जाना पड़ता है। अपने देश में ही नहीं, हर देश में साइबर अपराधों का गोरखधंधा बहुत तेजी से फैला है। अभी मार्च २०१९ में ही थाईलैंड से वाराणसी की यात्रा पर आए २६ पर्यटकों के पूरे दल के वीजा और वापसी टिकट फर्जी पाए जाने की खबर अखबारों में थी! और तो और इन अपराधों के शिकार दूसरे देशों के नागरिक भी हो रहे हैं। नोएडा में तो कई सारे फर्जी कॉल सेंटर भी पकड़े गए हैं, जिन्होंने अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन जैसे देशों के नागरिकों को भी ठगने में कोई संकोच नहीं किया है। ऐसा नहीं कि ये साइबर अपराधी पकड़े नहीं जा रहे हैं, लेकिन स्थिति तू डाल-डाल मैं पात-पात वाली बनी हुई है।

अबकी टूर आपरेटर की एक दूसरी उतनी ही बड़ी कैब हमारे लिए आई थी, लेकिन ड्राइवर एक भारी भरकम डील-डौल वाला और कुछ-कुछ भयानक सा दिखाई देनेवाला दूसरा तमिल था। लिहाजा इस ड्राइवर से भी बात करना सहज नहीं था। सुबह जिस कैब मालिक ने हमें होटल पहुँचाया था, उससे हमने जब हाइवे के किनारे के बागानों के बारे में जानकारी ली तो उसने उन्हें कोकोनट के बागान बता दिए थे, जबकि उनकी ऊँचाई इतनी कम थी कि वे कहीं से कोकोनट के बागान नहीं लग रहे थे। दरअसल वे पाम के बागान थे और मलेशिया पाम ऑयल का एक बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश है।

मलेशिया के सबसे बड़े शहर और वहाँ की राजधानी कुआलालंपुर का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। मूल रूप से सेलंगोर राज्य की राजधानी रहे कुआलालंपुर का उदय उन्नीसवीं सदी के मध्य में तब हुआ, जब यहाँ टिन धातु के खनन के उद्योग लगने शुरू हुए। गोंबक एवं क्लैंग नदियों के संगम पर बसे कुआलालंपुर की स्थापना १८५७ में हुई, जिसका अंग्रेजी में शाब्दिक अर्थ कीचड़वाला संगम होता है। जंगलों से भरे क्लैंग घाटी के ऐम्पांग इलाके में चीने से आए स्वर्ण धातु की खुदाई करनेवालों ने तत्कालीन सेलंगोर शासकों के लिए बड़ी चुनौतियों के बीच टिन की खदानें बनाईं। इसके साथ ही टिन की खरीद-फरोख्त करनेवाले व्यापारियों का यहाँ आना-जाना शुरू हो गया। इस खरीद-फरोख्त के लिए कुआलालंपुर एक सुविधाजनक केंद्र के रूप में धीरे-धीरे आकार लेने लगा। बहुत सारे चीनी यहाँ बसने लगे, मलयों के साथ-साथ भारतीय व्यापारी और दूसरे भारतीय मुस्लिम भी यहाँ आकर बस गए।

उन्नीसवीं सदी के सातवें-आठवें दशक में कुआलालंपुर ने ‘सेलंगोर सिविलवार’ के नाम से एक गृृहयुद्ध भी झेला। ऐसा चीनियों के कुआलालंपुर पर बढ़ते प्रभुत्व व सेलंगोर के शाही शासन के आपसी हितों के टकराव के कारण हुआ। यह टकराव राजनीतिक ताकत के साथ-साथ टिन की खदानों पर प्रभुत्व पाने का भी था। १८७२ तक इस गृहयुद्ध में तमाम खून-खराबा तो हुआ ही, कुआलालंपुर भी बरबाद होकर रह गया। इस संघर्ष में स्थानीय चीनी प्रमुख ‘याप अह लॉय’ की सक्रिय भागीदारी व भूमिका थी। अंततः १८७३ ई. में याप ने ही प्रायः नष्ट हो चुके कुआलालंपुर का पुनर्निर्माण करके इसे फिर से आबाद कराया।

१८७४ में सेलंगोर के सुल्तान अब्दुल समद ने ब्रिटिश रेजीडेंट को शासन चलाने के लिए अपनी सहमति दे दी और वे स्वयं सुल्तान बने रहे। तभी १८८० में कुआलालंपुर को सेलंगोर की राजधानी होने का गौरव मिला। इससे पहले राज्य की राजधानी क्लैंग थी। राजधानी के कुआलालंपुर स्थांतरण के बाद तत्कालीन ब्रिटिश रेजीडेंट विलियम ब्लूम फील्ड डगलस ने क्लैंग नदी के पश्चिमी तट पर सरकारी प्रशासनिक भवनों के निर्माण का तथा स्थानीय लोगों के निवास के लिए पूर्वी तट पर निर्माण का निश्चय किया। बाद में सरकारी कार्यालय मर्डेका
स्क्वायर स्थित सुल्तान अब्दुल समद बिल्डिंग में स्थानांतरित कर दिए गए। डगलस द्वारा शुरू किए गए निर्माण कार्य को १८८२ में नियुक्त किए गए अंग्रेज रेजीडेंट फ्रैंक स्वीटेन हैम ने तीव्रगति से अमल में लाते हुए एक बड़े शहरी केंद्र के रूप में कुआलालंपुर को विकसित करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। फ्रैंक के समय में ही १८८६ में कुआलालंपुर में पहली रेल-सेवा क्लैंग से कुआलालंपुर के बीच में शुरू हुई।

सन् १८९० तक कुआलालंपुर की आबादी २००० पहुँच गई थी। वह १८९५ का वही वर्ष था जब मलय राज्यों ने मिलकर फेडरेटेड मलय स्टेट का गठन किया। जब १८९६ में स्वेटन हैम एक बार पुनः रेजीडेंट जनरल होकर आए तो कुआलालंपुर को इस नए संघ की राजधानी बनाया गया। जो स्टेट इस संघ में शामिल रहे, वे थे—सेलंगोर, पेराक, नेगेरी सेंबिलान और पहांग। स्वेटेन हैम यहाँ १९०१ तक रेजीडेंट जनरल रहे।

मौजूदा कुआलालंपुर एक संघीय क्षेत्र है। १ फरवरी, १९७४ को उसे यह दर्जा सेलंगोर राज्य से अलग करके दिया गया। इसकी आबादी २०१० के अनुमानों के अनुसार १५.९० लाख थी, जो २०१६ में बहुत धीमी गति से बढ़कर १७.३० लाख पहुँची। २४३ वर्ग कि.मी. के क्षेत्र में फैला कुआलालंपुर शहर मलेशिया का सांस्कृतिक, आर्थिक और वित्तीय केंद्र भी है। मलेशियाई पार्लियामेंट और मलेशियाई सम्राट् के निवास इसी शहर में हैं। बाद में १९५७ में जब मलेशिया को अंग्रेजों की दासता से मुक्ति मिली, तब भी कुआलालंपुर का राजधानी वाला रुतबा यथावत् कायम रहा। मौजूदा समय में प्रशासनिक सुविधा को ध्यान में रखकर कुछ संघीय मंत्रालयों के कामकाज कुआलालंपुर के दक्षिण में २५ कि.मी. दूरी पर स्थित शहर ‘पुत्राजया’ नामक नए संघीय क्षेत्र में स्थानांतरित कर दिए गए हैं।

भारत की तुलना में काफी छोटा होने के बावजूद मात्र तीन करोड़ की आबादी वाले मलेशिया ने कुआलालंपुर में १९९८ के कॉमनवेल्थ खेलों तथा २०१७ के दक्षिण पूर्व रशियाई खेलों की मेजबानी भी की, जिससे इसकी धाक पूरी दुनिया में जम गई। इसका परिणाम रहा कि मास रैपिड ट्रांजिट, लाइटमेट्रो, बस रैपिड ट्रांजिट, मोनोरेल, कंप्यूटर रेल तथा एयरपोर्ट रेल लिंक जैसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था से लैस कुआलालंपुर २०१७ में विश्व के १० सबसे लोकप्रिय शहरों में शामिल रहा है। दुनिया के दस सबसे बड़े शॉपिंग मॉल में से तीन यहीं स्थित हैं।

कुआलालंपुर के प्रमुख पर्यटक आकर्षणों में दुनिया की सबसे ऊँची (४५२ मीटर) जुड़वाँ टावर पेट्रोनास ट्विन टावर, विश्व की सातवीं सबसे ऊँची (२७६ मीटर) संचार टावर—के.एल. टावर, ६०,००० वर्ग फुट में फैला विशाल मछली घर—एक्वेरिया, मलेशिया की आजादी का गवाह ऐतिहासिक मर्डेका/इंडिपेंडेंस स्क्वायर, दक्षिण भारतीय मुरुगन मंदिरवाली ४० करोड़ वर्ष पुरानी बाटू केव्स तथा विशालकाय स्वर्णिम आभायुक्त विश्व की सबसे ऊँची (४२.७ मीटर) मुरुगन प्रतिमा, चायना टाउन तथा भारतीयों की बहुलता वाला इंडिया ब्रिकफील्ड आदि शामिल हैं। पेट्रोनास ट्विन टावर में शाहरुख खान अभिनीत ‘डान-२’ फिल्म के कुछ महत्त्वपूर्ण दृश्य फिल्माए गए थे।

मलय, चीनी, भारतीय, बौद्ध, ईसाई, सिख आदि कई समुदायों की मिली-जुली आबादीवाला कुआलालंपुर अपने इंफ्रास्ट्रक्चर, अपनी स्वतंत्र और आधुनिक जीवनशैली तथा अपनी आर्थिक और व्यावसायिक सक्रियता के चलते आज दुनियभर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। स्वतंत्रता के संदर्भ में प्रयोग किया जानेवाला शब्द ‘मर्डेका’ यहाँ के जनजीवन में पूरी तरह व्याप्त देखा जा सकता है।

 

गोविंदम्, १५१२, कारनेशन-२

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—कमलेश भट्ट कमल

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