तीर्थ-यात्रा

तीर्थ-यात्रा

श्री राजेश कौल कश्मीरी भाषा के प्रतिष्ठित कहानीकार हैं। अब तक इनके दो कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। बहुत सी कहानियों का हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उत्कृष्ट लेखन के लिए छोटे-बड़े कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। यहाँ उनकी एक चर्चित कहानी ‘तीर्थ-यात्रा’ का हिंदी रूपांतरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

कश्मीरी-हिंदी लेखक, अनुवादक एवं फिल्मकार। मौलिक लेखन तथा अनुवाद की लगभग १५ पुस्तकें प्रकाशित। जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी द्वारा प्रथम अनुवाद पुरस्कार; लोक सेवा प्रसारण पुरस्कार; केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा हिंदीतर भाषी हिंदी लेखक पुरस्कार; उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा सौहार्द सम्मान सहित कई पुरस्कार-सम्मान प्राप्त। हिंदी में २५ टेलीफिल्म तथा एकल नाटकों का निर्माण एवं निर्देशन। संप्रति इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में सलाहकार।

 

जीवात्मा के शरीर त्यागने के पश्चात् यदि विधिपूर्वक क्रिया-कर्म हो जाए तो सूक्ष्म देह भवसागर पार हो जाती है और आत्मा मुक्ति पा जाती है। ऐसा ही मैं सुनता आया हूँ।

मेरी माँ का देहांत करीब एक महीना पहले हुआ था, परंतु हम अंतिम संस्कार करने के अलावा और कुछ नहीं कर सके थे, क्यों प्रज्ञावान कश्मीरी विधि जाननेवाले पंडितजी हमें यहाँ मिले ही नहीं। इसलिए हमने चौथे दिन तक ही मातम रखा।

दूसरे या तीसरे दिन मैंने यह निर्णय लेने से पहले अपनी पत्नी उषा से पूछा था, “क्या करें?”

“मैं क्या बताऊँ, जो ठीक लगे, कीजिए।” उसने उत्तर दिया।

“अपने ही आत्मीय कह रहे थे कि आर्य समाज की विधि से चौथे दिन का पाठ करके सबको विदा करें।”

उसके चेहरे पर कुछ मायूसी सी छा गई। खिन्न मन से उसने उत्तर दिया, “दूसरे कमरे में सभी बुजुर्गवार बैठे हैं, उनसे भी तो पूछ लीजिए।”

मैं बैठक की ओर गया। दरवाजे पर पहुँचा ही था कि फूफीजी का संवाद सुनाई दिया। वे फूफाजी से बात कर रही थीं, “अब इसमें कोई क्या कर सकता है। कब किसका बुलावा आ जाए, कोई नहीं जानता। मुझे भी किरण की शादी का बहुत चाव था। महीनों पहले मेहँदी की रात और देव-पूजा के लिए साड़ियाँ खरीद रखी हैं। कितनी चाहत थी, पर क्या करें! बेचारी अम्माँजी को भी इसी वक्त...! अब आय मर्दाना तौर पर जाना। औरतों का जाना मुनासिब नहीं होगा।”

मुझे याद आया कि हमारी नजदीकी रिश्तेदारी में बेटी की शादी होनेवाली है। इस कारण भी सभी चिंतित थे। “आगे के लिए भी सोच-विचार करना जरूरी है। लड़की की शादी है, इसलिए जाना जरूरी हो जाता है।” यह मेरी चाची चाचाजी से कह रही थीं। अब तक मैं बैठक में एक तरफ को बैठ गया था।

जब मैंने उनसे कहा क‌ि पूर्ण कश्मीरी विधि से ही क्रिया करने के लिए यहाँ पंडितजी मिलेंगे नहीं, तो जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिला। सभी मेरी तरफ उत्सुकता से देखने लगे कि मैं अब और क्या कहनेवाला हूँ!

मैंने कहा कि चौथा करना ही ठीक रहेगा, जैसा कि यहाँ होता है। सबने ठंडी साँसें भरीं, मगर कहा कुछ नहीं। उनकी चुप्पी से मेरे मन में क्षोभ भर गया। कोई तो कुछ कहता! आखिर, कुछ देर बाद फूफाजी बोल पड़े, “डू इन रोम ऐज द रोमनज डू।” ऐसे वाक्य बोलना और पश्चिमी विद्वानों के शब्दों को उद्धृत करना उनकी आदत थी। तभी फूफीजी उनके वाक्य का अनुवाद करते हुए बोलीं, “हर जगह की अपनी-अपनी प्रथा होती है। जैसा देश, वैसा भेस। अब जब कोई चारा नहीं है तो हमें ऐसा ही करना चाहिए।”

मैं समझ रहा था कि वे शादी में उपस्थित होना चाहते हैं और अपने-अपने घर भी जाना चाहते हैं, क्योंक‌ि महाशिवरात्रि आनेवाली थी।

चौथे दिन शांति-पाठ हुआ। वैसे ही जैसे होता है। पूजा-पाठ समाप्त होने के बाद सबने प्रसाद ग्रहण किया और अपने-अपने घर चले गए, बड़े उत्सव की तैयारी करने।

मैं और मेरी पत्नी उषा घर में अकेले रह गए थे। पहली बार हमें लगा कि हम इस संसार में अकेले हैं। वे जो हमारे घर में कई लोगों के समान थीं, आज वह भी हमारे पास नहीं थीं। निःशब्द लोक में हम निःशक्त पड़े थे।

उस रात से न जाने क्यों उषा की नींद उचट गई! वह अचानक जाग जाती और बिस्तर पर बैठे-बैठे न जाने क्या सोचती रहती! एक दिन मैंने पूछ ही लिया कि वह क्या सोचती रहती है? पहले तो उसने कोई उत्तर नहीं दिया; लेकिन कुछ समय बाद वह रोने लगी और व्यथित मन से बोली, “हम दूसरों की बातों में आ गए। हमें दसवें, ग्यारहवें और बारहवें दिन का क्रिया-कर्म विधिपूर्वक करना चाहिए था। हमने यह क्या किया? राजमाता से कम नहीं थीं आपकी माँ, और कैसा व्यवहार हुआ उनके साथ? किस तरह से पाला था उन्होंने सबको। कितना स्नेह देती थीं। किस-किस का उपकार नहीं किया था उन्होंने! आँखों पर बिठाती थीं सबको और आज सबके सब...?”

मेरी जैसे आबरू उतर गई हो। मगर पुरुष का अभिमान आड़े आया। मैंने कहा, “कश्मीरी ब्राह्मणजी नहीं मिले यहाँ तो क्या करता, अपने आपको आग में झोंकता क्या?”

“नहीं, असल बात तो यह है कि तुमने मन से कोशिश ही नहीं की। और फिर हम हरिद्वार भी तो जा सकते थे!” उसने मुँह फेरते हुए कहा।

“घर में सभी रिश्तेदार आए हुए थे, उन्हें क्या घर से निकाल देता!”

उसकी आँखों से आँसू छलक आए। मैं उसकी वेदना समझ गया और बोला, “तब क्यों नहीं बताया था?”

“अभी भी कौन सी देर हुई है, अब चले जाते हैं।”

“अब तो लगभग एक महीना होनेवाला है।”

“जब किसी की असामय‌िक मृत्यु होती है या किसी का मृत शरीर कई-कई दिनों तक मिलता ही नहीं है किसी दुर्घटना वगैरह की वजह से, तो क्या उनका क्रिया-कर्म ही नहीं होता है! इच्छा हो तो सब हो जाता है।”

मैं बिना किसी प्रतिक्रिया के सुनता रहा।

“इतने बड़े घर की मालकिन, बेटा इतना बड़ा अफसर और माँ के साथ ऐसा व्यवहार!” उसने निरुत्साहित और निराश होकर कहा।

मैं उसे देखता रहा और सोचता रहा कि क्या यह वही उषा है, जो मामूली सी बातों पर माँ से झगड़ा किया करती थी।

“ऐसे क्यों देख रहे हो, क्या मैं झूठ बोल रही हूँ?” मैंने उसकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया। दूसरे कमरे में गया, कंप्यूटर चलाया और हरिद्वार के लिए दो टिकटें बुक करा लीं। दूसरे दिन हम पूरी सामग्री लेकर हरिद्वार के लिए निकल पड़े।

नैसर्गिक, साधारण, किंतु असाधारण गंगा घाट। निर्मल जल के प्रवाह ने उषा का द्विभाव भी प्रवाहित किया था। वह प्रसन्न थी। हमने शांति से, बिना किसी विघ्न के दसवाँ, ग्यारहवाँ और बारहवाँ दिन अधिष्ठित को समर्पित किए। मैंने दसवें दिन सिर मुँड़वाया, वैसे ही जैसे कश्मीर में बितस्ता के घाट पर रिश्तेदारों आदि की मौजूदगी में होता था।

बारहवें दिन क्रिया-कर्म समाप्त होने के बाद हम दोनों गंगा के किनारे टहलने लगे। कहीं-कहीं कामचलाऊ दुकानों पर छ‌िट-पुट सामान बिक रहा था।

“बहनजी, लीजिए, यह शंख बहुत ही अच्छा है। आपको सस्ते में दे दूँगा।”

“बाबूजी, लीजिए, यह कुरता तो देख लीजिए, गरमियों में खूब काम आएगा। इसके साथ यह गमछा भी दे दूँगा, जिस रंग का भी ले लीजिएगा।”

सामने तिरपाल बिछाकर एक बूढ़ी औरत गंगाजल ले जाने के लिए बोतलें बेच रही थी। उषा ने कुछ सामान खरीदना शुरू किया। मैंने भी कुछ-कुछ खरीदा और हम यह सामान कंधे पर लटकते, भारी होते झोलों में ठूँसते गए। उषा ने शायद कुछ सामान यों ही, बेचनेवालों का मन रखने के लिए खरीदा था। मैं अब लौटना चहाता था, मगर उषा ने और आगे तक जाने की इच्छा जाहिर की। आगे एक विशाल वृक्ष के नीचे एक वृद्ध महात्माजी बैठे थे। उनके सामने बीस-तीस और लोग भी बैठे थे। कुछ चेले प्रवचन की तैयारी कर रहे थे। हम दूर से ही देख रहे थे, पर उषा के आग्रह पर हम भी भक्तों की भीड़ में शामिल हो गए। महात्माजी कुछ कहने लगे। उन्होंने कहा कि “सभी उपस्थित जन गंगाजी में जाकर तीन डुबकियाँ लगाएँ और पंद्रह मिनट में लौट आएँ। उसके बाद मैं अपना प्रवचन आरंभ करूँगा। पहली डुबकी तन की शुद्ध‌ि के लिए, दूसरी मन की शुद्धि और तीसरी पवित्र-दृष्टि के लिए।” मैं ऐसी बातों पर ज्यादा विश्वास नहीं करता, इसलिए अपने स्थान पर ही बैठा रहा।

उषा स्त्रियों के झुंड के साथ गई और कुछ देर बाद उनके साथ ही लौटी। मुझे अपने ही स्थान पर बैठा देखा तो आँखें तरेर लीं। उसने वही कुरता पहन रखा था, जो पटरी से खरीदा था। उसके गीले बालों से पानी की बूँदें घास पर गिर रही थीं। उषा ने गीले कपड़े थैले के एक कोने में रखते हुए मुझे कहा, “जाइए! आप क्यों नहीं गए?”

“मैं तो सुबह ही नहाया था, कितनी बार नहाऊँ? मैं लकीर का फकीर नहीं।”

“क्यों हर वक्त जिद्द करते हैं। दोबारा नहाने में कोई हर्ज नहीं!”

अपनी पत्नी की नाक रखने की गरज से मैं गंगा की ओर गया। कपड़े उतारे और डुबकी लगाई। पानी ठंडा था। शरीर सिहरने लगा, इस कारण पानी में ज्यादा समय तक रुक न सका। दूसरी डुबकी लगाई। पहले जैसा ही अनुभव था। मैंने अपना सिर पानी से बाहर निकाला। चारों तरफ नजर दौड़ाई। सबकुछ वैसा ही था। तीसरी बार जब मैं पानी के अंदर गया तो पूरे शरीर में सुरसुराहट सी हुई। फिर लगा, जैसे किसी शून्य की ओर जा रहा हूँ। क्या मैं उड़ रहा था? ऐसा ही कुछ लग रहा था। यह क्या, शरीर से जैसे दो और टाँगें जुड़ गई हों। मैं जैसे चार टाँगों पर खड़ा था। फिर कुछ और टाँगें निकल पड़ीं। निरंतर उगती हुई टाँगों ने मुझे एक बड़ी सी मकड़ी जैसा बना दिया था। अब मैं धीरे-धीरे चल रहा था, क्योंकि मेरा शरीर भारी हो गया था, मगर मेरी नजर साफ हो गई थी। सामने जो कुछ भी था, वह मुझे साफ-साफ नजर आ रहा था। मैं भयभीत हुआ और एकदम से पानी से बाहर आया। चारों तरफ नजर दौड़ाई, सबकुछ वैसा का वैसा ही था, कहीं कोई परिवर्तन नहीं। मुझे अपने स्वर्गीय पिता की बात याद आ गई कि विवाह के बाद पुरुष चौपाया बन जाता है पशु के समान। फ‌िर जब उसके बच्चे हो जाते हैं तो उसके दो और पैर निकल आते हैं। इस तरह उसके पैरों में वृद्ध‌ि होती रहती है और वह एक दिन मकड़ी सा हो जाता है, उसका प्रभाव प्राप्त करता है। वह जाल बुनता जाता है और अंततः उसी जाल में फँस जाता है।

मैं पानी से बाहर घाट के पत्थर पर बैठकर अपने आप को देखने लगा। सब ठीक था। मैं मनुष्य योनि में ही था। मैंने कपड़े पहने और वहाँ पर गया, जहाँ महात्माजी ज्ञान की बातें बता रहे थे। इतनी देर में वे क्या कुछ कह गए थे, वह तो सुन नहीं पाया था, मगर इस समय वे कह रहे थे, “कुत्ते का तन अपवित्र होता है, मगर उसका मन पवित्र होता है। और यदि बिल्ली की बात करें तो उसका मन अत्यंत अपवित्र, मगर शरीर पवित्र होता है।”

पवित्र-अपवित्र? बाल्यावस्था की घटनाएँ मानसपटल पर प्रकट होने लगीं। कुत्ता आता तो सारा घर फिर से लिप-पुत जाता। बिल्ली आती तो...। तब भी माँ प्रवचन पर ले जाती थीं। उन दिनों की कई सुनी हुई बातें, जो समझ से परे थीं—तीन ऋण, धन, अन्न, दान, संकल्प, आत्मा, दर्शन, मीमांसा। उषा ने कुहनी मार दी, “कहाँ खोए हैं? सुन भी रहे हो न कि स्वामीजी क्या कह रहे हैं?”

“हाँ-हाँ!” मैं स्वामीजी को फिर से सुनने लगा। वे कह रहे थे—

“तो मैं जो यह सारी बातें समझा रहा था कि कुत्ते का मन पवित्र और तन अपवित्र तथा बिल्ली का मन अपवित्र और...”

“तन पवित्र होता है।” कुछ उपस्थित लोगों ने कहा।

मेरे मन में भी एक प्रश्न मुझे झकझोर रहा था। मेरा चित्त अशांत था। एक पिशाचक की तरह मेरा प्रश्न मुझे परेशान कर रहा था। मैंने हिम्मत करके महात्माजी से पूछा, “स्वामीजी! इनसान को...?”

उन्होंने मेरी तरफ देखा। आँखों में न स्नेह था, न गुस्सा। उनकी मनःस्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल था। चारों तरफ खामोशी छा गई। प्रवचन सभा में बैठे सभी स्त्री-पुरुष मेरी तरफ घूर-घूर के देख रहे थे, जैसे मैंने कोई अपराध किया हो। स्वामीजी ने आँखें बंद कर लीं और ध्यान लगाया। संध्या समय तक वे ध्यानस्थ ही थे। कुछ लोग निकलने लगे थे। उषा अभी भी बैठे रहना चाहती थी, मगर मैंने उसे चलने को कहा। न चाहते हुए भी वह मेरे साथ होटल की तरफ चलने लगी। कुछ ही देर में हम ‘इष्टसिद्धि लॉज’ में पहुँच गए, मगर मैं तब से ही अपने प्रश्न के उत्तर की प्रतीक्षा में भटक रहा हूँ।

१६९-बी, पॉकेट-ए

जी-१, विकासपुरी

नई दिल्ली-११००१८

 

—मूल : राजेश कौल

—अनुवाद : गौरशंकर रैणा

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