चमचों की दुकान

चमचों की दुकान

सुपरिचित रचनाकार। काव्य-संग्रह ‘मन पखेरु उड़ चला फिर’ तथा पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य, कविता, कहानियाँ आदि प्रकाशित। अनेक कवि-सम्मेलनों में काव्य-पाठ। साधना टी.वी. चैनल पर काव्य-पाठ एवं संचालन।

दुकान के बाहर लिखा था, ‘चमचों की दुकान, चमचे ही चमचे...’ बस एक चमचा ही तो चाहिए था रसोई के लिए।

मैंने कहा, “भैया एक चमचा देना जरा,” और दुकानदार ने एक खूबसूरत, चिकना व अच्छी क्वालिटी का चमचा मेरे हाथ में पकड़ा दिया और बोला, “बहनजी, यह बहुत बढ़िया चमचा है, जिंदगी भर साथ निभाएगा, आदमी परलोक चला जाए, मगर यह चमचा कहीं नहीं जाएगा, मैं गारंटी लेता हूँ।”

मैंने चमचे को हाथ में पकड़ा, सचमुच चमचा एकदम चिकना और मजबूत था, देखकर लगा, कई बरसों तक इसकी मोटी और चिकनी सतह पर चिकनाई बनी रहने वाली है। मैंने उसकी चमक में अपना चेहरा देखना चाहा और चेहरे को चमचे सा लंबा, चपटा सा देखकर कहा, “यह थोड़ा उथला है, शक्ल तक सही से नहीं दिख रही, लगता नहीं, दाल-भाजी भी सही से निकाल पाएगा।” दुकानदार मेरी बात सुनकर दूध सा उबला, मगर गुस्से को पतीले से बाहर जरा भी नहीं छलकने दिया, तुरंत एक दूसरा चमचा मेरे हाथ में पकड़ा कर बोला, “अरे बहनजी, आप इतनी खूबसूरत हैं, यह गरीब चमचा कहाँ बता पाएगा। यह दूसरा लीजिए, यह आज के जमाने का चमचा है, बिल्कुल स्मार्ट फोन की तरह, चेहरे को इतना सुंदर बनाकर दिखाएगा कि आप खुद को भी नहीं पहचान पाएँगी। यह सारे काम भी करेगा, और जब चाहेंगी, चेहरा देखना और जब मन हो रसोईघर में काम पर लगा दीजिए, फिर देखिए इसका कमाल, किस तरह सब्जी, भाजी इधर की उधर करता है।”

“शायद आज तक किसी असली चमचे से आपका पाला पड़ा नहीं।”

दुकानदार मुझे चमचापुराण सुनाने लगा और तरह-तरह के चमचों की कारगुजारियाँ। उसने बताया, कब हमने हाथ पर भरोसा करना बंद कर दिया और चमचों का दौर आया।

कैसे चमचों ने चटनी चटाई थी, चाय में शक्कर मिलाई थी, चम्मचों से खाना खाने की बदौलत ही समाज में पढ़े-लिखे होने का खिताब पाया था।

क्या आप जानते हैं, संसार में अगर चमचे न होते तो कितना नुकसान हो जाता? जिस किसी को भी चमचों की उपयोगिता नजर आई होगी, उन्होंने अपने साथ कुछ चमचे अवश्य रखे होंगे। चमचा कुछ करे न करे, गुणगान इतना कर देता है कि पतीली के भीतर ही भीतर क्या पक रहा है, जग जाहिर कर सकता है।

दुकानदार फिर बोला, “बहनजी, चमचा जिस बरतन में रहता है, पूरी तरह से खाली करके दम लेता है।” दुकानदार अच्छा सेल्समैन था, उसके हिसाब से तो एक ग्राहक को वह सब भी खरीद लेना चाहिए, जिसकी जरूरत आज नहीं तो कल पड़ सकती है।

मैंने उसकी आधी बातें अनसुनी कर दीं और चमचे को उलट-पलटकर अच्छी तरह से ठोक-बजाकर देखा, फिर चेहरा देखते हुए माथे पर लगी बिंदी भी व्यवस्थित कर ली, अचानक मेरी नजर दुकान में पड़ी चम्मचों पर गई, खूबसूरत नक्काशीदार चम्मचें लुभा रही थीं, दुकानदार तुरंत सतर्क हुआ और मेरे ना-ना करते-करते भी चम्मचों का सैट मेरे सामने रख दिया, “देखिए, यह दूध पर से मलाई निकालने वाली चम्मच है, दूध की एक बूंद भी नहीं आएगी और मलाई बाहर। और यह दूसरी मक्खन लगाने में माहिर है, दिखाई तो बड़ी देती है, लेकिन जब मक्खन किसी दूसरे की ब्रेड पर लगाती है तो बस खुशबू सुँघाकर वापस ले आती है, और यह तीसरी चम्मच तो इतनी चिकनी है कि आप खाना खाते हुए चाहे जितनी बार इसके दाँत मार दें, आपको चोट नहीं पहुँचाएगी और यह चौथी चम्मच सबसे अधिक कामयाब है, यानी कि कामयाबी की सीढ़ियाँ यही चढ़ाएगी, यह आपका उस वक्त तक गुणगान करेगी, तब तक बजती रहेगी, जब तक की आप अपने साथ रखेंगी।

और देखते ही देखते मेरे चारों तरफ चमचों और चमचियों की लाइन लग गई थी, मैंने सबकी सब थैले में डाल लीं। सच बताऊँ तो मुझे उतना ही मजा आया, जितना सब्जी के साथ धनिया, मिर्ची मुफ्त मिलने पर आया करता है, और दुकानदार भी ठीक वैसे ही मुसकराया, जिस तरह रूमाल खरीदने आई महिला को दुकानदार चद्दरें, रजाई, गद्दे खरीदवा देता है।

सच मानिए तो चमचों की कमी सबको महसूस होती है, हुनर तो हर आदमी में होते ही हैं, लेकिन अगर चमचे न हों तो आदमी के भीतर पड़े हुनर को हिलाए-डुलाएगा कौन, और कौन बाहर लाकर दुनिया को दिखाएगा? जिनके अपने खरीदे चमचे हैं, उनकी तो बात ही निराली है, मजाल जो सब्जी का कच्चापन बाहर दिखाई दे।

सच मानिए तो चमचों की कमी सबको महसूस होती है, हुनर तो हर आदमी में होते ही हैं, लेकिन अगर चमचे न हों तो आदमी के भीतर पड़े हुनर को हिलाए-डुलाएगा कौन, और कौन बाहर लाकर दुनिया को दिखाएगा? जिनके अपने खरीदे चमचे हैं, उनकी तो बात ही निराली है, मजाल जो सब्जी का कच्चापन बाहर दिखाई दे।

ऐसे ही एक कार्यक्रम में चमचारूपी जग-प्रसिद्ध कवयित्री से मुलाकात हुई, मुझे देखते ही वह टूटकर गले मिली और मक्खन लगाती बोली, “आप तो सचमुच गजब हैं गजब, मेरा मन करता है, हमेशा आपको पढ़ती रहूँ, मैं आपके जैसा बनना चाहती हूँ, आप मेरा आदर्श हैं दी।” लिहाजा कोई मुझे इतना पढ़ चुका है कि अपना आदर्श मान रहा है, और ये मुआ दी शब्द तो हम पचास साल की महिलाओं को जवान कर डालता है,... मैं प्रशंसा के समंदर में गोते लगा-लगाकर खुश हो रही थी कि वह फिर बोली, “आपको मेरे कविता-संग्रह की भूमिका लिखनी है, साथ ही मेरी मदद करनी है कि मैं कौन-कौन सी कविताएँ किताब में रख सकती हूँ। मेरी कुछ कविताओं का संशोधन भी कर देंगी आप, तो मेरी भी किताब निकल जाएगी, आप बहुत अच्छा लिखती हैं।” मैं मक्खन-मलाई में इस कदर भर गई थी कि जरा भी उठने की कोशिश करती तो फिसलकर गिरती। और कोई निकलेगा भी क्यों, कहाँ इतना सम्मान मिलता है?, सोचिए तो खुद हनुमानजी अपनी शक्तियों को भूल गए थे तो मैं कैसे जान पाती मेरे भीतर एक समीक्षक और संपादक भी पल रहा है?...

मैं उससे इस कदर प्रभावित हुई कि अपना उपन्यास भूलकर उसकी व्हाट्सपी कविताओं की पांडुलिपि को सहेजने लायक बनाने में जुट गई, किताब आई, खूब छाई, लेकिन मेरी योग्य शिष्या विमोचन के समय अपनी गुरु को ही बुलाना भूल गई।

दुकानदार की बातें याद आ रही थीं, कुछ चमचे सचमुच बरतन खाली होने तक ही बने रहते हैं। ये हुनरमंद चमचे काम पूरा होने तक ही मक्खन लगाते हैं।

यह कहना गलत तो नहीं है, नवगीत, नई कहानी, नई हिंदी लिखने वालों की चमचागिरी ने कालीदास, महादेवी और निराला सरीखे भरे-पूरे बरतनों को भी खराब करने में कसर नहीं छोड़ी है।

206/3, गली नंबर-5, पद्म नगर,
किशन गंज, दिल्ली-110007

दूरभाष : 8860596937

—सुनीता शानू

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