नया वर्ष, नई सोच

ऐसा प्रायः हर वर्ष ही होता रहा है। किसी भी जाते हुए वर्ष को हमने अपनी अनेक दुर्घटनाओं, परेशानियों, कमियों के लिए दोषी ठहरा दिया तथा सारी आशाएँ आनेवाले नए वर्ष पर केंद्रित कर दीं, जैसेकि नया वर्ष कोई सर्वशक्तिमान देवता है, जो हर किसी की हर इच्छा पूरी कर देगा! जो भी परिवर्तन होना है, वह तो लोगों के संकल्पों, कठिन श्रम तथा समर्पण से ही होना है, बेचारा नया वर्ष क्या कर लेगा, किंतु किसी बहाने एक अवसर तो होता ही है, नए सिरे से अपने लिए, समाज के लिए, देश के लिए सोचने का, अपने भीतर झाँकने, अपनी क्षमताओं के आकलन का और स्वयं को नई सोच, नए इरादों के साथ एक नई कार्यप्रणाली से नए संकल्पों को पूरा करने का।

२०२१ पूरी दुनिया के लिए नई आशाएँ लेकर आ गया है क्योंकि २०२० मानव सभ्यता के इतिहास में एक भयानक वर्ष रहा है। प्रख्यात ‘टाइम’ मैगजीन ने २०२० पर लाल क्रॉस बनाकर अपने आवरण पृष्ठ पर इसे सबसे बुरा वर्ष घोषित किया है। पूरी दुनिया की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि हम सब एक सामान्य जीवन की ओर लौटें। लोग एक-दूसरे से मिल-जुल सकें, परिवार एकजुट हों, पर्यटन-स्थलों पर रौनक लौटे, समारोहों, उत्सवों की धूमधाम फिर से वापस आए और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय सामान्य पढ़ाई प्रारंभ कर सकें। अभी भी जो डर हर ओर पसरा हुआ है, उससे मुक्ति मिले। विडंबना देखिए कि जहाँ से कोरोना पूरे विश्व में फैला, चीन के उस वुहान शहर में सामान्य जीवन की रौनकें पूरी तरह वापस आ चुकी हैं; हालाँकि विशेषज्ञों का कहना है कि अब ‘मास्क’, ‘भौतिक दूरी’ तथा ‘नियमित हाथ धोते रहना’ हमें अपने सामान्य जीवन का अनिवार्य हिस्सा बना लेना चाहिए। वैक्सीन आ चुकी है और वैक्सीन के बाद जीवन कितना सामान्य हो सकेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है!

हम भारतवासी भी हर वर्ष ३१ दिसंबर की रात इस ‘आयातित’ नववर्ष के स्वागत में कोई कमी नहीं छोड़ते! नए वर्ष की शुभकामनाओं के माध्यम से अनेकानेक पुराने मित्रों, परिचितों, शुभच‌िंतकों की यादें ताजा हो जाती है; संबंधों में एक नई ताजगी का संचार हो जाता है, जो सुखद है! जैसाकि परंपरा है, लोग नए संकल्प लेते हैं। ये संकल्प आम लोगों के लिए प्रायः निजी जीवन में से संबंध रखते हैं, किंतु सार्वजनिक जीवन से जुड़े या उच्च पदों का दायित्व सँभालने वाले या सामाजिक संस्थाओं के संकल्प देशहित तथा समाजहित से जुड़े होना अपेक्षित है।

‘२०२१’ भारत के लिए एक विशेष अर्थ रखता है, क्योंकि २०२१ में हमारी स्वाधीनता के ७५वें वर्ष का शुभारंभ हो जाएगा। न केवल केंद्र सरकार, राज्य सरकारों तथा राष्ट्रीय संस्थाओं को अपना दायित्व समझना एवं निभाना होगा, वरन् सभी भारतवासियों को भी अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि भारत ने दुनिया के इतिहास में सबसे लंबा स्वाधीनता संग्राम लड़ा है, तब स्वाधीनता प्राप्त हुई है। असंख्य लोगों ने अपने जीवन की बाजी लगाई, अपनी सुख-सुविधाओं की कुर्बानी दी, अनगिनत मुसीबतें झेलीं, तब आजादी मिल पाई। युवा पीढ़ी को भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास को गंभीरता से पढ़ना चाहिए। एक ओर दर्जनों देशों पर राज करनेवाला अपार शक्तिसंपन्न ब्रिटिश साम्राज्य और एक ओर भयावह शोषण-दमन के शिकार होकर गरीबी से जूझते भारतीय! राजे, महाराजे, नवाब आदि कुछ अपवादों को छोड़कर (जैसे राजा नाहर सिंह तथा झज्जर के नवाब) अंग्रेजों के साथ थे।

तत्कालीन भारत में जहाँ ९० प्रतिशत लोग गाँवों में बसते थे, अशिक्षा, अंधविश्वासों के कारण लोगों में स्वाधीनता की चेतना न के बराबर थी। इन्हीं जमीनी सच्चाइयों को देखते हुए महात्मा गांधी ने अहिंसा और सत्याग्रह का रास्ता निकाला था, जिस पर चलकर दक्षिण अफ्रीका में असाधारण सफलता प्राप्त कर विश्व को चौंकाया था तथा चंपारण में भी इतने शक्तिशाली साम्राज्य को झुकने पर विवश किया। क्रांतिकारियों की अटूट देशभक्ति तथा सर्वोच्च बलिदानों की शृंखला ने भी ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें हिलाईं तथा स्वाधीनता की चेतना जगाने में बहुत योगदान दिया। चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह जैसे क्रांतिकारी करोड़ों भारतीयों के दिलों में बसे रहेंगे। नेताजी सुभाषचंद्र बोस तथा आजाद हिंद फौज का अनूठा योगदान भी अमर रहेगा। यह ऐसा संग्राम था, जिसमें बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएँ सभी शामिल थे। बहादुरशाह जफर जैसे मुगल बादशाह हों या रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेनम्मा या नागालैंड की रानी गाइंडिल्यू या आदिवासी, वनवासी या कवि, लेखक, पत्रकार—सबने अपनी भूमिका का अविस्मरणीय निर्वाह किया, इसीलिए आजाद भारत के लोगों पर बहुत बड़ा कर्ज है, जिसकी अदायगी करना हम सबका पावन कर्तव्य है। यह कर्ज है, जिन सपनों को लेकर आजादी की लड़ाई लड़ी गई, असंख्य बलिदान दिए गए, यातनाएँ सही गईं, उन सपनों को पूरा करना। वे सपने क्या थे—आजादी के बाद स्वतंत्र भारत में किसी भी प्रकार का शोषण, दमन, अन्याय, अत्याचार, भेदभाव, ऊँच-नीच नहीं होगी। आजाद भारत में सभी के लिए सम्मानपूर्ण जीवन की गारंटी होगी। गरीबी, भुखमरी, बेकारी, बीमारी, विषमता से मुक्ति मिलेगी। आजाद भारत खुशहाल भारत होगा, वह दुनिया भर के पीड़ित-वंचित लोगों की आवाज बनेगा और अपने लिए विश्व समुदाय में विशिष्ट सम्मान अर्जित करेगा। भारत के महान् नेताओं ने स्वाधीनता सेनानियों के इन्हीं सपनों को पूरा करने के लिए देश को गंभीर विमर्श के बाद एक उत्कृष्ट संविधान दिया। जिस देश में शिक्षा का घनघोर अभाव था, शिक्षा के लिए मीलों दूर जाना पड़ता था, जहाँ सूई भी नहीं बनती थी, प्राकृतिक आपदाओं में अथवा महामारियों में लाखों लोग मारे जाते थे, स्वास्थ्य सुविधाओं का अकाल था, खाद्यान्नों के लिए विदेशों पर निर्भर होना पड़ता था, उसी देश में इन सात दश्कों में अकल्पनीय परिवर्तन हुए हैं। कितने ही क्षेत्रों में भारत दुनिया के दस सर्वश्रेष्ठ देशों में शामिल है। आज भारत के अंतरिक्ष यान मंगल ग्रह और चंद्रमा तक जा चुके हैं। प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में हम सक्षम हो चुके हैं। विश्व में भारत का एक सम्मानजनक स्थान है।

अनेकानेक शानदार उपलब्धियों के बावजूद भारत अभी भी शहीदों के सपनों को साकार करने से बहुत दूर है, इस कड़वी सच्चाई से कोई इनकार नहीं कर सकता! हम अभी भी ‘हंगर इंडेक्स’ में बहुत नीचे हैं, मानव विकास में भी हम १३१वें स्थान पर हैं। अभी भी करोड़ों लोग निरक्षर हैं, करोड़ों लोग गरीबी-रेखा से नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं। करोड़ों बच्चे शिक्षा से वंचित हैं तथा बालश्रमिक बने हैं। महिला सुरक्षा की कड़ी चुनौती है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते’ के देश में बच्चियाँ तक अपराध की शिकार हो रही हैं। विषमता की खाई निरंतर गहरी होती गई है। एक ओर फाइव स्टार सुविधाओं वाले कॉन्वेंट स्कूल तो दूसरी ओर अभी भी बिना भवन के विद्यालयों में पढ़ाई, कितनी ही चुनौतियाँ हमारे सामने हैं! भारत पर एक और बड़ी जिम्मेदारी है, वह यह है कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, इसलिए हमारा लोकतंत्र एक आदर्श लोकतंत्र होना चाहिए, जहाँ एक गरीब से गरीब पीड़ित की भी आवाज सुनी जाए। दुर्भाग्य से भारत ने आजादी के बाद भी अंग्रेजों की बनाई उस नौकरशाही को बनाए रखा, जो अंग्रेजों ने दमन के लिए बनाई थी। इसी कारण करोड़ों रुपयों की कल्याणकारी योजनाएँ बनती हैं, किंतु जरूरतमंद लोगों तक नहीं पहुँच पातीं। सही मायने में लोकतंत्र अभी भी दूर है तथा ‘वीआईपी तंत्र’ अधिक मुखर है। अत्यंत देर से मिलनेवाला न्याय एक बहुत बड़ी चुनौती है। सरकार के मंत्रालय तथा विभाग या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच या एक राज्य का दूसरे राज्यों से मुकदमों की भरमार है। राजनीति में भी जोड़-तोड़ या दल-बदल में कानून बनने के बाद भी कोई बदलाव नहीं आया। मीडिया जो चौथा स्तंभ कहलाता है, गंभीर विषयों पर विमर्श करने की बजाय फालतू विषयों पर बेकार की बहसों में उलझा रहा है। विमर्श इस पर होना चाहिए कि शिक्षा के क्षेत्र में क्या सुधार हों, पुलिस व्यवस्था कैसे सुधरे, महिला सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो, लाखों आत्महत्याएँ कैसे रुकें, सड़क दुर्घटनाओं में मरनेवाले लाखों लोगों को कैसे बचाएँ, बच्चों की दुर्दशा कैसे सुधरे!

कुल मिलाकर हम सबको सामूहिक रूप से आत्मचिंतन करना होगा और नए इरादों, नए संकल्पों के साथ विकासशील भारत को ‘विकसित भारत’ बनाने में जुटना होगा। अब राजतंत्र नहीं है कि राजनीति या निर्णय-प्रक्रिया राजमहल तक सीमित हो तथा प्रजा राजमहल के रहमोकरम पर निर्भर हो, वरन् लोकतंत्र है। लोकतंत्र की सफलता के लिए अनिवार्य है कि प्रत्येक भारतवासी अपने कर्तव्यों तथा अधिकारों के प्रति जागरूक हो। अपने जनप्रतिनिधियों से निरंतर संपर्क बनाकर रखे। स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य सरकार तथा केंद्र सरकार के कार्यकलापों पर पैनी नजर रखे और अपनी प्रतिक्रिया दे। जहाँ हमारी संवैधानिक संस्थाओं या राष्ट्रीय संस्थाओं को अपना दायित्व निभाना है, वहीं स्वयंसेवी संस्थाओं, बुद्धिजीवियों, लेखकों, कवियों, पत्रकारों के साथ-साथ आम नागरिकों को भी अपने-अपने दायित्व सँभालने होंगे तभी हम ७५वाँ स्वाधीनता दिवस मनाने तथा शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि देने के हकदार होंगे।

जनशक्ति के चमत्कार

यह एक सच्चाई है कि हम हर बात में सरकार का मुँह ताकते हैं। सरकार हमारे लिए सबकुछ कर दे। सरकार को हम सब दैवीय शक्तियों से पूर्ण एक दिव्य या चमत्कारी महाशक्ति मान लेते हैं। यह भी सच है कि सरकार के पास अपार शक्तियाँ होती हैं, साधन होते हैं, धन होता है, अधिकारियों, कर्मचारियों की विशाल फौज होती है किंतु यह भी उतना ही सच है कि बिना जनसहयोग के वह सफल नहीं हो सकती। लोकतंत्र में तो यह और भी आवश्यक है कि सरकार को हर कदम पर जनता का पूरा-पूरा साथ मिले। सरकार में भी हमारे आपके परिवारों के लोग होते हैं, वे अतरिक्ष से नहीं उतरते।

विडंबना यही है कि जहाँ कुछ लोग होते हैं जो अपने परिवार के अतिरिक्त अपने समाज और देश के लिए सोचते भी हैं, कुछ-न-कुछ योगदान भी देते हैं वहीं बहुत से लोग निजी, जिंदगी निजी उपलब्धियों से आगे नहीं बढ़ पाते। यदि प्रत्येक भारतीय अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार अपनी निजी जिंदगी से परे जाकर समाज को थोड़ा सा भी योगदान दे तो देश का कायाकल्प हो सकता है। ऐसे अनगिनत उदाहरण मिल जाते हैं जहाँ लोगों ने समाज और देश की चिंता की तथा अपना योगदान देने की सोची और अपने ही साधनों से कुछ ऐसा कर डाला कि देशभर के लिए एक मिसाल बन गया। चलिए, कुछ उदाहरण आपसे साझा करता हूँ—इंदौर से २४ किलोमीटर दूर एक छोटे से कस्बे में सुमन चौरसियाजी अपने खर्चे से लता मंगेशकरजी के गानों के रिकॉर्ड इकट्ठा करते हैं और एक दिन ४०,००० के लगभग रिकॉर्ड और सीडी की अनूठी लाइब्रेरी बना डालते हैं तथा दुनिया के देशों की प्रसारण संस्थाएँ या टी.वी. चैनल उनसे सहयोग माँगते हैं।

बालोद जिले के हितापठार गाँव में एक मंदिर तक पहुँचने के लिए लोग ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ते से, कँटीली झाड़ियों से उलझते एक घंटे में पहुँच पाते थे तथा कुछ लोग घायल भी हो जाते थे। फिर १५० परिवारों की महिलाएँ रास्ता बनाने में जुट जाती हैं तथा दस महीने के श्रम से ३०० मीटर की सुंदर सड़क बना डालती हैं। अब इस समतल सड़क पर वाहन दौड़ते हैं।

टिहरी गढ़वाल का उदरखंडा गाँव पलायन के कारण वीरान हो जाता है; बचे हुए लोग कुछ संकल्प और सामूहिक खेती करके गाँव का कायाकल्प कर देते हैं और नगरों से ८० परिवार गाँव में वापस लौट आते हैं। निजी तौर भी योगदान करनेवालों के अनुपम उदाहरण मिलते हैं। बेंगलुरु के बाहरी इलाके में एक हनुमान मंदिर में भक्तों की संख्या बढ़ने लगती है तथा अनेक परेशानियाँ खड़ी हो जाती हैं। भक्तों की परेशानियाँ देखते हुए आसपास की जमीन के मालिक मोहम्मद बाशा लगभग एक करोड़ की जमीन मंदिर समिति को दान कर देते हैं। लॉकडाउन में छत्तीसगढ़ में जिन गरीब बच्चों के पास मोबाइल नहीं है, उन्हें पढ़ाने के लिए एक शिक्षक साइकिल से नियमित रूप से उन्हें पढ़ाने जाते हैं। और शिक्षक भी इसी तरह का प्रयास करते हैं। सैकड़ों कहानियाँ हैं। जरूरत है संवेदना की। उन महान् संदेशों को याद करने की, जो हमें हमारी महान् संस्कृति ने दिए हैं। हम सबमें एक राष्ट्रीय चरित्र का विकास हो जाए। हम सब देश के लिए भी सोचने लगें। उनसे प्रेरणा लें, जो अमरीका की सुविधापूर्ण संपन्न जिंदगी छोड़कर भारत के किसी ग्रामीण अंचल में लाखों लोगों का जीवन बदल रहे हैं।

जनवरी अंक पर आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी। हिंदी साहित्य को अप्रतिम योगदान देनेवाले श्री विष्णुचंद्र शर्मा एवं श्री मंगलेश डबराल को ‘साहित्य अमृत’ परिवार की श्रद्धांजलि।

(लक्ष्मी शंकर वाजपेयी)

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